‘खीम सिंह बोरा’- एक राजनीतिक बंदी

आज जब हम वरवर राव व अन्य राजनीतिक बन्दियों के लिए अपनी आवाज उठा रहे हैं तो हमें यह नही भूलना चाहिए कि देश की तमाम जेलों में हज़ारो ऐसे कैदी बंद हैं जो अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण जेलो में है। एक अनुमान के अनुसार इस समय देश की जेलों में करीब 22 हजार ऐसे कैदी हैं जिन पर किसी ना किसी तरह से माओवाद-नक्सलवाद से सम्बन्धित केसेस हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ये सभी राजनीतिक कैदी है। जाहिर है इनका बहुलांश छत्तीसगढ और झारखण्ड की जेलों में हैं। इनमे से अधिकांश ग़रीब, दलित व आदिवासी है। अपनी सामाजिक- आर्थिक स्थितियों की वजह से इनमे से ज्यादातर की कोई पैरवी करने वाला भी नहीं है। वरवर राव जैसे राजनीतिक बन्दी इन सबका प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए वरवर राव की रिहाई की मांग में इन सबकी रिहाई की मांग भी शामिल है।
ऐसे ही एक राजनीतिक कैदी ‘खीम सिंह बोरा’ लखनऊ जेल में मेरे साथ थे। आज से ठीक एक साल पहले जेल में मेरी उनसे मुलाक़ात हुई थी।


दरअसल एटीएस कस्टडी के दौरान ही मुझे पता चला कि बरेली से किन्ही बोरा जी को भी पकड़ा गया है। बोरा जी को मैं नाम से जानता था कि वे उत्तराखण्ड के आंदोलनकारी है, लेकिन कभी मिला नहीं था। एटीएस कस्टडी के बाद जब मैं वापस 15 जुलाई को जेल पहुंचा तो वहां बोरा जी से मेरी पहली मुलाकात हुई। वे भी मेरे नाम से परिचित थे और टीवी न्यूज के माध्यम से उन्हें मेरी गिरफ्तारी की खबर हो चुकी थी। सुबह की गिनती के बाद जब मैं अहाते में टहल रहा था तभी मेरे कानों के एक आवाज पड़ी- ‘यहां भोपाल से कोई मनीष नाम के कैदी आये है, जिन पर माओवादी केस डाला गया है?’ मैंने आवाज की दिशा में देखा और उनकी ओर इशारा करते हुए पूछा- ‘आप बोरा जी?’ एक क्षण को हमने एक दूसरे को देखा और ऐसा लगा कि हम एक दूसरे को कितने दिनों से जानते हैं। हम तुरन्त आगे बढ़कर गले मिले और कुछ देर तक हम यह भूले रहे कि हम जेल में हैं।
अब हमारे पास बातचीत का खजाना था- ‘ ग़में दौरा से लेकर ग़में जानां तक’। बातचीत में ही उन्होंने बताया कि उन्हें बरेली से नहीं बल्कि अल्मोड़ा से गिरफ्तार किया गया है, जब वे बस से कहीं जा रहे थे। उन्होंने बताया कि अल्मोड़ा में गिरफ्तारी के तुरन्त बाद उन्हें थोड़ी (?) यातना भी दी गयी। उन्हें कुछ समय तक एक खास कठिन पोजीशन में नंगे होकर खड़े होने को कहा गया। कस्टडी में व्यक्ति को नंगा करने के पीछे सुरक्षा एजेंसियों का जो ‘ओबसेशन’ है वह समझ से परे है। हालाँकि व्यक्ति को नंगा करने की प्रक्रिया में यह सिस्टम कितना नंगा होता जा रहा है, शायद उन्हें इसका अहसास नहीं है। बाद में पूछताछ के दौरान एक एटीएस के बन्दे ने उन्हें एक पैकेट दिया और कहा- ‘बोरा जी यह आपके लिए एक छोटा सा गिफ्ट है।’ पैकेट में 315 बोर का एक तमंचा था। यह बताते हुए बोरा जी खूब हंस रहे थे। एटीएस के उसी बन्दे ने आगे कहा कि खाली-खाली गिरफ्तार करना अच्छा नहीं लग रहा है। बोरा जी ने भी वह ‘गिफ्ट’ स्वीकार कर लिया। उनके पास चारा भी क्या था। पुलिस के दिए ऐसे असंख्य की ‘गिफ्टों’ के कारण ना जाने कितने लोग सालों साल जेल यातना भुगत रहे है।
बाद में जब उनकी चार्जशीट आयी तो उसमें कुछ मज़ेदार बातें लिखी हुई थी। अल्मोड़ा से गिरफ्तार करने के बावजूद चूंकि स्टोरी यह दिखानी थी कि इन्हें बरेली रेलवे स्टेशन से उस वक्त गिरफ्तार किया गया जब वे धनबाद जाने के लिए ट्रेन पकड़ने वाले थे। ऐसे में बोरा जी के पास उस ट्रेन का टिकट होना जरूरी था। लेकिन गिरफ्तार तो अल्मोड़ा से किया था तो टिकट कहां से लाते, तो इसका जो तर्क उन्होंने चार्जशीट में दिया वह और भी हास्यास्पद था। चार्जशीट में उन्होंने लिखा कि बरेली स्टेशन पर गिरफ्तार करने के बाद जब अभियुक्त से टिकट के बारे में पूछा गया तो अभियुक्त ने हाथ जोड़कर कहा कि ‘साहब मैं बहुत गरीब आदमी हूं, बिना टिकट के ही जनरल में यात्रा करता हूं।’ जेल में हमारे दोस्तो के बीच यह लाइन तकिया कलाम की तरह चल निकली। दिन भर में जिसको भी बोरा जी से मस्ती करनी होती वो बोरा जी के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता और यह लाइन दोहरा देता। यहां तक कि एक बार घर की मुलाकात आने के बाद जब सिपाही ने एक मजाकिया दोस्त कैदी से पैसे की डिमान्ड की तो उस कैदी ने बड़े ही मजाकिया अन्दाज में उसके सामने यही लाइन दोहरा दी। हम इस पर कितना भी हंसे लेकिन सच तो यही है कि इसी तरह के हास्यास्पद तर्क कैदी को सालों-साल जेल के अन्दर रखने की क्षमता रखते हैं। भीमाकोरेगांव वाले केसों में भी हम इसे साफ साफ देख सकते हैं। अमर उजाला ने उनके पास से जब्त प्रतिबंधित साहित्य की जो सूची जारी की, उस पर एक नज़र डालना रोचक होगा- ‘काले कानूनों से बिंसर जंगल कब्जाया 23 मार्च 2013, संसदीय चुनाव का बहिष्कार करो, शोषण, दमन, अन्याय जायज ठहराने का चुनाव है, यह दो अप्रैल 2014, सरकार, नौकरशाह, भ्रष्ट नेताओं और बड़े ठेकेदारों के लिए आपदा बनी वरदान, जनता के लिए अभिशाप, वोट का नहीं चोट का रास्ता अपनाओ क्रांतिकारी किसान संगठन एक फरवरी 2014, और जल, जंगल, जमीन व खनिज को लूटने से बचाओ । इसके अलावा संगठन से संबंधित चार पत्रिकाएं भी मिलीं, जिसमें से दो मुक्तिपथ जनवरी-मार्च 2013 और दो पत्रिकाएं जनहुकुमत मुखपत्र हैं। बरामद पंफ्लेटों और साहित्य का भी एटीएस की ओर से कानूनी परीक्षण कराया जा रहा है।’
57 साल के बोरा जी उत्तराखण्ड के पुराने आन्दोलनकारी हैं। पहली बार वे 1984 में ‘नशा नहीं रोजगार दो’ के मशहूर आन्दोलन में शमशेर सिंह बिष्ट, राजीव लोचन शाह जैसे वरिष्ठ आन्दोलनकारियों के साथ जेल गये थे। मार्क्सवाद के साथ उनका परिचय यहीं जेल में हुआ। उस समय शमशेर सिंह बिष्ट जेल में ही बोरा जी जैसे नौजवान आन्दोलनकारियों का क्लास चलाया करते थे। उसके बाद वे उत्तराखण्ड के सभी प्रमुख आन्दोलनों में शामिल रहे। 2017 में जब जिन्दल ने अल्मोड़ा के नजदीक रानीखेत में आम किसानों की जमीन पर कब्जा करके उस पर जिन्दल विद्यालय बनाने का प्रयास किया तो उसके खिलाफ हुए जबरर्दस्त आन्दोलन में भी इनकी भागीदारी रही और फलतः जिन्दल को अपना यह प्रोजेक्ट रोकना पड़ा।
मजेदार बात यह है कि उनके खिलाफ सभी 5 केसेस उत्तराखण्ड में हैं। लेकिन उन्हें लखनऊ में लाकर रखा गया है, ताकि उनकी पैरवी मुश्किल हो जाये और परिवार की उन तक पहुंच कठिन बनी रहे। फाइलेरिया ग्रस्त उनकी पत्नी साल में महज एक बार ही उनसे मिल सकी है। कोविड के दौरान जब जेल की मुलाकाते बन्द हैं और बाहर से जरूरत का कोई भी सामान अन्दर नहीं जा पा रहा है तो बोरा जी के लिए मुश्किलें और बढ़ गयी है। बोरा जी शुगर के मरीज हैं और जेल में मेरे रहते तीन बार उनका शुगर काफी डाउन हो गया था और वे बेहोशी के कगार पर पहुंच गये थे। लेकिन हम सबने मिलकर जल्द ही उन्हें संभाल लिया था।
मुलाक़ात और आवश्यक चीज़ों के अभाव में जेल में इस समय अधिकांश बन्दी भयानक डिप्रेशन में जी रहे हैं।
कल यानि 16 जुलाई को बोरा जी की बेल पर सुनवाई है। एक क्षीण सी उम्मीद तो है, लेकिन ये व्यवस्था इन तमाम उम्मीदों का क़त्ल करके ही तो जवान हुई है। ऐसे में इस व्यवस्था से कितनी उम्मीद की जा सकती है?

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अंत की शुरुआत……….

दार्शनिक दृष्टी से देखेँ तो ‘अंत’ कुछ नही होता। हर ‘अंत’ के साथ एक अनिवार्य ‘शुरूआत’ जुड़ी होती है। इस बात का अहसास मुझे तब हुआ जब मैंने ‘अब्बू की नज़र में जेल’ का अन्तिम भाग असली ‘अब्बू’ को भेजा और फिर फोन से उससे बात हुई। दरअसल मैं ‘अब्बू की नज़र में जेल’ का प्रत्येक भाग सबसे पहले असली अब्बू को भेजता था। 7 साल का हो चुका अब्बू धीमे धीमे एक-एक लाइन पढ़ता। जहां उसे दिक्कत होती, अपनी ईजा की मदद लेता। उसके बाद वह मुझे फोन करता कि मौसा मैंने तेरी डायरी पढ़ ली। मैं बोलता कि सच में तूने पढ़ ली। वह बोलता, और क्या, चाहो तो टेस्ट ले लो। फिर मैं डायरी के उस हिस्से से कुछ पूछता और वह सही सही जवाब देता। फिर मैं उसे पदुम नम्बर देता। कई बार वह पलट कर खुद भी सवाल करता। जैसे 12 वां भाग पढकर उसने बड़ी चिन्ता से पूछा कि मौसा ‘कादिर’ को अब कौन निकालेगा। उसकी तो मां भी नहीं है। मैं कुछ बोलता, इससे पहले ही वह खुद बोल पड़ा-‘मौसा उसे तुम क्यो नही निकाल सकते।’ मैंने उसे आश्वस्त किया कि ठीक है मैं उसे निकाल लूंगा।
जब मैंने अब्बू को डायरी का अन्तिम हिस्सा भेजा तो उसने डायरी पढ़कर मेरे सवालों का जवाब देने के बाद अचानक बोला-‘मौसा, काश कि मैं भी तेरे साथ जेल में होता।’ मैं चौक गया। मैंने तुरन्त पूछा-‘अब्बू तुझे जेल से डर नहीं लगता?’ अब्बू तुरन्त बोला-‘पहले लगता था, लेकिन तुम्हारी डायरी पढ़ने के बाद नहीं लगता।’ मेरी जेल डायरी का इससे अच्छा अन्त और क्या हो सकता है। इसने एक नयी शुरूआत को जन्म दे दिया। मेरे जेहन में ‘गोरख पाण्डेय’ की एक मशहूर कविता गूंजने लगी-
वे डरते हैं
किस चीज से डरते हैं वे
तमाम धन-दौलत
गोला-बारूद पुलिस-फौज के बावजूद ?
वे डरते हैं
कि एक दिन
निहत्थे और गरीब लोग
उनसे डरना
बंद कर देंगे

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अब्बू की नज़र में जेल- अंतिम भाग

