‘The Many Faces of Kashmiri Nationalism: From the Cold War to the Present Day’

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कश्मीर के वर्तमान हालात में ‘नन्दिता हक्सर’ की पिछले साल आई किताब ‘मेनी फेसेज आॅफ कश्मीरी नेशनलिज्म: फ्राम दि कोल्ड वार टू दि प्रजेन्ट डे’ से गुजरना एक बेचैन कर देना वाला अनुभव रहा। नन्दिता हक्सर ‘उत्तर पूर्व’ और कश्मीर में मानव अधिकार आंदोलन की जमीनी कार्यकर्ता है और वहां के जन-संघर्षो से उनकी पूरी सहानुभूति है। इसके अलावा सत्ता समीकरणों और उनकी खुली व गुप्त रणनीतियों पर भी उनकी पैनी नज़र रहती है। यही कारण है कि उनकी सभी किताबें अकादमिक बुद्धिजीवियों और आम पाठकों दोनों को अपील करती है।
इस किताब में नन्दिता ने ‘सम्पत प्रकाश’ और ‘अफजल गुरु’ के जीवन के वस्तुगत विवरणों के माध्यम से कश्मीर के संघर्षां और उसकी जटिलताओं पर रोशनी डालने का प्रयास किया है। उनकी प्रखर राजनीतिक दृष्टि अन्तराष्ट्रीय समीकरणों के साथ इसके अन्तर-सम्बन्धों को भी लगातार परखती चलती है।
सम्पत प्रकाश वाम विचारधारा वाले एक कश्मीरी पंडित हैं जो लगातार जम्मू-कश्मीर के ट्रेड यूनियन आन्दोलन में सक्रिय रहे हैं और जम्मू कश्मीर की आजादी और उसकी ‘कश्मीरियत’ के पक्के समर्थक हैं। वे उन कुछ गिने चुने कश्मीरी पंडितों में से है जो आज भी घाटी में सक्रिय हैं। और अभी भी ट्रेड यूनियन के मुद्दों के साथ ही कश्मीर की आजादी के मुद्दे को भी उठाते रहते हैं। इसलिए वे अलग अलग कारणों से ‘मुस्लिम साम्प्रदायिकता’ और ‘हिन्दू साम्प्रदायिकता’ दोनो के निशाने पर रहते हैं।
सम्पत प्रकाश जम्मू-कश्मीर की वर्गीय संरचना और उसमें हिन्दू-मुसलमानों की स्थिति को बहुत ही रोचक तरीके से बताते है-‘‘कश्मीरी पंडित यह भूल चुके हैं कि वर्षो से किस तरह अनेकों तरीकों से मुस्लिमों ने उनकी सेवा की है। कश्मीरी मुस्लिमों के बनाये ईटों से ही कश्मीरी पंडितों के घर बने। उनके मंदिरों के लिए उन्होंने पत्थर तोड़े। मुस्लिम कारपेन्टरों ने उनके मंदिरों के लिए बीम और दरवाजे बनाये। मुस्लिम राजगीरों ने ही सीमेन्ट तैयार किया और यहां तक की उनके भगवानों की मूर्तियां भी तैयार की। ‘खीर भवानी’ मंदिर का फर्श मुस्लिमों ने ही तैयार किया था। कश्मीरी पंडितों ने क्या किया? उन्होंने देवताओं की मूर्तियां बिठायी और पवित्र जल व दूध से मंदिर का शुद्धिकरण किया और कश्मीरी मुस्लिमों के मंदिर में प्रवेश करने पर पाबन्दी लगा दी।’’
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सम्पत प्रकाश के बहाने 50-60 और 70 के दशक के उस कश्मीर से परिचय होता है जब कश्मीर में ‘वाम’ का काफी प्रभाव था। शुरु में कम्युनिस्ट पार्टी ‘शेख अब्दुल्ला’ की ‘नेशनल कान्फ्रेन्स’ में ही काम करती थी। इसी दौर में ट्रेड यूनियन आन्दोलन में जबर्दस्त विकास हुआ और ट्रेड यूनियन आन्दोलन ने कई महत्वपूर्ण जीतें दर्ज की। श्रीनगर के मशहूर लाल चौक का नाम इसी दौर में ‘लाल चौक ’ पड़ा जो स्पष्ट रुप से रुस के मशहूर ‘रेड स्क्वायर’ से प्रभावित था।
यह तथ्य भी कम लोगों को ही पता है कि जब 1947 में पाक की तरफ से हमला हुआ था तो यहां के कम्युनिस्टों ने उनसे लड़ने के लिए ‘जन मिलीशिया’ का निर्माण किया था। और हमले को वापस खदेड़ने में इस जन मिलीशिया की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसमें कई कामरेडों की जाने भी गयी थी।
इस दौरान ‘मई दिवस’ की विशाल रैलियां, उनमें मुस्लिमों-हिन्दुओं की समान भागीदारी तथा गूंजते मजदूर नारों का विस्तृत विवरण हमें आश्चर्यचकित करता है कि चंद दशक पहले ही कश्मीर की एक अन्य पहचान भी थी। शेख अब्दुल्ला पर भी इसका काफी असर था। उनका ‘नया कश्मीर का घोषणापत्र’ इसका सबूत है। जिसमें ना सिर्फ बिना क्षतिपूर्ति दिये जमीन्दारों से जमीन जब्त करने का प्रावधान था बल्कि महिलाओं को भी सभी क्षेत्रों में समान अधिकार की बात की गयी थी। शिक्षा पूरी तरह से निशुल्क करने का प्रावधान था। बाद के वर्षो में इनमें से कई चीजें (जैसे शिक्षा और भूमि सुधार आदि) लागू भी हुई।
लेकिन यह ट्रेड यूनियन आन्दोलन शुरु में सीपीआई और 1964 के बाद मुख्यतः सीपीएम से जुड़ा रहा। ये दोनो कम्युनिस्ट पार्टियां शुरु से ही सत्ता के साथ दोस्ताना समीकरणों में रही। कश्मीर पर इनकी नीति कमोवेश दिल्ली सरकार की नीति से ही मेल खाती थी। ये दोनों पार्टियां ‘आत्म निर्णय के अधिकार’ यानी कश्मीर की आजादी की विरोधी थी। 1967 में नक्सलबाड़ी का आन्दोलन शुरु होने पर कश्मीर के कम्युनिस्टों का एक धड़ा भी इसके प्रभाव में आया। सम्पत प्रकाश भी उनमें से एक थे। इसी समय उनकी मुलाकात भी ‘चारु मजुमदार’ से हुई। वे चारु से काफी प्रभावित हुए क्योकि चारु मजुमदार ने स्पष्ट रुप से जम्मू कश्मीर के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया। नक्सलबाड़ी आन्दोलन के कुचले जाने और इसके अन्दर पैदा हुई टूटन के बाद सम्पत प्रकाश ने ‘जार्ज फर्नान्डिस’ की ‘हिन्द मजदूर किसान युनियन’ से अपने आप को जोड़ लिया। हिन्द मजदूर किसान यूनियन भी कश्मीर की आजादी का समर्शन नहीं करती थी।
बाद के वर्षो में ट्रेड यूनियन के बहुत से हिस्से (विशेषकर घाटी के) ‘हुर्रियत कान्फ्रेन्स’ या ‘जेकेएलएफ’ से जुड़ गये। दूसरी ओर जम्मू लगातार हिन्दू साम्प्रदायिक तत्वों विशेषकर ‘आरएसएस’ का गढ़ बनता जा रहा था। इसके प्रभाव में जम्मू की ट्रेड यूनियन पर आरएसएस का प्रभाव (जाहिर है उसके हिन्दू सदस्यों पर) बढ़ने लगा।
हुर्रियत कान्फ्रेस और जेकेएलएफ दोनों के पास अपना कोई ट्रेड यूनियन एजेण्डा नही था। और दोनो का ही वाम विचारधारा से कोई लेना देना नहीं था। फलतः राज्य में ट्रेड यूनियन आन्दोलन महज अनुष्ठान बनकर रह गया। दूसरी ओर कश्मीर में बहुत से कश्मीरी पंडित जो वाम आन्दोलन से जुड़े हुए थे उन्हें कश्मीर घाटी से पलायन करना पड़ा। वहीं बदली परिस्थिति में वाम विचारधारा रखने वाले मुस्लिमों के लिए घाटी में अपनी गतिविधियों को अंजाम देना ज्यादा से ज्यादा खतरनाक होने लगा। उनमें से कइयों को तो अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। और इस तरह जम्मू कश्मीर में ‘वाम आन्दोलन’ लगभग खत्म हो गया।
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यहां गौरतलब है कि नक्सलबाड़ी के छोटे से दौर को छोड़ दे तो जम्मू कश्मीर के कम्युनिस्टों ने कभी भी जम्मू कश्मीर के आत्मनिर्णय यानी आजादी के अधिकार का समर्थन नहीं किया। शीत युद्ध के समीकरणों के कारण और विशेषकर अपनी संशोधनवादी अवस्थिति के कारण तत्कालिन ‘सोवियत रुस’ जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानता था। चूंकि यहां की कम्युनिस्ट पार्टी रुस की कम्युनिस्ट पार्टी के चरण कदमों पर चल रही थी और खुद भी संशोधनवाद की गिरफ्त में थी, इसलिए इसकी पोजीशन भी यही थी। यहां तक की कश्मीर की आजादी की मांग करने वालों को यह शक की नज़र से देखती थी और उसे अमरीका का एजेन्ट समझती थी।
कल्पना कीजिए कि यदि ‘सीपीआई’ और ‘सीपीएम’ कश्मीर के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन कर रहे होते और इसे अपने संघर्ष के एजेण्डे में शामिल करते तो शायद कश्मीर की आजादी का संघर्ष मुस्लिम साम्प्रदायिक तत्वों के हाथ में नही जाता और जम्मू कश्मीर का इतिहास और प्रकारान्तर से भारत का इतिहास अलग होता।
हालांकि नन्दिता हक्सर और सम्पत प्रकाश दोनो ही सीपीआई और सीपीएम की इस गलत नीति के प्रति ज्यादा आलोचनात्मक नहीं दिखते और रोजमर्रा की ट्रेड यूनियन गतिविधियों के विवरण को ही गौरवान्वित करते रहते हैं।
इसी तरह का एक तरह से ‘राजनीतिक सुसाइड’ अरब देशों में काम कर रही वहां की तत्कालीन कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी किया था। 1948 के पहले अरब के कई देशों में कम्युनिस्ट पार्टियां बेहद ताकतवर थी। 1948 में अरब भूमि पर इजरायल के अस्तित्व में आते ही रुस ने उसे मान्यता दे दी। रुस के कदमों पर चलते हुए अरब देशों की सभी कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी उसे मान्यता दे दी। परिणामस्वरुप तत्काल ही इन कम्युनिस्ट पार्टियों की साख वहां की जनता की नज़र में तेजी से गिर गयी। अब इनका स्थान ‘राजनीतिक इस्लाम’ ने लेना शुरु कर दिया। नतीजा आज सबके सामने है। इस बारे में ‘तारिक अली’ ने अपनी किताब ‘बुश इन बेबीलोन’ में विस्तार से बताया है।
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दूसरी कहानी यानी अफजल गुरु की कहानी और उसके बहाने कश्मीर के बगावत की कहानी अपेक्षाकृत ज्यादा जानी पहचानी है। इसे बहुत ही रोचक और भावपूर्ण तरीके से लिखा गया है। इसके साथ ही जेकेएलएफ के संस्थापक ‘मकबूल भट्ट’ की भी रोचक कहानी इस किताब में है। इण्टरोगेशन सेन्टर में मकबूल भट्ट से सम्पत प्रकाश का परिचय और दोनों के बीच बातचीत का ब्योरा बहुत ही दिलचस्प और मूविंग है। मकबूल भट्ट के ‘मकबूल भट्ट’ बनने की कहानी भी यहां पता चलती है। मकबूल भट्ट का बचपन निरंकुश ‘डोगरा राज’ में बीता था। मकबूल भट्ट के हवाले से नन्दिता मकबूल भट्ट के बचपन की एक घटना को यो बयां करती है, जिसका मकबूल भट्ट के भावी राजनीतिक जीवन पर निर्णायक प्रभाव पड़ा- ‘‘जब जागीरदार कार से जाने लगा तो हमारे बड़ों ने गांव के सभी बच्चों को कार के सामने लेट जाने को कहा। गांव के सैकड़ों बच्चें कार के सामने लेट गये और जागीरदार से याचना करने लगे कि उन पर लगा अतिरिक्त कर माफ कर दिया जाय। मैं भी उनमें से एक था और मुझे आज भी वह डर और बेचैनी याद है जो उस वक्त हम पर हावी थी। सभी बच्चों और बूढ़ों की आंखों में आँशु थे। वे जानते थे कि यदि जागीरदार कर में छूट दिये बिना लौट गया तो उनकी जिन्दगी नरक हो जायेगी। अंततः जागीरदार अपने अन्तिम फैसले में कुछ संशोधन करने पर सहमत हो गया।’’
मकबूल भट्ट को पाकिस्तान और हिन्दोस्तान दोनो जगहों पर अलग अलग समयों पर गिरफ्तार किया गया। दोनों जगह आरोप समान थे- भारत में ‘पाक जासूस’ होने का आरोप और पाक में ‘भारत का जासूस’ होने का आरोप। भारत और पाक दोनो से अलग होने की मांग करने वाले मकबूल भट्ट और उनके द्वारा स्थापित ‘जेकेएलएफ’ की यही नियति थी। वे किसी के हाथ की कठपुतली बनने को तैयार नही थे। फलतः भारत और पाकिस्तान दोनों ही उसे खत्म कर देने पर आमादा थे। इसके अलावा दोनों ही देशों को इसके सेकुलर चरित्र से एलर्जी थी। क्योकि इससे जेकेएलएफ को हिन्दू-मुस्लिम खाने में फिट नहीं किया जा सकता था, जो दोनों ही देशों का एजेण्डा था। नन्दिता हक्सर ने साफ साफ लिखा है कि कश्मीर का पाकिस्तान में विलय चाहने वाले ‘हिजबुल मुजाहिदीन’ ने भारतीय सुरक्षा एंजेसियों को जेकेएलएफ के लड़ाकों के बारे में जानकारियां उपलब्ध करवायी। इस जानकारी के कारण ही इनसर्जेन्सी के दौरान करीब 500 जेकेएलएफ के लड़ाकों को भारतीय सुरक्षा एंजेन्सियों ने मार दिया। जेकेएलएफ का कमजोर होना दोनों ही देशों के हित में था।
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अफजल गुरु 89-90 के इसी उथलपुथल भरे दौर में ‘एमबीबीएस’ की पढ़ाई कर रहा था। और घट रही घटनाओं को ध्यान से देख रहा था। इसी समय कश्मीर के नौजवानों में फिल्म ‘उमर मुख्तार’ बेहद लोकप्रिय थी। अफजल ने भी यह फिल्म दर्जनों बार देखी। बाद में कश्मीर में इस फिल्म को बैन कर दिया गया। अफगानिस्तान में रुस की फौजों को हराया जा चुका था। और अफजल की पीढ़ी को यह मानने में कोई दिक्कत नहीं थी कि उसी तरह भारत को भी हराया जा सकता है। यहां नन्दिता ने इस पहलू पर भी पर्याप्त ध्यान दिया है कि कैसे रुस के खिलाफ इस लड़ाई में अमरीका ने हस्तक्षेप किया और हथियारों से ‘तालीबान लड़ाकों’ की मदद की और एक तरह से ‘राजनीतिक कट्टर इस्लाम’ को बढ़ावा दिया। बहरहाल अफजल गुरु अपनी पढ़ाई छोड़ कर ‘लाइन उस पार’ हथियारों की ट्रेनिंग के लिए गया जहां खाली समय में वह ‘इस्मत चुगताई’ की रचनाएं पढ़ता था। वहां उसने देखा कि पाकिस्तान उनकी आजादी की लड़ाई को अपने हित में इस्तेमाल कर रहा है। इसके अलावा भारत वापस लौटने पर उसने यह भी देखा कि कश्मीर के लिए लड़ने वाले लोग ही आपस में कितने मुद्दों पर बंटे हुए हैं। इस्लाम में पूरा विश्वास होने के बावजूद आजादी की लड़ाई को निरन्तर इस्लामी रंग दिये जाने से वह असहमत था। फलतः जल्दी ही उसका मोहभंग हो गया। लेकिन एक लड़ाके का सामान्य जिन्दगी में वापस लौटना इतना आसान न था। इसके लिए सेना के सामने समर्पण करना और उनसे इस सम्बन्ध में एक सर्टीफिकेट प्राप्त करना बेहद जरुरी था। और उसके बाद समय समय पर थाने में या सेना हेडक्वार्टर में हाजिरी लगाना था। खैर इन सबकी त्रासद कहानी इस किताब में दर्ज है। ‘पार्लियामेन्ट अटैक’ केस में अफजल को फंसाये जाने का बहुत विश्वसनीय विवरण यहां मौजूद है। और इसी के साथ दर्ज है अफजल की पत्नी ‘तबस्सुम’ का दर्द और उसका अन्तहीन संघर्ष।
‘हब्बा खातून’ से ‘तबस्सुम’ तक की यह त्रासद-दुखद यात्रा मानों खुद कश्मीर की ही यात्रा है।
किताब के नाम के अनुरुप ही नन्दिता हक्सर ने दमन और प्रतिरोध की इस अन्तहीन गाथा के सभी पहलुओं को समेटने की कोशिश की है। लेकिन जम्मू-कश्मीर इतिहास की एक बेहद महत्वपूर्ण घटना के बारे में किताब में कुछ भी नही है। 1947-48 में विभाजन के समय जम्मू प्रान्त में हजारों की संख्या में मुस्लिमों का कत्लेआम हुआ और उन्हें जबर्दस्ती पाकिस्तान भेजा गया। यह कत्लेआम राज्य मशीनरी और आरएसएस के सहयोग से घटित हुआ। इस कत्लेआम से पहले जम्मू में भी मुस्लिम बहुसंख्यक थे। लेकिन इसके बाद ही यहां मुस्लिम अल्पसंख्यक हो गये। अभी पिछले माह प्रकाशित हुई ‘सईद नकवी’ की किताब ‘बीइंग अदर्स’ में इस घटना का जिक्र किया गया है। इसके अलावा जम्मू के प्रसिद्ध पत्रकार ‘वेद भसीन’ ने इस पर काफी काम किया है। उनकी माने तो यह कत्लेआम दिल्ली की सहमति से हुआ और इसके पीछे एक बेहद सुनियोजित रणनीति काम कर रही थी। वह यह कि यदि भविष्य में कश्मीर की आजादी का आन्दोलन उठ खड़ा होता है तो जम्मू को इस आजादी के खिलाफ खड़ा किया जा सके और प्रकारान्तर से ‘जम्मू बनाम कश्मीर’ को ‘हिन्दू बनाम मुस्लिम’ में परिवर्तित किया जा सके। बाद में कश्मीर घाटी से पंडितोें का पलायन भी सरकार की उसी रणनीति का हिस्सा था। नन्दिता ने भी अपनी किताब में इसका जिक्र किया है कि कैसे तत्कालिन गवर्नर ‘जगमोहन’ अपने रेडियों प्रसारण के जरिये पंडितों से घाटी छोड़ने की अपील कर रहे थे और उन्हे डरा रहे थे कि यहां उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।
सच तो यह है कि जम्मू का यह कत्लेआम और इसी दौरान हैदराबाद में 40 हजार मुस्लिमों का कत्लेआम वह घटना है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते है और इसका विवरण अभी भी सात तालों के अन्दर कैद है। हैदराबाद कत्लेआम पर ‘ए जी नूरानी’ ने काफी विस्तार से लिखा है।
जम्मू के उस कत्लेआम का जम्मू-कश्मीर की भावी राजनीति विशेषकर उसकी आजादी की लड़ाई पर निर्णायक प्रभाव पड़ा। इसलिए इस बारे में सम्पत प्रकाश की चुप्पी और नन्दिता हक्सर की अनभिज्ञता बेचैनी पैदा करती है।
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इसके अलावा किताब का सबसे कमजोर पहलू वह है जहां ‘अफजल के लिए बनी कमेटी’ द्वारा लिये गये अभियान के दौरान ‘नन्दिता’ और ‘जीलानी’ के बीच अन्तरविरोधों का विवरण है या इसी दौरान अफजल के परिवार विशेषकर अफजल के बड़े भाई केे साथ तबस्सुम या खुद नन्दिता हक्सर के अन्तरविरोधों का जिक्र है। नन्दिता ने यहां विस्तार से अपना पक्ष रखा है।
वास्तव में इस तरह के ब्योरों की इस तरह की किताब में कोई जरुरत नही थी। कश्मीर जैसे किसी भी बड़े आन्दोलनों में इस तरह के अन्तरविरोध आम बात है। और दूसरी बात की किताब के विषय से इसका कोई सीधा वास्ता नहीं है। मेरे हिसाब से इस तरह के विवरण विषय को समझने में कतई मदद नहीं करते वरन् उसे डायलूट ही करते हैं।
‘कश्मीरी राष्ट्रवाद’ और उसके प्रतिरोध की कहानी यहां के साहित्य में विशेषकर ‘कविता’ और ‘पेन्टिग’ में काफी मुखर है। लेकिन पूरी किताब में इस पहलू का कोई जिक्र नही है जो एक अधूरेपन का अहसास पैदा करता है। इस पोस्ट में प्रस्तुत कुछ पेंटिंग्स से आपको इस कला की एक बानगी मिल सकती है.
इसके बावजूद यह एक बेहद महत्वपूर्ण किताब है। जो भी जम्मू-कश्मीर में या नन्दिता हक्सर के शब्दों में कहें तो ‘भारतीय लोकतंत्र’ में रुचि रखते हैं उन्हें यह किताब जरुर पढ़नी चाहिए।

