यह दुनिया किसकी हैं…

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आज जब पूरी दुनिया एक बार फिर मंदी में गोते लगा रही है तो 1929 की ‘महामंदी’ पर बनी यह क्लासिक फिल्म (Kuhle Wampe, or Who Owns the World?) बार बार याद आ रही है। इस फिल्म से ‘ब्रेख्त’ और ‘हान्स आइसलर’ (ब्रेख्त के सभी नाटकों में हान्स आइसलर का ही संगीत है। ‘ए रिबेल इन म्युजिक’ उनकी बहुत मशहूर किताब है।) के जुड़े होने से यह फिल्म और भी खास हो जाती है। ब्रेख्त ने इस फिल्म की पटकथा लिखी है और फिल्म के अन्तिम हिस्से को खुद निर्देशित भी किया है। यह फिल्म बर्लिन में 1932 में बनी थी और इसेे तुरन्त ही बैन कर दिया गया। हालांकि हिटलर अभी सत्ता में नहीं आया था। फिल्म में ‘एबार्शन’ जैसे मुद्दे उठाने और फिल्म के ‘वाम नजरिये’ के कारण इसे बैन किया गया था। बाद में हिटलर के पूरे काल में यह बैन रही। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इसका प्रिन्ट इतना खराब हो चुका था कि इसे दोबारा रिलीज नही किया जा सका। अन्ततः 1999 में ‘ब्रिट्रिश फिल्म इन्स्टीट्यूट’ ने इसका ‘डिजिटल वर्जन’ तैयार किया और तब जाकर यह दुनिया के सामने आ पायी।
बहरहाल फिल्म महामंदी और उसके प्रभावों पर है। फिल्म की शुरुआत अखबारों की कतरनों के साथ होती है कि दुनिया में बेरोजगारी कितनी तेजी से बढ़ रही है। उसके तुरन्त बाद बर्लिन में काम खोजते मजदूरों की भागती साइकिलों का चित्र है। यह दृश्य बहुत प्रभावकारी है और साइकिलों की बढ़ती रफ्तार काम खोजतें मजदूरों की बेचैनी को बहुत प्रभावी तरीके से व्यक्त कर देते है। यह दृश्य हमें बाद की एक अन्य क्लासिक ‘दि बाइसिकिल थीफ’ की याद दिला देते हैं।
फिल्म की मुख्य मात्र ‘एनी’ के भाई को जब कहीं भी नौकरी नही मिलती है तो वह चौथे मंजिल की खिड़की से कूद कर आत्महत्या कर लेता है। कूदने से पहले वह अपनी कलाई घड़ी को खोलकर मेज पर सुरक्षित रख देता है। मतलब साफ है- घड़ी की कीमत एक मजदूर के जीवन से कही ज्यादा है।
एनी के प्यार और उसकी सगाई पर मंदी के असर को बहुत ही सशक्त तरीके से दिखाया गया है। बाद में ‘एनी’ मजदूर आन्दोलन में, विशेषकर उनकी सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल हो जाती है। इसी सन्दर्भ में फिल्म में एक नुक्कड़ नाटक का भी दृश्य है। यहां ब्रेख्त के ‘इपिक थियेटर’ की भी एक झलक हम पा जाते हैं।
फिल्म का अन्तिम दृश्य एक ट्रेन का है। इसमें समाचार पत्र की एक सुर्खी (ब्राजील में लाखों टन काफी को सुनियोजित तरीके से नष्ट कर दिया गया है) पर यात्रियों में बहस छिड़ जाती है। यह बहस बहुत रोचक है। और इस पर ब्रेख्त की छाप एकदम स्पष्ट है। बहस के अन्त में एक मध्य वर्गीय व्यक्ति कहता है कि ब्राजील में क्या हो रहा है इसका हमसे क्या लेना देना। इस परिस्थिति को हम तो नही बदल सकते। तब एक मजदूर वर्ग का व्यक्ति नाटक के अंदाज में अनेक मध्य वर्ग के लोगों की ओर उंगली से इशारा करते हुए कहता है कि हां इस दुनिया को आप, आप, आप नही बदल सकते क्योंकि आप लोग इस दुनिया से संतुष्ट हैं। इसे वही लोग बदलेंगे जो इस दुनिया से असंतुष्ट हैं।
फिल्म यही समाप्त हो जाती है। और अंत में ब्रेख्त का लिखा और हान्स आइसलर का संगीतबद्ध एक खूबसूरत गीत बजता है।
फिल्म का निर्देशन Slatan Dudow ने किया है जो खुद बहुत गहराई से वाम विचारधारा से जुड़े हुए थे और जर्मन कम्युनिस्ट के सदस्य थे।
पूरी फिल्म आप यहां देख सकते हैं।

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