एक दिन सुबह-सुबह गिनती के बाद अब्बू ने अचानक बिना किसी सन्दर्भ के मुझसे पूछा-‘मौसा, अगर तुम्हारे पास अपनी जेल होती तो क्या तुम मौसी को कभी जेल में डालते।’ मैंने बेहद आश्चर्य से उससे पूछा कि ये क्या पूछ रहा है तू। उसने मेरे आश्चर्य वाले भाव पर बिना ध्यान दिये आगे जोड़ा-‘मतलब कि मौसी तुमसे भी तो झगड़ा करती है, तो उस समय यदि तुम्हारे पास जेल होती तो क्या तुम मौसी को जेल में बन्द कर देते।’ अब्बू बिना रूके उसी रौ में आगे बोलता रहा-‘लेकिन जब तुमने सरकार से झगड़ा किया तो सरकार ने तुम्हें जेल में क्योँ डाला।’ उसकी इस बात ने मुझे और ज्यादा आश्चर्य में डाल दिया। मैं समझ नहीं पाया कि क्या बोलूं। इस बात को समझने में तो बड़े-बड़े समाज वैज्ञानिकों को भी दिक्कत होती है। मैं अब्बू को कैसे समझाऊँ। मैंने तो अब्बू को टाल दिया कि ठीक है अब्बू, दलिया पीने के बाद बताउंगा। लेकिन मेरा दिमाग चलने लगा। जनता और सरकार के बीच का रिश्ता, या और सटीक रूप से कहें तो जनता और राज्य के बीच का रिश्ता क्या है। हमारी पारिवारिक पितृसत्तात्मक संरचना और जनता पर दमन के लिए इस संरचना का इस्तेमाल या इस दमन के प्रतिरोध में यह संरचना कितना अवरोध पैदा करती है। यदि हम सबके घरों में एक छोटी जेल है तो हम इस बड़ी जेल का कितना विरोध कर पायेंगे। या इस बड़ी जेल का विरोध, उन छोटी-छोटी जेलों को तोड़ने में कितना कारगर होगा या इस छोटी जेल का उस बड़ी जेल से आखिर सम्बन्ध क्या है। खैर दलिया पीने के बाद अब्बू ‘बोरा जी’ के साथ चेस खेलने लगा और अपना सवाल भूल गया।
चेस खेलते अब्बू को मैंने ध्यान से देखा और अचानक मेरे दिमाग में आया कि अब इस बच्चे को और जेल में रखना सही नही हैं। अभी पिछली ही बार जब मैं महिला मुलाकात में अमिता से मिला तो अमिता ने बताया कि उसकी बैरक में जो लोग ‘अब्बू की नज़र में जेल’ पढ़ते हैं, उसमें से कई लोग अब यह कहने लगे हैं कि अब्बू को जेल में नहीं देखा जाता, उसे रिहा कर दो। मेरी बैरक में भी जो लोग ‘अब्बू की नज़र मे जेल’ पढ़ते हैं उनमें से भी कुछ लोग यह कह चुके हैं कि इतने छोटे बच्चे को जेल में नहीं देखा जाता। भले ही वह कल्पना में ही क्यो ना हो। उनके इस अनुरोध को मैं अपनी कामयाबी समझता कि मेरीे लेखनी असर कर रही है। लेकिन आज मुझे लग रहा है कि क्या मैं महज अपने स्वार्थ में अब्बू को अपने साथ जेल में रखे हुए हूं। ताकी कहानी में मासूमियत ला सकूं। और सहानुभूति बटोर सकूं। मेरे इस दावे में भी कितना दम है कि मैंने अब्बू को इसलिए अपनी कहानी में शामिल किया कि एक बार अब्बू की निर्दोष नज़र से दुनिया को देख संकू। आखिर अब्बू के मुंह से मैं ही तो बोल रहा हूं। इसी उधेड़बुन में मुझे गोर्की की कहानी ‘पाठक’ की याद हो आयी। और अन्ततः मैंने अब्बू को रिहा करने का फैसला कर लिया। हालांकि यह ख्याल आते ही मेरा दिल बैठने लगा। बिना अब्बू के मैं कैसे रहूंगा। बिना अब्बू के मैं कैसे लिखूंगा। बिना झूठ के सच कैसे लिख पाउंगा। ‘पाब्लो पिकासो’ तो कहते थे कि कला वह झूठ है जो आपको सच तक पहुचाता है। फिर मैं बिना अब्बू के सच तक कैसे पहुंचूगा। क्या कोई दूसरा झूठ गढ़ना पड़ेगा। क्या कला में हर सच का अपना एक झूठ भी होता है। और हर सच को उसके झूठ से और हर झूठ को उसके सच से आंकना होता है। मुझे कोई जवाब नहीं मिल रहा था, लेकिन मैंने फैसला कर लिया कि अब अब्बू को जेल से रिहा करने का समय आ गया। लेकिन उसे कैसे रिहा करूं। क्या कहानी गढ़ूं। क्या अपने पात्र से यानी अब्बू से विद्रोह करा दूं। अब्बू को रूला दूं कि अब मैं जेल में नही रह सकता। मुझे घर, मेरे ईजा बाबा के यहां पहुंचा दो। हां यही ठीक रहेगा। कितनी कहानियों में मैंने पढ़ा है कि पात्र लेखक से विद्रोह कर देते है और लेखक की कल्पना के लौह दायरे को तोड़ कर बाहर निकल जाते हैं। क्या अब्बू मेरी कल्पना के लौह दायरे को तोड़ सकता है। क्या मेरा प्यारा अब्बू ऐसा कर सकता है। ‘संजीव’ की मशहूर कहानी ‘प्रेरणास्रोत’ में भी तो यही होता है। पता नहीं कितना कहानीकार अपने पात्रों को गढ़ता है और कितना पात्र अपने कहानीकार को गढ़ते हैं। पता नहीं मैंने कितना अब्बू को गढ़ा और कितना अब्बू ने मुझे गढ़ा। बहरहाल, अब्बू को अपनी कहानी से बाहर करने का दबाव क्या सिर्फ मेरे आठ-दस पाठकों का है, या इसके पीछे मेरी अपनी निराशा भी है।
दरअसल मेरी बेल लगने के बाद ही कुछ ऐसा घटनाक्रम घटा कि मुझे अपनी बेल मुश्किल लगने लगी। तेलंगाना में किसी माओवादी ने समर्पण किया और यहां एटीएस वालों ने आदतन उसकी कहानी को बेवजह मेरे साथ जोड़ दिया। यह सुनकर मन खिन्न हो गया। और निराशा छाने लगी। लगा कि अब लम्बे समय तक बेल मुश्किल होगी। तो अब्बू को कहानी से बाहर करने का फैसला क्या निराशा में उठाया गया फैसला था? पता नहीं। ठीक-ठीक नहीं कह सकता। पहले तो मैं यही सोचता था कि मैं और अब्बू दोनो साथ ही जेल से बाहर आयेंगे। आखिर अब्बू मेरी आशा जो है। उसे तो मेरे साथ रहना ही चाहिए। ‘अनुज लगुन’ ने अपनी कविता में इस आशा को यूं बयां किया है-

यह बच्चा
जो मेरे साथ जेल की कस्टडी में है
तुम्हें नहीं लगता
जब यह बड़ा होगा तो
जेल की दीवार टूट जाएगी….?

खैर बेल पर बहस की डेट भी आ गयी। सीमा ने बताया कि अगर चमत्कार हो गया और बेल हो गयी तो मैं उसी दिन जेल में फोन करवा कर तुम्हे सूचना दे दूंगी। वर्ना समझ लेना बेल नही हुई। आज दिन भर मेरी धड़कन तेज चलती रही, लेकिन शाम तक धीरे धीरे धड़कन की रफ्तार सामान्य होने लगी। सन्देशा नहीं आया। यानी बेल नहीं हुई। एक हल्की सी आशा अभी भी बनी हुई थी कि हो सकता है वह फोन ना करवा पाई हो और कल मुलाकात के लिए आ जाय। इसी उधेड़बुन में रात भी कट गयी और दिन भर बेचैनी बनी रही। लेकिन मुलाकात नहीं आई। अब स्पष्ट हो गया कि बेल नहीं हुई। अब मैंने अपने आपको शान्त किया और उस कहानी पर विचार करने लगा जिसमें अब्बू को जेल से रिहा किया जाना था। मैंने सोचा कि दोपहर में नहाने के बाद लिखने बैठूंगा और अब्बू को रिहा करूंगा। यह सोचकर मेरा मन भारी हो रहा था कि अब मुझे लम्बे समय तक यहां अब्बू के बिना रहना पड़ेगा।
भीड़ से बचने के लिए अक्सर मैं दोपहर बाद ही नहाता था। मैं अभी अपने ऊपर पानी डालने जा ही रहा था कि अहाते में दूर से दौड़ता हुआ अब्बू आता दिखा। मैंने सोचा क्या हुआ। इतनी तेज क्यो दौड़ रहा है। मैं रूक गया। वह मेरी तरफ ही आ रहा था। वह सीधे मेरे पास आकर ही रूका। मेरे कुछ पूछने से पहले ही वह हांफते हुआ बोला-‘मौसा हमारी बेल हो गयी।’ और फिर पीछे की तरफ इशारा करता हुआ बोला कि वो नम्बरदार बताने आया है और पैसे मांग रहा है। मैं स्तब्ध था। कोई भाव नहीं आ रहा था। अब्बू को बेल के बारे में मैंने कुछ नहीं बताया था कि झूठ मूठ के वह आशा बांध लेगा। अब्बू को यहा रहते हुए बेल का मतलब अच्छी तरह पता था। मुझे इस तरह भावहीन देख उसने फिर हाफते हुए ही कहा कि मौसा मैं सच बोल रहा हूं। अब हम जेल से बाहर जायेंगे। इसी बीच वह नम्बरदार भी मुस्कुराते हुए अब्बूू के पीछे-पीछे आ गया और सबसे पहले उसने यही कहा कि 500 रूपये से कम नहीं लूंगा। पहले मैंने उससे कन्फर्म किया कि सन्देश किसका है और कैसे आया है। आश्वस्त होने के बाद मैंने उसे गले से लगाया और अब्बू को गोद में उठा लिया। अब यह तय था कि मुझे और अब्बू को साथ-साथ रिहा होना था। अब्बू का चेहरा तो खुशी से चमक रहा था। और बार-बार यही पूछ रहा था कि अब हम कितने दिन बाद बाहर निकलेंगे। तब तक अन्य परिचित कैदियों ने भी हमें घेर लिया और बधाई देने लगे। सबसे पहले कादिर ने बधाई दी। कादिर की बेल हुए 2 साल हो गये, लेकिन गरीबी के कारण कोई बेलर नहीं मिल पा रहा। महज इसलिए 2 साल से जेल में है। पहले 3-4 माह में एक बार उसकी बूढ़ी मां मिलने आ जाती थी और 100-200 रूपये दे जाती थी। लेकिन पिछले 11 महीने से वह नहीं आयी। मैंने एक बार पूछा तो हंस कर बोला- ‘क्या पता, मर मरा गयी हो।’ यह सुनकर मैं अन्दर से हिल गया। बहरहाल अब वह बैरक का झाड़ू पोछा करके अपना खर्च किसी तरह निकाल लेता है। मुझे बधाई देने वालों में कमल भी था जो एक मोबाइल चोरी में आया था और गरीबी के कारण वकील ना कर पाने से पिछले 9 माह से जेल में था। उसकी कहानी हूबहू ‘बायसिकल थीफ’ नामक फिल्म से मिलती थी। मैं उसे अक्सर मस्ती में ‘डी सिका’ (‘बायसिकल थीफ’ फिल्म का डायरेक्टर) कहकर बुलाता। वह हल्का सा मुस्कुरा देता। मुझे बधाई देने वालों में प्रमोद भी था जिसने अपने छोटे भाई का बलात्कार का केस अपने सर ले लिया था और अब पिछले तीन साल से जेल काट रहा है। जिस भाई के लिए उसने यह सब किया उसने मुड़ के देखा तक नहीं। उसकी पत्नी ईट भट्टे पर काम करती और महज इतना ही बचा पाती थी कि कोर्ट में पेशी के समय अपने दोनों छोटे बच्चों को उनके बाप की एक झलक दिखा पाती थी। मैं अक्सर उससे पूछता कि तुम्हे अफसोस नहीं होता कि जिस भाई को बचाने के लिए तुमने अपना जीवन दांव पर लगा दिया, उसने तुम्हारी मदद की कौन कहे, मुड़ के देखा तक नही कि तुम सब कैसे हो। वह हल्की सांस भरते दार्शनिक अंदाज में बोलता-‘नहीं दादा, मुझे कोई अफसोस नहीं है। मुझे जो सही लगा मैंने किया, उसे जो सही लग रहा है, वो कर रहा है।’ उसकी यह उदात्तता देख मैं हैरान रह जाता। इन सबकी बधाइयों के बीच मैं अपनी खुशी को दबाने का भरसक प्रयास कर रहा था। इनके बीच अपनी रिहाई की खुशी का प्रदर्शन मुझे अश्लील लग रहा था। मुझे बधाई देने वाले कैदियों की आंखो में मैं वो दुःख भी साफ-साफ देख पा रहा था जो मेरी रिहाई के कारण उनकी कैद को और गाढ़ा बनाने के कारण आ गया था। इसके अलावा मुझसे बिछड़ने का दुःख भी उन्हें था। मेरे लिए यह 10-15 मिनट का समय बहुत भारी गुजर रहा था- दुःखों के समन्दर में छोटी सी खुशी की नौका हिचकोले खाती हुई।