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‘बिकनी’ और ‘बिकनी एटोल’ के 70 साल….

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ब्रिटेन की लोकप्रिय पत्रिका ‘मिरर’ में 4 जुलाई 2016 को फैशन परिधान ‘बिकनी’ के 70 साल पूरे होने पर एक लम्बा लेख छपा। इसमें यह जानकारी भी दी गयी थी कि बिकनी का नाम ‘बिकनी’ क्यो पड़ा। पता चला कि बिकनी के ‘आविष्कारक’ फ्रान्स के मशहूर फैशन डिजायनर ‘लुइस रीयर्ड’ [Louis Reard] ने इसका नाम प्रशान्त महासागर में स्थित एक द्वीप ‘बिकनी एटोल’[Bikini Atoll] के नाम पर रखा। जब मैंने सर्च इंजन में ‘बिकनी एटोल’ डाला तो मुझे इसके बारे में भयावह जानकारियां मिली। आज से ठीक 70 साल पहले 1 जुलाई 1946 को अमरीका ने इस द्वीप पर ‘हिरोशिमा-नागासाकी’ पर गिराये गये [6 august और 9 august 1945] परमाणु बम से भी कई गुना शक्तिशाली परमाणु बम का परीक्षण शुरु किया था। 1946 से 1958 तक इस द्वीप पर और आसपास कुल 67 परमाणु बम का परीक्षण किया गया। इसमें से कई की ताकत हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराये गये बम से 1000 गुना ज्यादा थी। 1954 में इसी द्वीप पर पहली बार हाईड्रोजन बम का भी ‘सफल’ परीक्षण किया गया।
बिकनी एटोल पर एक पूरी सभ्यता निवास करती थी। 17वीं शताब्दी में स्पेन की इस पर नज़र पड़ी और उसने इस पर कब्जा जमा लिया। उसके बाद जर्मनी से होते हुए द्वितीय विश्व युद्ध में यह जापान के कब्जे में रहा। द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के हार जाने के बाद यह अमरीका के कब्जे में आ गया।
परीक्षण शुरु करने से पहले अमरीका ने यहां के आदिवासी समाज के मुखियाओं की एक बैठक बुलाई। उनसे कहा गया कि उन्हे यह द्वीप खाली करना पड़ेगा। यहां ‘मानवता की बेहतरी’ के लिए कुछ परीक्षण किये जायेगे। इसके बाद उन्हे जबर्दस्ती जहाजों पर लाद कर यहां से 200 किलोमीटर की दूरी पर एक दूसरे निर्जन द्वीप ‘रोन्गेरिक एटोल’ पर भेज दिया गया। उन्हें महज कुछ सप्ताह का राशन मुहैया कराया गया। यह द्वीप रहने लायक नहीं था। इसलिए राशन खत्म होने के बाद वे भूखमरी के शिकार होने लगे। विश्व मीडिया में अमरीका की आलोचना होने के बाद उन्हें पुनः कुछ हफ्तों के राशन के साथ पास के दूसरे निर्जन द्वीप पर भेजा गया। तब से लेकर आज तक वे आसपास के द्वीपों पर भटक रहे है। उनमें से अधिकांश परमाणु विकिरण के घातक असर से भी जूझ रहे है। उनका अपना देश ‘बिकनी एटोल’ पूरी तरह तबाह हो गया। यहां विकिरण स्तर समान्य से कई गुना ज्यादा है।
‘बिकनीएटोलडाटकाम’[www.bikiniatoll.com] ने परमाणु परीक्षण वाले दिन और उसके तुरन्त बाद की स्थितियों को इन शब्दों में कैद किया है-‘‘रोन्गेरिक एटोल पर विस्थापित लोगों को नही पता था कि वहां क्या हो रहा है। उन्होंने उस दिन आसमान में दो सूरज देखे। उन्होंने आश्चर्य से देखा की उनके द्वीप के ऊपर दो इंच मोटा रेडियोएक्टिव धूल के बादल छा गये। उनका पीने का पानी खारा हो गया और उसका रंग बदलकर पीला पड़ गया। बच्चे रेडियोऐक्टिव राख के बीच खेल रहे थे, मांए भय से यह सब देख रही थी। रात होते होते उनके शरीर पर इसका असर साफ दिखने लगा। लोगों को उल्टियां और दस्त पड़ने लगे, बाल झड़ने लगे। पूरे द्वीप पर आतंक की लहर दौड़ पड़ी। इन लोगों को कुछ नही बताया गया था और ना ही अमरीका द्वारा किसी तरह की चेतावनी ही जारी की गयी थी। परीक्षण के दो दिन बाद उन्हे ‘इलाज’ के लिए पास के ‘क्वाजालेन द्वीप’ पर ले जाया गया।’’
बिकनी एटोल पर इस परीक्षण के लिए आसपास कुल 42 हजार अमरीकी सैनिक तैनात थे। इसके अलावा परीक्षण का असर जानने के लिए 5400 चूहे, बकरी और सूअरों को भी इस द्वीप पर लाया गया।

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1980 के आसपास ‘सीआइए’ की एक स्रीक्रेट रिपोर्ट ‘डिक्लासीफाइड’ हुई। बिकनी एटोल के निवासी और बिकनी एटोल की घटना पर नज़र रखने वाले लोग इस रिपोर्ट से बुरी तरह सकते में आ गये। इसमें साफ साफ बताया गया था कि चूहों, बकरियों और सूअरों के साथ ही बिकनी एटोल के निवासी भी परमाणु परीक्षण के औजार थे। इसलिए उन्हें जानबूझकर बिकनी एटोल से इतनी दूरी पर विस्थापित किया गया था कि वे परमाणु विस्फोट से मरे भी ना और पूरी तरह से परमाणु विकिरण की जद में रहें ताकि उन पर इसके प्रभावो का अध्ययन किया जा सके। इस रिपोर्ट के बाद ही बिकनी एटोल के लोगो और इस पर नज़र रखने वाले लोगों को यह समझ में आया कि क्यों अमरीका के डाक्टर नियमित अन्तराल पर उनके बीच आते थे और उनका ‘मुफ्त’ ‘इलाज’ करते थे। यही नही उन 42000 अमरीकी सैनिकों में से भी कई इस विकिरण की जद में आ गये। और उनमें कई कैन्सर जैसी घातक बीमारियों के शिकार हो गये। इस विकिरण से प्रभावित सैनिकों ने बाद में अपना संगठन बना कर अमरीकी सरकार पर केस भी दायर किया है। हालांकि यह पता नहीं चल सका है कि क्या ये सैनिक भी इस प्रोजेक्ट में ‘गिनी पिग’ की तरह इस्तेमाल किये गये या यह अमरीकी साम्राज्यवाद का ‘कोलैटरल डैमेज’ था। इसी से जुड़ा यह तथ्य कम लोगों को ही पता होगा कि ‘हिरोशिमा-नागासाकी’ पर गिराये गये बम में लाखों जापानियों के साथ ही वहां की जेलों में बन्द 100 के करीब अमरीकी युद्ध बन्दी भी मारे गये थे। और अमरीका को यह तथ्य अच्छी तरह पता था कि वहां की जेलों में अमरीकी भी कैद हैं।

इस विवरण को पढ़कर मुझे घोर आश्चर्य हुआ कि कैसे इस त्रासद कहानी से ‘टू पीस बिकनी’ को जोड़ा गया। बाद में मुझे पता चला कि ‘सेक्स बम’ जैसे शब्द भी हमारे शब्दकोश में इस समय जुड़े।
बिकनी एटोल के निवासियों के साथ हुई इस त्रासद अमानवीय घटना के रुपक को यदि फैशन पर लागू करे तो हम देखेंगे कि इसी समय से विशेषकर अमेरिका और यूरोप में महिलाओं पर फैशन का ‘आक्रमण’ होना शुरु हुआ। प्रयास किया जाने लगा कि उनकी मानवीय रुह को विस्थापित करके उन्हे महज ’फैशन डाॅल’ में बदल दिया जाय। सोवियत संघ और चीन में समाजवाद और तीसरी दुनिया में राष्ट्रीय मुक्ति युद्धों के कारण जो चेतना पैदा हो रही थी, उसका मुकाबला करने के लिए उनके लिए यह जरुरी था कि सामूहिकता के बरक्स व्यक्ति को स्थापित किया जाय। यानी व्यक्तिवाद को बढ़ाया दिया जाय। इस सन्दर्भ में फैशन उस परमाणु बम की तरह था जिससे महिलाओं में आ रही ‘मुक्ति की चेतना’ को तबाह किया जा सकता था और उन्हें सामूहिकता के द्वीप से विस्थापित करके अलग अलग निर्जन द्वीपों पर विस्थापित किया जा सकता था। 2005 में आयी ‘एडम कुरटिस’ की मशहूर डाक्यूमेन्ट्री ‘सेन्चुरी आॅफ दि सेल्फ’ में इस परिघटना को बेहद बारीकी से दिखाया गया है।
अमरीकन और यूरोपियन फैशन के इसी विध्वंसक और अमानवीय स्वरुप के कारण ‘टू पीस परिधान’ का नाम बिकनी पड़ा। इसमें कोई शक नही।
साम्राज्यवाद-पूंजीवाद में हर चमकती जगमगाती आकर्षक चीज के पीछे त्रासदी, दुःख और खून पसीना होता है। जब भी आप फैशन का कोई आकर्षक परिधान देंखे तो बांग्लादेश का ‘रानाप्लाजा’ जरुर याद कर लें। और जब भी आप कोई आकर्षक इलेक्ट्रानिक सामान देंखे तो कांगो के उन बच्चों को याद कर लीजिए जो इन इलेक्ट्रानिक सामानों में प्रयुक्त होने वाले धातुओं को निकालने के लिए लंबी अंधेरी सुरंग नुमा खानों में प्रवेश करते हैं और कई तो वही दम तोड़ देते हैं।
‘कार्ल मार्क्स’ ने इन सब का निचोड़ पेश करते हुए लिखा है- ‘पूँजी सर से पांव तक खून और गंदगी में सनी हुई है।’
हमसे से कितने लोग इसे देख पाते हैं।
बहरहाल बिकनी एटोल की इस त्रासदी पर एक डाक्यूमेन्ट्री ‘रेडियो बिकनी’ आप यहां देख सकते हैं।

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‘Cultural Revolution’: Revolution within Revolution

