Author Archives: kriti shree

The People Vs Tech: How the Internet is Killing Democracy (and how We Save It) by Jamie Bartlett

‘फ्रांसिस फुकोयामा’ के इतिहास के अन्त की घोषणा के ठीक 16 साल बाद ‘क्रिस एण्डरसन’ ने 2008 में अपने एक लेख में थ्योरी के अन्त (The End of Theory: The Data Deluge Makes the Scientific Method Obsolete) की भी घोषणा … Continue reading

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Kameradschaft [Comradeship]

मेघालय के पूर्वी जैनतिया पहाड़ी पर एक गैर कानूनी कोयला खदान में फंसे 15 खनिकों को आज 26 दिन बाद भी बचाया नहीं जा सका और अभी अभी खबर आ रही है कि वहीं पर पास की एक दूसरी गैरकानूनी … Continue reading

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Look Who’s Back : हिटलर ज़‍िन्‍दा है

हिटलर ज़‍िन्‍दा है, कभी वह अख़लाक के फ्रीज़र के गोश्‍त में घुस जाता है, कभी वह जुनैद की टोपी के धागों में उलझ जाता है, कभ्‍ाी वह पहलू ख़ान और रकबर ख़ान के मवेशियों के झुण्‍ड में घुस जाता है, … Continue reading

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The Power of the Documentary by John Pilger

There are 26 films in this festival and each one pushes back a screen of propaganda – not just the propaganda of governments but of a powerful groupthink of special interests designed to distract and intimidate us and which often … Continue reading

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Sankofa

‘ओपन वेन्‍स ऑफ लैटिन अमरीका’ जैसी चर्चित पुस्‍तक के लेखक ‘एडुवार्डो गैलीयानों’ ने कही इतिहास के बारे में लिखा है कि इतिहास कभी भी हमें अलविदा नहीं कहता, बल्कि कहता है- फिर मिलेंगे (History never really says goodbye. History says, … Continue reading

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‘सआदत हसन’ मर गया ‘मंटो’ जिन्दा है……….

मैं उस सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा जो पहले से ही नंगी है। उसे कपड़े पहनाना मेरा काम नहीं है। यह काम दर्जी का है।- मंटो 2017 के ‘जश्न-ए-रेख़्ता’ में जब मैंने ‘नंदिता दास’ को यह कहते सुना कि वे … Continue reading

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खून की पंखुड़ियां – गुगी वा थ्योंगो

कैद हमेशा यातनादायी नहीं होती, विशेषकर उस वक्त जब आप किसी शानदार किताब की गिरफ्त में हों। मेरा पिछला हफ्ता ‘गुगी वा थ्योंगो’ के मशहूर उपन्यास ‘‘खून की पंखुड़ियां’’ की शानदार गिरफ्त में बीता। इस उपन्यास का अन्तिम पन्ना पलटते … Continue reading

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Survivors Guide To Prison

अमरीका में जब ‘डोनाल्ड ट्रम्प’ की राष्ट्रपति पद पर जीत हुई तो दो कम्पनियों के शेयरों में 100 प्रतिशत का उछाल आ गया। ये कम्पनियां है- ‘कोर सिविक’ और ‘जीओ ग्रुप’। ये कम्पनियां अमरीका में निजी जेलों का संचालन करती … Continue reading

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“Young Karl Marx”: A Must-See Film by Frieda Afary

It is not easy to make a movie about a multidimensional and historical figure like Marx without privileging one aspect of that figure’s life over another.  Raoul Peck’s Young Karl Marx however, has succeeded in presenting a holistic view of … Continue reading

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‘Mephisto’: एक कलाकार जिसने अपनी आत्मा फासीवादियों को बेच दी….

जर्मन फासीवाद पर वैसे तो कई बेहतरीन फिल्में हैं, लेकिन 1981 में आयी यह फिल्म एकदम अलग तरह की है। ‘हेन्डरिक’ एक स्टेज कलाकार है। वह आम तौर से वाम की ओर झुका हुआ हैै। और उसी तरह के नाटक … Continue reading

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