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अब्बू की नज़र में जेल-12

यह मध्य जनवरी की ठंडी सुबह थी। सभी लोग ‘खुली गिनती’ के बाद तुरन्त अपने अपने बैरक में लौटने की जल्दी में थे। हम अहाते के बीच पहुंचे ही थे कि अब्बू ने मेरा हाथ झटकते हुए सामने की ओर इशारा किया। मैंने देखा कि वहां एक सामान्य कद काठी का लड़का जेल वाला काला झबरीला कंबल लपेट कर खड़ा है और 5-7 लोग उसे घेर कर खड़े हैं। मैं नजदीक पहुंचा तो देखा कि वह नंगे पांव था और शरीर पर महज एक झीनी सी शर्ट थी जो कंबल के नीचे से झांक रही थी। उसकी आंखों के किनारो से आंसू बह रहे थे और वह ठंड से कांप रहा था। मेरे वहां पहुचते ही घेरे में खड़े हुए लोगों ने मुझे रास्ता दे दिया मानो अब वह मेरी जिम्मेदारी हो। मैंने उससे पूछा-कब आये हो? उसने कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन उसे घेर कर खड़े एक कैदी ने कहा कि इसका नाम ‘मकबूल’ है। इसे कल रात लाया गया है। यह मेरे ही बैरक में है। लेकिन इसे हिन्दी नहीं आती। बस थोड़ा बहुत समझ लेता है। इसके पास कुछ भी नहीं है। ये बता रहा है कि इसका स्वेटर भी पुलिस स्टेशन में रखवा लिया गया। मेरे बगल में खड़े अब्बू ने आश्चर्य से दोहराया-‘स्वेटर पुलिस स्टेशन में रखवा लिया गया ?’ मैंने उससे पूछा- ‘कहां के रहने वाले हो?’ उसने कांपते हुए जवाब दिया-‘आसाम’। उसके बाद उसने कुछ बोला लेकिन हममे से कोई नहीं समझ पाया। मैंने तुरन्त अब्बू से कहा-‘अब्बू दौड़ के जा और खोखन को बुला कर ला।’ अब्बू दौड़ कर गया और खोखन को बुला लाया। खोखन बांग्लादेश के रहने वाले हैं और भारत में उनकी रिश्तेदारी है। यहां एक रिश्तेदार से मिलने आये और पर्याप्त डाकूमेन्ट ना होने की वजह से उन्हें जेल में डाल दिया। उन्हें बांग्ला और असमिया दोनो भाषाएं आती हैं। खोखन और असम के उस व्यक्ति मकबूल के बीच लगभग 15 मिनट बात हुई। जब खोखन बोलते तो अब्बू खोखन का मुंह देखता और जब मकबूल बोलता तो अब्बू उसका मुंह देखता। इस संक्षिप्त बातचीत के बाद खोखन हम सबसे मुखातिब हुए और कहने लगे कि यह कुछ ही दिन पहले आसाम से लखनऊ आया था। यहां इसके गांव का एक व्यक्ति कबाड़ का काम करता है। उसी ने इसे बुलाया था। मकबूल भी यहां आकर कबाड़ के काम में शामिल हो गया था। कल दोपहर में ‘परिवर्तन चौक’ के पास इसकी ठेला गाड़ी को कुछ पुलिस वालों ने रोका, इसका आधार कार्ड चेक किया, दिन भर थाने में बैठाये रखा इसका स्वेटर उतरवाया और शाम को जेल भेज दिया। मैंने खोखन के माध्यम से उससे पूछा कि उसे मारा पीटा भी गया है क्या, तो उसने कहा-नहीं। उसे अभी तक नहीं पता कि उसे किस अपराध में जेल में डाला गया है। यह सुनकर मैं परेशान हो गया। मैं कुछ सोचने लगा। तभी सामने से जेल का चीफ सिपाही जाता हुआ दिखा। मैंने तुरन्त उसे आवाज लगायी-‘चीफ साब, ये किस केस में अन्दर आया है?’ उसने एक नज़र मकबूल पर डाली और बेरूखी से यह कहते हुए आगे बढ़ गया कि ‘अरे, यह दंगाई वाले केस में आया है।’ मैं समझ गया। सीएए के खिलाफ प्रदर्शन का यह पहला कैदी हमारे अहाते में आया था। मैं यह बात नही पचा पा रहा था कि पुलिस ने इतनी ठंड में जब रात में पारा जीरो डिग्री के पास चला जा रहा है, इसका स्वेटर क्यो उतार लिया। यह गरीब से नफरत के कारण है या मुसलमान से या दोनो से। जब मैं इन राजनीतिक-नैतिक सवालों में उलझा था तभी मैंने देखा कि अब्बू और खोखन दोनो सामने से हाथ में कुछ कपड़े लिये चले आ रहे हैं। अब्बू और खोखन कब यहां से खिसक लिये थे, मुझे पता ही नही चला। 40 साल के खोखन के साथ अब्बू की भी दोस्ती हो गयी थी। जब वह मेरे साथ नहीं होता तो खोखन के पास उसके पाये जाने की संभावना ज्यादा होती। दोनो जाकर कुछ लोगो से मकबूल के लिये कपड़े वगैरह जुटा लाये थे। मैं थोड़ा शर्मिन्दा हुआ कि जब मैं सैद्धान्तिक सवालों में उलझा था उस समय खोखन तात्कालिक व्यवहारिक समस्या का समाधान करने में जुटे हुए थे। बहरहाल जल्दी ही मकबूल के पास सभी जरूरी चीजें हो गयी। अचानक मैंने देखा कि अब्बू अपना छोटा मग लेकर भागा आ रहा है। आते ही उसने अपना मग झिझकते हुए मकबूल की ओर बढ़ा दिया। मकबूल मेरी तरफ देखने लगा। मैंने कहा, ले लो। हमारे पास एक और है। इसमें सुबह सुबह दलिया ले सकते हो। मकबूल के मग पकड़ते ही अब्बू के चेहरे पर खुशी देखने लायक थी। जेल की तुलना अक्सर नरक से की जाती है। लेकिन जहां आम गरीब लोगों का जमावड़ा हो, वहां जीवन बहता है और जहां जीवन बहता है वह जगह नरक कैसे हो सकती है?
बाद में मैं जब भी मकबूल से बात करता तो खोखन भाई अनुवादक की भूमिका निभाते। अब्बू भी अक्सर हमारी बातचीत ध्यान से सुनता। एक दिन उसने मुझसे पूछा-‘मौसा, अलग अलग तरह की भाषा क्यो होती है। एक ही भाषा क्यो नहीं होती।’ मैंने कुछ देर सोचा। फिर मैंने अब्बू को एक पुरानी कहानी सुनाई-‘अब्बू पहले सबकी भाषा एक ही थी। तब इंसान ने एक बार भगवान से मिलने की सोची। और सबने एक दूसरे के कंधे पर चढ़कर आसमान तक एक सीढ़ी बनाने लगे। यह देखकर भगवान घबरा गया और उसने सबकी अलग अलग भाषा बना दी ताकि कोई एक दूसरे की बात न समझ पाये और भगवान तक सीढ़ी न बना पाये।’ अब्बू का अगला सवाल था-‘लेकिन भगवान ये क्यो चाहता है कि कोई सीढ़ी ना बना पाये और उससे ना मिल पाये?’ मैं सोच में पड़ गया। मुझे चुप देख अब्बू ने ही संशय और प्रश्नवाचक मुद्रा के साथ कहा-‘ताकि कोई भगवान की पोल पट्टी ना जान ले।’ मैं आश्चर्य में पड़ गया। अब्बू का आशय क्या था, मुझे पता नही। लेकिन मेरे लिए इसके आशय गहरे थे।
बहरहाल तभी अहाते में कुछ हलचल होने लगी। अब्बू तेजी से बाहर भागा। पीछे पीछे मैं भी चल दिया। आज 20-25 लोगों की ‘नई आमद’ आयी थी। नये कैदी को यहां जेल की भाषा में ‘आमद’ यानी ‘आमदनी’ कहां जाता है। सच में वो आमदनी होते हैं क्योकि उनसे जेल प्रशासन कई तरह से अवैध उगाही करता है। अब्बू ने कहा-‘इतने सारे लोग।’ आमतौर पर रोज हमारे अहाते में 5 से 7 नये कैदी आते है। इसलिए सभी को आश्चर्य हो रहा था कि इतने सारे लोग कैसे। हमारे अहाते का राइटर जहां बैठता है, मैं वहीं खड़ा था। तभी सर्किल चीफ आया और धीरे से राइटर से बोला-‘ये सब दंगाई हैं इन्हें अलग अलग बैरकों में रखना। और हर बैरक में कहलवा देना कि इनसे कोई बात ना करे।’ अपनी बात में वजन लाने के लिए उसने आगे जोड़ा कि यह डिप्टी साहब का आदेश है। यह कहकर जैसे ही चीफ मुड़ा, अब्बू ने मुझसे सवाल किया-‘मौसा दंगाई क्या होते हैं।’ मैं इस मासूम बच्चे को क्या बताता कि दंगाई क्या होते हैं। मुझे पता था कि ये सब सीएए के खिलाफ प्रदर्शनकारी है और कुछ मकबूल जैसे लोग हैं जो महज अपनी मुस्लिम पहचान के कारण जेल पहुच गये हैं। मैंने कुछ सोचकर अब्बू से कहा-‘अब्बू रात में जब अपना बैरक बन्द हो जायेगा तो इनमें जो भी अपनी बैरक में आयेगा, उसी से पूछ लेंगे कि दंगाई क्या होते हैं।’ अब्बू ने भी खुशी से कहा, हां यही ठीक रहेगा।
बैरक बन्द होने के बाद जब गिनती पूरी हो गयी तो जाते हुए सिपाही ने सबको सचेत करते हुए कहा-‘इस बैरक में जो दंगाई आये हैं उनसे कोई बात न करे।’ मुझे आश्चर्य हुआ कि कुछ देर पहले जो बात सर्किल चीफ दबी जुबान में कह रहा था वह अब ऐलान बन गयी। यह आत्मविश्वास उन्हें कहा से आया?
बैरक का गेट बन्द होते ही सभी लोगों की निगाह उस ‘दंगाई’ पर टिक गयी। मैं अभी सोच ही रहा था कि उसके पास जाउं और बाते शुरू करूं, तभी तीन चार मुस्लिम कैदी अपने फट्टे से उठे और उस नये कैदी के पास पहुंच गये। कुछ देर बाद मैं भी उनके बीच जाकर बैठ गया। अब्बू अभी बैरक में लगी टीवी देख रहा था और मुड़ मुड़ कर मेरी तरफ देख लेता था। जैसे ही उसने देखा कि मैं उस नये कैदी के पास जा रहा हूं, वह भी उठा और भागता हुआ मेरे पास आ गया। बातचीत पहले ही शुरू हो चुकी थी। उसका नाम अब्दुल था। उसकी इलेक्ट्रिक की दुकान थी। उस दिन घर से उसके भाई का फोन आया कि शहर में कुछ बवाल हो गया है, आप दुकान बन्द करके घर आ जाइये। अब्दुल ने तुरन्त दुकान बन्द किया और घर की ओर चल दिया। रास्ते में ही पुलिस की एक जीप ने उसे रोका, उसका नाम पूछा और उसे जीप में बिठा लिया। कुछ देर थाने में बिठाये रखा और फिर जेल भेज दिया। मैंने पूछा, मारा पीटा तो नही। उसने कहा, ना तो मारा पीटा और ना ही कुछ पूछा ही। बगल में बैठे एक मुस्लिम कैदी, जो मोबाइल चोरी के जुर्म में पिछले 8 माह से जेल काट रहा था, ने धीमे से कहा- हमारा नाम ही काफी है। उसके बाद क्या पूछताछ करना। मैं सन्न रह गया। मैंने उससे आगे पूछा कि आपसे बातचीत करने के लिए जेल प्रशासन मना क्यो कर रहा हैं। इसका उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस हल्का सा मुस्कुरा दिया। रात ज्यादा होने लगी तो धीमे धीमे उसे घेरे सभी कैदी एक एक कर जाने लगे। बस मैं और अब्बू रह गये। अब्बू मेरी गोद में नींद से झूल रहा था, लेकिन फिर भी सो नहीं रहा था। मैंने उससे पूछा भी कि चल तुझे सुला दूं। लेकिन उसने इंकार कर दिया। अब अब्दुल ने मेरा परिचय पूछा। मेरा परिचय जानने के बाद उसके चेहरे पर हल्की चमक आ गयी। उसने मुझसे कहा कि कल मैं आपको और लोगों से मिलवाउंगा, जिन्हें ‘परिवर्तन चौक’ पर धरना स्थल से उठाया गया है। वो आपको और जानकारी देंगे। उन्हें थाने पर बहुत पीटा गया है। अब्दुल के चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी। मैंने उनसे कहा कि अब आप सो जाइये, कल बात करेंगे। इसके बाद जब मै और अब्बू अपने फट्टे यानी बिस्तर पर लौटे तो अब्बू ने तुरन्त पूछा-‘थाने पर किसे बहुत पीटा गया है।’ मैंने कहा कि चल सो जा। कल मैं तुझे उससे मिलवाउंगा।
दूसरे दिन अब्दुल गिनती के तुरन्त बाद मुझे सामने की बैरक में ले गया। अब्दुल ने मेरा परिचय उसे पहले ही दे दिया था। उसका नाम तैयब था। तैयब ने बिना किसी औपचारिकता के मुझे गिरफ्तारी की पूरी कहानी बयां कर दी। फिर अपना कुर्ता ऊपर करते हुए लाठियों के निशान दिखाये। निशान नीले पड़ गये थे। पूरी कहानी अब्बू दम साधे सुनता रहा था, लेकिन जब उसने पीठ पर लाठियों के निशान देखे तो मेरी उंगली पर उसकी पकड़ ना जाने क्यों मजबूत हो गयी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोलू। क्या सहानुभूति दूं। ‘मन्टो’ ने एक शरणार्थी कैम्प के जीवन के बारे में लिखते हुए कहा कि यहां सभी को सहानुभूति की जरूरत है, लेकिन दिक्कत यह है कि कौन किसको दे। यही जेल के लिए भी सच है। वापस पीठ ढकते हुए उसने कहा कि मुझे पिटाई का उतना दुःख नहीं है। मुझे इस बात का दुःख है कि पीटते हुए वे यह कह रहे थे कि अब अपने अल्लाह को बुला, देखते हैं तेरा अल्लाह तुझे कैसे बचाता है। अभी तक उसकी आंखों में आंसू नहीं आये थे, लेकिन यह बात बोलते हुए उसकी आंख भर आयी। इसी बीच एक और कैदी हमारे बीच आकर बैठ गया था। थोड़ी देर चुप रहने के बाद तैयब ने खुद पर नियंत्रण स्थापित करते हुए और उस नये कैदी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि अब इनका केस देखिए। इनको प्रदर्शन वगैरह से कोई मतलब नहीं। ये सीएए के बारे में कुछ जानते भी नही। पुलिस थाने के पास इनकी छोटी सी चाय की दुकान है। पिछले तीन साल से ये थाने में सुबह शाम चाय पिला रहे है। 21 जनवरी को थाने के ही एक परिचित सिपाही ने इसे थाने पर बुलाया। दो चार घण्टे यूं ही बैठाये रखने के बाद और बिना कुछ पूछताछ किये जेल भेज दिया। मैं उसकी तरफ मुड़ा और पूछा कि आपका नाम क्या है? उसने धीमे से झिझकते हुए जवाब दिया-‘कमालुद्दीन’।
सीएए प्रदर्शनकारियों (जिन्हें जेल प्रशासन ‘दंगाई’ बुलाता था) के आने से हमारे अहाते का माहौल बदल गया। सटीक रूप में कहें तो राजनीतिक हो गया। अब मेरा ज्यादातर समय इन्हीं लोगों के साथ टहलने और बात करने में बीतने लगा। अब्बू की भी नयी दोस्ती ‘आदिल’ के साथ हो गयी। 19-20 साल का जोश से भरपूर यह नौजवान सीएए प्रदर्शन का वीडियो बना रहा था, जब पुलिस ने उसे पकड़ा। अब्बू ज्यादातर अब उसी की पीठ पर सवार रहता। खुद अन्दर से काफी परेशान होने के बावजूद वह लोगों को हमेशा अपनी हरकतों से हंसाता रहता। एक दिन अब्बू ने मुझे उसके बारे में बताया कि मौसा वो बीड़ी पीता है और जब तुम उसकी तरफ आते हो तो वह तुरन्त बीड़ी फेक देता है। एक दो बार मैंने भी गौर किया था यह बात। मैने सोचा कि 2-4 दिन की मुलाकात में वह मेरा इतना लिहाज क्यो कर रहा है। हालांकि उसके इस व्यवहार से मुझे खुशी हो रही थी।
तैयब की बहन जामिया में पढ़ती थी और वहां के प्रदर्शन और शाहीनबाग के प्रदर्शन की भागीदार थी। तैयब से मुझे आन्दोलन की जीवन्त रिपोर्ट सुनने को मिली। एक राजनीतिक कैदी के लिए इससे बड़ा सुख भला क्या हो सकता है कि उसे बाहर चल रहे आन्दोलन के एक सक्रिय भागीदार से आन्दोलन का जीवन्त विवरण सुनने को मिले। शाहीनबाग में जो नया साहित्य जन्म ले रहा था, उसकी झलक मुझे तैयब से ही मिली। उसके सुनाने का अंदाज भी निराला था। ‘आमिर अजीज’ जैसे युवा शायर की रचनाओं से तैयब ने ही मेरा परिचय कराया। तैयब ने जब यह सुनाया तो मैं एकदम रोमांचित हो गया था-‘भगतसिंह का जज़्बा हूं, आशफाक का तेवर हूं, बिस्मिल का रंग हूं। ऐ हुकूमत नज़र मिला मुझसे, मैं शाहीनबाग हूं।’
मेरी बहन ‘सीमा आजाद’ ने अपना नया कहानी संग्रह ‘सरोगेट कन्ट्री’ मुझे पढ़ने को दिया था। इन प्रदर्शनकारियों के आने से सीमा के कहानी संग्रह की मांग बढ़ गयी और कई लोग ‘वेटिंग लिस्ट’ में अपना नाम लिखाने लगे। वे पुराने कैदी जिनके साथ मैं अक्सर घूमता था, वे मुझे प्यार से चिढ़ाने लगे कि अब आप हम लोगों को भूल गये, लेकिन इतना याद रखियेगा कि ये लोग चन्द दिनों के मेहमान हैं। अन्त में आपको हमारे साथ ही रहना है। मैं मुस्कुरा देता।
इसी बीच एक दिन जब मैं अब्बू को नहला रहा था तो अब्बू अचानक बोल उठा-‘मौसा, मैं बड़ा होकर मुसलमान नहीं बनूंगा।’ अचानक मेरा हाथ रूक गया। मैंने कहा क्यो? अब्बू ने मेरे हाथ से मग खींचते हुए जवाब दिया-‘वर्ना मुझे भी पुलिस पकड़ लेगी।’ यह कह कर वह खुद ही अपने ऊपर पानी डालने लगा। और मैं उसे भौचक्का देखता रहा।