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16 मई 1966 को शुरु हुई चीन की ‘महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति’ को 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं। लेकिन अभी भी इतिहास के पन्नों में इसे वह जगह हासिल नही है जिसकी यह हकदार है। सच तो यह है कि संभवतः इतिहास की यह अकेली ऐसी घटना है जिस पर दुनिया के इतिहासकार आज भी बुरी तरह बंटे हुए है। कुछ के अनुसार यह माओ का पागलपन भर था। और कुछ के अनुसार चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर का सत्ता संघर्ष। फिर सच क्या है? कहावत है कि सच हमेशा क्रान्तिकारी होता है। लेकिन यह भी सच है कि क्रान्तिकारी सच को पकड़ने के लिए क्रान्तिकारी अवस्थिति जरुरी होती है।
जनता सच के इर्द गिर्द अपने मिथक गढ़ती है जबकि शासक वर्ग झूठ के इर्द गिर्द अपने मिथक गढ़ता है। सच्चे इतिहासकार को दोनो मिथकों मेें फर्क करना पड़ता है और दोनों को क्रमशः सच और झूठ में ‘रिड्यूस’ करना होता है।
मशहूर अमरीकी लेखक ‘विलियम हिन्टन’ ने सांस्कृतिक क्रान्ति पर लिखी अपनी बहुचर्चित किताब ‘इतिहास ने जब करवट बदली’ [Turning Point in China] में इस क्रान्ति को 1917 की रुसी क्रान्ति के बाद सदी (20वीं सदी) की दूसरी महत्वपूर्ण क्रान्ति करार दिया। उनके अनुसार 1949 की क्रान्ति एक तरह से 1917 की क्रान्ति की ही निरन्तरता थी। लेकिन 1966 की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति गुणात्मक रुप से भिन्न क्रान्ति थी क्योकि यह ‘क्रान्ति के भीतर क्रान्ति’ थी।
दरअसल 1917 की क्रान्ति और 1949 की क्रान्ति ने तत्कालीन शासक वर्ग से सत्ता तो छीन ली थी लेकिन उसके बाद जो सत्ता बनी उसमें मजदूरों-किसानों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी व उसके नेता आ गये। सर्वहारा क्रान्ति से पहले चीन में और 1956 तक रुस में जो दो लाइनों के संघर्ष चले उसके मूल में यही था कि कौन मजदूरों-किसानों का सच्चा प्रतिनिधित्व कर रहा है और कौन मजदूरों-किसानों के नाम पर बुर्जुआ वर्ग हितों को बढ़ावा दे रहा है। यानी कौन सी नीति सर्वहारा वर्ग के पक्ष में है और कौन सी नीति उसके हितों के विरुद्ध है।
यह संघर्ष अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण था। लेकिन असल सवाल तो यह था कि राज्य और समाज को चलाने में और उस पर निगरानी रखने में ‘प्रतिनिधियों’ की बजाय वास्तविक मजदूरों-किसानों की प्रत्यक्ष भागीदारी कैसे हो। यह सवाल इससे भी जुड़ा था कि पार्टी के अन्दर चलने वाले दो लाइनों के संघर्ष में जनता की यानी मजदूरों किसानों की प्रत्यक्ष भागीदारी कैसे हो। यानी समाज में यह संघर्ष कैसे चलाया जाय। राज्य के ‘विलोपीकरण’ की प्रक्रिया इसके बिना असम्भव थी जो किसी भी कम्युनिस्ट क्रान्ति का दूरगामी लक्ष्य होता है। यह सही है कि रुसी क्रान्ति और 1949 की चीनी क्रान्ति ने उत्पादन के साधनों पर कब्जा करके समाज के आर्थिक आधार (मूलाधार) को बदल दिया था। लेकिन अधिरचना (शिक्षा, कला, साहित्य, धर्म आदि) का क्रान्तिकारी रुपान्तरण अभी बाकी था जहां पूंजीवादी-सामन्ती मूल्यों, विचारधाराओं व उनके पैरोकारों का अभी भी नियन्त्रण था। फलतः जनता अभी भी मुख्यतः पुराने विचारों और मूल्यों से चिपकी हुई थी। मार्क्सवादी शब्दावली में कहें तो 1917 और 1949 की क्रान्तियां मूलतः मूलाधार में क्रान्ति थी। इस क्रान्तिकारी मूलाधार के अनुसार क्रान्तिकारी अधिरचना का काम अभी बाकी था। इसके अलावा मूलाधार में क्रान्ति भी कोई स्थिर चीज नही है यह भी लगातार विकासमान है। जैसे खेती में जमीन्दारों से जमीन छीनने के बाद- ‘आपसी सहायता ग्रुप’, ‘कोआपरेटिव’, ‘कम्यून’……………।
इस समस्या के सूत्र ‘कम्युनिस्ट मैनीफेस्टो’ में भी मिलेंगे- ‘‘कम्युनिस्ट क्रान्ति परम्परागत सम्पत्ति सम्बन्धों से क्रान्तिकारी विच्छेद है और यह आश्चर्य की बात नही कि यह अपने विकास के दौरान परम्परागत विचारों से भी क्रान्तिकारी विच्छेद करती है।’’
क्रान्ति की इस समस्या या सच कहें तो क्रान्ति की निरन्तरता की इस समस्या की जड़ मार्क्सवादी दर्शन में थी। दरअसल प्राकृतिक विज्ञानों की तरह ही सामाजिक विज्ञान भी वस्तुगत नियम के अनुसार चलता है और ये नियम सतत विकासमान होते हैं। मार्क्सवादी दर्शन में अन्तरविरोध के नियम के अनुसार सभी चीजों में अन्तरविरोध है। यानी एक दो में विभाजित है। इसके अनुसार समाजवादी समाज भी दो में विभाजित है। लेकिन इस तरफ किसी का ध्यान नही गया था कि अन्तरविरोध के नियम के अनुसार ही समाजवादी समाज के अन्तरविरोध भी इतने तीखे हो सकते हैं कि वे दुश्मनाना अन्तरविरोध का रुप ले लें और उनके पहलू आपस में बदल जायें। यानी सर्वहारा की जगह पूंजीवादी ताकतें हावी हो जायें और राज्य का चरित्र समाजवादी से पूंजीवादी हो जाय। जैसा कि रुस में 1956 में हो गया था। दर्शन की इस गहराई पर पकड़ ना होने के कारण ही ‘स्टालिन’ ने 1936 में जारी रुस के संविधान में यह ऐलान कर दिया था कि रुस में अब दुश्मनाना वर्ग (शोषक वर्ग) खत्म हो चुके है यानी वर्ग संघर्ष खत्म हो चुका है और रुस अब साम्यवाद की अन्तिम मंजिल में प्रवेश करने जा रहा है। मजेदार बात यह है कि अगले साल ही पार्टी के दो बड़े नेताओं ’कामनेव’ व ‘जिनोवियेव’ को देश से गद्दारी के आरोप मेें फांसी दे दी गयी। और इनके सैकड़ों समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया गया, कुछ को साइबेरिया निर्वासित कर दिया गया। यानी वर्ग संघर्ष खत्म नही हुआ था बल्कि और तीखा हो गया था।
माओ ने पहली बार इस सवाल को दर्शन के स्तर पर हल किया और बताया कि समाजवाद एक लंबा संक्रमण काल है जिसमें अनेको सांस्कृतिक क्रान्ति के बाद ही सर्वहारा की जीत सुनिश्चित हो सकती है। इस पूरे संक्रमण काल के दौरान वर्ग संघर्ष जारी रहेगा और अन्तरविरोध के नियम के अनुसार ही कुछ कुछ समय पर तीखा भी होता रहेगा और यदि क्रान्तिकारी ताकतें कमजोर पड़ी तो प्रधान पहलू के गौण पहलू में बदलने की यानी पूंजीवादी पुर्नस्थापना की संभावना हमेशा बनी रहेगी। अधिरचना में यदि लगातार क्रान्ति नही चलाई गयी तो यह पलट कर आधार को प्रभावित करेगी और इसे अपने अनुरुप बदल देगी। इसके अलावा उन्होने यह भी बताया कि पुराने शोषक वर्ग के साथ ही एक नया शोषक वर्ग भी पैदा हो चुका है जो कम्युनिस्ट पार्टी के अन्दर ही है। जिसे ‘पूंजीवादी पथगामी’ कहा गया।
‘महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति’ दर्शन में आये इस महत्वपूर्ण छलांग का मूर्त रुप था जिसने क्रान्ति के विज्ञान को और समृद्ध बनाया। यानी सांस्कृतिक क्रान्ति से पहले क्रान्ति करने का विज्ञान था, लेकिन क्रान्ति को टिकाये रखने और निरन्तर उसे साम्यवाद तक ले जाने का विज्ञान इसी सर्वहारा क्रान्ति के दौरान ही अस्तित्व में आया।
1966 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी स्पष्ट रुप से ‘दो’ में विभाजित हो चुकी थी। माओ की भाषा में एक ‘पूंजीवादी पथगामी’ थे तो दूसरे ‘सर्वहारा पथगामी’। जमीन पर जनता और कम्युनिस्ट पार्टी के बीच फासला बढ़ता जा रहा था। ज्यादातर कम्युनिस्ट पार्टी के पदाधिकारी सत्ता का सुख भोगते हुए एक नये शोषक वर्ग में तब्दील होने लगे थे। जनता से उनका रिश्ता और इसी कारण उत्पादन से उनका रिश्ता टूट चुका था।
पुरानी दुनिया के सभी बंटवारे जस के तस बने हुए थे। मसलन गांव व शहर का बंटवारा, मानसिक श्रम व शारीरिक श्रम का बंटवारा, औरत व मर्द के बीच का बंटवारा आदि। शिक्षा अभी भी सीमित थी और श्रम व उत्पादन से कटी हुई थी। परीक्षा प्रणाली के कारण बहुमत छात्र छांट दिये जाते थे,जो प्रायः मजदूर किसान घरों से ही आते थे। यहां तक कि प्राथमिक शिक्षा भी सभी बच्चों को उपलब्ध नहीं थी। राज्य प्रशासन में जनता की भागीदारी ना के बराबर थी।
एक तरह से कहा जाय तो चीन 1966 में पूंजीवाद के मुहाने पर खड़ा था।
लेकिन 1966-76 के बीच चली इस सांस्कृतिक क्रान्ति ने इस पूरी तस्वीर को बदल दिया। छात्रों-नौजवानों की लाखों लाख की रैली ने और इस दौरान बनी ‘रेड गार्डस’ की टोलियों ने ‘शंघाई’ और ‘बीजिंग’ जैसे बड़े शहरों के प्रशासन को पूरी तरह से बदल दिया। देश की लगभग तीन चौथाई पार्टी कमेटियां बदल दी गयी। आलोचना-आत्मालोचना ने एक व्यापक अभियान की शक्ल ले ली। पार्टी के वरिष्ठ से वरिष्ठ पदाधिकारियों, नेताओं को भी हजारों और कभी कभी लाखों की संख्या के बीच आकर आत्मालोचना करने पर मजबूर किया गया। जिन्होंने आनाकानी की उनके साथ जबर्दस्ती भी की गयी।
मजदूरों ने फैक्टरी संचालन को अपने हाथ में ले लिया जो पहले उनके नाम पर मैनेजरों के हाथ में थी। किसानों ने इसी समय गांवों में बड़े पैमाने पर कम्यूनों का निर्माण किया। इन कम्यूनों ने अपने सीमा क्षेत्र में आने वाले लगभग सभी काम अपने हाथ में ले लिये। शिक्षा उनमें से एक महत्वपूर्ण काम था। इसी दशक में चीन के हर गांव में कम्यून ने प्राइमरी स्कूल खोला। फिर कुछ गांवों ने मिलकर मिडिल स्कूल खोला और कम्यून के पैमाने पर हाईस्कूल खोले गये। इनमें शिक्षक और अन्य सुविधाएं व संसाधन कम्यून की तरफ से ही दिये गये। और इन स्कूलों का प्रबन्धन भी वहां के मजदूरों किसानों ने अपने पास रखा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि पाठ्यक्रम भी कम्यून के नेतृत्व में मजदूरों किसानों शिक्षकों और छात्रों ने मिलकर तैयार किया जो स्थानीय जरुरतों और सर्वहारा राजनीति को ध्यान में रखकर बनाया गया। प्राथमिक स्तर पर विषय को मोटा मोटी दो भागों में बांट दिया गया। एक था ‘कृषि आधारित ज्ञान’ (जिसमें जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान आदि आ जाता था) और दूसरा था ‘उद्योग आधारित ज्ञान’ (जिसमें भौतिक विज्ञान, गणित जैसे विषयों को शामिल कर लिया गया)। ‘संगीत’ और ‘भाषा’ ज्ञान को भी उत्पादन से जोड़ दिया गया। स्कूल के सत्र को स्थानीय जरुरतों के हिसाब से लचीला बनाया गया। जब कृषि का काम ज्यादा होता था तो स्कूल बन्द कर दिया जाता था और बच्चे व शिक्षक किसानों की खेती के काम में मदद करते थे। ज्यादा छोटे बच्चे उन्हे गाना सुनाकर उनका श्रम हल्का करने का प्रयास करते थे।
खेती के ज्यादातर उपकरण गांव के स्तर पर ही कम्यून के नेतृत्व में बनाये जाते थे। छात्र इन छोटी छोटी फैक्टरियों में भी समय समय पर काम देखने व सीखने आते थे और इस प्रक्रिया में मजदूरों की मदद भी करते थे।
स्कूल का माहौल काफी जनवादी होता था। छात्रों को शिक्षक से असहमत होने, अपनी बात कहने व शिक्षक की आलोचना करने का अधिकार था। इसके लिए ‘बिग करैक्टर पोस्टर’ का भी इस्तेमाल किया जाता था, जिसका चलन सांस्कृतिक क्रान्ति ने ही शुरु किया था, जहां आप अपनी आलोचना लिख कर सम्बन्धित स्थानों पर चिपका सकते थे। चीन में इस दौरान बिग कैरैक्टर पोस्टर ने इतनी लोकप्रियता हासिल की कि बीजिंग, शंघाई जैसे शहरों की लगभग सभी दिवारें इन पोस्टरों से भर गयी थी।
हाई स्कूल तक किसी तरह की परीक्षा प्रणाली नही थी। स्कूल सभी के लिए खुले थे। कालेजों में प्रवेश परीक्षा बन्द हो चुकी थी। अब कम्यून से मजदूर किसान जिन छात्रों को अनुमोदित करते थे, वे ही कालेज में प्रवेश पा सकते थे। शर्त यह थी कि वे कालेज की पढ़ाई पूरी करके वापस अपने कम्यूनों में लौट जायेगे। और वहां के उत्पादन में मदद करेंगे। सच कहें तो शिक्षा में ये क्रान्तिकारी बदलाव आज तक के इतिहास की एक अनोखी घटना है। 1970 के दशक के बाद पैदा हुई ‘वैकल्पिक शिक्षा प्रणाली’ पर इसका असर आज भी देखा जा सकता है। हालांकि दुःख की बात यह है कि आज वैकल्पिक शिक्षा प्रणाली की बात करने वाले लोग इसके सन्दर्भ को यानी सांस्कृतिक क्रान्ति को जाने या अनजाने भुला देते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में और देशों ने भी कई व्यापक अभियान चलाये हैं। ‘क्यूबा’ और ‘सोवियत संघ’ के शिक्षा के क्षेत्र में किये गये परिवर्तन काफी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन चीन का यह शिक्षा अभियान उससे बुनियादी तौर पर भिन्न था। यहां शिक्षा के सभी पहलुओं पर कम्यून यानी मजदूरों किसानों का प्रत्यक्ष नियत्रण था। शिक्षा उत्पादन से और जनता की चेतना के क्रान्तिकारी रुपान्तरण से सीधे जुड़ी हुई थी।
इतिहास के इसी क्रान्तिकारी दौर में ‘जिमो काउण्टी’ कम्यून के तहत शिक्षा पाने वाले ‘डोन्गपिन्ग हान’ (Dongping Han) ने अपने अनुभवों व इसी काउण्टी के गांवों के फील्ड-शोध के आधार पर शिक्षा में आये इन क्रान्तिकारी बदलावों का बहुत ही रोचक वर्णन 2008 में आयी अपनी पुस्तक The Unknown Cultural Revolution में किया है।
शिक्षा के इन क्रान्तिकारी बदलावों को सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान बनी एक फिल्म Breaking With Old Ideas में बहुत ही प्रभावी तरीके से दिखाया गया है।
शिक्षा के अलावा कला साहित्य संगीत के क्षेत्र में भी बहुत से संघर्ष हुए और रचनात्मकता के नये कीर्तिमान बनाये गये और इस क्षेत्र में बुर्जुआ गढ़ को काफी नुकसान पहुंचाया गया। यहां तक बहस हुई कि ‘शुद्ध संगीत’ (absolute music) का भी वर्ग चरित्र होता है या नही।
नये क्रान्तिकारी यथार्थ के अनुसार जनवादी क्रान्ति के दौर के प्रगतिशील नृत्य नाटिकाओं के भी नये संस्करण तैयार किये गये। ‘सफेद बालो वाली लड़की’ जैसे प्रगतिशील नृत्य नाटिकाओं में नायिका के रोल को और ज्यादा क्रान्तिकारी बनाया गया जो सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान आयी नयी चेतना का प्रतिनिधित्व करे।
इसी दौरान सोवियत संघ के ‘समाजवादी साहित्य’ की भी आलोचनात्मक पड़ताल की गयी और उसकी कमियों को उजागर किया गया। ‘शोलोखोव’ जैसे मशहूर उपन्यासकार की उनके उपन्यासो में चित्रित प्रति क्रान्तिकारी पहलू की तीखी आलोचना की गयी। ’धीरे बहो दोन‘ (And Quiet Flows the Don) में ‘ग्रिगोरी’ को प्रतिक्रान्तिकारी पात्र सिद्ध किया गया और लेखक की उसके प्रति सहानुभूति की आलोचना की गयी। मशहूर नाटककार ‘स्तानिसलवस्की’ की उनके Stanislavsky’s system की आलोचना की गयी और बताया गया कि अभिनय का यह तरीका बुर्जुआ है क्योकि इसमें मानवीय भावनाओं को वर्ग के परे बताया गया है। बहुचर्चित फिल्म “Ballad of a Soldier” की आलोचना इस आधार पर की गयी कि यह फिल्म बारीकी से क्रान्तिकारी-प्रगतिशील युद्ध की भर्त्सना करती है।
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शिक्षा के बाद सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन महिलाओं और पुरुषों के सम्बन्धों में आया बदलाव था। जैसा कि ‘एंगेल्स’ ने बताया है कि इतिहास का पहला वर्ग-अन्तरविरोध महिलाओं और पुरुषों के बीच के अन्तरविरोध के रुप में सामने आया। समाजवादी समाज में यह अन्तरविरोध बरकरार रहता है। समाज के जनवादीकरण की पहली शर्त है कि इस अन्तरविरोध को कम किया जाय और इसे खत्म करने की ओर बढ़ा जाय। इसी को ध्यान में रखकर प्रत्येक गांव, फैक्ट्ररी, स्कूल, और सरकारी कार्यालयों में ‘महिला फेडरेशन कमेटी’ बनायी गयी। सम्बन्धित क्षेत्र में महिला सम्बन्धी किसी भी समस्या को देखने और उसे हल करने का काम इसी कमेटी का था। राजनीतिक, प्रशासनिक व उन सभी कामों में उनकी भागीदारी को सचेत तरीके से बढ़ाया गया जो पहले पुरुषों के अधिकार क्षेत्र में आते थे। दूसरी ओर पुरुषों को भी ऐसे काम करने के लिए प्रोत्साहित किया गया जो परम्परागत रुप से महिलाओं के माने जाते थे जैसे-बच्चे पालना, खाना बनाना, छोटे बच्चों को पढ़ाना या नर्स का काम आदि। महिलाओं के लिए यदि यह नारा था कि महिलाएं वे सभी काम कर सकती हैं जो पुरुष करते हैं तो पुरुषों के लिए भी यह नारा दिया गया कि पुरुष भी वे सभी काम कर सकते हैं जो महिलाएं कर सकती हैं। सांस्कृतिक क्रान्ति ने महिलाओं को किस हद तक प्रभावित किया था यह इस तथ्य से पता चल जाता है कि क्रान्ति के दौरान एक समय महिलाओं ने विशेषकर नौजवान महिलाओं ने अपना नाम बदलना शुरु कर दिया। भारत की तरह ही वहां भी महिलाओं के नाम तथाकथित नारी सुलभ स्वभाव को अभिव्यक्त करने वाले रखे जाते थे। जैसे (भारतीय सन्दर्भ में देखे तो) शीतल, सुमन, सावित्री आदि। इस तरह के नामों को त्यागकर उन्होेंने ऐसे नामों को अपनाया जो उनकी उस समय की क्रान्तिकारी चेतना को अभिव्यक्त करे। नृत्य नाटिकाओं में भी उन्होंने पुराने ‘नारी सुलभ’ भावों को त्याग दिया और नारी की बिल्कुल नयी तस्वीर सामने रखी। इसे The Red Detachment of Women और The White Haired Girl जैसी नृत्य नाटिकाओं में देखा जा सकता है।
1970 के बाद दुनिया के पैमाने पर चलने वाले नारी आन्दोलनों पर सांस्कृतिक क्रान्ति के इस पहलू की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है।
समग्रता में देखे तो 1917 की रुसी क्रान्ति ने पूरी दुनिया को जिस तरह से प्रभावित किया था, लगभग उसी तरह का प्रभाव पूरी दुनिया पर चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का भी पड़ा। अमेरिका का ‘ब्लैक पैन्थर आन्दोलन’, फ्रान्स का ‘1968 का छात्र आन्दोलन’,‘वियतनाम का संघर्ष’ और पूरी दुनिया में वियतनाम के समर्थन में हुए प्रदर्शनों पर इसके गहरे असर की छाप आज भी दिखती है। एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमरीकी के क्रान्तिकारी आन्दोलनों पर सांस्कृतिक क्रान्ति का ना सिर्फ जबर्दस्त प्रभाव था, बल्कि उस दौरान इन संघर्षो को चीन ने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष भरपूर मदद भी की थी।
प्रतिक्रियावादी ताकतें और उनके अकादमिक बुद्धिजीवी इतिहास के इस सुनहरे दौर को लगातार अपने झूठ के पुलिन्दों से ढक देने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन चीन के प्रख्यात साहित्यकार ‘लू शुन’ के शब्दों में कहे तो- ‘‘खून से लिखे गये तथ्यों को स्याही से लिखे गये झूठ मिटा नही सकते।’’

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‘लातीन अमरीका के रिसते जख्म’: एक चीखती किताब

