फसल के गीत

harvest song
सावित्री राॅय के बांग्ला उपन्यास का अंगे्रजी अनुवाद ‘हार्वेस्ट सांग’ पढ़ा। पढ़ कर इतिहास का वह हिस्सा मन में मूर्त होने लगा। यह उपन्यास मूलतः तेभागा आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। बांग्ला में यह उपन्यास ‘पाका धानेर गान’ नाम से सबसे पहली बार तीन भाग में क्रमशः 1956,1957 व 1958 में प्रकाशित हुआ था। इसका अंगे्रजी अनुवाद 2006 मंे छपा।
अंग्रेजों के आने के बाद से ही बंगाल की धरती विप्लव की धरती में तब्दील हो गयी थी। बंगाल की क्रान्तिकारी परम्परा की एक कड़ी में ही 1940 के दशक में तेभागा आन्दोलन हुआ। और 1946 में कम्युनिस्ट पार्टी की किसान सभा के नेतृत्व मे जमीन्दारों के खिलाफ एक जबरदस्त आन्दोलन छिड़ गया। बंगाल के एक व्यापक क्षेत्रों में यह आन्दोलन छिड़ गया। अपने उरूज के समय इस आन्दोलन में लगभग 60 लाख लोगों ने हिस्सेदारी की।
जैसा कि नाम से स्पष्ट है, तेभागा आन्दोलन में किसान जमीन्दारों से अपनी उपज के दो तिहाई हिस्से की मांग कर रहे थे। किसान हाड़तोड़ मेहनत करके खेत में धान पैदा करते तो जमीन्दार उनकी उपज का आधे से ज्यादा हिस्सा हड़प लेते। इसके अलावा अन्य कर आदि अलग से लेते। इसके अतिरिक्त किसानों पर सामन्ती उत्पीड़न की कोई इन्तहां नहीं थी। 1930 के दशक से ही किसान सभा के कार्यक्रम में दोतिहाई हिस्से का मांग थी। 1940 के दशक में बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा और जनता त्राहि-त्राहि कर उठी। और फिर एक दिन जनता ने विद्रोह कर दिया। पूरे उत्तर बंगाल में यह आन्दोलन तेजी से फैल गया और इसने काफी जुझारु रूप ग्रहण कर लिया। रातों-रात तैयार फसल को किसानों ने काटकर उस पर अपना कब्जा कर लिया। जमीन्दारों के गोदामों में इकट्ठा धान लूट लिया। जाहिर है आन्दोलन जितना उग्र था, दमन भी उतना ही तीव्र हुआ। स्वतःस्फूर्त रूप से इस आन्दोलन में महिलाओं की हिस्सेदारी उल्लेखनीय है। जगह-जगह पर ग्रामीण महिलाओं ने नारीबाहिनियां बनायीं और अर्धमिलिीशिया के रूप में आत्मरक्षा दस्ते बनाए। वे न केवल फसलों को काटने में हिस्सेदारी कर रही थीं बल्कि वे आगे बढ़कर अपने सहभागी पुरुषों को दमन से भी बचा रही थीं। नन्दीग्राम के सुदूर गांवों की औरतों ने इस आन्दोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। यह सच है कि उस वक्त औरतों को घर से बाहर निकलने की इजाजत नहीं थी। वे पर्दे में रहती थीं। तमाम मेहनत करने के बावजूद फसलों पर उनका कोई कब्जा नहीं होता था। (हालांकि फसल और सम्पत्ति में औरतों की हिस्सेदारी तो आज भी नहीं है।) फिर भी बड़ी संख्या में औरतों ने तेभागा आन्दोलन में हिस्सेदार की।
ऐसे ही ऐतिहासिक दौर के बंगाल की कथा कही है बंगाल की मशहूर लेखिका साबित्री राॅय ने। उनका नाम बांग्ला साहित्य में महाश्वेता देवी सुलेखा सान्याल की कड़ी में लिया जाता है। इन्होंने अपने साहित्य में न केवल महिलाओं के मुद्दे को उठाया बल्कि राजनीतिक मुद्दों पर अपनी कलम चलायी। जैसा कि इतिहासकार तनिका सरकार अपने प्राक्कथन में लिखती हैं कि साबित्री राॅय का यह उपन्यास कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं है लेकिन पूरा उपन्यास पढ़ने के बाद उस समय के बंगाल की एक छवि जरूर मिलती है। इस उपन्यास को पढ़ कर तेभागा आन्दोलन की ऐतिहासिक तस्वीर नहीं मिलती। लेकिन कई छोटी-छोटी कथाओं और उपकथाओं के माध्यम से उस समय के ग्रामीण एवं शहरी बंगाल की एक छवि जरूर मिलती है।