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अब्बू की नज़र में जेल-11

गिरफ्तारी के तुरन्त पहले की कहानी-

दिन भर की धमा-चौकड़ी के बाद अब रात में अब्बू को तेज नींद आ रही थी। लेकिन आंखो में नींद भरी होने के बावजूद वह अपना अन्तिम काम नहीं भूला-मुझसे कहानी सुनने का काम। कहानी का शीर्षक हमेशा वही देता था। उसी शीर्षक के इर्द गिर्द मुझे कहानी सुनानी होती थी। कभी उसकी फरमाइश होती कि ‘सफेद भूत’ की कहानी सुनाओ, तो कभी उसकी फरमाइश होती कि ‘कभी ना थकने वाली चिड़िया’ की कहानी सुनाओ। कभी कभी वह बड़े प्यार से कहता कि ‘अब्बू और मौसा’ की कहानी सुनाओ। आज उसके दिमाग में पता नही क्या आया कि उसने थोड़े चिन्तनशील अंदाज में कहा कि मौसा तुम मौसी से पहली बार कब मिले, इसकी कहानी सुनाओ। उसकी इस फरमाइश पर मैं और बगल में लेटी अमिता दोनो आश्चर्यचकित रह गये। खैर मैंने कहानी शुरू की-थोड़ी हकीकत थोड़ा फसाना। और हर बार की तरह इस बार भी वह बीच कहानी में सो गया। कहानी सुनाते हुए मैंने महसूस किया कि अमिता भी बड़े ध्यान से मेरी कहानी सुन रही है। मैंने अमिता को यह अहसास नहीं होने दिया कि अब्बू सो चुका है। और मैंने कहानी जारी रखी। लेकिन कहानी खत्म होने से पहले ही अमिता भी सो गयी। मेरे मन में ‘अरूण कमल’ की कविता की एक पंक्ति कौधी-‘नींद आदमी का आदमी पर भरोसा है।’ इस खूबसूरत भरोसे को कैद करने के लिए मैंने दोनो को आहिस्ते से चूम लिया। किसी खूबसूरत फंतासी का इससे अच्छा यथार्थवादी अंत और क्या हो सकता है।
नींद मुझे भी आ रही थी। लेकिन आज रात मुझे ‘हिस्ट्री आफ थ्री इंटरनेशनल’ खत्म करनी थी। महज 9 पेज शेष रह गये थे। मैंने सोचा आज रात इसे खत्म कर देते है, क्योकि कल से एक जरूरी अनुवाद पर भिड़ना था। मनपसन्द किताब की ‘कैद’ और पढ़ चुकने के बाद ‘रिहाई’, दोनों का अहसास बहुत सुखद होता है। रात एक बजे के करीब ‘रिहाई’ के इसी सुखद अहसास के साथ मैं अपनी खुली छत पर टहलने आ गया। 7 जुलाई की यह रात बहुत शान्त थी। उस वक्त मुझे तनिक भी अंदाजा न था कि यह तूफान के पहले की शान्ती है। मेरे दिमाग में तो 1950 के दशक की उस दुनिया के चित्र आ जा रहे थे, जिसका विस्तृत वर्णन ‘विलियम जेड फोस्टर ने’ अपनी उपरोक्त किताब के अन्त में किया है। पृथ्वी का बड़ा हिस्सा लाल रंग में रंग चुका था और समाजवाद लगातार मार्च कर रहा था। तीसरी दुनिया के गुलाम देश एक एक कर अपनी जंजीरें तोड़ रहे थे। इसी सुखद अहसास के साथ मैं भी अब्बू और अमिता के बीच जगह बनाकर लेट गया और उन दोनों की तरह ही नींद के आगोश में समा गया।
देर से सोने के बावजूद आज भी रोजाना की तरह मेरी नींद सुबह 5 बजे खुल गयी और मैं दोबार छत पर आ गया। भोपाल की सुबह हमेशा सुहानी होती है। और फिर दो मंजिले पर स्थित मेरा कमरा एक तरफ छोटी पहाड़ी और दूसरी तरफ नहर से घिरा है। पहाड़ी पर अच्छी खासी हरियाली थी। मेरे मन में एक पुराना गीत चल रहा था-‘ये कौन चित्रकार है…..’ अचानक मेरे पीछे से ‘भो‘ की आवाज आयी। मैं चौक गया। यह अब्बू था। अपना यह प्रिय काम निपटा कर वह मेरी बाहों में निंदाया सा उलझ गया। मैंने उसे गोद में उठाया और रोज का डायलाग रिपीट किया-‘चल तुझे थोड़ी देर दुलार लूं। अच्छा बता दुलार करने से क्या होता है।’ अब्बू ने निंदाये हुए ही मेरी गोद में लगभग झूलते हुए अपना रोज का डायलाग दुहरा दिया-‘बच्चे में कान्फिडेन्स आता है।’
इसी बीच मेरी नज़र छत से नीचे सामने की सड़क पर गयी। मैंने देखा 4-5 सफारी जैसी गाड़ियों में करीब 15-20 लोग सिविल ड्रेस में बहुत आराम से उतर कर गेट खोल कर अन्दर आ रहे हैं। मैंने सोचा मकान मालिक के यहां लोग आये हैं, लेकिन इतनी सुबह इतने लोग? अगले ही क्षण उनके कदमों की आवाज तेज होने लगी यानी बिना रूके वे लोग सीधे ऊपर चले आ रहे थे। अगले ही क्षण मेरे अन्दर भय की लहर दौड़ गयी। मैं तुरन्त समझ गया कि वे लोग हमारे लिए ही आये हैं। मेरी धड़कन तेज हो गयी। अगले ही क्षण वे सब मेरे सामने थे। मेरे मुंह से कोई भी शब्द ना निकला। तभी उनमें से एक ने साफ्ट लेकिन आदेशात्मक स्वर में कहा-‘चलिए, अन्दर चलिए।’ मेरे अन्दर कमरे में घुसने से पहले ही उनमें से आधे अन्दर घुस चुके थे। अमिता अभी भी अन्दर सो रही थी। इस टीम की दो महिला कान्सटेबिलों ने अमिता को जगाया। इतने सारे लोगों को कमरे में देखकर वह हड़बड़ा गयी और बोली- क्या है, कौन हैं आप लोग। इस बीचे मैं शुरूआती शाक से उबर चुका था। उनके जवाब देने से पहले मैंने ही कहा-‘इधर आ जाओ, पुलिस वाले हैं।’ टीम को लीड कर रहे आफीसर ने व्यंग्य मिश्रित मुस्कान के साथ कहा-‘अच्छा तो समझ आ गया।’ मैंने कहा- हां। फिर भी उसने अपना आई कार्ड निकाल कर दिखाया। तब मुझे समझ आया कि ये यूपी एटीएस के लोग हैं। आश्चर्यजनक रूप से अमिता ने भी जल्दी ही अपने पर नियंत्रण स्थापित कर लिया और चौकी पर मेरे बगल में आकर बैठ गयी। उसने धीरे से मेरा हाथ दबाया और मैंने धीमे स्वर उससे कहा- New struggle begins. पिछले 20 सालों की राजनीतिक जिंदगी में हमने सीमा-विश्वविजय सहित इतने सारे दोस्तो-परिचितों की गिरफ्तारियां देखी हैं कि हम अक्सर यह कल्पना करते थे कि हमारी गिरफ्तारी कब और कैसे होगी। मैं अक्सर मजाक में अपने दोस्त कार्यकर्ताओं से कहता-‘समय समय पर लिखा है, गिरफ्तार होने वाले का नाम।’ बिना गिरफ्तारी के हम जैसे राजनीतिक कार्यकर्ताओं का बायोडेटा कहां पूरा होता है।
मेरे घर पर कब्जा जमाये वो 15-20 लोग पूरे घर को हमारे सामने ही उलट पुलट रहे थे। इस छोटे से एक कमरे के घर को अमिता ने बेहद करीने से सजाया था। उसकी आंखो के सामने इसका पूरा सौन्दर्य बिखर रहा था। इसी उठा पटक में अब्बू की नींद भी खुल गयी, जो दुबारा मेरी गोद में सो गया था। इतने सारे लोगों को कमरे में देखकर वह सहम गया और सहमते हुए बोला-‘ये लोग कौन हैं।’ मैंने धीमे से उसके कान में कहा-‘मोदी के दोस्त हैं ये लोग।’ उसने लगभग डरते हुए पूछा-‘तुझे और मौसी को पकड़ने आये हैं?’ मैंने कहा-‘हां।’ मुझे आश्चर्य हुआ कि इसके बाद उसने ना तो कुछ पूछा और ना ही कोई प्रतिक्रिया दिखाई। बस उन सभी को बारी बारी से ध्यान से देखता रहा, मानो उनके और मोदी के चेहरे में साम्य ढूंढ रहा हो। अपने और अपने काम के बारे में मैंने अब्बू को कई बार कहानियों के माध्यम से समझाया था। शायद यह उसी का असर था। शायद वह उन कहानियों और इस यथार्थ के बीच तुलना में तल्लीन था। अचानक अब्बू ने मेरे कान में शिकायती लहजे में कहा-‘मौसा वह आदमी मेरी कविता पढ़ रहा है।’ मैंने पहले ही गौर कर लिया था कि इन 15-20 लोगो में एक व्यक्ति ऐसा था जो इस उलट पुलट में शामिल ना होकर कमरे में लगे कविता पोस्टरों को बेहद ध्यान से पढ़ रहा था। मानो ब्रेख्त, नाजिम, मीर, गालिब की कविताओं में कोई गुप्त सन्देश छिपा हो। पता नही यह इन कविताओं का असर था या कुछ और- बाद में इस व्यक्ति ने मेरी महत्वपूर्ण मदद की। अचानक मैंने सुना कि अब्बू अपनी ही कविता मेरे कान के पास बुदबुदा रहा था-‘अब्बू की ताकत है मौसा, मौसा की ताकत है अब्बू, इन दोनो की ताकत है मौसी, हम सबकी ताकत है खाना।’
मैंने देखा कि अब उन्होंने सामान पैक करना शुरू कर दिया था। मेरा, अमिता का कम्प्यूटर, मेरी सारी किताबें, 3 हार्ड डिस्क, पेन ड्राइव, तमाम कागज पत्र आदि। इसी में उन्होंने चुपके से बोस कम्पनी का स्पीकर भी रख लिया (इस चोरी का पता मुझे बाद मे चला)। मैं समझ गया, अब हमें जल्दी ही हमेशा के लिए यहां से निकलना था। मैंने मन ही मन कमरे की एक एक चीज से बिदा ली। विदा मेरे कम्प्यूटर, जिसकी स्क्रीन रूपी खिड़की से मैं दुनिया झांक लेता था। विदा मेरी प्यारी किताबें, जिन्हें ‘टाइम मशीन’ बनाकर मैं अतीत और भविष्य की सैर कर लेता था और मार्क्स, माओ, ब्रेख्त, हिकमत, भगत सिंह जैसे तमाम दोस्तों का हाल चाल ले लेता था। विदा मेरे गद्दे, जिस पर मैं अब्बू से कुश्ती लड़ता था और दुनिया का सबसे बड़ा आनन्द, एक बच्चे से हारने का आनन्द लेता था। विदा दरवाजे के पीछे वाले कोनो, जिसके पीछे छिपकर अब्बू मुझसे छुपन छुपाई खेलता था और जब प्यार से मैं पूछता था कि मेरा प्यारा अब्बू कहां है तो वह उतने ही मासूमियत से जवाब देता-मौसा मैं यहां हूं। विदा चाय के कप, जिसमें सुबह सुबह चाय बनाकर अमिता को जगाने का आनन्द ही कुछ और था। विदा प्यारी बाल्टियां, जिसमें मैं अपने कपड़े भिगोता और चुपके से अमिता उसमें अपना एकाध कपड़ा भिगो देती और धोते समय मैं उसे देखता और हमारा प्यारा झगड़ा शुरू हो जाता। विदा, अब्बू के प्यारे खिलौनों जो अब्बू के आते ही मानो जीवित हो उठते और उसके जाते ही दुःखी होकर निर्जीव हो जाते। तभी अचानक मेरी नज़र मेरी गोद में बैठे अब्बू पर गयी, जो अभी भी बड़े ध्यान से उनकी गतिविधियों पर नज़र रखे हुए था। मैंने मन ही मन कहा-‘विदा मेरे प्यारे अब्बू, अलविदा!’