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एदुवार्दो गालिआनो की किताब ’ओपेन वेन्स ऑफ़ लैटिन अमेरिका’ [OPEN VEINS OF LATIN AMERICA] लम्बे समय से पढ़ने की फेहरिस्त में थी। गार्गी प्रकाशन ने हाल ही में इसका हिन्दी अनुवाद ’लातिन अमेरिका के रिसते जख्म’ के नाम से प्रकाशित किया है। इत्तेफाक से हिन्दी अनुवाद हाथ में आया और पढ़ना शुरू किया। पन्ने दर पन्ने इस किताब को पढ़ते हुए अजीब-अजीब से मनोभावों से गुजरना हुआ। अन्याय शोषण का ऐसा नंगा नाच जितना लैटिन अमरीकी देशों में हुआ, शायद ही कहीं हुआ हो। दमन और प्रतिरोध का बेमिसाल उदाहरण है समूचा दक्षिण अमरीकी महाद्वीप। इस किताब को पढ़ते हुए कभी ग़म की शिकार हुयी तो कभी गु़स्से की। पढ़ते हुए कभी पेट की अंतड़ियां तक ऐंठने लगती हैं, कभी यह चेतना को इतना झकझोरती है कि आप उठ कर चक्कर लगाने लगते हैं। इससे पहले इतनी चीखती हुयी किताब मैंने पहले कभी नहीं पढ़ी थी। इसको पढ़ने के बाद आप इतिहास के रोज़ाना के चक्र में अपने कदमों के निशान को तलाशने लगते हैं। प्रश्न करते हैं कि अन्याय की यह रवायत आखिर कब तक?? इससे पहले हावर्ड जिन की असाधारण किताब ’पीपुल्स हिस्ट्री आफ अमेरिका’ पढ़ी थी। इन दोनो किताबों ने मिल कर समूचे अमरीकी महाद्वीपों का असली इतिहास सामने रख दिया। उत्तरी अमेरिका ने न केवल दक्षिणी अमरीकी जनता के श्रम को लूटा था बल्कि बहुत संस्थागत तरीके से उत्तरी अमरीकी मूलनिवासियों का कत्लेआम किया और बचे हुए लोगों को संग्रहालय की वस्तु बना कर रख दिया।
1971 में प्रकाशित एदुवार्दो गालिआनो की इस किताब ने समूचे लैटिन अमेरिका में तहलका मचा दिया था। उरुग्वे के नागरिक एदुआर्दो गालियानो एक पत्रकार थे। वह लैटिन अमेरिका की धरती और लोगों में रचे बसे थे। वह अपने बेमिसाल साहित्य और जनता के प्रति अपने सरोकारयुक्त लेखन के लिए जाने जाते हैं। 1971 में जब यह किताब आयी तो लैटिन अमेरिका एक उथलपुथल से गुजर रहा था। दुनिया की राजनीति में शीत युद्ध का दौर था। उत्तरी अमेरिका के नेतृत्व में इस महाद्वीप के सैनिक शासकों को शह थी। ऐसे माहौल में जब यह किताब आयी तो अर्जेन्टीना, चिली, ब्राजील और उनके अपने देश उरुग्वे में इस किताब को प्रतिबन्धित कर दिया गया। कई वर्षों तक एदुवार्दो को निर्वासन में जीवन जीना पड़ा। सन 2009 में जब वेनेजुएला के राष्ट्रपति शावेज ने 5वे अमरीकी समिट में यह किताब राष्ट्रपति ओबामा को भेंट की तो ओबामा अचकचा गया। क्योंकि ओबामा इस लूट की निरन्तरता का वाहक रहा है। लेकिन इस किताब की सेल एकाएक बहुत ज़्यादा बढ़ गयी। इसलिए नहीं कि शावेज इसके प्रचारक बने बल्कि इसलिए कि वाकई यह किताब चीखते हुए खुद को पढ़ने के लिए आमन्त्रित करती है।
लैटिन अमरीकी महाद्वीप 20 से अधिक छोटे बड़े देशों का एक समूह है। यहां की रत्नगर्भा धरती वस्तुतः यहां के इतिहास के लिए एक अभिशाप बन गयी। इतिहास गवाह है कि दुनिया में जहां-जहां भी धरती के नीचे सम्पदा है उसके ऊपर रहने वाले वहां के मूल निवासी इतिहास के सबसे अधिक शोषित लोगों में से एक हैं। हालांकि वे सदियों से इसकी रक्षा करते आए हैं और आज भी जहां-जहां वे संघर्ष करते हुए लड़ रहे हैं, वहां की सम्पदा बची हुयी है। स्वयं भारत इसका एक ज्वलन्त उदाहरण है। आज भारत में भी आदिवासी लोग अपने जल, जंगल व ज़मीन की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं। नियमगिरी के आदिवासियों ने प्रतिरोध की मिसाल कायम करते हुए अपने समूचे पहाड़ को वेदान्ता के पंजे में जाने से रोक लिया। आज भी उनका संघर्ष जारी है।
समूचे लैटिन अमेरिका में धरती के नीचे सोना, चांदी, टिन, पेट्रोलियम के अकूत भण्डार पर आक्रान्ताओं की गिद्ध नजर रही तो धरती के ऊपर कोको, काफ़ी, केला, रबर व चीनी की पैदावार लूट का सबब बनी। यूरोप के बाज़ार ने एशिया की समृद्धि की कहानी सुनी थी। कोलम्बस इसी भ्रम में अमरीकी महाद्वीप पहुंच गया। इसके साथ ही शुरू हुयी यहां बाज़ार की निर्मम लूट और नरसंहार। लैटिन अमरीका की प्राकृतिक समृद्धि यूरोप और बाद में चलकर उत्तरी अमेरिका की समृद्धि का सबब बनी। यहां की अकूत ग़रीबी वहां की अमीरी का आधार बनी। शुरू हुआ हत्याओं और नरसंहारों का ऐसा अन्तहीन चक्र जिसके निशान आज भी लैटिन अमरीका की धरती पर यहां वहां बिखरे नज़र आ जाएंगे। उन्होंने वहां के निवासियों के श्रम का जबरन इस्तेमाल कर वहां की धरती खोद डाली। धरती की नसों में प्रवाहित होता सोना, चांदी और टिन खुरच-खुरच कर निकाल लिया। अपने घोड़ों की नाल में चांदी ठुकवा कर हाथों में हथियार लहराते लाखों लोगों का कत्लेआम किया। पूंजीवाद कितना निर्मम हो सकता है, इसका गवाह है लैटिन अमेरिका के 500 सालों की लूट का यह इतिहास। मार्क्स की यह पंक्ति कि ‘पूंजी सिर से पांव तक खून व कीचड़ में लथपथ है’ का अर्थ इस किताब को पढ़ने पर पूरी तरह से खुल जाता है।
लैटिन अमरीकी शासक वर्ग ने लगातार दलाल की भूमिका अदा की। पहले उसने यूरोपीय आक्रान्ताओं के समक्ष समर्पण किया फ़िर उत्तरी अमरीकी बहुराष्ट्रीय निगमों को अपने देश की अकूत सम्पदा बेच दी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमरीका दुनिया का ठेकेदार बना और उसकी दो प्रमुख आर्थिक संस्थाएं आईएमएफ़ व विश्वबैंक ने कर्ज़ की राजनीति शुरू की और प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से लैटिन अमरीकी जनता के खुले जख्मों को चूस लिया। वही कहानी दोहराई गयी। जनता लगातार ग़रीब बनी रही और मुट्ठी भर लोग उनकी अंतड़ियों को चांदी की प्लेट में परोस कर मौज करते रहे। एदुआर्दो गालियानो की यह किताब 500 साल की इसी भयानक लूट का राजनीतिक अर्थशास्त्र का इतिहास बताती है। पंक्ति दर पंक्ति यह किताब अपनी विशिष्ट किस्सागोई की शैली में इस भीषण लूट की दास्तान बताती है।
पुस्तक की 1997 संस्करण की प्रस्तावना लिखी है ईसाबेल अलेन्दे ने। ईसाबेल चिली के लोकप्रिय शासक सल्वाडोर अलेन्दे की जीवनसाथी हैं। 11 सितम्बर 1973 अमेरिका ने अलेन्दे का तख्तापलट करवा दिया था। घर से भागते समय ईसाबेल के सामानों में चिली की मिट्टी के अलावा ’ओपेन वेन्स ऑफ लैटिन अमेरिका’ व पाब्लो नेरुदा की किताब ‘ओड्स’ थी। ईसाबेल लातीन अमेरिका में उत्तरी अमरीकी ताण्डव की प्रत्यक्ष गवाह थीं। इस किताब की भूमिका इस किताब का एक बेहतरीन हिस्सा है। अनुवाद की दृष्टि से भी यह सबसे बेहतरीन हिस्सा है।
अब थोड़ी बात अनुवाद पर। इस बेहद महत्वपूर्ण किताब को हिन्दी के पाठको के लिए लाने का श्रमसाध्य काम करने के लिए अनुवादक दिनेश पोसवाल को बधाई! निश्चित रूप से यह एक जरूरी किताब है जिसे हिन्दी में आना ही चाहिए था। प्रकाशक गार्गी प्रकाशन को भी शुक्रिया! अनुवाद के लिए निश्चित रूप से यह एक कठिन किताब है। मूल स्पेनी से अंग्रेजी फिर अंग्रेजी से हिन्दी। मूल भाव बचा पाना एक कठिन काम है। सम्भवतः इस कारण से अनुवादक किताब में प्रवाह को पूरी तरह से बचा नहीं पाए हैं। हिन्दी में अंग्रेजी के तरह का वाक्य विन्यास किताब को और दुरूह बनाता है। अनुवादक को इससे बचना चाहिए। इसके अलावा व्यक्तिगत रूप से लैटिन अमेरिका के इतिहास की कम जानकारी, सन्दर्भों से अपरिचय एवं कठिन व लम्बे लातीन अमरीकी नाम भी प्रवाह में बाधक बने। अन्त में इसी किताब से एक उद्धरण –
जब तक
हिरन अपना इतिहास
खुद नहीं लिखेंगे
शिकारियों की
शौर्यगाथाएं
लिखी जाती रहेंगी
-चिनुआ अचीबी

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‘Nostalgia for the Light’

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9/11 आज एक मुहावरा बन चुका है। 2001 के बाद की दुनिया और 2001 के बाद की अमरीकी विदेश नीति को इन दो जादुई अंकों से ‘डीकोड’ किया जा सकता है। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि दुनिया में एक और 9/11 है जिस पर निरंतर पर्दा डाला जाता है। 11 सितम्बर 1973 को दक्षिण अमरीकी देश चिली में समाजवादी-जनवादी ‘सल्वादोर अलेन्दे'(Salvador Allende) की सरकार का तख्तापलट किया गया था। और इस तख्तापटल की पटकथा लिखी गयी थी अमरीका में।
चिली के मशहूर डाकूमेन्ट्री मेकर ‘पैट्रिसियो गुजमान’ (Patricio Guzmán) ने इस तख्तापलट के पहले और बाद की घटनाओं को अपनी मशहूर फिल्म ‘बैटल आफ चिली’ में समेटा है। यह फिल्म उन चंद फिल्मों में से हैं जो एतिहासिक घटनाओं का दस्तावेजीकरण इस तरह से करती है कि प्रकारान्तर में खुद इतिहास का जीवंत दस्तावेज बन जाती है। आज चिली के इस कालखण्ड का कोई भी अध्ययन इस फिल्म के बगैर अधूरा ही माना जायेगा। फिल्म की स्टाइल भी ‘थर्ड वल्र्ड सिनेमा’ की क्रान्तिकारी परंपरा में है। इसी फिल्म में वह मशहूर और दुःखद दृश्य भी है जहां अर्जेन्टीना के मशहूर कैमरा-जर्नलिस्ट ‘लियोनार्डो हेनरिचसेन’ [Leonardo Henrichsen] ने चिली की सेना के एक जनरल के हाथों अपनी खुद की मौत को कैमरे में कैद कर लिया था।
2011 में पैट्रिसियो गुजमान ने एक और फिल्म बनाई-‘नास्टेल्जिया फार दि लाइट’ (Nostalgia for the Light)। सल्वादोर अलेन्दे के तख्ता पलट के बाद ‘अगस्तो पिनोसेट’ (Augusto Pinochet) की अमरीकी समर्थक सैन्य सरकार ने वहां के ‘वाम’ और ‘प्रगतिशील तबकों’ का जो कत्लेआम किया वह इतिहास के कुछ चुने हुए जनसंहारों में शामिल है। और जैसा कि ऐसे मामलों में हमेशा होता है इनमें से बहुत से लोगों की लाश भी नहीं मिलती और उनके नजदीकी ताउम्र मानसिक प्रताड़ना झेलते हुए उनके अवशेष ढ़ूढते रहते हैं। चिली में ऐसे लापता मृत लोगों की संख्या हजारों में है। उनके नजदीकी रिश्तेदार आज भी उनके अवशेष ढ़ूढ रहे हैं। यह फिल्म उन्ही लोगों की स्मृतियों पर है जो आज भी अपने भाइयों, बेटों, पतियों और अन्य नजदीकी लोगों की स्मृतियों के धुंधला होने के खिलाफ निरंतर लड़ रहे हैं। और इस बहाने यह फिल्म विस्मृति के खिलाफ एक अनोखी जंग का दस्तावेज बन जाती है। मशहूर राजनीतिक चिंतक ’तारिक अली‘ कहते हैं कि इतिहास का सबसे बड़ा दुरुपयोग इतिहास को भूल जाना है। यह फिल्म उन चंद फिल्मों में से है जो इतिहास के अंधेरे कोनों को ढ़ूढ़ती है और फिर उन्हे अपने कैमरे की रोशनी से रोशन करती हैं। ‘विस्मृति’ और ‘स्मृति’ का यह संघर्ष विशुद्ध कला का या अकादमिक संघर्ष नहीं है बल्कि प्रत्येक जनसंघर्षों का एक अनिवार्य मोर्चा है।
इस पूरे विषय को गुजमान ने अपनी इस फिल्म में बहुत ही अनोखे और प्रभावकारी अंदाज में निभाया है। चिली-पेरू-बोलीविया-अर्जेन्टीना में फैले विशाल रेगिस्तान ’अटाकामा‘ (Atacama) ही वह जगह है जहां लापता लोगों की लाशों को दफ्न किया गया है। ऐसा माना जाता है कि कुछ की लाश को इस रेगिस्तान से लगने वाले समुद्र में भी फेका गया है। इसलिए ज्यादातर लोग अपने साथ छोटे छोटे फावड़े लेकर आते हैं और इस विशाल रेगिस्तान की मिट्टी पलटते रहते है। कुछ लोगों को सफलता तो मिली लेकिन साबुत कंकाल शायद ही किसी को मिल पाया। एक महिला अपने साक्षात्कार में बताती है कि उसे उसके भाई का महज एक पैर मिला। उसने मोजे और जूते से उसे पहचाना। यहां हम स्मृति की ताकत को पहचान सकते हैं। वह महिला उस पैर के साथ दिन भर बैठी रही। अभी भी उसे उम्मीद है कि वह अपने भाई का शेष हिस्सा भी खोज निकालेगी। इससे यह भी पता चलता है कि लोगों को मारने के बाद उन्हें कई टुकड़ों में विभक्त कर दिया गया और इधर उधर रेगिस्तान में फेंक दिया गया। हैवानियत की कोई सीमा नही होती।
फिल्म में एक ‘एन्थ्रोपालाजिस्ट’ के हवाले से बताया गया है कि यह रेगिस्तान सुदूर अतीत काल के मानव अवशेषों से भी भरा हुआ है। यहां एन्थ्रोपालाजिस्ट सुदूर अतीत के मानव इतिहास को खोज रहे हैं तो महिलाएं अपने नजदीक के ’इतिहास‘ को खोज रही हैं। सुदूर अतीत और आधुनिक काल के अवशेषों के रिश्तों पर यह फिल्म सीधे सीधे तो कुछ नही कहती। लेकिन संकेत साफ है। ‘बर्बरता’ से ‘सभ्यता’ तक की मानव यात्रा रैखिक नही हैं। इनके बीच बहुत कुछ ऐसा है, जो हमारे बने बनाये सांचे में फिट नही होता।

यह रेगिस्तान दुनिया का सबसे शुष्क रेगिस्तान है। इसलिए अन्तरिक्ष को खंगालने के लिए यह आदर्श जगह है। यहां दुनिया की आधुनिकतम आब्जरवेटरी है। यहां दुनिया के तमाम वैज्ञानिक ब्रहमाण्ड का इतिहास जानने में लगे हुए हैं। दरअसल फिल्म इसी आब्जरवेटरी से शुरु होती है और अन्तरिक्ष के इतिहास के साथ चिली के इस तात्कालिक इतिहास की समस्या को दार्शनिक धरातल पर जोड़ने का प्रयास करती है। फिल्म में इस आब्जरवेटरी में काम करने वाले वैज्ञानिकों के कुछ रोचक साक्षात्कार भी हैं, जिससे रेगिस्तान में सतह के नीचे अपने नजदीकियों को खोजने वाली महिलाओं और ब्रहमाण्ड की अतल गहराइयों से आने वाले प्रकाश को खोजने वाले वैज्ञानिकों के बीच एक खूबसूरत रिश्ता बनता है। अपने पति के अवशेषों को इस रेगिस्तान में खोज रही एक महिला कहती है कि काश ऐसा होता कि अन्तरिक्ष की तरफ जो मशीनें अपनी नज़र गड़ाये हुए हैं वे मशीनें इस रेगिस्तान की तरफ अपनी नज़र मोड़ ले और हम इसमें दबे हुए अपने लोगों को खोज निकालें। इसी आब्जरवेटरी का एक वैज्ञानिक कहता है कि हम दोनों ही इतिहास खोज रहे हैं। लेकिन दोनों के बीच एक बड़ा फर्क यह है कि हम रोज अपने हिस्से का काम करके चैन की नींद ले सकते हैं, लेकिन इस रेेगिस्तान में अपनों को खोजने वाली ये महिलाएं कभी चैन की नींद नही ले पाती।
हांलाकि मुझे लगता है कि ब्रहमाण्ड के इतिहास और अपनों को खोजने के इतिहास के बीच साम्य पर आवश्यकता से ज्यादा जोर देने के कारण विषय का तीखापन प्रभावित होता है। और फिल्म के अन्त में हमारे भाव कुछ हद तक ‘विरेचित’ (catharsis) होने लगते हैं।
फिल्म में स्मृति की ताकत का एक रोचक उदाहरण है। इसी रेगिस्तान में पिनोसेट ने एक यातना शिविर बनवाया था, जिसके बारे में बाहरी दुनिया को कोई खबर नही थी। इसमें बन्द एक व्यक्ति रोज रात को इस यातना शिविर का नक्शा बनाता था और सुबह पकड़े जाने के भय से इसे फाड़कर टायलेट में फेंक देता था। रोजाना के इस अभ्यास द्वारा उसने अपने दिमाग में इस यातना शिविर का एक पूरा नक्सा दर्ज कर लिया और छूटने के बाद इसी के माध्यम से दुनिया को पता चला कि यह यातना शिविर कैसा था।
फिल्म में ‘अटाकामा’ रेगिस्तान के ‘लांग शाट्स’ काफी खूबसूरत हैं। बिना बैकग्राउण्ड संगीत के ये लांग शाट्स रेेगिस्तान की सतह के नीचे दबे इतिहास की रोशनी में एक साथ खूबसूरत भी लगते है और भयावह भी। इतिहास भी तो ऐसा ही है- ‘खूबसूरत और भयावह’।

