Monthly Archives: October 2013

राजेन्द्र यादव: एक हंस अकेला

‘राजेन्द्र यादव’ हिन्दी साहित्य की अकेली ऐसी शख्सियत हैं, जिनसे आप प्यार और नफरत एक साथ कर सकते हैं। उनका एक संपादकीय आपके विचारों और आपकी चिन्ताओं के साथ मजबूती से खड़ा नजर आयेगा तो अगले माह की संपादकीय आपको … Continue reading

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‘Stealing a Nation’

‘कभी कभी एक त्रासदी या एक अपराध यह बताने के लिए पर्याप्त होते हैं कि लोकतंत्र के नकाब के पीछे पूरा सिस्टम काम कैसे करता है और यह समझने में मदद मिलती है कि शक्तिशाली लोग पूरी दुनिया को कैसे … Continue reading

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‘Le Capital’ – Greed is God

2008-09 की मंदी के बाद हेज फण्ड, डेरिवेटिव, स्टाक मार्केट, सी ई ओ, रेटिंग ऐजेन्सी, टाक्सिक एसेट, अधिग्रहण, इनवेस्टमेन्ट जैसे शब्द अर्थशास्त्र न जानने वाले लोगों के शब्दकोश का भी हिस्सा बनने लगे। इन चीजों के इर्द गिर्द कई अच्छी … Continue reading

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चोरी भी सीनाजोरी भी

पूंजीपतियों,बैंकों के बड़े अधिकारियों,नौकरशाहों और नेताओं के बीच की मिलीभगत जगजाहिर है। लेकिन भारत में इस पर शायद ही कोई साहित्य हो। भारत में इस गठजोड़ पर सबसे उम्दा किताब ‘दी पालिस्टर प्रिन्स’ है। लेकिन यह किसी भारतीय ने नही … Continue reading

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