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अब्बू की नज़र में जेल-10

लाॅकअप से वापस गाड़ी में बैठने के लिए वैसे ही लाइन में खड़े होना पड़ता है। जिन्होंने सीट खरीदी होती है, उन्हें पहले ही सीट पर बिठा दिया जाता है। उसके बाद शुरू होती है धक्का मुक्की। इस धक्का मुक्की से बचने के लिए हम जैसे लोग और बुजुर्ग और बीमार लोग लाइन के अंत में ही नज़र आते हैं। गाड़ी भरती जाती है या सटीक रूप से कहें तो ठूंसती जाती है, और निकलती जाती है। इसलिए हम जैसे लोगों को अक्सर अंतिम गाड़ी ही मिलती है। अब्बू और मैं दोनो ही बुरी तरह थक चुके थे। खैर किसी तरह हम गाड़ी में घुसे। अंधेरा हो चुका था। गाड़ी में भी अंधेरा था। गाड़ी पर जब बाहर की लाइट पड़ती तभी हम एक दूसरे को देख पा रहे थे। सभी बूढ़े-बीमार लोग किसी तरह गाड़ी के फर्श पर ही बैठ गये थे। इन्हें देखकर मुझे बार बार ‘कोयन ब्रदर्स’ की फिल्म ‘देयर इज नो कन्ट्री फार ओल्ड मैन’ का नाम याद आ रहा था। हालांकि फिल्म का कथानक एकदम अलग है। खैर सीट पर बैठे एक परिचित कैदी की गोद में अब्बू को बिठाकर मैं गाड़ी के पिछले दरवाजेनुमा चैनल पर टेक लेकर खड़ा हो गया। सुबह की तरह ही इस बार भी गाड़ी के हिचकोले लेते ही गांजा चरस का दौर शुरू हो गया और पूरी गाड़ी पुनः धुंए से भर गयी। मजेदार बात यह है कि गाड़ी में एक कैमरा भी लगा है। लेकिन इसे पूरा सम्मान देते हुए कैदी टोपी पहना देते हैं और कानूून की तरह कैमरा भी आंख बन्द कर लेता है।
अब शुरू हुआ फोन का दौर। बन्द चैनल के बाहर की ओर बैठे दोनो सिपाही 50-50 रूपये लेकर कैदियों को बात करा रहे थे। मेरी बगल में सीट पर बैठा एक कैदी लगातार फोन लेकर अपने साथी कैदियों को दे रहा था और खुद भी बात कर रहा था। अंधेरा होने के कारण मैं उसका चेहरा नहीं देख पा रहा था। फोन के इसी लेन देन के चक्कर में वह लगातार मुझे डिस्टर्ब कर रहा था। अन्ततः मैंने उसे डांटा कि क्यो मुझे बार बार धक्का दे रहे हो। यह सुनते ही उसने मुझे जोर का धक्का दे दिया, जिसके लिए मैं एकदम तैयार नहीं था। मैं गिरते गिरते बचा। मुझे बहुत तेज गुस्सा आया और मैंने उसका गला पकड़ लिया। उसने फिर मुझे जोर का धक्का मारा और मैंने उसी प्रतिक्रिया में उसे एक चांटा जड़ दिया। उसके बाद वह खड़ा हो गया और उसने मुझे धड़ाधड तीन चार मुक्के जड़ दिये। मेरा चश्मा नीचे गिर गया और टूट गया। साथी कैदी की गोद में बैठा अब्बू, जो रास्ते में ही सो गया था, इस लड़ाई झगड़े में उसकी नींद खुल गयी और शायद माहौल को समझते हुए वह जोर जोर से मौसा मौसा चिल्लाने लगा। इस बीच कुछ लोगो ने उसे और कुछ ने मुझे पकड़ लिया। मैं चिल्ला रहा था कि अपना नाम बता, जानता नहीं कि मैं कौन हूं। गाली ना दे पाने की आदत के कारण मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या बोलूं, लेकिन मैं गुस्से में हांफ रहा था। शायद उसे भी अहसास हो गया था कि उसने गलत जगह हाथ छोड़ दिया था। लिहाजा वह कुछ बोल नहीं रहा था और चुपचाप कोने में बैठ गया था। तभी अचानक बाहर की स्ट्रीट लाइट गाड़ी के अन्दर झाड़ू मारते हुए गुजर गयी। इसी क्षणिक लाइट में मैंने उस कैदी को पहचाना जिससे अभी मेरा झगड़ा हुआ था। वह 24-25 साल का हट्टा कट्टा नौजवान था। झगड़े में मेरा उससे कोई जोड़ नहीं था। इसी लाइट में किसी कैदी ने मेरा चश्मा ढूढकर मुझे दिया। मुझे संतोष हुआ कि कांच नहीं टूटा है, महज फ्रेम टूटा है। कांच टूट जाता तो बहुत दिक्कत होती क्योकि मुझे उसका नम्बर याद नहीं। खैर इसी क्षणिक लाइट में मैंने जल्दी से अब्बू को गोद में उठा लिया। वह घबड़ाया हुआ था, लेकिन मैंने उसे आश्वस्त किया कि कुछ नहीं हुआ है। लेकिन किसी अनहोनी की आशंका में वह चैकन्ना हो गया था और मुझसे कसकर लिपट गया। अब मैं मन ही मन सोच रहा था कि मुझे क्या करना है। कल जब सीमा विश्वविजय आयेंगे तो पूंछूगा कि क्या करना चाहिए। सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि मैं उस कैदी का नाम नहीं जानता था और मेरे बार बार नाम पूछने पर कोई भी उसका नाम बताने को तैयार नहीं था। खैर एक बार फिर गाड़ी में शान्ती छा गयी, जैसे कुछ हुआ ही ना हो। मजेदार बात यह थी कि गाड़ी के पीछे बैठे दोनो सिपाही इस दौरान एकदम चुप थे, जैसे यह रोजाना की बात हो।
गाड़ी से उतरकर जेल में दाखिल होने पर नाम लेकर हाजिरी होती है। इसी हाजिरी में मैंने उसका नाम जान लिया और उसे ठीक से पहचान भी लिया। अब्बू पुनः मेरी गोद में सो चुका था। मैं भी अब पूरी तरह शान्त था और जल्दी से बैरक में अपनों के बीच पहुंचना चाहता था। लेकिन इसी बीच मेरी उस डिप्टी जेलर से भेंट हो गयी जो मुझसे बहुत अच्छे से पेश आता था और कुछ मुद्दों पर मुझसे राजनीतिक चर्चा भी कर लेता था। उसको देखकर मैं थोड़ा भावुक हो गया और ना चाहते हुए भी उसे पूरी घटना बयां कर दी। वह थोड़ा जल्दी में था और उसने मुझसे इतना भर कहा कि आप यह सब अपने सर्किल के डिप्टी जेलर को रिपोर्ट कर दिजिए। सर्किल में प्रवेश करते ही मैं सीधे सर्किल डिप्टी जेलर के पास गया और कुछ बोलने को हुआ ही था कि उसने तेज आवाज में कहा कि दूर खड़े होकर बात करो। यह सुनकर मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन मैं खून का घूंट पी कर रह गया। इस सिस्टम के भ्रष्ट अनैतिक और घामड़ लोग मुझसे दूर खड़े होने के लिए कह रहे है। बहरहाल मैंने जल्दी जल्दी संक्षेप में पूरी घटना रिपोर्ट कर दी। उसने मेरी बात पर ज्यादा तवज्जो ना देते हुए नम्बरदार को कहा कि इनकी पेशी नोट कर लो, कल बात करेंगे। यह कहकर वह चला गया। उसके जाने के बाद नम्बरदार ने मुझसे कहा कि अब दोनों को सजा मिलेगी, शायद दोनों का दौड़ा खुल जाय (जेल में दौड़ा खुलने का मतलब है कि आपको हर रात अपना बोरिया बिस्तर लेकर अलग अलग सर्किल के अलग अलग बैरक में रात गुजारनी होगी, इसे यहां बड़ी सजा मानी जाती है)। मैंने सोचा कि मैंने बेवजह ही बात खोल दी, पहले कल मुलाकात में सीमा विश्वविजय से सलाह लेनी चाहिए थी। खैर अब क्या हो सकता है। अब तो सुबह की पेशी का इन्तजार करना था।
थका हारा मैं अपनी बैरक पहुंचा और धीरे से फट्टे यानी बिस्तर पर अब्बू को लिटा दिया। मेरे साथी कैदियों ने तुरन्त पूछा कि चश्मा कहां है। उनके इस तरह प्यार से पूछने पर मैं फिर भावुक हो गया और यहां भी ना चाहते हुए मुझे पूरी बात बतानी पड़ी। मेरे बैरक के सभी 40 लोगोे में से करीब 25-30 मेरे फट्टे के नजदीक आकर लगभग मुझे घेर लिया। और मुझसे सहानुभूति व्यक्त करते हुए यह बताने लगे कि किसके किसके पास शिकायत की जानी चाहिए। अचानक एक कैदी ने कहा कि कल गिनती के वक्त सभी लोग डिप्टी जेलर के सामने खड़े हो जाते हैं और बोलते हैं कि हमारे बैरक के आदमी के साथ ऐसा क्यो हुआ। हम उन्हें बताएंगे कि मनीष भाई कैसे हैं। हम उसका दौड़ा खोलने के लिए बोलेंगे, जिसने मनीष भाई को मारा है और उनका चश्मा तोड़ा है। मेरे लिए कैदी भाइयों का यह भाव देखकर मेरी आंख में आंसू आ गये। इसी बीच अब्बू जाग गया था और ध्यान से सबकी बातें सुन रहा था और बीच बीच में मेरे चेहरे की तरफ देखे जा रहा था। उस वक्त अब्बू मुझे मशहूर इटैलियन फिल्म ‘बायसिकल थीफ’ के उस बच्चे की तरह लग रहा था जो अपने रोते हुए पिता को देखता है और समझ नहीं पाता कि मैं अपने पिता के लिए क्या करूं। रात में एक साथी कैदी ने बहुत इसरार करके मुझे सीने पर मालिश करवाने के लिए बाध्य कर दिया। हालांकि मुझे इसकी जरूरत नहीं थी। कैदियों का यह प्यार और सरोकार देख कर मैं मन ही मन सोच रहा था कि जेल इतनी बुरी जगह भी नहीं है। रात में सोते वक्त अचानक अब्बू ने कहा-‘मौसा तुम्हे चोट भी लगी है।’ मैंने कहा, नही तो। फिर वह मुझसे लिपट कर सो गया। शारीरिक-मानसिक रूप से थके होने के कारण मुझे भी नींद आ गयी।
सुबह गिनती के समय वास्तव में साथी कैदी डिप्टी जेलर के सामने सामूहिक रूप से खड़े होने का मन बना चुके थे। मैंने तो समझा था कि भावावेश में उन्होंने कह दिया होगा। क्योकि सामूहिक रूप से डिप्टी जेलर के सामने खड़े होना विरोध प्रदर्शन का एक तरीका माना जाता है और जेल प्रशासन इसे अपना अपमान समझता है। जब कैदियों ने आकर मुझे अपने इस निर्णय के बारे में बताया तो मैं असमंजस में पड़ गया। अभी मैं इस स्तर तक नही जाना चाहता था। और फिर यदि जेल प्रशासन ने इसका बदला लिया तो मेरे अलावा और कैदी भी फंस सकते हैं। अन्ततः मैंने उन्हें सामूहिक रूप से खड़े होने से मना कर दिया। मैंने उन्हें समझाया कि आज मेरी पेशी है। यदि पेशी में मेरे मनोनुकूल फैसला नहीं होता है तब कल सुबह सब खड़े होना। वे लोग मान गये।
अन्ततः डिप्टी जेलर के सामने मेरी पेशी हुई। जिस लड़के ने मुझे मारा था, वह भी वहां था। मैंने मन ही मन कुछ तय कर लिया और भिड़ने को तैयार हो गया। साथी कैदियों ने जो भाव मेरे प्रति दिखाया था, उससे मेरी स्प्रिट हाई थी। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से डिप्टी जेलर का रूख मेरे प्रति बदला हुआ था। उसने मुझसे बहुत सम्मान से कहा-‘श्रीवास्तव जी मुझे कल रात आपके बारे में पता चला। चलो अब आप ही बताओ कि इसे क्या सजा देनी है। आपको इसे मारना हो तो मार लीजिए।’ फिर उसने उस लड़के की तरफ मुखातिब होकर उसे डांटा-‘चल माफी मांग।’ उसने तुरन्त मेरा घुटना छूते हुए मुझसे माफी मांगी। रात में जिस तरह से उसके घूंसे ने मुझे हतप्रभ कर दिया था, ठीक उसी तरह इस समय उसके माफीनामे ने मुझे हतप्रभ कर दिया। मैंने जल्दी ही अपने आप को संयत किया और बोला कि जो सजा देनी हो आप दीजिये, मैं कौन होता हूं सजा देने वाला। डिप्टी जेलर को जैसे कुछ याद आ गया और वह उठ गया। बोला कि मैं 10 मिनट में वापस आता हूं। अब कमरे में सिर्फ मैं और वह लड़का व डिप्टी जेलर का एक नम्बरदार था। डिप्टी जेलर के जाते ही वह मेरे सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और कहने लगा कि मुझे नहीं पता था कि आप कौन हैं। उसने आगे कहा कि कल मेरी बेल रिजेक्ट हो गयी थी और मैं बार बार घर वालों को फोन मिला रहा था और फोन लग नहीं रहा था। बेल रिजेक्ट होने और फोन ना मिलने से मैं तनाव में था। इसलिए ऐसा हो गया, वरना मैं किसी से उलझता नहीं हूं। फिर उसने कहा कि लाइये चश्मा मुझे दे दीजिए, मैं बनवा दूंगा। मैं सोच ही रहा था कि क्या किया जाय, तभी डिप्टी जेलर वापस आ गया। अब मैं भी उसे माफ करने का मन बना चुका था। मैंने डिप्टी जेलर के सामने कहा-‘ठीक है, मैंने उसे माफ किया।’ यह सुनकर डिप्टी जेलर खुश हो गया। उसके इस भाव से मुझे यह समझते देर ना लगी कि डिप्टी जेलर इस लड़के को बचाना चाहता था। बाद में मुझे पता चला कि यह लड़का राइटर (एक जिम्मेदारी का पद जिसे थोड़ा पढ़े लिखे कैदियों को दिया जाता था) था और यह डिप्टी जेलर इस लड़के के माध्यम से बहुत से भ्रष्टाचार के काम भी करता था। डिप्टी जेलर ने फिर उससे दोबारा से माफी मांगने को कहा और मेरी तरफ देखकर बोला-‘आप अपना चश्मा इसे दे दीजिये। यही बनवायेगा।’ मैंने मना कर दिया। मैंने कहा कि नहीं, आज मेरी बहन मिलने आयेगी, मैं उसे ही दूंगा बनवाने के लिए। अब वह थोड़ा चैकन्ना हो गया। उसने कहा कि आपकी बहन पूछेंगी तो आपको बताना पड़ेगा कि चश्मा कैसे टूटा। मैंने कहां – हा बता दूंगा। फिर उसने तुरन्त कहा-‘लाइये चश्मा मैं बनवा दूंगा, सरकारी खर्च पर।’ फिर उसने असल बात बतायी। उसने कहा कि अगर आप अपनी बहन को यह सब बताएंगे तो यहां के अधीक्षक तक बात जायेगी (अब तक उसे पता चल चुका था कि मेरी बहन का अधीक्षक से थोड़ा परिचय है) और लड़के का दौड़ा खुल जायेगा। उसकी रायटरी भी चली जायेगी। उसने आगे जोड़ा कि आप लोग तो बुद्धिजीवी लोग हैं, क्यो इस बेचारे का दौड़ा खुलवायेंगे। यह सुनकर वह लड़का भी थोड़ा डर गया। मैंने डिप्टी जेलर को अपना टूटा चश्मा दिया और उससे कहा कि ठीक है नहीं बताउंगा। फिर मैंने उस लड़के से हाथ मिलाया। उसके चेहरे पर अब खुशी और कृतज्ञता का भाव था। लेकिन मेरा मन बेचैन था। इसलिए नहीं कि मैंने उसे माफ कर दिया था, इससे तो मुझे खुशी ही हो रही थी, बल्कि इसलिए कि इतनी बड़ी चीज मैं अपनी प्यारी बहन से छुपाउंगा कैसे। फिर मैंने सोचा कि उसे बता दूंगा और कहूँगा कि मामला मेरे पक्ष में ही हल हो गया है। इसलिए वह किसी से ना कहे। लेकिन मैं जानता था कि मेरी तरह वह भी बहुत इमोशनल है और फिर मुलाकात में इतना समय नहीं मिलता कि मैं चीजों को कायदे से व्याख्यायित कर पाउं और उसे आश्वस्त कर पाउं कि अब सब ठीक है। लिहाजा मैंने फैसला कर लिया कि उसे कुछ नहीं बताउंगा। अब दूसरी दिक्कत अमिता की थी, जिससे 2 दिन बाद ही मुलाकात होनी थी। यदि मैं उसे बताता हूं तो वह बेहद परेशान हो जायेगी और उसका शुगर लेवल बढ़ जायेगा। उसके साथ भी 15-20 मिनट की मुलाकात में कैसे आश्वस्त करूंगा कि अब सब ठीक है। वह वहां हमेशा इसी चिन्ता में रहती थी कि मेरा किसी से झगड़ा ना हो। मैंने फैसला किया कि उसे भी नहीं बताना है। अब तीसरी दिक्कत अब्बू था, जो अब धीरे धीरे कड़ियों को जोड़ कर पूरी घटना समझ चुका था। उसे भी मैंने समझा दिया कि सीमा आजाद और मौसी को नहीं बताना है। प्यारा अब्बू मेरा कहना कैसे टाल सकता था। लेकिन फिर भी तुरन्त बोला-‘क्यो?’ मैंने कहा-‘इसलिए।’ उसने फिर जवाब दिया-‘ठीक है मौसा, जैसा तुम कहो।’
और वह घड़ी आ गयी जब जाली के उस तरफ सीमा विश्वविजय खड़े थे। विश्वविजय दूसरी तरफ अमिता से बात कर रहे थे और सीमा मेरे सामने खड़ी थी। मिलते ही सीमा ने पूछा कि चश्मा कहां है। यह सुनते ही मुझे रोना आ गया, लेकिन मैंने बड़ी मुश्किल से अपने आंसुओं को पीछे ढकेला। जब आप जेल में होते है तो आपको यह काम अक्सर करना होता है। तभी तो ‘वरवर राव’ ने भी अपनी जेल डायरी में लिखा है-‘पलको में आंसुओं को छुपाकर मुस्कुराने की जगह है जेल।’ बहरहाल तभी वह लड़का मेरा चश्मा लेकर वहां आ गया। मैंने चश्मा पहनते हुए सीमा से कहा कि ऐसे ही गाड़ी में गिरने से टूट गया था। यहीं जेल में ही बन गया। सीमा ने नये फ्रेम की तारीफ की और हम दूसरी बातों में मशगूल हो गये।