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डाॅ. अम्बेडकर की 125वीं जयंती पर

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1939 में डाॅ. अम्बेडकर ने ‘देश’ और अछूत जातियों के बीच के शत्रुवत अन्तरविरोधों की ओर इशारा करते हुए कहा कि ‘‘जब भी अछूत जातियों और देश के हितों के बीच किसी भी तरह का टकराव होगा तो जहां तक मेरा सम्बन्ध है मैं ऐसी स्थिति में अछूतों के हितों को देश के हितों पर वरीयता दूंगा।’’
यह बयान ना सिर्फ डाॅ. अम्बेडकर को समझने का सूत्र मुहैया कराता है बल्कि दलित आन्दोलन को भी समझने में मददगार है। लेकिन आज हम अम्बेडकर के उस बयान को आगे बढ़ाकर यदि यह कहे कि आज ना सिर्फ अछूत जातियों बल्कि भारत की तमाम शोषित-उत्पीडि़त जनता का हित उसके ‘देश’ या अधिक सटीक रुप से कहे तो उसके ‘राष्ट्र’ के हितों से टकराव की स्थिति में है (मार्क्सवाद की भाषा में कहें तो दुश्मनाना अन्तरविरोध की स्थिति में) तो यह गलत नही होगा। आज दलित आन्दोलन और वाम की संभावित एकता का आधार भी यही है। भारत की ब्राहमणवादी-दक्षिणपंथी और प्रतिक्रियावादी ताकते जिस देश और राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करती है उस देश और राष्ट्र को सबसे बड़ा खतरा इसी एकता से है, जिसे पिछले दिनों ‘अरुंधति राय’ ने अपने एक भाषण में खूबसूरत तरीके से कहा-”आज दक्षिणपंथी ताकतों को सबसे बड़ा खतरा ‘नीले गगन में लाल सितारे’ से है।”
इस नीले और लाल की एकता का सबसे बड़ा प्रयास 1972 में महाराष्ट्र में ‘दलित पैंथर’ की स्थापना में दिखता हैं जो एक ओर अमरीका के ‘ब्लैक पैंथर’ आन्दोलन से प्रभावित था तो दूसरी ओर अपने देश के ‘नक्सलवादी आन्दोलन’ से। 1973 में ‘दलित पैंथर’ ने अपना घोषणापत्र जारी किया जो वाम और दलित एकता का जीवंत दस्तावेज है और आज पहले से कही ज्यादा प्रासंगिक है। तो आइये डाॅ. अम्बेडकर की 125वीं जयंती पर इस महत्वपूर्ण दस्तावेज पर एक नजर डाल लेते हैं-

घोषणा-पत्र
दलित पैन्थर्स (बम्बई, 1973)

पैन्थर्स का क्रान्तिकारी दृष्टिकोण
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आज के दिन हम ‘दलित पैन्थर्स’ अपना एक वर्ष पूरा कर रहे हैं। चौतरफा प्रबल विरोध के बावजूद हम पैन्थरों की ताकत बढ़ रही है क्योंकि हमारे पास स्पष्ट क्रान्तिकारी दृष्टि है। हमारी ताकत बढ़नी ही है क्योंकि हमने उस जनता के क्रान्तिकारी स्वभाव और उसकी आकाक्षाओं को पहचान लिया है, जिस जनता की हंसी और जिसके आंसुओं के साथ हम अपने जन्म के दिन से ही जुड़े रहे हैं। पिछले एक वर्ष के दौरान, खास तौर पर महाराष्ट्र के सुदूर कोनों में हमारे सदस्यों एवं हमारी गतिविधियों के बारे में गलतफहमियाँ पैदा करने के सचेत प्रयास किये गये हैं। ‘पैन्थर्स के उद्देश्यों, व्यापक क्रान्तिकारी तथा जनवादी संघर्षों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता और हमारी नीतियों के बारे में भ्रम फैलाये जा रहे हैं। इसलिए यह जरूरी हो गया है कि हम अपने दृष्टिकोण को साफ-साफ सामने रख दें। क्योंकि, ‘पैन्थर्स’ अब दलितों के भावनात्मक उद्गार मात्र का प्रतीक नहीं रह गया है। बल्कि, इसका चरित्र एक राजनीतिक संगठन जैसा हो गया है। डाॅ० बाबासाहब अम्बेडकर ने अपने अनुयायियों को हमेशा सिखाया कि जिन राजनीतिक परिस्थितियों में आप संघर्ष कर रहे हैं, उनके गम्भीर अध्ययन के आधार पर ही अपनी राजनीतिक रणनीतियां तय करनी चाहिए। इस आदर्श को हमेशा अपने सामने रखना हमारे लिए आवश्यक ही नहीं बल्कि अपरिहार्य है। अन्यथा हम कछुए की पीठ को चट्टान समझ बैठेंगे और उसका सहारा लेने के चक्कर में डूब जायेंगे।
वर्तमान कांग्रेस शासन के रूप में वही पुराना हिन्दू सामन्तवाद जारी है जिसने हजारों वर्षों से दलितों को सत्ता, सम्पत्ति तथा सम्मान से वंचित रखा। इसलिए यह कांग्रेस शासन कोई सामाजिक परिवर्तन नहीं ला सकता। जनता के दबाव में इसने कई तरह के कानून भले बना लिये हों लेकिन उनको अमल में यह नहीं ला सकता। क्योंकि, सम्पूर्ण राज्यतंत्र पर उन्हीं सामन्ती स्वार्थों का प्रभुत्व है जिन्होंने हजारों वर्षाें से धार्मिक विधि-निषेधों के जरिए सारी सम्पदा एवं सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखा और आज भी वे अधिकांश कृषि-योग्य भूमि, उद्योग, आर्थिक संसाधनों तथा सत्ता के अन्य सभी उपकरणों के मालिक बने हुए हैं।
इसीलिए, स्वतंत्रता-प्राप्ति और लोकतांत्रिक प्रतीत होने वाले ताम-झामों के बावजूद दलितों की समस्याएँ जस की तस बनी हुई हंै। छुआ-छूत ज्यों का त्यों बना हुआ है। क्योंकि सरकार ने इसके उन्मूलन के लिए कुछ नहीं किया, सिवाय इसके खिलाफ खोखले कानून पारित करते जाने के। छुआ-छूत को उखाड़ फेंकने के लिए सारी जमीनों को फिर से बाँटना होगा। सदियों पुराने रिवाजों और शास्त्रों को नष्ट कर देना होगा और नए विचारों को रोपना होगा। ग्राम संगठन, समाज संगठन और जनता की चेतना, इन सभी चीजों को सच्चे जनवादी लक्ष्यों के अनुरूप ढालना होगा। हमें सत्ता के उस वस्तुगत ढांचे की ओर ध्यान देना होगा जो दलितों को गुलाम बनाता है और जो उन्हें अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चलाने को मजबूर करने में कामयाब रहा है।
हिन्दू सामन्ती शासन दलितों का शोषण करने में मुस्लिम काल या ब्रिटिश काल की तुलना में आज सौ गुना ज्यादा सक्षम है। क्योंकि, इस हिन्दू सामन्ती शासन के कब्जे में उत्पादन के सारे साधन, नौकरशाही, न्यायपालिका, सेना और पुलिस बल है जो सामन्तों, जमींदारों, पूंजीपतियों और धार्मिक नेताओं के रूप में मूर्तिमान हैं और ये सारे लोग पर्दे के पीछे से इन उपकरणों को संचालित कर रहे हैं। अतः दलितों के प्रति छुआ-छूत की समस्या केवल मानसिक गुलामी की समस्या नहीं रह गई है।
छुआ-छूत धरती पर शोषण का सर्वाधिक हिंसक रूप है जो सत्ता संरचना के नित-परिवर्तनशील रूपों के साथ-साथ खुद को कायम रखे हुए है। आज जरूरत है इसकी असली जमीन, इसके मूल कारणों को तलाशने की। यदि हमने उन्हें तलाश लिया तो हम निश्चित ही इस शोषण की जड़ पर वार कर सकेंगे। हमारे दो महान नेताओं-ज्योतिबा फुले और बाबासाहब अम्बेडकर-के जीवन संघर्ष एवं प्रयासों के बावजूद दलितों का उत्पीड़न खत्म नहीं हुआ। यह उत्पीड़न न केवल जारी है बल्कि और तीव्रतर हो गया है। अतः अछूतों के पददलित जीवन में निहित क्रान्तिकारी अन्तरवस्तु को यदि हम नहीं समझेंगे और उसे सही दिशा नहीं देंगे तो सामाजिक क्रान्ति की चाह रखने वाले एक भी व्यक्ति का भारत में जीना दूभर हो जाएगा।
वास्तव में, दलितों अथवा अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों का सवाल एक व्यापक सवाल बन गया है। अब दलित का तात्पर्य ग्रामीण समाज और शास्त्रों से बहिष्कृत अछूत मात्र से नहीं है। वह अछूत और दलित होने के साथ-साथ मेहनतकश है, भूमिहीन श्रमिक है, सर्वहारा है। और यदि हमने इन सभी के बीच बढ़ती जाती क्रान्तिकारी एकता को एड़ी-चोटी का जोर लगाकर और मजबूत न किया तो हमारा नामोनिशां मिट जाएगा। इसलिए दलितों को अपने मुक्ति-आंदोलन में जनता के अन्यान्य हिस्सों को, अन्यान्य क्रान्तिकारी शक्तियों को सहभागी बनाना होगा। तभी जाकर वह अपने दुश्मनों से कारगर ढंग से निपट सकते हैं। यदि ऐसा न हो सका तो हम गुलामी से बदतर अवस्था में पहुंच जायेंगे। हमें हर साल, हर महीने, हर दिन, हर घण्टे और हर घड़ी इस चेतना को विकसित करना और दृढ़ बनाना होगा। केवल तभी हम मनुष्य कहलाने के अधिकारी होंगे।
इसी बात के लिए डाॅ० अम्बेडकर ने हमें हमारी पशुओं की-सी शोषित अवस्था में भी अपनी मनुष्यता का एहसास कराया। यदि हमें सफल होना है तो शांतचित्त होकर केवल गम्भीर अध्ययन के बाद ही किसी चीज को अपनाना चाहिए। हमें जुमलेबाजी और भावोद्रेक का शिकार नहीं हो जाना चाहिए, हमें उस वर्ण-व्यवस्था और जाति-व्यवस्था को उखाड़ फेंकना होगा जिसने अपने जाल में फांसकर हमें अपना गुलाम बना रखा है। हमें उस जमीन को बंजर बना देना होगा जिसमें यह विषवृक्ष पनपता और बढ़ता है। हमें यह समझना होगा कि दलित शब्द का जातीय चरित्र अब समाप्त हो रहा है।
सरकार ने दलितों के लिए क्या किया है?
सन् 1947 में जब भारत को आजादी मिली, शासक-वर्ग का महज नकाब बदल गया। (ब्रिटिश) राजशाही के प्रधानमंत्री की जगह ‘जनता का प्रतिनिधि’ आ गया। वेदों, उपनिषदों, मनुस्मृति और गीता की जगह संविधान आ गया। जो कागज आज तक कोरा था उस पर स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे जैसे लफ्जों की भरमार हो गई। सन् 1947 से 1974 तक एक दीर्घ समयावधि है। स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत को अपनी जागीर समझते हुए इन 27 वर्षों तक कांग्रेस सरकार एकछत्र शासन करती आयी है। इस स्वातंत्र्योत्तर ‘स्वशासन’ के दौरान चार पंचवर्षीय योजनाएं, पांच आम चुनाव और तीन युद्ध देखने को मिले लेकिन दलितों के, बल्कि सारी की सारी जनता के सवालों और उनकी जरूरतों को सरकार द्वारा कहीं दूूर अनन्त में धकेल दिया गया है।
राजसत्ता पर अपना कब्जा बनाए रखने के अलावा सरकार ने और कुछ नहीं किया। उल्टे, ’जनता का राज’, समाजवाद, गरीबी हटाओ और हरित-क्रान्ति जैसे जुमले उछाल-उछाल कर उसने दलितों, भूमिहीनों, निर्धन किसानों और मेहनतकशों को अपने पैरों तले रौंदा। उनके बीच से कुछ मुट्ठी भर लोगों को लोभ-लालच देकर, व्यापक जनता की जिन्दगी से खिलवाड़ करते हुए, सरकार ने उसके अस्तित्व को ही खतरे में डाल देने की भरसक कोशिश की। विभाजनकारी नीतियों के द्वारा जनता को धर्म, जाति और दूसरी अनेक चीजों के नाम पर बांट कर उसने लोकतंत्र की प्रतिष्ठा ही दांव पर लगा दी।
एक ऐसा लोकतंत्र जिसमें लोगों को स्वाभिमान से वंचित कर दिया गया हो, जहां लोग अपना भला-बुरा न तय कर सकें और जहां लोगों की जिन्दगी का कोई महŸव न हो, जहां लोग अपने व्यक्तित्व का और अपने समाज का विकास न कर सकें, जहां देश की धरती के कण-कण को अपने खून से सींचने वालों को भूखा मरना पड़ता हो, जहां लोगों की जमीनंे छिनती जा रही हों, सर छुपाने के लिए छत छिनती जा रही हो, जहां ईमानदार को दुःख और पराजय का सामना करना पड़ता हो, जहां लोगों की आँखों के सामने उनकी मांओं और बहनों का बलात्कार होता हो, ऐसे लोकतंत्र में, आजादी सच्चे अर्थों में आजादी नहीं कही जा सकती।
स्वतंत्रता-संघर्ष राष्ट्रीय पूँजीपतियों, जमींदारों व सामन्तों के नेतृत्व में उनके अपने हितों के लिए चलाया गया था। इस संघर्ष का नेतृत्व जनता ने या दलितों ने नहीं किया था। जबकि, डाॅ0 अम्बेडकर हमेशा कहते थे कि इस संघर्ष का नेतृत्व जनता के हाथों में होना चाहिए। वह गाँधी जिसके हाथों में स्वतंत्रता संघर्ष की बागडोर थी, धोखेबाज, धूर्त और रूढ़ जातिवादी था और उसने उन लोगों को शह दी जो वर्गीय प्रभुत्व को बचाये रखना चाहते थे। स्वतंत्रता संघर्ष की एकता को बचाये रखने के नाम पर वह दलितों के सवालों, छुआछूत के सवालों और जनता के सवालों के साथ खेलता रहा और यही वजह थी कि बाबासाहब (अम्बेडकर) अक्सर उसे देश का दुश्मन, राष्ट्र का खलनायक कहते थे। बाबासाहब कहा करते थे कि, गांधीवाद का मतलब है धार्मिक प्राधिकार को बनाये रखना, गांधीवाद का मतलब है लकीर के फकीर बने रहना, गांधीवाद यानी जातिवाद, गांधीवाद यानी परम्परागत श्रम-विभाजन, गांधीवाद यानी अवतारवाद, गांधीवाद यानी गौ माता, गांधीवाद यानी मूर्तिपूजा, गांधीवाद यानी अवैज्ञानिक दृष्टिकोण।
अंग्रेजों को अपना शासन छोड़ना पड़ा नाविकों के विद्रोह के कारण, आजाद हिन्द फौज के कारण, किसानों के संघर्षां के कारण। इन्हीं वजहों से अंग्रेजों की सत्ता का बने रहना असंभव हो गया। अंग्रेजों ने गांधी और गांधीवादियों को आजादी इसलिए सौंपी, क्योंकि वे चाहते थे कि उनके जाने के बाद भी भारत में उनके हितों की रक्षा होती रहे। जो आजादी हमने पायी वह एक तरह से भीख में मिली आजादी थी। सच्ची स्वतंत्रता तो वह होती है जो शत्रु के हाथों से बलपूर्वक छीन ली जाये। एक लाचार भिखमंगे के आगे फंेक दिये गये रोटी के टुकड़ों-सी आजादी, आजादी नहीं। हर घर में और हर मन में सच्ची स्वतंत्रता की अग्नि प्रज्वलित करनी होगी। यह आज तक नहीं हो सका। इसी कारण दलितों, मजदूरों, भूमिहीनों और गरीब किसानों को स्वतंत्रता नहीं मिली। तालाब की तली में कीचड़ जस का तस सड़ता रहा और यथास्थिति बनाये रखने वाली सरकार दलितों से झूठ पर झूठ बोलती गयी।
दूसरी पार्टियों ने दलितों के लिए क्या किया ?
वामपंथी पार्टियाँ पाँच बार चुनाव लड़ने के बाद भ्रष्ट हो चुकी हैं। उनकी दिलचस्पी अब सिर्फ चुनाव लड़ने में रह गयी है। सन् 1967 में वामपंथी पार्टियाँ कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हुईं। इस संयुक्त मोर्चे में अवसरवाद का आलम यह था कि कम्युनिस्ट कहलाने वाली पार्टियों ने जनसंघ और मुस्लिम लीग जैसी साम्प्रदायिक पार्टियों से हाथ मिलाया। कुछ राज्यों में वामदलों का संयुक्त मोर्चा सत्ता में आया। लेकिन किसी स्पष्ट कार्यक्रम के अभाव में यह कांग्रेस-विरोधी रुख किसी काम नहीं आया। जनता के सामने कोई विकल्प रखने, दलितों की समस्याओं को हल करने या गरीबों का शासन स्थापित करने में सभी वामपंथी पार्टियां निकम्मी साबित हुईं। परिणामतः जनता के क्रान्तिकारी धड़ों का चुनावी जनतंत्र से विश्वास उठ गया। नक्सलबाड़ी जैसे विद्रोह होने लगे और उनकी चिंगारी सारे देश में फैल गयी।
सन् 1972 के आम चुनाव के बाद हम वहीं पहुंच गये जहाँ से चले थे। कांग्रेस पुनः सत्ता में आकर दलितों, आमजनों पर शासन करने लगी; सूखे की मार पड़ी, करोड़ों लोगों की जीविकाएँ ही उजड़ गयीं, पशु नष्ट हो गये, फैक्ट्रियां बंद हो गयीं, मजदूर बेरोजगार हो गये, बढ़ती महंगाई ने हर इंसान को पस्त कर दिया।
देश के जीवन पर से कांग्रेस शासन का ग्रहण अभी समाप्त नहीं हुआ है। लेकिन, संसदीय राजनीति का खेल खेलती हमारी वामपंथी पार्टियां कांग्रेस के पिछलगुआपन में वक्त जाया कर रही हैं। किसी ने भी क्रान्तिकारी रुख अख्तियार करके जनता के सवालों को उठाने का साहस नहीं किया है। राजनीतिक सत्ता से विहीन उन सभी वाम दलों ने सामाजिक क्रान्ति के सवालों से मुंह मोड़ लिया है। उन्होंने वर्ग-संघर्ष को छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष से नहीं जोड़ा, आर्थिक शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के साथ-साथ उन्होंने सांस्कृतिक और सामाजिक प्रभुत्व के खिलाफ आवाज नहीं उठायी।
छुआछूत शोषण का सबसे भयंकर रूप है। इस शोषण-व्यवस्था को हिन्दू सामन्तवाद ने जन्म दिया और इसी के हितों की रक्षा में यह व्यवस्था लगी हुई है। सेना, जेलों, कानून व्यवस्था तथा नौकरशाही की सहायता से इस छुआछूत का दायरा और अधिक विस्तृत हो रहा है। ऊंची-उड़ान भरने वाले दार्शनिक सिद्धांतों और आत्मा की मुक्ति (मोक्ष, निर्वाण) की आड़ में दलितों को दुनियावी सुख-सुविधाओं से वंचित रखा गया और जो कुछ उनके पास था, वह सब लूट लिया गया।
औद्योगिक विकास के साथ मशीनों का प्रयोग होने लगा। दलितों को इन मशीनों में जोत दिया गया। लेकिन ऊंची जातियों के मन में सामन्तवाद जीवित बचा हुआ था। क्योंकि मशीनों के मालिक मुनाफा तभी कमा सकते थे जबकि सामाजिक संरचना के साथ किसी प्रकार की छेड़-छाड़ न की जाये। कोई राजनीतिक क्रान्ति तभी सम्भव है, जबकि दलितों को सामाजिक क्रान्ति का महत्व समझ में आ जाये। यदि ऐसा हो जाता है तो उच्च वर्ण तथा उच्च वर्ग के हाथों से सत्ता निकल जायेगी। वामपंथी पार्टियों ने जैसा रुख अपना रखा था उसके चलते जनता में क्रान्तिकारी विचारधारा का प्रसार होने में अड़चन आ रही थी। चूंकि दलितों के हित में वास्तविक तथा सच्चे संघर्ष छेड़े नहीं गये, इसलिए उनकी हालत बदतर हो गयी है। उन्हें अनगिनत अत्याचार झेलने पड़े हैं।
आज दलितों के सामने जो समस्याएं हैं, वे चाहे सामाजिक समस्याएं हो या राजनीतिक या नैतिक, उन्हें धर्म-सुधार तथा ’जाति का उत्थान’ जैसे उपायों से नहीं हल किया जा सकता। सन् 1952 के आम चुनावों में अपनी पराजय के बाद जाकर डाॅ0 अम्बेडकर ने इस बात को समझा। केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वर्ग-चेतना और पूरी तरह से अनीश्वरवादी रवैया एवं मानव मात्र की खातिर लड़ाई की भावना ही दलितों के संघर्षों को धार दे सकती है। इसी उद्देश्य से डाॅ0 अम्बेडकर उस वक्त के ’अनुसूचित जातियों का महासंघ’ (ैब्थ्द्ध को विस्तृत जनाधार वाली एक पार्टी में तब्दील कर देना चाहते थे। लेकिन यह काम उनके जीवन काल में न हो सका। उनकी मृत्यु के बाद उनके ’अनुयायियों’ ने ’अनुसूचित जातियों का महासंघ’ (ैब्थ्द्ध का केवल नाम बदलकर रिपब्लिकन पार्टी रख दिया और जातिवादी राजनीति करने लगे। उन्होंने सारे दलितों और सारे उत्पीडि़तों को कभी एकता के सूत्र में नहीं बांधा। बहुत करके, उन्होंने क्रान्तिकारी दलित समुदाय की राजनीति को कानूनी तौर-तरीकांे से चलाया। रिपब्लिकन पार्टी वोटों, सौदेबाजियों, मुट्ठीभर दलितों के लिए विशेष पदों के जुगाड़ और थोड़ी-बहुत रियायत हासिल कर लेने के लोभ-पाश में फंस कर रह गयी। अतः देश भर में यहां-वहां असंख्य गांवों में बिखरी हुई दलित आबादी की राजनीतिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। रिपब्लिकन पार्टी का नेतृत्व दलितों में ही उभरते मध्यवर्ग के हाथों में चला गया। षडयन्त्र, स्वार्थ और आपसी फूट का बोलबाला हो गया।
डाॅ0 अम्बेडकर की क्रान्तिकारी आवाज को दबाते हुए ये घृणित नेता उनका नाम भुनाने लगे और अपने-अपने स्वार्थों की झोलियां फैलाने लगे। यह डाॅ0 अम्बेडकर की पार्टी है। यह डाॅ0 अम्बेडकर का झण्डा है। यह दुहाई देकर वे अपनी तिजोरियां भरने लगे और इस तरह, दादासाहब गायकवाड़ के नेतृत्व में चले भूमिहीनों के सत्याग्रह के अलावा, रिपब्लिकन पार्टी ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जो उसकी गरिमा के अनुकूल हो। दलितों पर जुल्म रोज-रोज की बात हो गयी। डेढ़ वर्षों के अन्तराल में 1,117 दलितों की हत्या हुई। सिंचाई की कोई व्यवस्था न होने से जमीनें बंजर होती गयीं। लोगों के सम्मान के साथ खिलवाड ़ किया गया, घरों में मातम छाया रहा, लोग मारे जाते रहे। रोजी-रोटी के अभाव के साथ-साथ शारीरिक प्रताड़ना की घटनाएं बढ़ती गयीं। रिपब्लिकन पार्टी ने क्या किया? यशवंत राव चैहाण जैसे शासक वर्ग के धूर्त नेताओं के फेंके गये जाल में पार्टी फंस गयी। उसकी जीवटता को घुन लग गया। पार्टी में एकता नहीं रह गयी और उसमें निकम्मे लोगों की भरमार हो गयी। यदि हम अपना भविष्य ऐसे कायर नेताओं के हाथों में सौंप देंगे तो हम अपने जीवन से ही हाथ धो बैठेंगे और इसीलिए आज अत्यन्त दुःख के साथ हमें घोषित करना पड़ रहा है कि रिपब्लिकन पार्टी से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं।
विश्व के दलित और पैन्थर्स
अमरीकी साम्राज्यवाद की घृणित चालों के कारण तीसरी दुनिया-’दलित दुनिया’-यानी दमित राष्ट्रों के लोग और दलित जनता कष्ट भोग रही है। यहां तक कि अमेरिका में भी कुछ मुट्ठी भर श्वेत प्रतिक्रियावादी अश्वेतों का शोषण कर रहे हैं। इस प्रतिक्रियावादी शक्ति का मुकाबला करने और इस शोषण का अन्त करने के लिए ’ब्लैक पैन्थर’ आंदोलन का उदय हुआ। ’ब्लैक पैन्थर्स’ से ’अश्वेत शक्ति’ का उभार हुआ। इस संघर्ष की ज्वाला ने सारे देश पर अपना असर छोड़ा। हम जोर देकर कहते हैं कि इस संघर्ष से हमारा गहरा नाता है। हमारे सामने वियतनाम, कम्बोडिया, अफ्रीका और ऐसे ही कई अन्य देशों का आदर्श है।
दलित कौन है ?
अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोग, नव-बौद्ध, मेहनतकश जनता, भूमिहीन और गरीब किसान, स्त्रियां और वे सब लोग जिनका राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक शोषण किया जा रहा है।
हमारे मित्र कौन है ?
1. वे क्रान्तिकारी पार्टियां जिनका मकसद है जाति व्यवस्था और वर्गीय शासन का विध्वंस करना। वे वामपंथी पार्टियां भी जो सच्चे अर्थों में वामपंथी हों।
2. समाज के वे सभी तबके जो आर्थिक और राजनीतिक दमन के चलते कष्ट भोग रहे हैं।
हमारे शत्रु कौन हैं ?
1. सत्ता और दौलत पर कब्जा किये हुए लोग, महंगाई।
2. जमींदार, पूंजीपति, सूदखोर और उनके दुमछल्ले।
3. वे पार्टियां जो धार्मिक और जातिवादी राजनीति करती हैं और वह सरकार जो धार्मिक और जातिवादी राजनीति के सहारे टिकी रहती हैं।
दलितों के सामने आज के ज्वलन्त प्रश्न
1. रोटी, कपड़ा, और मकान।
2. रोजगार, जमीन, छुआछूत।
3. सामाजिक अन्याय और शारीरिक प्रताड़ना।
दलितों के मुक्ति-संघर्ष के लिए समग्र क्रान्ति की जरूरत है। छोटे-मोटे बदलावों से कुछ नहीं होगा। हमें छिटपुट बदलाव चाहिए भी नहीं। हमें समग्रतः तथा पूर्णतः क्रान्तिकारी परिवर्तन की जरूरत है। यदि हम केवल सामाजिक अधःपतन की इस वर्तमान दशा से ही निकलना चाहें, तो भी हमें आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक सभी मोर्चों पर अपनी ताकत लगा देनी होगी। अब हमें आसानी से बहलाया नहीं जा सकता। हम ब्राह्मणों के टुकड़ों पर नहीं पलना चाहते। हम सारे देश पर हक चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि राजा या सरकार बदले, हम चाहते हैं यह व्यवस्था ही बदले। हृदय-परितर्वन, उदार शिक्षा, इत्यादि उपायों से हमारी शोषित अवस्था का अंत नहीं होने वाला। जब हम क्रान्तिकारी जनता को संगठित करेंगे, जनता को जगायेंगे, तभी इस विशाल जनता के संघर्ष से क्रान्ति का ज्वार उठेगा। कानूनी अपीलों, प्रार्थनाओं, याचनाओं, चुनावों, सत्याग्रहों-इन उपायों से समाज कभी नहीं बदलेगा। सामाजिक क्रान्ति और बगावत की हमारी विचारधारा का महावृक्ष, विरोध के इन बनावटी कागजी गमलों में नहीं उग सकता। यह महावृक्ष वास्तविकता की जमीन से फूटेगा, हमारे मानस में महकेगा और फिर फौलादी इरादों से प्रेरित होकर पूरी शक्ति के साथ प्रकट हो जायेगा।

