बाला साहेब ठाकरे होने का मतलब

87 साल की उम्र में बाला साहब की मौत हो गयी। जीने के लिए इससे ज्यादा और उम्र की भला क्या जरूरत? एक भरी पुरी जि+न्दगी। जीते जी इतनी शोहरत, इतनी दौलत! मरने के बाद इतना मातम! अन्तिम संस्कार में 20 लाख की जनता का शोक। चैबीसों घण्टे घड़ी के कांटे से भी तेज गति से चलने वाली मुम्बई थम गयी। दो करोड़ की आबादी में से 20 लाख आबादी बालासाहेब की अन्तिम संस्कार में शामिल थी। बाकी सारे लोग सांस रोके समय के बीत जाने का इंतज+ार कर रहे थे। समूचा राष्ट्रीय मीडिया बालासाहेब के जीवन की कशीदाकारी उकेरने में पूरी शिद्दत से लगा रहा। चिल्ला-चिल्ला के टीवी एंकरों का गला बैठ गया। प्रधानमंत्री ने नेताओं के लिए आयोजित डिनर पार्टी रद्द कर दी। सारे मन्त्री सन्तरी, फिल्मी हस्तियां और बिजनेस टाईकून उनके लिए शोक सन्तप्त दिखे। और इसकी परिणति हुयी दो युवतियों की गिरफ्तारी से। शाहीन नामक एक लड़की ने अपने फेसबुक एकाउण्ट पर उनके निधन पर हुई बन्दी एवं इस दिखावे के औचित्य पर सवाल उठाया। उसकी एक सहेली ने उसे लाइक कर लिया। फिर क्या था। शिव सैनिको ने बालासाहेब की विरासत सम्भाल ली और उनके सच्चे उत्तराधिकारी की रवायत सम्भालते हुए शाहीन के डाक्टर चाचा के क्लीनिक पर हमला कर दिया। तोड़ फोड़ की और लड़की के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी। मुम्बई पुलिस ने भी बगैर किसी देरी के उन दोनो लड़कियों को गिरफ्तार कर लिया।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर क्या हुआ कि एक प्रान्तवादी, साम्प्रदायिक एवं फासीवादी बुजुर्ग के अपनी प्राकृतिक मौत मर जाने पर इतना शोक क्यों उमड़ पड़ा। क्या था उस व्यक्ति में कि अधिकांश मध्यवर्गीय मराठी मानुष, नेता, अभिनेता, बिल्डर, उद्योगपति इतने शोकाकुल हो उठे।
यहां हम बाला साहब ठाकरे के बहाने भारत के शासकवर्ग का असली चेहरा भी देख सकते हैं। आखिर शासक वर्ग के इन रहनुमाओं को बालठाकरे से इतनी हमदर्दी क्यों है?
दरअसल जिस समय बाला साहेब ठाकरे ने शिव सेना की बागडोर सम्भाली, उस समय मुम्बई के बड़े पूंजीपति संगठित मजदूर आंदोलन का सामना कर रहे थे। मजदूर यूनियनंे ज्यादातर सीपीई के हाथ में थी। गिरनी कामगार यूनियन, मजदूरो की बड़ी और जुझारु यूनियन थी। मुंबई 1947 से पहले से ही मजदूर आंदोलन का बड़ा क्रेन्द्र रहा है। 1946 में नौसैनिकों के विद्रोह के समर्थन में सबसे बड़ी और असरकारक हड़ताल मुम्बई में ही हुई थी। शिवसेना के अविर्भाव के समय तक भी यह परंपरा बरकरार थी।
कांग्रेस पर पूंजीपतियों की तरफ से मजदूरों को ‘अनुशाषित करने’ का बहुत दबाव था। वह समय ‘निजीकरण’, ‘उदारीकरण’ का भी नहीं था। अतः काग्रेस चाहते हुए भी यह काम खुले तौर पर कानून का सहारा लेकर नहीं कर सकती थी। उस समय काग्रेस को कानून व्यवस्था के बाहर एक ऐसी फोर्स की जरुरत थी जो राज्य और कानून व्यवस्था के मौन समर्थन से यह काम भी कर दे और राज्य और काग्रेस का मजदूर विरोधी चरित्र भी उजागर ना हो। ‘संयुक्त महाराष्ट्र’ आन्दोलन से शिवसेना और बाल ठाकरे को एक पहचान और अहमियत मिल चुकी थी। और अब काग्रेस और मुम्बई के रुलिंग क्लास वह मिल चुका था, जिसकी उसे तलाश थी। एक बालठाकरे नामक व्यक्ति को शेर की खाल पहनाने की कवायद शूरु हो गयी। और जन्म हुआ उस ‘शेर’ का जिसके दांतो से मजदूरों, दलितो और मुसलमानोे का खून रिस रहा था। क्या आज का रुलिंग क्लास मजदूरो, दलितों और मुसलमानों के खिलाफ खड़ा नही है? तो बाला साहेब की मौत पर इनका टेसुवे बहाना स्वाभाविक ही है।