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अब्बू की नज़र में जेल-9

कोर्ट से जब हम वापस हाक हेडक्वार्टर पहुंचे तो मैं काफी हल्का और आत्म विश्वास से भरा महसूस कर रहा था। निश्चय ही यह ‘इंकलाब जिंदाबाद’ नारे का प्रभाव था। अमिता थोड़ा पहले पहुंच चुकी थी। जब मैं और अब्बू वहां पहुंचे तो वहां एक महिला कांस्टेबिल के चिल्लाने और रोने की आवाज आ रही थी। जब मैं पूछताछ वाले कमरे में पहुंचा तो बगल के कमरे से अमिता की भी तेज तेज आवाज सुनाई दे रही थी। तभी मेरे कमरे में अमिता को साथ ले जाने वाली महिला कांस्टेबिल रोते हुए गुस्से से पैर पटकते प्रवेश की। उसके पीछे एटीएस का एक अधिकारी भी आया। महिला के कुर्सी पर धंसते ही उस अधिकारी ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला-‘चलो छोड़ो, ये साले खुद ही अपनी मौत मरेंगे।’ मैंने तेज आवाज में कहा-‘गाली किसे दे रहे हैं।’ उसने मुझे नज़रअंदाज कर दिया और फिर उस महिला कांस्टेबिल से ही मुखातिब होते हुए कहा-‘साले ऐसे ही होते हैं।’ इस बार मैं गुस्से में बोला-‘आपको गाली देने का अधिकार नहीं है।’ यह सुनकर वह महिला कांस्टेबिल चिल्ला पड़ी-‘आप लोगों को गाली देने का अधिकार है?’ मैं आवाक रह़ गया। लेकिन बेहद शान्त होकर पूछा-‘किसने गाली दी, आखिर हुआ क्या है?’ महिला ने तेज और उंची आवाज में कहा-‘आपकी पत्नी ने मुझे गाली दी है।’ मैंने आश्चर्य से कहा-‘क्या कहा उसने?’ ‘हरामी कहा उसने मुझे’-महिला कांस्टेबिल चीख कर बोली। मैंने तुरन्त मामला शान्त करने के उद्देश्य से कहा-‘चलिए उसकी तरफ से मैं माफी मांगता हूं। लेकिन हुआ क्या?’ वह महिला कांस्टेबिल गुस्से में उठी और पैर पटकते हुए बाहर चल दी। इस पूरे माहौल से अब्बू थोड़ा सकते में आ गया था और मुझसे सट कर बैठा रहा। उसके जाने के बाद अब्बू ने मुझसे कान में कहा-‘मौसा मुझे पता है क्या हुआ था।’ अब्बू ने फिर धीमें धीमें बताना शुरू किया-‘मौसा, वो पुलिस लड़की न, मौसी का बायां हाथ खींच कर कैमरा वाले से दूर ले जा रही थी। मौसी को बांए हाथ में दर्द है ना, तो मौसी ने उसे कसकर डांट दिया।’ फिर थोड़ा रूक कर बोला-‘अच्छा किया डांटा।’
खैर उसके बाद एटीएस के ही एक बन्दे ने मुझे बताया कि वह महिला डिप्रेशन में है। ऐसे ही कुछ कुछ समय पर भड़क उठती है। मैंने पूछा, पहले से है या नौकरी में आने के बाद हुआ। उसने कहा, नौकरी में आने के बाद डेवलप हुआ है। शायद नौकरी के प्रेशर का असर हो। मैं उससे बात कर ही रहा था कि पुनः वह महिला तेजी से कमरे में दाखिल हुई और उसी तरह चिल्लाकर बोली-‘दूसरो की पत्नियों को गले लगाने का रिवाज आपके यहां होगा, हमारे यहां नहीं।’ यह कहकर वह उल्टे पाव वापस चल दी। मैं आवाक रह गया कि यह क्या बात हुई। किस सन्दर्भ में उसने यह बात की। दिमाग पर बहुत जोर डालने पर मुझे बात समझ आयी। दरअसल कोर्ट में अब्बू की मां जब रो रही थी तो मैंने उसे सांत्वना देते हुए हल्के से गले लगा लिया था और उसके सर पर अपना हाथ रख दिया था। मुझे याद आया, उस समय यही महिला कांस्टेबिल बड़े ध्यान से मेरी तरफ देख रही थी। मुझे पूरा मामला समझ आ गया। लेकिन मुझे उस महिला कांस्टेबिल पर जरा भी गुस्सा नहीं आया। बल्कि तरस आया। दरअसल असल कैद में तो वो थी-‘अपने पिछड़े मूल्यों की कैद में।’
खैर, कोर्ट से एटीएस को हमारा ‘ट्रांजिट रिमांड’ मिल चुका था और अब हमें भोपाल से लखनऊ आना था। गाड़ियों में जल्दी जल्दी सामान पैक किया जा रहा था। जरूरी औपचारिकताएं निभाई जा रही थी। पहली बार हम इतनी लंबी यात्रा बिना कोई सामान लिए करने जा रहे थे-खाली हाथ। कार से इतने ‘लांग ड्राइव’ पर जाने का हल्का सुख भी महसूस हो रहा था और आगे होने वाली पूछताछ की चिंता भी सता रही थी। खैर 8 बजे रात हम लोग निकल पड़े। अब्बू उत्साहित था कि हम लखनऊ जा रहे है-यानी मौसा के गांव। भोपाल से अपने राजनीतिक काम पर निकलते हुए मैं अब्बू से यही कहता था कि मैं लखनऊ जा रहा हूं, अपने गांव।
रास्ते में ढाबे पर हमने खाना खाया। और फिर आगे निकल पड़े। इस दौरान कोई किसी से नही बोल रहा था। तभी आगे बैठे एटीएस अधिकारी ने बोला-‘रात में हम झांसी में अपने कार्यालय पर रूकेंगे और फिर सुबह लखनऊ के लिए निकलेंगे।’ मैं कुछ नहीं बोला। मेरे पास विकल्प ही क्या था। खाना खाने के बाद अब सबको नींद आ रही थी। अब्बू तो मेरी गोद में ही सो गया था। अचानक आगे की सीट पर ड्राइवर के साथ बैठे अधिकारी ने आदेशात्मक स्वर में बोला-‘किसी को सोना नहीं है। वरना ड्राइवर को भी नींद आयेंगी।’ थोड़ा देर रूक कर फिर बोला-‘ चलिए मनीष जी अपने बारे में कुछ बताइये। अपने बचपन से शुरू कीजिए।’ मैं कुछ बोलता, इससे पहले ही उसने सवाल दागना शुरू कर दिया। मसलन, जन्म कहां हुआ, पढ़ाई कहां से की आदि। मुझे समझ नही आया कि वह सचमुच मुझमें रूचि ले रहा है या पूछताछ की अपनी ड्यूटी निभा रहा है। बहरहाल मुझे मजा आ रहा था। बहुत बहुत दिनों बाद कोई मेरे बचपन के बारे में पूछ रहा था। मेरे अगल बगल बैठे दो सिपाही और मेरी सीट के पीछे बैठे दो सिपाहियों की प्रतिक्रिया मैं रात के अंधेरे में नहीं देख पा रहा था। अचानक मेरे बगल में बैठे एटीएस के सिपाही ने मुझसे पूछा-‘आपके कमरे में जो ‘शहतूत’ वाली कविता लगी थी वो आपने लिखी है?’ मैंने हंसते हुए कहा-‘अरे नहीं, वह तो ईरान के मजदूर कवि ‘साबिर हका’ की कविता है।’ एटीएस का यह व्यक्ति वही था जो मेरे कमरे की तलाशी के दौरान तलाशी लेने की बजाय दिवारों पर लगी कविताएं पढ़ रहा था। अचानक उसने सामने की सीट पर बैठे अपने सीनियर से कहा-‘सर चलिए, कुछ कविताएं सुनते हैं मनीष जी से।’ उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। हां हां कुछ कविताएं, शेरो शायरी हो जाये। पीछे बैठे सिपाहियों ने एक साथ कहा। तब मुझे अहसास हुआ कि इन लोगों को मेरी कहानी में कोई रूचि नहीं थी। गाड़ी 80-90 की रफ्तार से दौड़ रही थी। मैंने कहा-‘पहले आप लोग कुछ सुनाइये।’ बगल वाले व्यक्ति ने एक अच्छा शेर सुनाया, जिसका भाव यह था कि अगर आप बिखरे हुए कांच के टुकड़ों को उठाने का प्रयास करेंगे तो उंगलियां तो लहूलूहान होगी ही। अब मेरी बारी थी। मैंने लगातार कई शेर सुनाएं। सभी मंत्रमुग्ध सुन रहे थे और दाद दे रहे थे। सामने की सीट पर बैठा अधिकारी कुछ नहीं बोल रहा था। शायद उसे यह ‘मुक्त माहौल’ पसन्द नहीं आ रहा था। आखिर मैं कैदी जो था। लेकिन वह बोला कुछ नहीं। अंत में मैंने दो कविताओं के माध्यम से उनके सामने एक सवाल रख दिया। गोरख पाण्डेय की कविता-‘चिड़िया जाल में क्यो फंसी, क्योकि वह भूखी थी।’ और कंवल भारती की कविता-‘चिड़िया जाल में क्यो फंसी, क्योकि वह चिड़िया थी।’ गाड़ी में बैठे सभी लोगों में दो फाड़ हो गया। सभी के अपने अपने तर्क थे। तभी मैंने देखा कि अब्बू उठकर बैठ चुका था और खिड़की से बाहर का मजा ले रहा था। हमारी बातें भी उसके कान में पड़ रही थी। अचानक वह मुड़ा और मेरा गला अपनी ओर खींचते हुए मेरे कान में बोला-‘मौसा, चिड़िया को कोई बहेलिया जाल बिछाकर पकड़ेगा, तभी तो चिड़िया जाल में फंसेगी। बहेलिया चिड़िया को नही पकड़ेगा तो चिड़िया मजे में उड़ती रहेगी, चाहे वो भूखी हो या ना हो।’ बहस में अब्बू का यह निर्णायक हस्तक्षेप था। मैंने आश्चर्य से उसे देखा और उसका माथा चूम लिया। इस खूबसूरत हस्तक्षेप के बाद वह कुछ समय बाहर का नजारा लेकर पुनः मेरी गोद में सो गया। तभी सामने की सीट पर बैठा अधिकारी जो अब तक चुप था और ऐसा लग रहा था कि उसे यह ‘कवि गोष्ठी’ पसन्द नहीं आ रही थी, अचानक बोल उठा-‘एक नक्सली जाल में क्यो फंसा, क्योकि वह सुरक्षा के प्रति लापरवाह था।’ और ‘एक नक्सली जाल में क्यो फंसा, क्योकि वह नक्सली था।’
इस खेल में अधिकारी के कूदते ही सब खुश हो गये। खैर, इस पर भी सब दो भागों में बंट गये और मुझे थोड़ा अन्दाजा लगाने में आसानी हुई कि ये मुझ तक कैसे पहुंचे। तभी पीछे बैठे एक सिपाही ने मुझसे पूछा कि आखिर आप लोग चाहते क्या हैं। अब तक मैं बोल बोल के थक चुका था, लिहाजा मैंने फैज का एक मशहूर शेर पढ़ दिया-‘सूतूनेदार पे रखते चलो सरो के चिराग, जहां तलक सितम की सियह रात चले।’ शेर का अर्थ शायद उसकी समझ में नहीं आया, लेकिन उसने दूसरा प्रश्न दाग दिया-‘चलिए, मान लिया कि आपको आपका मकसद मिल जाये तो उसके बाद आप क्या करेंगे।’ मैंने उसी रौ में एक और शेर पढ़ दिया-‘जिंदगी एक मुसलसल सफर है, जो मंजिल पे पहुंचा तो मंजिल बढ़ा ली।’
शेरो शायरी के बीच हमारी मंजिल यानी झांसी आ गया। इसी बीच सामने बैठे अधिकारी के पास किसी का फोन आया। वह ‘जी सर, जी सर’ कहता रहा। फिर पीछे मुड़ कर बोला-‘मनीष जी सारी, आज रात आपको 2-4 घण्टे थाने के लाक अप में गुजारने होंगे।’ उनकी आपस की बातचीत से मैंने अंदाजा लगाया कि ऊपर से आदेश था कि मुझे लाकअप में ही रखा जाय। जिंदगी में पहली बार मैं लाकअप में था। छोटा अंधेरा कमरा, पेशाब की बदबू से भरा। लाकअप के कोने में पेशाब घर, पेशाब से लबालब। नरक की कल्पना करने वाला जरूर इस लाकअप में रहा होगा। खैर अब्बू अभी भी नींद में मेरी गोद में ही था। मुझे लगा कि कही अब्बू जाग ना जाय और इस नरक से उसका साबका ना पड़ जाय। खैर वह सोया रहा और मुझे भी नींद आ गयी। सुबह सुबह अचानक मेरी नींद खुली। मेरे कानों में लगातार आवाज आ रही थी-‘अरे बाप रे, अरे माई रे।’ थानेदार अपनी बेल्ट से 16-17 साल के तीन बच्चों को बेरहमी से पीट रहा था। सामने दिवाल घड़ी 5 बजा रही थी। पिटते तीनों बच्चों के उपर गांधी, अंबेडकर की फोटो लगी थी। सामने की दिवार पर बड़ा बड़ा ‘सत्यमेव जयते’ खुदा हुआ था। यह दृश्य देख मुझे महेन्द्र मिन्हवी का एक शेर याद आ गया-
सत्यमेव जयते का नारा खुदा हुआ यो थाने में, जैसे कोई इत्र की शीशी रखी हुई पैखाने में।
इसी शोरगुल में अब्बू की नींद भी खुल गयी। उसने आश्चर्य से चारो तरफ देखा और मुझसे लिपट गया। मेरे कान में धीमें से बोला-‘हम कहां हैं।’ मैंने कहा-‘ड्राइवर थक गया था, इसलिए हम यहां आराम कर रहे हैं। तब तक पेशाब की बदबू अब्बू की नाक में जा चुकी थी। अब्बू मुंह बनाके बोला-‘कितनी बुरी जगह है ये। यहां कौन रहता है।’ मैंने बेहद धीमे से यूहीं कह दिया-‘चोर रहते हैं।’ उसने फौरन सवाल किया-‘लेकिन, लेकिन हम तो चोर नहीं हैं।’ मैंने कहा, हां हम तो सिर्फ रूकने के लिए आये हैं। फिर अब्बू ने सहमी सी नज़र लाकअप में बैठे 3 अन्य लड़कों पर डाली जिन्हें रात में ही यहां लाया गया था। अब्बू ने बेहद धीमें से मेरे कान में कहा-‘क्या ये चोर हैं।’ उनमें से एक लड़के ने अब्बू की बात सुन ली और प्यार से कहा-‘हम चोर नहीं है।’ फिर उसने गुस्से में आगे जोड़ा-‘चोर तो पुलिस है। उसने हमारे पैसे मोबाइल सब चुरा लिये।’ फिर मेरी तरफ दुःख से देखते हुए बोला-‘हमें तो घर से पकड़ कर लायी है। देखते हैं क्या केस डालती है। अभी तक तो कुछ बताया नही।’ फिर उन्होंने अब्बू को खाने के लिए बिस्किट दिये, जो अब्बू ने थोड़ा झिझकते हुए ले लिया। बिस्किट खाते हुए अब्बू ने मेरे कान में धीमें से कहा-‘मौसा ये चोर नहीं हैं।’ मैंने भी खेल खेलने के अंदाज में उसके कान में कहा-‘तुझे कैसे मालूम।’ अब्बू ने भी तुरन्त शरारती अंदाज में कहा-‘मुझे मालूम है, क्योकि बच्चे हमेशा सच बोलते हैं।’ यह सुनकर मैं मुस्कुरा दिया।
इसके बाद हमें लाकअप से निकाला गया। हम नित्यकर्म से निवृत्त होकर पुनः लाकअप में आ गये। तभी एटीएस की हमारी टीम भी नहा धोकर, नये कपड़े पहनकर और इत्र लगाकर हमें लेने वापस आ गयी। आते ही एटीएस अधिकारी ने मुझसे पूछा-‘रात कैसी कटी।’ मैं समझ नहीं पाया कि यह सामान्य सवाल था या व्यंग्य था। मैंने कोई जवाब नहीं दिया। उसने आगे कहा-‘मच्छरो ने जरूर परेशान किया होगा।’ रात की शेरो-शायरी का हैंग ओवर अभी मेरे ऊपर था। लिहाजा एक शेर में ही मैंने उसे जवाब दिया-‘धूप की शिद्दत कभी महसूस ना करता, ये कौन मगर पेड़ के साये में खड़ा है।’ उस अधिकारी समेत पूरी टीम मुस्कुरा दी और हम अगली यात्रा पर निकल पड़े।