दलित पैन्थर महज एक जुमला नहीं
अपने सवालों के प्रति हमारा रुख ही उन्हें हल करने की ओर पहला कदम है। छुआछूत, जातिवाद और आर्थिक शोषण पर पैन्थरों का प्रहार अंतिम सिद्ध होगा। इस समाज-व्यवस्था और राज्यसŸाा ने हमें गुलाम बनाने के लिए हजारों क्रूर तौर-तरीके अपनाये हैं। सुदूर अतीत में इन्होंने हमें ’शूद्र’ बनाया। मानसिक दासत्व की बेडि़यां वर्तमान में उसी गुलामी का आधुनिक रूप हैं। हम उन बेडि़यों को तोड़ डालेंगे। हमारे इस संघर्ष में ही हमारी मुक्ति है।
हमारे कार्यक्रम
1. भारत की 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी गांवों में रहती है। उनमें 35 प्रतिशत लोग भूमिहीन किसान हैं; और भूमिहीन कृषि-मजदूरों की कुल आबादी में से 33 प्रतिशत लोग अनुसूचित जाति से आते हैं। जिन दलित निर्धन कृषकों के पास थोड़ी-सी जमीन है भी, तो वह नाम भर की है। दलित कृषकों की भूमिहीनता को समाप्त करना ही होगा।
2. लैंड सीलिंग एक्ट के तहत तुरन्त अतिरिक्त जमीनंे भूमिहीन कृषकों को मिलनी चाहिए। परती भूमि और जंगल कीे भी जमीनों को इसी तरह बांटना होगा।
3. गांवों में अब भी सामन्ती अवशेष बचे हुए हैं। इस कारण दलितों का निर्दयतापूर्वक दमन और शोषण हो रहा है। जमींदार और धनी किसान धन-दौलत से समृद्ध तो हैं ही, उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा भी हासिल है। इस कारण दलितों पर अत्याचारों की बाढ़-सी आयी हुई है। इस व्यवस्था ने दलितों को इस कदर जकड़ रखा है कि रोजी-रोटी से लेकर व्यापक आर्थिक सवालों तक, उनके जीवन के हर पहलू को वह प्रभावित कर रही है। इस व्यवस्था का अन्त करना ही होगा।
4. भूमिहीन मजदूरों की मजदूरी में वृद्धि करनी होगी।
5. दलितों को सार्वजनिक कुंओं के इस्तेमाल की अनुमति होनी चाहिए।
6. दलितों को गांव से बाहर अलग बस्तियों में नहीं, बल्कि गांव के अंदर ही बसाना होगा।
7. उत्पादन के सारे साधनों पर दलितों का अधिकार होना चाहिए।
8. निजी पूंजी द्वारा शोषण बंद होना चाहिए।
9. सामाजिक सांस्कृतिक एवं आर्थिक शोषण का अंत होना चाहिए और भारत में समाजवाद की स्थापना होनी चाहिए। राष्ट्रीयकरण के भ्रामक रास्ते को छोड़कर सच्चे समाजवाद के रास्ते पर बढ़ना चाहिए।
10. सभी दलितों को दैनिक मजदूरी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
11. बेरोजगार दलितों को बेरोजगारी भŸो इत्यादि मिलने चाहिए।
12. सभी दलितों को निःशुल्क शिक्षा मिलनी चाहिए, चिकित्सकीय सुविधाएं, मकान और उच्च गुणवŸाा के अनाज सस्ती दरों पर मिलने चाहिए।
13. शिक्षण संस्थाओं में रोजगार देते समय अपनी जाति तथा धर्म का उल्लेख करने की बाध्यता तुरन्त खत्म की जानी चाहिए।
14. सरकार धार्मिक संस्थाओं को अनुदान देना तुरन्त बंद करे और धार्मिक संस्थाओं की धन-दौलत को दलितों के हित में लगाये।
15. धार्मिक और जातिवादी साहित्य को प्रतिबन्धित करना होगा।
16. सेना में जाति के आधार पर श्रम-विभाजन का अंत करना होगा।
17. कालाबाजारी करने वालों, जमाखोरों, सूदखोरों और उन सब लोगों को खत्म करना होगा जो जनता का आर्थिक शोषण करते हैं।
18. आवश्यक वस्तुओं को निःशुल्क उपलब्ध कराना होगा।
हम मजदूरों, दलितों, भूमिहीनों, गरीब किसानों को, सभी शहरी फैक्ट्रियों और सभी गांवों में जा-जाकर संगठित करेंगे। हम दलितों पर हो रहे हर प्रकार के अन्याय का जवाब देंगे। हम उस जाति-व्यवस्था और वर्ण-व्यवस्था को पूरी तरह से और हमेशा के लिए मिटा देंगे, जो जनता के दुःखों पर फलती-फूलती है, जनता का शोषण करती है और इस प्रकार हम दलितों को मुक्ति दिलायेंगे। वर्तमान कानून व्यवस्था एवं राज्यसŸाा ने हमारे सारे सपनों को तबाह कर दिया है। अपने साथ होने वाले समस्त अन्याय के खात्मे के लिए दलितों को स्वयं शासक बनना होगा। यही सच्चा जनवाद है। दलित पैन्थर्स के समर्थकांे और सदस्यों, दलितों के निर्णायक संघर्ष के लिए तैयार हो जाओ !

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पेरिस कम्यून: स्वर्ग में हमला -क्रिस हरमन

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इस साल महान ‘पेरिस कप्यून’ के 145 साल मनाया जा रहा है। मजदूरों का यह महान विद्रोह 1871 [18 March – 28 May 1871] में पेरिस में हुआ था। तात्कालिक पराजय के बावजूद इसने इतिहास की धारा ही पलट दी। इसके बाद का इतिहास वह बिल्कुल नही रहा जो इसके पहले था। प्रस्तुत है इस महान घटना पर मशहूर जन इतिहासकार ‘क्रिस हरमन’ का यह आलेख-

1870 के प्रारंभ तक नई पूंजीवादी व्यवस्था विश्व प्रभुत्व के लिए तैयार थी। संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में तो वह शिखर पर पहुंच चुकी थी। और वे ही सारी दुनिया को नचा रहे थे। रूस का जार भी 1861 में अर्धदास प्रथा (सर्फडम) का अंत करने पर मजबूर हो गया था। हालांकि उसने आधी जमीन पुराने सामंतों को दे दी थी और किसानों को उनकी दया पर छोड़ दिया था। सारी दुनिया में उलट-पुलट हो रही थी।

लेकिन पेरिस की घटनाओं ने उजागर कर दिया कि पूंजीवाद के प्रभुत्व से उथल-पुथल बंद हो जाय यह जरूरी नहीं। माक्र्स और एंगेल्स ने कम्युनिस्ट घोषणा पत्र में 1848 में लिखा था कि ‘बुर्जुआजी अपनी कब्र खोदने वाले’ स्वयं पैदा करती है। 18 मार्च को फ्रांस की बुर्जुआजी ने देखा कि उपर्युक्त कथन कितना सही था।

चार साल पहले लूई नेपोलियन ने वैभव का प्रदर्शन एक ‘बड़ी नुमाइश’ में यूरोप के शासकों के सामने किया था। प्रदर्शनी का केन्द्र था एक विराट 482 मीटर लंबा अंडाकार भवन जिसका गुंबद इतना ऊंचा था कि वहां तक पहुंचने के लिए मशीन का इस्तेमाल करना पड़ता था।

उसके इस प्रदर्शन का कारण था। 1851 में जब उसने गणतंत्र को उखाड़ फेंका था तब से फ्रांस में बहुत पूंजीवादी विकास हुआ था। औद्योगिक उत्पादन दो गुना हो गया था। शिल्प का अवसान शुरू हो चुका था और कारीगरों से पूंजीपति मजदूरों जैसा ही व्यवहार करते थे।

पर सम्राट की शक्ति उतनी सुरक्षित नहीं थी जितनी लगती थी। वह संतुलन बनाये रखने पर निर्भर थी। वह शासक वर्गों में एक को दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करता रहता था। वह (अपने चाचा) नेपोलियन की नकल कर सैनिक अभियानों से अपनी प्रभुता प्रमाणित करना चाहता था- जैसे इटली और मैक्सिको में (वहां वह अपने उम्मीदवार मैक्सीमिलियन को सम्राट बनाना चाहता था।)। पर उसके शासन के प्रति विरोध थामा नहीं जा सका। पूंजीपति वर्ग के एक भाग को सट्टेबाजी से बहुत नुकसान हुआ। फायदा महज उनको हुआ जो सम्राट के निकटस्थ थे। मैक्सिको का अभियान तो विध्वंसकारी साबित हुआ क्योंकि मैक्सीमिलियन को गोली मार दी गयी। पेरिस के मजदूरों को 1848 का संहार याद था। दाम मजदूरी की अपेक्षा तेजी से बढ़ते जा रहे थे। नेपोलियन के करीबी अधिकारी आउसमांन्न ने लिखा कि पेरिस की आधी जनता ‘बेहद गरीबी’ में रहती है जबकि वह ग्यारह-ग्यारह घंटे काम करती है। 1869 तक चुनावों में पेरिस और दूसरे बड़े नगरों में गणतंत्र समर्थकों का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा था। तभी जुलाई, 1870 में सम्राट बिस्मार्क की चाल में फंस कर प्रशा के विरूद्ध युद्ध की घोषणा करने पर मजबूर हो गया।