जून 1970 में इस ‘शेर’ का पहला राजनीतिक निशाना बने मजदूर आन्दोलन के जुझारु नेता और सीपीई के तत्कालीन एमएलए कृष्णा देसाई। एक शिव सैनिक ने उनकी हत्या कर दी। खुलेआम इस हत्या का अनुमोदन करते हुए बाला साहेब ने कहा कि मुम्बई पर ‘लाल भैया’ लोगो की नही बल्कि शिवसेना की हूकूमत चलेगी।
कृष्णा देसाई की हत्या से खाली हुई सीट पर हुए उपचुनाव से पहला शिवसैनिक एमएलए बनकर महाराष्ट्र विधानसभा में पहुंचा। यानी शिवसेना की चुनावी राजनीतिक यात्रा एक मजदूर नेता की लाश पर चढ़कर शुरु हुई। इससे पहले शिवसैनिको ने 1967 में एक बडा+ हमला करते हुए ‘गिरनी कामगार युनियन’ के दफ्तर को पूरी तरह जला दिया था। उस समय के मुख्यमंत्रियों क्रमशः बसंतराव नाइक और बसंतदादा पाटिल का इन्हे जबर्दस्त संरक्षण मिला हुआ था। यह संरक्षण इस हद तक था कि शिवसेना बसंत सेना के रुप में भी जानी जाने लगी थी।
महाराष्ट्र डाॅ. अम्बेडकर और दलित आंदोलन की भी कार्यस्थली रहा है। महाराष्ट्र विशेषकर मुम्बई के सवर्ण शासक वर्ग के लिए यह आंदोलन हमेशा से उसकी आंख में चुभता रहा है। शिवसेना इस मोर्चे पर भी उसके लिए राहत लेकर आयी। हालांकि यहां शिवसेना ने दोहरी नीति अपनायी – कुचलने के साथ साथ कोआप्ट करने की नीति। महाराष्ट्र के बहुचर्चित दलित आंदोलन ‘दलित पैंथर’ को कुचलने में राज्य के साथ साथ शिवसेना की भूमिका अब किसी से छिपी नही है। ‘दलित पैंथर’ के सक्रिय कार्यकर्ता ‘भागवत जाधव’ की शिवसेना ने जघन्य हत्या कर दी। दूसरी और नामदेव ढसाल जैसे बड़े दलित लेखक को शिवसेना में महत्वपूर्ण जगह देकर उन्हे ‘कोआप्ट’ कर लिया। और उनके दलित आन्दोलनकारी रुप की हत्या कर दी। आनन्दपटवर्धन ने अपनी कई फिल्मों में इस पहलू पर रोशनी डाली है।
1990 आते आते तो पूरा परिदृश्य ही बदल गया था। ‘निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण’ की आंधी के साथ साथ साम्प्रदायिकता का बुखार भी चरम पर था। साम्प्रदायिक ताकतों के बीच एक तरह की होड़ सी मच गयी कि कौन अधिक साम्प्रदायिक है। परिणाम था- बाबरी मस्जिद का विध्वंस और तत्पश्चात मुम्बई में करीब 2000 मुसलमानों का सुनियोजित कत्लेआम । जस्टिस श्री कृष्णा आयोग ने इस दंगे के लिए सीधे सीधे बाल ठाकरे को दोषी ठहराया, लेकिन शासक वर्ग के चहेते बाल ठाकरे पर कोई आंच नही आयी। लता मंगेशकर जब यह कहती हैं कि बाला साहेब के जाने के बाद मुम्बई अनाथ हो गयी तो क्या उन्हे अहसास है कि 1992 के कत्लेआम में कितने मुस्लिम बच्चें अनाथ हो गये थे ?
कहना ना होगा कि इस बीच साम्प्रदायिक राजनीति का वोट बैंक इतना ठोस हो चुका था कि बाला साहेब को नजरअंदाज करना किसी के लिए भी मुश्किल हो गया था।
अभी अभी खबर आयी कि कसाब को फांसी दे दे गयी। आतंक के एक रुप को फांसी और दूसरे रुप को गार्ड आफ आनर ।
भारतीय राज्य को यह अच्छी तरह पता है कि आतंक के किस रुप को कुचलना है और किस रुप को गले लगाना है। बाल ठाकरे परिघटना भी इसका अपवाद नहीं है।

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