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अब्बू की नज़र में जेल- 8

हमारे घर से हमें सीधे ‘हाक’ (एण्टी नक्सल फोर्स) हेडक्वार्टर लाया गया। काले बूट और गहरे हरे रंग की वर्दी में नौजवान लड़के अत्याधुनिक हथियारों से लैस किसी रोबोट की भांति इधर से उधर आ जा रहे थे। हमारे आने पर उन्होंने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई। कुर्सियां लगी एक छोटे कमरे में हमें बैठाया गया। हमारे बैठते ही उन लोगों के बीच कुछ काना फूसी हुई और फिर अमिता को इसी से सटे दूसरे कमरे में शिफ्ट कर दिया गया। अब्बू को मैंने शतरंज दे दिया और उसे कोने में लगी एक कुर्सी पर बिठा दिया। लेकिन अब्बू कुर्सी पर बैठते ही सरक कर उतर गया और बोला-‘मौसा मैं एक चक्कर लगा कर आता हूं।’ इसके बाद वह कैम्पस का चक्कर लगाता और बीच बीच में आकर मुझे नई-नई जानकारी देता। जैसे, वो लंबा वाला सिपाही वीडियो काल में अपने बच्चे से बात कर रहा है। मैंने चुपके से सुन लिया, आज उसके बच्चे का जन्मदिन है और वो अपने पापा को बुला रहा है।
इधर मुझसे पूछताछ की शुरूआत हो गयी। 7-8 लोगों ने भयभीत करने के अंदाज में मेरे एकदम नजदीक आकर घेरे में कुर्सियों पर बैठ गये। पहले औपचारिक पूछताछ हुई। नाम, पता आदि। मुझे मशहूर लैटिन अमरीकी फिल्म ‘दी आवर आफ फरनेस’[The Hour of the Furnaces] का शुरूआती दृश्य याद आ गया। तेज ड्रम संगीत के बीच स्क्रीन पर कैप्शन उभरता है। नाम- विक्टिम [victim], सरनेम- आरगैनाइजेशन [organization], पेशा- रिवोल्यूशन [Revolution]। सच में मेरा भी यही परिचय था। इस औपचारिक पूछताछ के बाद असली पूछताछ शुरू हुई। मेरे नजदीक बैठे एक शख्स ने अपना मोबाइल निकाला और एक एक करके मुझे तमाम लोगों के फोटो दिखाने लगा। फोटो देखते हुए मैं नर्वस होने लगा और मेरे पसीने छूटने लगे। लेकिन जल्दी ही मैंने अपने पर नियंत्रण पा लिया और बाथरूम जाने का इशारा किया। इसी ‘ब्रेक’ में मैंने अपने आपको नार्मल किया। ‘ब्रेक’ के बाद वह हर फोटो का परिचय खुद ही देने लगा और उनसे मेरा सम्बन्ध जोड़ने लगा। अब तक मैं इस शुरूआती शाक से उबर चुका था। मैंने कहा-‘जब आपको इतनी डिटेल जानकारी है तो मुझसे क्यों पूछ रहे हैं।’ उसने तुरन्त कहा -‘लेकिन हमें यह नही पता कि संगठन में इनका पद और जिम्मेदारी क्या है। यह जानकारी आप हमें देंगे।’ फिर व्यंग्य से बोला-‘देंगे ना।’ अब तक मेरा अपने आप पर पूरा नियंत्रण हो चुका था। मैंने दृढ़ता से कहा- इनमें से कुछ जनसंगठन के सदस्य हैं और कुछ मेरे व्यक्तिगत दोस्त हैं, बाकी को मैं नहीं पहचानता । कुछ फोटो पर वह जोर देने लगा कि बताइये यह कौन है। मैंने साफ इंकार कर दिया कि मैं नहीं जानता। तभी उनमें से एक ने मेरे पेट पर हाथ रखते हुए हल्का सा मरोड़ दिया और बोला कि बताना पड़ेगा। मुझेे लगा कि अब टार्चर शुरू होने वाला है। तभी एक हट्टा कट्टा लंबा सांवले रंग का सिपाही जो इस पूछताछ में चुपचाप बैठा था, अचानक बोल उठा-‘इनका पेट ठीक नहीं है, टच मत करिये।’ बाद में मैंने ध्यान दिया, यह वही व्यक्ति था जिसके बेटे का आज जन्म दिन था और जिसकी बात अब्बू ने सुन ली थी। उसकी बात का असर हुआ। और फिर किसी ने मुझे टच नहीं किया। मुझे अभी भी समझ नहीं आ रहा कि उसने मुझे ‘डिफेन्ड’ क्यो किया।
इसी दौरान अचानक मैंने देखा कि अब्बू पूछताछ करने वाले शख्स के पीछे खड़ा होकर मोबाइल की सभी तस्वीरें ध्यान से देख रहा था। उसने मेरे कान में धीमें से कहा-‘ये सब भी तेरे साथ मिलकर सरकार से लड़ते हैं।’ मैंने कहा-हां। अब्बू ने तपाक से जोड़ा-वाह। और अपने शतरंज की ओर भागा, जहां शायद उसका राजा भी दुश्मनों से घिरा हुआ था। अब्बू को उसे बचाना था।
इसी पूछताछ के बीच एक रोबीले डील डौल वाले व्यक्ति ने प्रवेश किया, जो पता नहीं क्यों किसी ढहते सामंती परिवार का बिगड़ैल बेटा नजर आ रहा था। उसने कुर्सी पर धंसते ही पूरे माओवादी आन्दोलन को गाली देना शुरू कर दिया। वही पुराना राग-‘नेता लोग कोठियों में रहते है, कैडर को मरने के लिए छोड़ देते हैं।’ मैं चुपचाप उसका ‘भाषण’ सुन रहा था। लेकिन जब उसने यह बोला कि यहां लड़कियों का शारीरिक शोषण होता है तो अचानक मुझे गुस्सा आ गया। मैंने भरसक अपने गुस्से पर नियंत्रण रखते हुए कहा कि आप मुझसे पूछताछ करने आये हैं या अपना ‘मुर्गावलोकन’ सुनाने। पता नहीं क्यो वह भड़का नहीं। गैर हिन्दी भाषी होने के कारण शायद वह मुर्गावलोकन का अर्थ नहीं समझ पाया। लेकिन उसने उसी रौ में कहा-‘तुम मानो या ना मानो यह तो कामन सेन्स की बात है।’ मैंने भी यूहीं अग्रेजी में कह दिया-‘कामन सेन्स इज नाट सो कामन’। इसके बाद उसका ब्लडप्रेशर थोड़ा नार्मल हो गया और खीझते हुए दूसरों को संबोधित करते हुए बोला-‘इनका ब्रेनवाश हो चुका है, इन्हें कुछ समझ में नहीं आयेगा। दो चार साल जेल में रहेंगे तब समझ आयेगा।’ यह कहते हुए वह पैर पटकते हुए कमरे से बाहर चला गया।
इस गरमा गरमी के कारण अब्बू का ध्यान भी भंग हो चुका था, वह दौड़ कर मेरे पास आया, बोला-‘मौसा क्या हुआ।’ मैंने कहा-‘कुछ नहीं आदिवासियों को गाली दे रहा था।’ मैंने अब्बू को आदिवासियों की जो कहानियां सुनाई थी, उससे रिलेट करके अब्बू ने कुछ समझा और तत्काल मुंह बनाकर बोला-‘गन्दा आदमी।’ मुझे हंसी आ गयी और मेरा टेंशन भी रिलीज हो गया।
इसी बीच पूछताछ करने वाले एक एक करके बाहर चले गये। सिर्फ वही बचा रहा जिसने मुझे ‘डिफेंड’ किया था। मुझे ऐसा लगा कि वह जान बूझ कर नहीं गया। जब कमरे में सिर्फ मैं और अब्बू बचे तब उसने इत्मीनान से पूछा-‘आप लोग तो भगवान में विश्वास करते नहीं तो ऐसे कठिन समय में आप किसकी तरफ देखते है।’ मैंने बिना सोचे समझे जवाब दे दिया- इतिहास की तरफ। वह संतुष्ट नहीं हुआ, लेकिन आगे कुछ नहीं पूछा और उठ कर चल दिया। अब्बू मेरी बात ध्यान से सुन रहा था। अब्बू को पता है कि मैं भगवान को नहीं मानता। कभी कभी वो मुझसे बहस भी करता है। इससे जुड़ी बड़ी मजेदार कहानियां हैं हमारे पास। लेकिन इतिहास उसके शब्दकोश के लिए नया शब्द था। उसने मुझसे पूछा-‘मौसा ये इतिहास क्या होता है?’ मैंने दिमाग पर जोर डाला और बोला, कहानी। अब्बू ने तुरन्त दूसरा सवाल दागा-‘सच्ची कहानी?’ मैंने कहा, थोड़ी सच्ची थोड़ी झूठी। अब्बू ने कहा-‘अच्छा अब पता चला कि जब मैं रोता हूं तो तुम मुझे कहानी क्यो सुनाते हो। ताकि मैं फिर से हंसने लगूं और खेलने लगूं।’ मैंने कहा- हां। मैंने इतना और जोड़ा-‘यही तो इतिहास भी करता है।’ पता नहीं अब्बू ने क्या समझा और वह फिर से कैम्पस का चक्कर लगाने भाग गया।
मुझे लगा था कि आज रात नींद नहीं आयेगी। लेकिन अब्बू को और मुझे अच्छी नींद आ गयी। पूछताछ करने वाली टीम भी कई तकनीकी कामों में उलझी थी-यहां मोहर, वहां मोहर, इसकी पैंकिग, उसकी पैंकिग। शायद यही कारण था कि उन्होंने मुझे सोने का मौका दे दिया। रात में करीब दो ढाई बजे के आस पास मेरे कान में कुछ आवाज पड़ी और मेरी नींद खुल गयी। कमरे के बाहर अहाते से धीमें धीमें बातचीत की आवाज आ रही थी। एक की बात तो मैं नहीं सुन सका, लेकिन दूसरा व्यक्ति जो मेरे कमरे की तरफ ही खड़ा था, उसकी आवाज मैं सुन पा रहा था। वह कह रहा था-‘नहीं मैं यह नहीं कर सकता। इतनी बड़ी मक्खी मैं नहीं निगल सकता। आखिर कोर्ट में तो मुझे ही जवाब देना पड़ेगा।’ यह सुनकर मैं तनाव में आ गया। लेकिन फिर इसे झटक कर दुबारा सोने का प्रयास करने लगा। मैंने अपने आप से कहा-इसमें मैं क्या कर सकता हूं, जो करना है, अब इन्हें ही करना है।
अगले दिन हमें कोर्ट ले जाया गया। हमें उम्मीद नहीं थी कि वहां हमसे मिलने कोई आयेगा। लेकिन हमारे आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। वहां ना सिर्फ हमारे शुभचिंतक पहले से मौजूद थे, बल्कि उन्होंने एक अच्छा वकील भी कर दिया था। सबसे पहले अब्बू की मां हमे कोर्ट में मिली। उसकी आंखें भरी हुई थी। हमसे मिलते ही वह रोने लगी। मैंने उसे ढांढस देते हुए पूछा-‘अब्बू कैसा है।’ वह बोली कि उसे अभी बताया नहीं है, लेकिन आज सुबह पूछ रहा था कि मौसी की तबियत खराब है क्या। हम लोगो के व्यवहार से कुछ अजीब लग रहा है उसे। आज सुबह ही मौसा के यहां जाने की जिद कर रहा था। बड़ी मुश्किल से समझाया। यह सुन कर हमें भी रोना आ गया। बड़ी मुश्किल से हमने अपने आप को रोका।
खैर कोर्ट की औपचारिकता पूरी करके हम कोर्ट से बाहर निकले। मेरे दिमाग में लगातार यही चल रहा था कि अपने दोस्तों, संगठन के साथियों, और परिवार वालों को सन्देश कैसे दिया जाय कि हम ठीक हैं और अच्छी स्प्रिट में है। तभी कोर्ट की सीढ़िया उतरते हुए हमें सामने मीडिया का हुजूम दिखायी पड़ गया। बस मुझे सन्देश देने का माध्यम मिल गया। सीढ़िया उतरते हुए ही मैंने अपनी मुठ्ठी लहराई और नारा लगाया-इंकलाब जिन्दाबाद। पीछे से अमिता ने भी जोर से दोहराया-इंकलाब जिन्दाबाद। तभी मुझे अब्बू की पतली सी आवाज सुनाई दी-इंकलाब जिन्दाबाद। मैंने आश्चर्य से पीछे मुड़ कर देखा-उसके नन्हें हाथ हवा में उठे हुए थे और वो मेरी तरफ ही देख रहा था। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। दिमाग में कौंधा- भला अब इंकलाब को कौन रोक सकता है।
इंकलाब जिन्दाबाद

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अब्बू की नज़र में जेल- 6 और 7

अब्बू की नज़र में जेल-6

एक दिन खुली गिनती के समय अब्बू ने मुझसे अचानक पूछा- मौसा जब जेलर अन्दर आता है तो बड़ा वाला गेट (करीब 18-20 फुट ऊंचा) खुलता है, और जब हम लोग अन्दर आते हैं या बाहर जाते हैं तो छोटा गेट (करीब 5 फुट ऊंचा) खुलता है। ऐसा क्यों? मैं इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं था, इसलिए कुछ देर रूक कर मैं बोला-‘शायद उसकी गर्दन में दर्द हो और वह सर झुका ना पाता हो।’ अब्बू ने तुरन्त मेरी बात काटी-‘नहीं मौसा मैंने देखा है, वह अपनी कुर्सी पर बैठते हुए गर्दन झुकाता है। इसका मतलब उसे दर्द नहीं है।’ मुझे समझ नहीं आया कि अब मैं इसका क्या जवाब दूं। मैंने यूहीं कहा-‘अरे यार वो भी छोटे गेट से आयेगा तो पता कैसे चलेगा कि वो जेलर है। सब सोचेंगे कि वह भी कैदी है।’ अब्बू ने तुरन्त दूसरा सवाल दागा-‘तो क्या कैदी और जेलर में यही फर्क है?’ मैंने यूहीं कहा-हां। अब्बू ने अपनी आंखे नचाते हुए जैसे कोई सीक्रेट खोलते हुए कहा-‘मौसा मुझे पता है कि बड़ा वाला गेट एक बार और खुलता है।’ मैंने आश्चर्य से पूछा-‘अच्छा। कब?’ उसने विजयी भाव से कहा-‘जब कूड़ा-गाड़ी निकलती है तब।’ मैंने डर से चारो तरफ देखा कि किसी ने सुना तो नहीं!
बच्चे के इस मासूम आब्जर्वेशन पर पूरी कायनात मुस्कुरा रही थी।

अब्बू की नज़र में जेल-7

पूछताछ के दौरान ही मुझसे राजनीतिक चर्चा भी होती रहती थी, जिसे मैं जानबूझकर लम्बा खींचने का प्रयास करता था, ताकि पूछताछ का उनका समय कम पड़ जाय। ज्यादातर पूछताछ के ही किसी बिन्दु से राजनीतिक चर्चा शुरू हो जाती थी। हालांकि राजनीतिक चर्चा के पीछे भी उनका एक ‘हिडेन एजेण्डा’ होता था- मेरे ‘स्तर’ का अंदाजा लगाना।
उन्होंने मेरे कमरे से जो साहित्य जब्त किया था उसमें ‘वैकल्पिक शिक्षा’ से सम्बन्धित कुछ साहित्य था, जिस पर अमिता काम कर रही थी। इसके अलावा कुछ साहित्य ‘पारधी’ जैसी ‘विमुक्त जन जातियों’ [Denotified Tribes] की सामाजिक आर्थिक स्थितियों पर था। इन्हीं साहित्य पर पूछताछ ने राजनीतिक चर्चा का रूप ले लिया। उसने पूछा, यह ‘वैकल्पिक शिक्षा’ क्या है। वैकल्पिक शिक्षा के बारे में बताते हुए मैंने ‘मुख्यधारा’ की शिक्षा की आलोचना की और उदाहरण के रूप में मैंने बताया कि आज भी बच्चो को ‘क्ष’ से क्षत्रिय और ‘ठ’ से ठठेरा ही पढ़ाया जाता है। उसने तुरन्त पूछा कि ‘क्ष’ से क्षत्रिय ना पढ़ाया जाय तो क्या पढ़ाया जाये। मैंने तुरन्त कहा- बहुत से शब्द है। उसने भी तुरन्त कहा-‘कोई एक बताइये।’ मैं चकरा गया, क्योकि मुझे सच में उस समय ‘क्ष’ से कोई अन्य शब्द ध्यान में नहीं आया। अपनी इस ‘जीत’ से पूछताछ करने वाला मदमस्त हो गया और मुस्कराते हुए बोला -‘आप लोग बस आलोचना करना जानते हैं, कोई विकल्प तो होता नहीं आप लोगो के पास।’ मैं उसके जाल में फंस गया था। उसके जाल से निकलने का प्रयास करते हुए मैने कहा-‘पढ़ाने का यह तरीका ही गलत है।’ कविता कहानी और इससे जुड़ी अन्य गतिविधियों के माध्यम से बच्चे अक्षर खुद ब खुद पहचान लेते है।’ लेकिन वह इस विजयी पल को हाथ से जाने नहीं देना चाहता था और बार बार मुझसे यही पूछे जा रहा था कि बताइये बताइये ‘क्ष’ से और क्या शब्द है। मेरी इस ‘हार’ ने अब्बू का ध्यान भी आकर्षित कर दिया जो वहीं पर एक कोने में बैठकर ड्राइंग पेपर पर कुछ बना रहा था। वह मेरे बिल्कुल पास आकर कान में धीमें से बोला-‘मौसा सचमुच तुम्हें नहीं पता।’ मैंने प्यार से पूछा-‘क्या।’ वही जो ये पूछ रहे हैं। मैंने कहा, नही याद आ रहा, अब्बू। अब्बू हल्के गुस्से में बोला-‘फिर इतनी मोटी मोटी किताबें पढ़ने का क्या फायदा।’ यह कहते हुए वह वापस अपनी ड्राइंग बुक की तरफ चला गया। उसे यह बर्दाश्त नहीं था कि उसके मौसा किसी से हार जाय।
अब बात विमुक्त जातियों पर आकर टिक गयी। वह अपने अनेक आपरेशनों का हवाला देते हुए कहने लगा कि ये सभी जातियां अपराधी जातियां हैं। अपराध इनके खून में होता है, इन्हें कभी सुधारा नहीं जा सकता। जवाब में मैं उतने ही पुरजोर तरीके से इन जातियों के इतिहास, सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों और सबसे बढ़कर पुलिस व समाज का उनके प्रति रूख को स्थापित करते हुए यह बताने का प्रयास करता रहा कि ये जातियां किस कदर दबायी और बदनाम की गयी हैं। अचानक से मेरे बगल में बैठा गठीले बदन का, टीका लगाये हुए एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति जो अभी तक कम बोल रहा था और बहुत विनम्र व्यवहार कर रहा था, भड़क उठा और विमुक्त जातियों से शुरू करके पूरी जनता को ही गालियां देने लगा-‘किस जनता की बात आप लोग करते हैं, वही जो दारू पीकर सूअरों की तरह पड़ी रहती है, एक नम्बर की कामचोर होती है, दो पैसे के लिए अपना ईमान बेच देती है।’ इसी प्रक्रिया में वह कूद कर बेवजह मुसलमानों पर भी आ गया और अपना दिमागी कचरा उड़ेलने लगा। उसके अचानक इस हमले से मैं सकते में आ गया। अगले पांच दस मिनट तक वह ऊंची आवाज में लगातार बोलता रहा और जनता को गालियां देता रहा।
रात में 2 बजे उसकी आवाज और भी तेज व तीखी सुनाई दे रही थी। बाहर खड़े दोनों पहरेदार भी एके 47 पर अपनी पकड़ मजबूत बनाते हुए कमरे के दरवाजे पर आ गये। मानो उसके कुतर्को को कभी भी हथियारों की जरूरत पड़ सकती है। यह देख कर मेरे दिमाग में अचानक कौधा-‘क्या मेरे तर्को के लिए भी हथियारों की जरूरत है।’ गिरफ्तारी के चंद रोज पहले ही मैंने ‘न्यूगी वा थांगो’ का उपन्यास ‘मातीगारी’ पढ़ा था। उसकी पंक्तियां कौध गयी-‘सिर्फ खूबसूरत तर्क ही काफी नहीं होते, उनका समर्थन करने के लिए हथियारों की ताकत भी जरूरी हाती है।’ बहरहाल किसी अनहोनी की आशंका में अब्बू अपना ड्राइंग छोड़ कर मेरे पास आकर कुर्सी से सट कर खड़ा हो गया। पता नहीं क्या हुआ कि अब्बू का स्पर्श मिलते ही मैं भावुक हो गया और मेरी आंख भरने लगी। चश्में के भीतर से ही मैंने दोनों किनारों को साफ किया। पूछताछ करने वाला भी मेरी स्थिति भांप गया और अपना जहरीला भाषण बीच में ही रोक कर बोला-क्या हुआ। मैंने बहुत मुश्किल से आवाज निकाली-‘जनता को इतनी गाली मैंने जीवन में पहले कभी नहीं सुनी है।’ मेरी मनःस्थिति देख कर वह आगे कुछ नहीं बोला। मैं अब्बू की तरफ मुखातिब हुआ और अब्बू को रिलैक्स करने के लिए पूछा-‘अब्बू तू ड्राइंग बुक पर क्या बना रहा है?’ अब्बू ने गम्भीरता से जवाब दिया-‘माल्यांग की कूची।’