सेदां के युद्ध में फ्रांस की फौज की भारी हार हुई। लुई बोनापार्ट पर इल्जाम लगा और उसने सिंहासन त्याग दिया। सत्ता पूंजीवादी गणतंत्र समर्थकों के हाथ आ गयी पर प्रशा की फौज ने पेरिस को घेर लिया और संधि के लिए कठोर और अपमानजनक शर्तें पेश की- भारी जुर्माना और अल्सास लारेन क्षेत्र पर जर्मन कब्जा।

घेरा पांच महीनों तक भयंकर सर्दी में चलता रहा। लोग चूहे और कुत्ते खाने पर मजबूर हो गये। शून्य के नीचे के तापमान में घरों को गर्म करने के लिए ईंधन नहीं था। चीजों के दाम बढ़ते जा रहे थे और मजदूरों तथा कारीगरों के परिवार सबसे ज्यादा तबाह थे। उन्हीं पर नगर की रक्षा का भी मुख्य भार था। वे नेशनल गार्ड में भर्ती होते गये और उसकी संख्या 3,50,000 हो गयी। उन्होंने स्वयं अपने अधिकारी चुने और उसके मध्यवर्गीय चरित्र का अंत कर दिया। उनके प्रतिरोध में जितनी प्रशा की सेना चिंतित थी उतनी ही चिंतित फ्रांस की बुर्जुआ सरकार भी होती गयी। 1792 के सा-क्यूलोतों और 1848 के लड़ाकुओं की संतानों ने फिर हथियार उठा लिये थे। ‘लाल’ क्लब और क्रांतिकारी अखबारों की धूम थी। वे मजदूरों को बता रहे थे कि बुर्जुआ गणतंत्रवादियों ने उनके साथ 1848 में कैसा व्यवहार किया था। माक्र्स ने लिखा ‘सशस्त्र पेरिस का मतलब था क्रांति सशस्त्र’।

गणतंत्रवादी सरकार ने एक वामपंथी विद्रोह को कुचल दिया था। जनवरी, 1871 में बेलविल इरमाके के मजदूरों को ब्रिटेन की फौज का इस्तेमाल कर दबा दिया गया था। वह आतंकित थी कि अगली बार उसे सफलता नहीं मिलेगी। उपाध्यक्ष फाब्र के अनुसार ‘गृह युद्ध कुछ ही गज दूर था और अकाल कुछ ही घंटों दूर’। उसने निर्णय लिया कि सरकार बचाने का एक ही उपाय था। 23 जनवरी की रात को वह गुप्त रूप से प्रशा की फौज से आत्मसमर्पण की शर्ते तय करने पहुंच गया।

इस खबर से पेरिस के गरीब क्रुद्ध हो गये। क्या पांच महीनों तक उन्होंने सब कुछ इसीलिए झेला था? सरकार ने आठ दिनों की नोटिस पर चुनाव की घोषणा कर दी ताकि समर्पण की पुष्टि करवा ली जाए। 1848 की तरह वामपंथियों के पास समय और साधन नहीं थे कि खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में अपनी बात पहुंचा सकें। मतदाताओं का अधिसंख्य तो वहीं रहता था। उधर पूंजीपतियों और पादरियों ने अपना प्रभाव जमा लिया। चुने गये 675 विधायकों में से 400 राजतंत्रवादी थे। पेरिस में असंतोष बढ़ता गया। घेरे बंदी के विश्वासघात के बाद अब सारे गणतंत्र से विश्वासघात हो रहा था। फिर एक और विश्वासघात हुआ। सरकार का अध्यक्ष 71 वर्षीय ओगुस्त थीए को नियुक्त किया गया। वह अपने को मध्यमार्गी रिपब्लिकन कह रहा था पर उसने 1834 में गणतंत्रवादियों का दमन करके ही ख्याति प्राप्त की थी।

समर्पण की शर्तो के अनुसार फौज से हथियार रखवा लिये गये पर जनता ने फिलहाल हथियार नहीं छोड़े। इसके अलावा समृद्ध मध्य वर्ग वाले पेरिस से खिसक लिये। परिणामतः नेशनल गार्ड मजदूरों का संगठन बन गया।

थीए समझ गया था कि पेरिस की जनता के साथ टकराव अनिवार्य हो गया है। उसे पता था कि नेशलन गार्ड के हथियार उन्हीं के कब्जे में हैं जिनमें 200 तोपें भी शामिल हैं। उसने उन पर कब्जा करने के लिए सिपाही भेजे। तोपों को मोंमात्र्र ले जाने के लिए घोड़े तलाशे जा रहे थे तभी लोगों ने सैनिकों से बहस शुरू कर दी। लिसागरे के अनुसार ‘औरतों ने मर्दों का इंतजार नहीं किया। उन्होंने तोपों को घेर लिया और बोलीं- आप लोग जो कर रहे हैं वह शर्मनाक है’। सैनिक समझ नहीं पा रहे थे कि कैसी प्रतिक्रिया करें। तभी 300 नेशनल गार्डों ने ड्रम बजाते हुए ललकारने वाला मार्च किया। एक जनरल लकोंत ने गोली चलाने का आदेश दिया, पर सैनिक खड़े रहे। भीड़ आगे बढ़ती गयी और सैनिकों की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया। लकोंत और दूसरे अधिकारी गिरफ्तार कर लिये गये।

अपराह्न 3 बजे तक थीए की सरकार पेरिस छोड़कर भाग गयी थी। दुनिया के महान नगरों में से एक सशस्त्र मजदूरों के हाथ में था। और इस बार वे इसे कुछ मध्यवर्गीय नेताओं को नहीं सुपर्द करने वाले थे।

एक नये तरह की सत्ता

सशस्त्र जनता ने पहले तो नेशनल गार्ड के चुने हुए नेताओं के माध्यम से ‘सेन्ट्रल कमेटी’ के जरिये काम किया। पर वे कुछ भी ऐसा नहीं करना चाहते थे जिसे तानाशाही करार दिया जा सके। उन्होंने एक नई संस्था ‘कम्यून’ के लिए चुनाव करवाया जिसमें सभी पुरुषों को मताधिकार दिया गया। ये दूसरे संसदीय चुनावों जैसे नहीं थे। इसमें मतदाता प्रतिनिधि को तत्काल वापस भी बुला सकते थे और उन्हें औसत कुशल मजदूर की ही पगार मिलनी थी। उन्हें बस ऐसे कानून नहीं बनाने थे जिसे एक श्रेणीबद्ध नौकरशाही लागू करती उन्हें स्वयं अपने विचार कार्यान्वित करने थे।

कार्ल माक्र्स ने ‘द सिविल-वार इन फ्रांस’ में कम्यून के पक्ष में लिखा कि उन्होंने पुराने राज्य को तोड़कर उसकी जगह एक नई संरचना स्थापित कर दी जो वर्ग समाज के इतिहास में सबसे अधिक जनतांत्रिक थीः

तीन या छः साल में यह तय करने के बजाय कि शासक वर्ग का कौन सा व्यक्ति जनता का गलत प्रतिनिधित्व करेगा, कम्यून की तरह की जनता वयस्क मताधिकार से चीजें तय करेगी- कम्यून को संविधान ने अभी तक परजीवी राज्य द्वारा अधिकृत सारी शक्तियां, जिनके कारण समाज की मुक्त गति बाधित होती है, समाज को लौटा दिया…

उसका असली रहस्य यही था। वह एक मजदूरों की सरकार थी। हड़पने वाले वर्ग के विरुद्ध उत्पादक वर्ग के संघर्षों से जन्मी सरकार, यह एक ऐसा राजनीतिक रूप था जिसमें मजदूर की राजनीतिक मुक्ति का काम किया जा सकता था।

माक्र्स के अनुसार नगर के मेहनतकशों के प्रतिनिधि के रूप में कम्यून ने उनके हित वाले काम शुरू किये- बेकरियों में रात के काम पर पाबंदी, मालिक द्वारा कर्मचारियों पर जुर्माना लगाने पर रोक, मालिकों द्वारा बंद किये गये वर्कशाप और फैक्टरियां मजदूर संगठनों को सुपर्द, विधवाओं को पेंशन, हर बच्चे को मुफ्त शिक्षा, घेरेबंदी के दौरान लिये गये कर्जों की वसूली पर रोक और किराया न देने पर बेदखल करने की पाबंदी। कम्यून ने सैन्यवाद के स्मारकों को ढहा दिया और अंतर्राष्ट्रीयतावादी होने के प्रभावस्वरूप एक जर्मन मजदूर को श्रम-मंत्री बना दिया।

मजदूरों की सरकार और क्या-क्या कर सकती है इसको कर दिखाने का मौका ही नहीं मिला, क्योंकि रिपब्लिकन सरकार फौरन दमन की तैयारी में फौज संगठित करने में जुट गयी। ऐसा करने में उसने प्रशा यानी शत्रु से भी सहयोग लिया। उसने बिस्मार्क को समझा लिया कि पिछले साल गिरफ्तार कैदी जिन पर हाल की पेरिस की घटनाओं और विचारों का प्रभाव नही पड़ा था छोड़ दिये जाएं। ये लोग और देहातों में भर्ती किये गये रंगरूट वर्साई में इकट्ठा किये गये- उन अधिकारियों की निगरानी में जिनके राजतंत्र समर्थन पर एक झीना पर्दा मात्र था, अप्रैल के अंत तक थीए ने कम्यून के दमन के लिए सेना जुटा ली थी और बिस्मार्क से समझौता कर लिया था कि उसे प्रशा के घेरे के बीच से गुजरने दिया जायेगा। कम्यून के सामने विकट कठिनाइयां थीं। एक और समस्या थी। प्रतिनिधि अपने लक्ष्य को पूरी तरह समर्पित थे पर विरोध में इकट्ठा हो रही शत्रु-शक्तियों से निबटने के लिए जरूरी राजनीतिक समझदारी का अभाव था।

1830 से ही फ्रांस के मजदूरों के बीच दो धाराएं विकसित हुई थीं- एक ब्लांकी से प्रभावित थी। वह 1793 के जैकोबैंवाद से अधिक रेडिकल और सामाजिक रूप से जागरूक संघर्ष चाहती थी। उसके अनुसार मजदूरों के पक्ष में नेतृत्व के लिए एक गुप्त अल्पमत चाहिए था जो षड्यंत्रात्मक ढंग से काम करे। इसलिए होता यह था कि जब मजदूर तैयार नहीं होते थे तब ब्लांकी साहसी उभार का प्रयत्न करता और फिर असफल हो जेल चला जाता। तब मजदूरों को उसके बिना ही संघर्ष करना पड़ता। कम्यून की सरकार के दौरान वह जेल में ही था। दूसरी धारा पर प्रूधों की शिक्षाओं का प्रभाव था। जैकोबैं अनुभव के विरुद्ध इनमें भयानक प्रतिक्रिया थी और वे राजनीतिक क्रिया को नकारते थे। उनका तर्क था कि मजदूर बिना राज्य के हस्तक्षेप के सहकार द्वारा समस्याएं हल कर सकते थे।

माक्र्स दोनों धाराओं को अपर्याप्त मानता था। महान फ्रांसीसी क्रांति से सीखने में उसे कोई शंका नहीं थी पर अब उसके बहुत आगे जाने की जरूरत थी। राजनीतिक क्रिया जरूरी थी जैसा ब्लांकी कहता था पर उसकी तरह कुछ लोगों के साहस के माध्यम से नहीं बल्कि जन क्रिया (मास एक्शन) के रूप में। उत्पादन का पुनर्गठन होना चाहिए जैसा प्रूधोंवादी कहते थे पर वह बिना राजनीतिक क्रांति के संभव नहीं था। पर माक्र्स पेरिस की घटनाओं को प्रभावित कर पाने की स्थिति में नहीं थे। कम्यून में ब्लांकी के अनुयायी वाइयां जैसे लोग माक्र्स के साथ काम करने को तैयार थे पर उसके विचारों से पूरी तरह सहमत नहीं थे। नेशनल गार्ड और कम्यून का नेतृत्व माक्र्सवादियों नहीं ब्लांकी और प्रूधों के अनुयायियों के हाथ में था। और दोनों परंपराओं की कमियां आड़े आ रही थीं।

18 मार्च को पेरिस से भागते समय रिपब्लिकन सरकार के पास कोई सेना नहीं थी। उस समय नेशनल गार्ड वेरसाइय तक मार्च कर जाता तो उसे छिन्न-भिन्न कर सकता था। पर प्रूधोंवादियों की गैर राजनीतिक परंपरा के कारण ‘कम्यून’ पेरिस में अच्छे-अच्छे प्रस्ताव पास करता रहा और उधर थीए फौज जुटाता रहा। जब थीए ने 2 अप्रैल को पेरिस पर बमबारी करने का आक्रामक रुख दिखाया तो कम्यून वेरसाइय पर हमले के लिए तैयार हुआ, पर बिना किसी तैयारी के। उन्होंने शत्रु को जीतने का मौका दे दिया और उन्हें ध्वस्त करना और कठिन हो गया।

उन्होंने वैसी ही गलती पेरिस में भी की। देश का सारा सोना बैंक आफ फ्रांस के तहखानों में था। कम्यून उस पर कब्जा कर के थीए को उससे वंचित कर सकता था और देश की अर्थव्यवस्था पर उसका वर्चस्व बना रह सकता था, पर कम्यून की दोनों धाराएं सम्पत्ति के अधिकारों पर इस तरह के हमले के लिए तैयार नहीं थी। इसलिए थीए के लिए चीजें आसान होती गयीं।

बुर्जुआजी का बदला

थीए ने बड़ी सेना जुटा ली। वह बाहर से बमबारी करता रहा और छोटी-मोटी टकराहटों के बाद 21 मई को उसकी फौज अंदर घुस गयी। थीए ने अगर आसान जीत की उम्मीद की थी तो उसे निराशा ही हुई। पेरिस कम्यून के मजदूर एक-एक सड़क, एक-एक मुहल्ले और एक-एक इमारत के लिए जूझे। थीए की फौजों को पश्चिम से पूरब के मजदूर इलाकों को फतह करने में पूरा एक सप्ताह लग गया।

कम्यून की पराजय के बाद हिंसा का नग्न उत्सव शुरू हुआ जिसका आधुनिक इतिहास में कोई दूसरा जवाब नहीं मिलता। बुर्जुआ अखबार ‘ल फिगारो’ ने दंभपूर्वक लिखाः पेरिस को नैतिक पक्षघात से, जिससे वह 25 वर्षों से ग्रस्त था, मुक्त करने का दूसरा ऐसा अवसर नहीं आया था और उस अवसर को वेरसाइय की फौजों ने भरपूर इस्तेमाल किया।

जिसने भी कम्यून की तरफ से लड़ाई में हिस्सा लिया था तत्काल मार दिया गया। एक हफ्ते में 1900 लोग मारे गये। औसतन हर दिन ‘आतंक’ (1793-94) के दिनों से भी अधिक लोग मारे गये। पुलिस सड़कों पर पेट्रोलिंग के दौरान किसी भी गरीब को उठा लेती, क्योंकि वह ‘कम्यूनवाला’ लगता था और 30 सेकेंड के मुकदमे के बाद उसे फांसी दे दी जाती। एक पादरी ने बताया कि 25 औरतों को फांसी दी गयी क्योंकि उन्होंने आगे बढ़ती फौजों पर उबलता पानी फेंका था। ‘लंदन टाइम्स’ की टिप्पणी थीः

….वेरसाइय की फौजें बर्बर प्रतिहिंसा के कानून के अनुसार लोगों को गोली या संगीन मार रही हैं- कैदियों, बच्चों और औरतों को फाड़ रही हैं…जहां तक हमें याद आता है इतिहास में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ…इन फौजों द्वारा किये जा रहे भयानक नरसंहार से आत्मा संतप्त है। 20,000 आज के फ्रांसीसी इतिहासकारों के अनुमान से, 30,000 के बीच लोग मारे गये। करीब 40,000 ‘कम्यूनार’ पर एक साल कैद के बाद मुकदमा चला। इनमें से 5000 को देश निकाला और अन्य 5000 को दूसरी सजाएं दी गयीं।

निष्कासित लोगों में एक थी लड़ाकू महिलाओं की नेत्री लूइज मिशेल, उसने अदालत से कहा थाः ‘मैं अपनी वकालत नहीं करूंगी, कोई नहीं करेगा। मैं पूरी तरह सामाजिक क्रांति को समर्पित हूं, अगर आपने मुझे जीने दिया तो मैं बदले का आह्वान एक पल के लिए भी नहीं रोकूंगी।’ कम्यून ने औरतों को मताधिकार उस समय के पूर्वाग्रहों के कारण नहीं दिया था पर मेहनतकश महिलाओं ने इसके बावजूद समझ लिया था कि कम्यून का दमन उनका भी दमन है।

दमन का पेरिस के मेहनतकशों पर भयानक असर हुआ। जैसा कि एलिस्तैर ओर्न ने लिखा है, ‘पेरिस का चेहरा कुछ दिनों के लिए एक खास तरह से बदल गया- आधे रंगसाज, आधे प्लंबर, आधे टाइल बिछाने वाले, मोची और दूसरे मजदूर गायब हो गये थे। मजदूरों की नई पीढ़ी उभरने में 20 साल लग गये। उन्हें दमन की याद थी पर संघर्ष का संकल्प अडिग था।

अंतिम शब्द तो माक्र्स ने ही कहा है–‘पूंजी की दुनिया के लिए यह अब तक की सबसे बड़ी चुनौती थी। पूंजी द्वारा अपने विरुद्ध पैदा किये गये वर्ग के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा भी वही थी’। उसने अपने मित्र कुगेलमान को लिखा कि कम्यून वालों ने स्वर्ग पर हमला कर दिया था और ‘एक नई शुरूआत’ कर दी थी जिसकी ‘विश्वव्यापी अर्थवत्ता है’।