उपन्यास का मुख्य नायक पार्थदास है। वह किसान सभा का भूमिगत कार्यकर्ता है और तेभागा आन्दोलन का नेता है। अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता को वह हर सम्बन्ध से ऊपर रखता है। चाहे उसे अपनी बेहद प्यार करने वाल मां हो, कठिनाई में जीवन बसर कर रहे पिता हों या परिवार हो या उनकी प्रेयसी भद्रा हो। वह इन सारे सम्बन्धों को बहुत बारीकी से अहसास करता है। पर ये सम्बन्ध कभी भी उसे कमज+ोर नहीं कर पाते। वह अपने इन सम्बन्धों से, खासकर प्रेम सम्बन्ध से एक नयी ऊर्जा लेता है और अन्त में किसानों के लिए लड़ता हुआ शहीद हो जाता है।
इसी तरह से इस उपन्यास में बहुत से पात्र ऐसे हैं जो राजनीतिक गुलामी को तोड़ने के क्रम में अपनी व्यक्तिगत गुलामी के चक्र को भी तोड़ने का प्रयास भी करते हैं। उपन्यास में कहीं-कहीं इसका उलटा भी होता है। उपन्यास में देबकी नामक एक पात्र जिसकी पढ़ने की इच्छा को दरकिनार कर उसकी शादी एक लम्पट आदमी से कर दी जाती है। तमाम अत्याचार करते हुए एक दिन उससे उसके नन्हे से बच्चे को छीन कर घर से निकाल दिया जाता है। वह कलकत्ता में आकर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती है और एक अस्पताल में नौकरी करती है और एक दक्षिण भारतीय पत्रकार कुनाल से प्यार करती है और उसके साथ घर बसाती है। किसान सभा का एक अन्य कार्यकर्ता अली गांव की एक बाल विधवा ब्राह्मणी मेघी से शादी करता है। इसकी कीमत उसे घर एवं गांव छोड़ कर चुकानी पड़ती है। एक अन्य पात्र सुलक्षण की प्रेयसी पत्नी लता अपने छोटे से बेटे के साथ अपने भूमिगत पति का इंतज+ार करती है और जीवन जीने का संघर्ष करती है। इस तरह यह उपन्यास अपने अलग-अलग आख्यानों में तमाम सामाजिक वर्जनओं को तोड़ता है।यह दिखाता है कि उस समय की औरत कितनी बंधी हुयी थी और साथ ही उस बन्धन तोड़ने का प्रयास भी कर रही थी। न केवल व्यक्तिगत रूप से बल्कि सामाजिक रूप से भी।
tebhaga
हालांकि शरत्चन्द्र के उपन्यासों में नारीपात्र बहुत सशक्त और बोल्ड दिखायी देते हैं। पर मुझे उनका एक भी उपन्यास नज+र नहीं आता जिसमें उन्होंने विधवा विवाह दिखाया हो। साबित्री राॅय का उपन्यास इन्हीं अर्थों में उनसे अलग है कि वे अपने पात्रों को गढ़ते हुए उस युग की सीमा से आगे जाती हैं और उसे ऐसे गढ़ती हैं जैसे उसे होना चाहिए। चाहे वह भद्रा हो, देबकी हो या मेघी हो या लता हो। इस उपन्यास के सारे पात्र अपने अपने जीवन में संघर्ष करते हैं और खुद को सामाजिक राजनीतिक संघर्ष से किसी न किसी रूप में जोड़ते हैं।
इस उपन्यास का अंग्रेजी रूपान्तरण किया है-चन्द्रिमा भट्टाचार्य एवं अद्रिता मुखर्जी ने। हिन्दी में इसका अनुवाद होना चहिए। जिससे एक बड़े पाठक वर्ग तक इसकी पहुंच बनेगी और एक आन्दोलन जिसके बारे में मुख्य धारा के इतिहास में बहुत कम जगह दी जाती है, उसकी एक झलक पाठकों को मिल सकेगी।

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