नोट-‘माल्यांग की कूची’ एक चीनी लोककथा है, जिसमें माल्यांग नामक बच्चे को एक जादुई कूची यानी ब्रश मिल जाता है, जिससे वह जो भी बनाता है, वह वास्तविक हो जाता है। माल्यांग अपनी इस ताकत का इस्तेमाल करते हुए एक नदी बनाता है और उसमें बाढ़ ला देता है। इस बाढ़ में वहां का अत्याचारी राजा डूब जाता है और जनता को उसके अत्याचारों से मुक्ति मिल जाती है।

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अब्बू की नज़र में जेल-5

जेल में शनिवार का दिन हमारे लिए बहुत खास होता है। इस दिन अब्बू की मुलाकात अपनी मौसी से और मेरी मुलाकात अपनी पत्नी/प्रेमिका/फाइली [co-accused] अमिता से होती है। हालांकि यह मुलाकात महज आधे घण्ठे की होती है मगर फिर भी हमें इस मुलाकात का बेसब्री से इन्तजार रहता है। अब्बू तो लगभग हर दिन एक दो बार पूछ ही लेता है-मौसा शनिवार कब आयेगा, या शनिवार आने में अभी कितना दिन बाकी है। शनिवार के दिन सुबह सुबह तैयार होकर अब्बू माइक की तरफ ही कान लगाये रहता था। हालांकि हमारा नाम 12 बजे के आसपास ही पुकारा जाता था। नाम सुनते ही अब्बू बिना मेरा हाथ पकड़े ही आगे आगे गेट तक भाग जाता था, लेकिन यहां पहुंच कर वह ठिठक जाता और मेरा इंतजार करता क्योकि उसे पता था कि अब आगे का रास्ता अपमानजनक तलाशियों से होकर जाता है। सभी बैरकों से मुलाकाती कैदी जब गेट पर इकट्ठा हो जाते तो हमें जोड़े में खड़े होने का आदेश दिया जाता। फिर हमारी गिनती होती-2 4 6 8 10। सुबह की गिनती और फिर बैरक की अन्य दो गिनती (दोपहर और फिर रात की) भी इसी तरह जोड़े में होती। जोड़ा बनाने में पीछे रहने वाले कैदी को अपमानजनक गालियों से नवाजा जाता। अब्बू ने एक बार पूछ ही दिया- मौसा यहां गिनती 1 2 3 4 5 6 क्यों नहीं होती। 2 4 6 8 क्यो होती है। मुझे भी कोई जवाब नहीं सूझा तो मैंने कह दिया कि यहां की गिनती यहीं है। लेकिन अब्बू संतुष्ट नहीं हुआ। फिर मैंने मन ही मन सोचा कि चूंकि यहां जिंदगी ही आधी है, इसलिए शायद गिनती भी आधी है। या शायद यहां सिर्फ पुरूष पुरूष हैं इसलिए विषम नम्बर को निकाल दिया गया है। बाद में मैंने सोचा था कि इसके बारे में पता करूंगा कि आखिर ऐसा क्यो है। लेकिन बाद में मैं भूल गया।
यहां जब लोग महिला मुलाकात के लिए जाते है तो अपने प्यार व सरोकार का इजहार करने के लिए कुछ सामान भी ले जाते है। जैसे बिस्किट नमकीन का पैकेट आदि। जो ज्यादातर यहां की कैन्टीन से खरीदे हुए होते हैं। लेकिन उधर से यानी महिलाओं की तरफ से हाथ से बनाया सामान ज्यादा आता है, जैसे दही, चटनी, पराठा आदि, जो कुछ महिलाएं अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए या पैसे के बल पर किचेन में घुस कर बना लेती थी। गरीब पुरूष व महिलाएं अक्सर खाली हाथ ही आते। असमानता जेल में भी पीछा नहीं छोड़ती। मेरे दोस्त बन चुके कैदियों के घर से यदि कोई अच्छा खाने का सामान आता तो मेरे ये दोस्त कैदी उसका कुछ हिस्सा ‘भाभी जी’ के लिए ले जाने को कहते। मेरे ना कहने पर वो अक्सर इसरार करते तो मैं रख लेता, नही ंतो हम अक्सर सिर्फ पारले जी लेेकर जाते थे। अब्बू अब तक यहां का रंग ढंग काफी कुछ समझ चुका था। मैं अक्सर मजे में उससे पूछता-‘अब्बू जेल में वो कौन से टू ‘जी’ हैं जिनका बोलबाला है?’ अब्बू को भी इसका जवाब देने में बड़ा मजा आता- ‘मौसा, पारले जी और गांधी जी।’ आसपास के लोग अब्बू को छेड़ने के लिए यह सवाल अक्सर पूछते और अब्बू बड़े मजे से इसका जवाब देता। वह जान चुका था कि यहां कई सुविधाएं सिपाही या नम्बरदार को पैसा देने से मिल जाता है।
जेल में किसी भी तरह के मीठे आइटम पर पाबंदी है। मीठे के नाम पर सिर्फ पारले जी ही मिलता है। इसलिए कभी कभी अब्बू मीठे के लिए मचल जाता। हम दोनो को ही मीठा बहुत पसंद है। ऐसे समय पर अब्बू बोल ही देता कि मौसा सिपाही को पैसे देकर मेरे लिए बाहर से चाकलेट मंगवा दो ना। लेकिन मेरे कुछ बोलने से पहले ही वह अपना कदम वापस ले लेता- नहीं मौसा रहने दो, ये बुरी बात है। मैं पारले जी ही खा लूंगा। इतने छोेटे बच्चे को अपने आप पर नियंत्रण करते देख कर मेरा मन भारी हो जाता। एक बार अब्बू ने पूछ ही लिया कि मौसा यहां मीठा खाने पर मनाही क्यो है? मैं क्या जवाब देता। मैंने वही घिसा पिटा जवाब दोहराया- ‘क्योकि यह जेल है।’ अब्बू संतुष्ठ नहीं हुआ और आगे पूछा- क्या जेलर को मीठा पसन्द नहीं। मैंने कहा, नहीं उसे तो मीठा बहुत पसन्द है, तभी तो वह इतना मोटा हो गया है। अब्बू ने फिर आगे पूछा और मोदी को? मैंने अब गम्भीर होकर कहा- सुन अब्बू! इन सब को मीठा पसन्द है। लेकिन कैदी लोग मीठा खाये, ये इनको पसन्द नहीं। अब्बू ने तुरन्त कहा-क्यों? मैंने कहा-‘क्योकि मीठा खाकर हम खुश हो जायेंगे।’ आगे की बात अब्बू ने ही पूरी कर दी- और हम खुश रहें ये उन लोग को पसन्द नहीं। यह कहकर वह भाग गया और हाते में चारो तरफ दौड़ने लगा।
खैर, हमने अपनी तलाशी दी, अपना सामान चेक करवाया। अब्बू अपनी तलाशी का नम्बर आने से पहले ही अपने जेब के भीतरी अस्तर उलटने लगता। यह देख मुझे हरिश्चंद्र पाण्डेय की एक कविता याद आ जाती थी-‘बच्चे अपनी तलाशी में जेबों के अस्तर तक उलट देते हैं, इसलिए बच्चों के बारे में जब भी सोचो गम्भीरता से सोचो।’ खैर, तलाशियों का दौर खत्म होने के बाद हम एक बड़े हाल की ओर चल दिये, जहां अपनी अपनी महिला सम्बन्धियों से हमारी मुलाकात होनी थी। अब्बू मेरा हाथ पकड़कर मुझे खींचे जा रहा था, तभी पीली वर्दी पहने नम्बरदार ने तेज आवाज में हमें रुकने को कहा। हम जहां थे वहीं ठिठककर खड़े हो गये। उतनी ही तेज आवाज में दूसरा आदेश हुआ कि हम तुरन्त जोड़े में बैठ जाये। थोड़ी अफरातफरी के बाद सब जोड़े में बैठ गये। अब्बू का चेहरा थोड़ा मायूस हो गया कि अब यह कौन सी मुसीबत आ गयी। तभी हमने देखा कि हमारे पीछे से जेल का एक बड़ा अधिकारी अपने लाव लस्कर के साथ अवतरित हो गया। तो हमें रोकने का यह कारण था। उस जेल अधिकारी ने आदेशात्मक स्वर में पूछा-‘इनके सामान की तलाशी ली गयी?’ आदेश देने के साथ ही वह आगे बढ़कर एक कैदी का झोला खुद ही चेक करने लगा। उसके झोले में भेलपूरी थी। उस जेल अधिकारी ने उसे डांटते हुए कहा-‘मुलाकात के लिए जाते हो या पिकनिक मनाने।’ यह कहते हुए वह अपने लाव लश्कर के साथ आगे बढ़ गया। हम सबने चैन की सांस ली। अब्बू थोड़ा खीझ कर बोला-‘यह बिना हम लोगों को डिस्टर्ब किये भी तो जा सकता था।’ यह बात बोल कर वह मुलाकात कक्ष की ओर भाग गया। लेकिन अब्बू की इस बात ने मेरी विचार प्रक्रिया को तेज कर दिया। भारत में ‘पावर’ के प्रति एक अजीब सी सनक है। उस जेल अधिकारी को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि वह बिना कुछ बोले यहां से निकल जाये। उसके पास पावर है तो इसे बिना दिखाये वो कैसे गुजर जाये। दिखावा सिर्फ पैसे का ही नहीं पावर का भी होता है। सड़क पर ड्यूटी करते एक आम सिपाही और किसी भी आफिस के चपरासी तक में आप इस सनक/दिखावे के दर्शन कर सकते हैं। भारत में यह एक विकराल समस्या है। विशाल ‘लोकतान्त्रिक’ छाते के नीचे लगभग सभी संस्थाएं राजशाही युग के पदसोपान क्रम में काम करती हैं। इसी सन्दर्भ में मुझे ‘फूको’ का मशहूर कथन भी याद आया-‘पावर करप्ट्स’। यही सब सोचते हुए मैं हाल के पास पहुंच गया। अब्बू पहले ही भाग कर वहां पहुंच चुका था।
यहां पहुंचकर सबसे पहले अच्छी जगह पर कब्जा करने के लिए होड़ लग जाती। पैसे वालों के लिए सिपाही पहले से ही स्थान बुक किये रखते है। बहरहाल फर्श पर अपना अपना चद्दर या अखबार बिछाकर हम सब बैठ जाते और महिलाओं का इन्तजार करने लगते। अब्बू बेसब्र होकर हाल में घूमने लगा। अब्बू की बेसब्री का कारण महज उसकी मौसी ही नहीं थी, बल्कि वे बच्चें भी थे जो महिलाओं के साथ आते थे। यहां 6 साल तक के बच्चों को मां के साथ रहने का अधिकार है। हर शनिवार की मुलाकात के कारण अब्बू की यहां आने वाले कुछ बच्चों से दोस्ती हो गयी है। आधे घण्टे ये बच्चें आपस में खेलते, और धमाचैकड़ी करते थे। इन बच्चों को देखकर हम कुछ समय के लिए ही सही यह भूल जाते कि हम जेल में हैं। बीच बीच में अब्बू हमारे पास आ जाता और पूछता-मौसी तुम कैसी हो! फिर पूछता, मौसा अभी कितना समय बचा है। जब मैं बोलता कि जा अभी खेल ले। अभी समय है, तो वह खुश हो जाता। लेकिन आधे घण्टे कपूर की तरह उड़ जाते। और सिपाही आकर हमें उठाने लगता। यह देख अब्बू धीमी चाल और दुःखी मन से हमारी तरफ आता। कभी कभी पूछता-‘मौसा तुमने मौसी से सारी बातें कर ली?’ मेरा जवाब सुने बिना कहता- ‘काश मौसी भी हमारे साथ चलती।’ एक दिन उसने गम्भीरता से पूछा- ‘मौसा, हम मौसी के साथ ही क्यो नहीं रह सकते।’ फिर उसने खुद ही जवाब दे दिया, क्योकि इससे हम खुश रहेंगे।
एक शनिवार की मुलाकात में अब्बू को उसका प्यारा दोस्त सूरज नहीं दिखायी दिया। अब्बू और सूरज दोनों लगभग 6 साल के है। इसलिए दोनो में अच्छी दोस्ती हो गयी थी। अब्बू ने तुरन्त मौसी से पूछा- ‘मौसी आज सूरज क्यो नहीं आया।’ मौसी उसके इस सवाल से थोड़ा असहज हो गयी। खुद को संयत करते हुए उसने अब्बू से कहा कि अब्बू उसकी तबियत खराब हो गयी थी, इसलिए उसे घर भेज दिया गया। अब्बू बुझे मन से दूसरे बच्चों के साथ खेलने चला गया। अब्बू के जाने के बाद अमिता ने सूरज के बारे में जो वास्तविक घटना बयां की वह हदयविदारक थी। जेल प्रशासन को जैसे ही पता चला कि सूरज 6 साल का पूरा हो गया है, उसने उसे घर भेजने का आदेश दे दिया। लेकिन झारखण्ड के किसी गांव में रहने वाले इन लोगों के घर में कोई नहीं था जो सूरज की देखभाल कर सके। लिहाजा जबर्दस्ती सूरज को उसकी मां से छीन कर उसे अनाथालय में डाल दिया गया। किस तरह से जेल प्रशासन ने मां से उसके कलेजे के टुकड़े को अलग किया, यह बताते बताते अमिता खुद रोने लगी। यह दारूण दृश्य अमिता की आंख के सामने ही घटित हुआ था। मेरा मन भी भारी हो गया।
मैंने सोचा कि ऐसे ना जाने कितने नियम कानून की गिरफ्त में यहां जिंदगी दम तोड़ रही है। इसी बीच मैंने देखा कि अब्बू व अन्य बच्चे खेलते खेलते हाल के बाहर निकल गये। सिपाही उन्हें रोकने के लिए उनके पीछे दौड़ा। उन्होंने हाल के बाहर ना जाने का नियम जो तोड़ दिया था। मुझे अच्छा लगा कि कहीं तो जिंदगी भी नियमों कानूनों की धज्जियां उड़ा रही है।

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