(क्रिस हरमन की पुस्तक ‘विश्व का जन-इतिहास’ से साभार)
पेरिस कम्यून पर महान जन फिल्मकार ‘पीटर वाटकिंन’ ने एक शानदार फिल्म बनायी है। उसे आप यहां देख सकते हैं।

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भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू की शहादत पर डा अम्बेडकर — सुभाष गाताडे

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(जनता, 13 अप्रैल 1931)
भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरू इन तीनों को अन्ततः फांसी पर लटका दिया गया। इन तीनों पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने सान्डर्स नामक अंग्रेजी अफसर और चमनसिंह नामक सिख पुलिस अधिकारी की लाहौर में हत्या की। इसके अलावा बनारस में किसी पुलिस अधिकारी की हत्या का आरोप, असेम्ब्ली में बम फेंकने का आरोप और मौलमिया नामक गांव में एक मकान पर डकैती डाल कर वहां लूटपाट एवं मकानमालिक की हत्या करने जैसे तीन चार आरोप भी उन पर लगे। इनमें से असेम्ब्ली में बम फेंकने का आरोप भगतसिंह ने खुद कबूल किया था और इसके लिए उसे और बटुकेश्वर दत्त नामक उनके एक सहायक दोस्त को उमर कैद के तौर पर काला पानी की सज़ा सुनायी गयी। सांडर्स की हत्या भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों ने की ऐसी स्वीकारोक्ति जयगोपाल नामक भगतसिंह के दूसरे सहयोगी ने भी की थी और उसी बुनियाद पर सरकार ने भगतसिंह के खिलाफ मुकदमा कायम किया था। इस मुकदमें में तीनों ने भाग नहीं लिया था। हाईकोर्ट के तीन न्यायाधीशों के स्पेशल ट्रीब्युनल का गठन करके उनके सामने यह मुकदमा चला और उन तीनों ने इन्हें दोषी घोषित किया और उन्हें फांसी की सज़ा सुना दी। इस सज़ा पर अमल न हो और फांसी के बजाय उन्हें अधिक से अधिक काला पानी की सज़ा सुनायी जाए ऐसी गुजारिश के साथ भगतसिंह के पिता ने राजा और वायसराय के यहां दरखास्त भी दी । अनेक बड़े बड़े नेताओं ने और तमाम अन्य लोगों ने भगतसिंह को इस तरह सज़ा न दी जाए इसे लेकर सरकार से अपील भी की। गांधीजी और लॉर्ड इरविन के बीच चली आपसी चर्चाओं में भी भगतसिंह की फांसी की सज़ा का मसला अवश्य उठा होगा और लार्ड इरविन ने भले ही मैं भगतसिंह की जान बचाउंगा ऐसा ठोस वायदा गांधीजी से न किया हो, मगर लार्ड इरविन इस सन्दर्भ में पूरी कोशिश करेंगे और अपने अधिकारों के दायरे में इन तीनों की जान बचाएंगे ऐसी उम्मीद गांधीजी के भाषण से पैदा हुई थी। मगर यह सभी उम्मीदें, अनुमान और गुजारिशें गलत साबित हुई और बीते 23 मार्च को शाम 7 बजे इन तीनांे को लाहौर सेन्ट्रल जेल में फांसी दी गयी। ‘ हमारी जान बकश दें’ ऐसी दया की अपील इन तीनों में से किसी ने भी नहीं की थी; हां, फांसी की सूली पर चढ़ाने के बजाए हमें गोलियों से उड़ा दिया जाए ऐसी इच्छा भगतसिंह ने प्रगट की थी, ऐसी ख़बरें अवश्य आयी हैं। मगर उनकी इस आखरी इच्छा का भी सम्मान नहीं किया गया। न्यायाधीश के आदेश पर हुबहू अमल किया गया ! ‘अंतिम सांस तक फांसी पर लटका दें’ यही निर्णय जज ने सुनाया था। अगर गोलियों से उड़ा दिया जाता तो इस निर्णय पर शाब्दिक अमल नहीं माना जाता। न्यायदेवता के निर्णय पर बिल्कुल शाब्दिक अर्थों में हुबहू अमल किया गया और उसके कथनानुसार ही इन तीनों को शिकार बनाया गया।

यह बलिदान किसके लिए
अगर सरकार को यह उम्मीद हो कि इस घटना से ‘अंग्रेजी सरकार बिल्कुल न्यायप्रिय है – न्यायपालिका के आदेश पर हुबहू अमल करती है’ ऐसी समझदारी लोगों के बीच मजबूत होगी और सरकार की इसी ‘न्यायप्रियता’ के चलते लोग उसका समर्थन करेंगे तो यह सरकार की नादानी समझी जा सकती है। क्योंकि यह बलिदान ब्रिटिश न्यायदेवता की शोहरत को अधिक धवल और पारदर्शी बनाने के इरादे से किया गया है, इस बात पर किसी का भी यकीन नहीं है। खुद सरकार भी इसी समझदारी के आधार पर अपने आप को सन्तुष्ट नहीं कर सकती है। फिर बाकियों को भी इसी न्यायप्रियता के आवरण में वह किस तरह सन्तुष्ट कर सकती है ? न्यायदेवता की भक्ति के तौर पर नहीं बल्कि विलायत के कान्जर्वेटिव (राजनीतिक रूढिवादी) पार्टी और जनमत के डर से इस बलिदान को अंजाम दिया गया है, इस बात को सरकार के साथ साथ तमाम दुनिया भी जानती है। गांधी जैसे राजनीतिक बन्दियों को बिनाशर्त रिहा करने और गांधी खेमे से समझौता करने से ब्रिटिश साम्राज्य की बदनामी हुई है और जिसके लिए लेबर पार्टी की मौजूदा सरकार और उनके इशारे पर चलनेवाला वायसरॉय है, ऐसा शोरगुल विलायत के राजनीतिक रूढिवादी पार्टी के कुछ कटटरपंथी नेताओं ने चला रखा है। और ऐसे समय में एक अंग्रेज व्यक्ति और अधिकारी की हत्या करने का आरोप जिस पर लगा हो और वह साबित भी हो चुका हो, ऐसे राजनीतिक क्रांतिकारी अपराधी को अगर इरविन ने मुआफी दी होती तो इन राजनीतिक रूढिवादियों के हाथों बना बनाया मुददा मिल जाता। पहले से ही ब्रिेटेन में लेबर पार्टी की सरकार डांवाडोल चल रही है और उसी परिस्थिति में अगर यह मसला राजनीतिक रूढिवादियों को मिलता कि वह अंग्रेज व्यक्ति और अधिकारी के हिन्दुस्थानी हत्यारे को भी माफ करती है तो यह अच्छा बहाना वहां के राजनीतिक रूढिवादियों को मिलता और इंग्लैण्ड का लोकमत लेबर पार्टी के खिलाफ बनाने में उन्हें सहूलियत प्रदान होती। इस संकट से बचने के लिए और रूढिवादियों के गुस्से की आग न भड़के इसलिए फांसी की इन सज़ा को अंजाम दिया गया है। यह कदम ब्रिटिश न्यायपालिका को खुश करने के लिए नहीं बल्कि ब्रिटिश लोकमत को खुश करने के लिए उठाया गया है। अगर निजी तौर पर यह मामला लार्ड इरविन की पसंदगी -नापसंदगी से जुड़ा होता तो उन्होंने अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके फांसी की सज़ा रदद करके उसके स्थान पर उमर कैद की सज़ा भगत सिंह आदि को सुनायी होती। विलायत की लेबर पार्टी के मंत्रिमंडल ने भी लार्ड इरविन को इसके लिए समर्थन प्रदान किया होता, गांधी इरविन करार के बहाने से इसे अंजाम देकर भारत के जनमत को राजी करना जरूरी था। जाते जाते लार्ड इरविन भी जनता का दिल जीत लेते। मगर इंग्लेण्ड की अपने रूढिवादी बिरादरों और यहां के उसी मनोव्रत्ती की नौकरशाही के गुस्से का वह शिकार होते। इसलिए जनमत की पर्वा किए बगैर लार्ड इरविन की सरकार ने भगतसिंह आदि को फांसी पर चढ़ा दिया और वह भी कराची कांग्रेस के तीन चार दिन पहले। गांधी-इरविन करार को मटियामेट करने व समझौते की गांधी की कोशिशों को विफल करने के लिए भगतसिंह को फांसी और फांसी के लिए मुकरर किया समय , यह दोनों बातें काफी थी। अगर इस समझौते को समाप्त करने का ही इरादा लार्ड इरविन सरकार का था तो इस कार्रवाई के अलावा और कोई मजबूत मसला उसे ढंूढने से भी नहीं मिलता। इस नज़रिये से भी देखें तो गांधीजी के कथनानुसार सरकार ने यह बड़ी भूल /ब्लंडर/ की है, यह कहना अनुचित नहीं होगा। लुब्बेलुआब यही कि जनमत की परवाह किए बगैर, गांधी-इरविन समझौते का क्या होगा इसकी चिन्ता किए बिना विलायत के रूढिवादियों के गुस्से का शिकार होने से अपने आप को बचाने के लिए, भगतसिंह आदि को बली चढ़ाया गया यह बात अब छिप नहीं सकेगी यह बात सरकार को पक्के तौर पर मान लेनी चाहिए। ..
(प्रस्तुत अंश ‘डा बाबासाहेब अम्बेडकर, एम ए, पीएचडी, डीएससी, बार-एट-लॉ’ की अगुआई में निकलनेवाले पाक्षिक अख़बार ‘जनता’’ से लिया गया है। मालूम हो कि जनता पाक्षिक का पहला अंक 24 नवम्बर 1930 को प्रकाशित हुआ था। लगातार बाईस अंकों के प्रकाशन के बाद 23 वां और 24 वां अंक ‘संयुक्तांक’ के तौर पर प्रकाशित हुआ। बाद में ‘जनता’ को साप्ताहिक मंे रूपांतरित किया गया। ‘मूकनायक,’ ‘बहिष्कृत भारत’, ‘समता’ ऐसी यात्रा पूरी करके अम्बेडकरी अख़बारी आन्दोलन की यात्रा ‘जनता’ तक पहुंची थी।)
[http://kafila.org से साभार]

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‘Engels was Right: Early Human Kinship was Matrilineal’ by Chris Knight

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In 2008, the Royal Anthropological Institute published a scholarly volume entitled Early Human Kinship.[1] It stemmed from a 2005 workshop held in Gregynog, Wales, as part of the prestigious British Academy Centenary Project ‘From Lucy to Language: The Archaeology of the Human Brain’.

It’s common knowledge among anthropologists – part of our origins myth – that Frederick Engels published an influential essay on world prehistory, The Origin of the Family Private Property and the State, shortly after the death of his friend Karl Marx[2]. Engels argued that kinship was originally matrilineal. In association with matrilineal descent, Engels continued, every child was raised not just by its parents alone but by the whole clan.

In the early years of the twentieth century, especially following the Russian revolution, these ideas became associated with ‘Bolshevism’ and deemed so inflammatory that, outside the Soviet Union, they were effectively suppressed. As politicians and clerics railed against the threat to ‘marriage and the family’, their counterparts in the universities re-established anthropology on a completely new footing, defining it in opposition to Darwinism on the one hand, Marxism on the other.[3]

To my knowledge, that workshop in Gregynog was the first time for something like a hundred years that professional anthropologists had summoned up the courage to re-open these debates. In my talk and eventually published chapter, I argued quite bluntly that Engels was essentially right: we now have compelling evidence that early human kinship was indeed matrilineal.[4] To my delight and astonishment, most of my professional colleagues participating in the Gregynog workshop tended to agree.

But why did we have to wait so long? Why, for the best part of a century, were academics barred from even debating questions of this kind? To explain that, we must take a step back into history.

In the immediate aftermath of World War I, anthropology in Britain and America became established for the first time as a professional discipline. This new discipline was set up with a political mandate: to overturn the materialist paradigm established in the pre-war period by Lewis Morgan, Frederick Engels and Karl Marx. In particular, the mission of the new anthropology was to debunk the theory – until then accepted by almost everyone – that the primordial human social institution had been not the individual family but the matrilineal clan. The last prominent exponent of the ‘matrilineal group motherhood’ theory of human origins was Robert Briffault, who published his encyclopaedic three-volume work, The Mothers, in 1927. As it turned out, Briffault’s monumental effort – nowadays comprehensively forgotten – was the final gasp of the Morgan-Engels paradigm. It served as a red rag to a bull. The principal founder of the new professional discipline of anthropology – the LSE’s Bronislaw Malinowski – responded as if personally affronted. Group motherhood, he declared, is not only a false but a dangerous idea. Society was, is and will always remain founded on individual marriage and the family.[5]

Most Marxists today prefer to ignore this whole controversy, regarding it as somewhat embarrassing. After all, didn’t Engels celebrate not only communism in general but sexual communism in particular? Didn’t he talk about group motherhood and primitive matriarchy? That kind of nonsense can’t possibly be right. Why should today’s Marxists feel committed to the details of Engels’ lurid speculations – when these in turn were based on conjectures by Lewis Morgan which everyone now knows to be wrong?

MARX AND ENGELS IN THEIR OWN WORDS

Since Engels’ actual words are today scarcely remembered, let me begin with a direct quotation. In the following passage, Engels celebrates Morgan’s ‘rediscovery of the original mother-right clan’:

‘The rediscovery of the original mother-right clan has the same significance for the history of primitive society as evolution has for biology and Marx’s theory of surplus value has for political economy. It enabled Morgan to outline for the first time the history of the family. Clearly this opens a new era in the treatment of primitive societies.’[6]

Engels went on to describe ‘the mother-right clan’ as ‘the pivot around which the entire science turns.’

Engels based his ideas not simply on Lewis Morgan. An equally important source was Marx’s early notes. In 1844, he and the young Marx had declared that ‘the immediate, natural and necessary relationship of human being to human being is the relationship of man to woman’, adding: ‘From this relationship the whole cultural level of man can be judged’.[7]

When Marx discovered Morgan’s work, he took it as confirmation of his own youthful ideas. In The German Ideology, Marx and Engels had contrasted primitive communism with the subsequent emergence of property, ‘the nucleus, the first form of which lies in the family, where wife and children are the slaves of the husband’.[8] Engels’ ideas in The Origin of the Family didn’t come out of the blue. He based them on a lifetime of collaborative intellectual work with Marx, much of which had never been published or completed.

According to Morgan, the domestication of cattle disempowered women, breaking up their earlier sisterhood. Previously, women had cared for their children within a co-operative framework, sharing the burdens with their mother and other female relatives. One down-to-earth traditional custom made this possible. Throughout her life, a woman remained living in the same household with her mother and siblings. Children would be raised by a confederacy of mothers, daughters and sisters, backed up by male kin and possessing sufficient solidarity and authority to prevent any husband from taking them away or breaking them apart. A certain loose kind of ‘marriage’ was consistent with these arrangements, but in-marrying spouses had to agree to visit their brides within these women’s communal home. No woman could be privatised by her spouse or taken away.

According to Morgan, this arrangement – known technically as ‘matrilocal residence’ – originally prevailed in all human societies across the world. So what happened to change such time-honoured arrangements? According to Morgan, the key factor was the domestication of animals, notably cattle. A man possessing a herd could bargain with his future bride’s kinsfolk, allowing them to keep his cows in exchange for their daughter, whom he could now take away. Under the previous matrilocal system, his bride would have been free to remain with her natal family, benefitting from shared childcare, the children’s father being considered just a visitor. The introduction of cattle triggered a general shift from matrilocal to patrilocal residence. This change ‘reversed the position of the wife and the mother in the household’. Morgan explains:

‘She was of a different clan to her children: she had been pulled away to live with her husband. As well as being a different clan from her husband, she was isolated from her kin in the separate and exclusive house of her husband. Her new condition tended to subvert and destroy the power and influence which descent from the female line that the joint tenement houses had created.’[9]

Engels added political impact to all this: ‘The man took command in the home also; the woman was degraded and reduced to servitude; she became the slave of his lust and a mere instrument for the production of children.’[10] He continued: ‘The first class opposition that appears in history coincides with the development of the antagonism between man and woman in monogamous marriage, and the first class oppression coincides with that of the female sex by the male.’[11]

THE IGNOMINIOUS COLLAPSE

That is the theory, which few Marxists these days defend. From the moment of Malinowski’s onslaught during the 1920s, western Marxism began caving in. Soviet official communism paid lip service to the theory, perhaps mentioning it here and there, but did nothing to develop or advance it. Meanwhile, left-leaning intellectuals in the western world abandoned the paradigm wholesale. The consequences remain with us to this day. Go up to any ordinary member of today’s Socialist Party, Socialist Workers’ Party, Workers’ Liberty Alliance or whatever. Ask whether they defend Engels on the matrilineal clan. They won’t know what to say.

Of course, it could be that Engels was wrong. Maybe the whole theory of matrilineal priority was just a mistake. Maybe Morgan himself got it wrong. Perhaps he was over- influenced by the fact that he underwent an initiation ceremony conducted by Iroquois Indians, whose traditions had been strongly matrilineal. Possibly he just extrapolated from Iroquois tradition or even myth, incorrectly projecting what he was told onto human history as a whole. If Morgan got it wrong, then as Marxists we must put science first, abandoning outdated nineteenth century dogma.

But you might have expected the left intellectuals to probe a little. Shouldn’t they have asked questions about this sudden reversal in anthropology? Virtually all prominent thinkers in the 1880s and 1890s had accepted one or another aspect of Morgan’s theory. Well into the twentieth century, intellectual giants such as Emile Durkheim and Sigmund Freud continued to accept Morgan on the question of the matrilineal clan. Then, just after World War I, the new discipline of anthropology in the universities suddenly did an about-turn. Might we not have expected that Marxists – of all people – would be slightly suspicious of that? Mightn’t they have suspected an element of politics behind such a change? I find it quite staggering that out of all the New Left Review types, all the Althusserians, all the postmodernists, all those fashionable intellectuals who called themselves Marxists, not one sought to fight back. To this day, no one seems to have bothered to ask even the most basic question: What actual evidence is there that Morgan and Engels got everything so wrong?

As we review the historical evidence, it becomes clear that political passions were never far beneath the surface and ultimately played the decisive role. With regard to the topic of ‘primitive promiscuity’, Engels commented: ‘It has become the fashion of late to deny the existence of this initial stage in the sexual life of mankind. The aim is to spare humanity this “shame”’.[12] The reference here was to Edward Westermarck, scholarly defender of individual marriage and the family who was later to inspire the young Malinowski. Westermarck had chosen to turn public opinion against the theory of ‘primitive promiscuity’ by associating it with modern prostitution. To this, Engels retorted: ‘To me it rather seems that all understanding of primitive conditions remains impossible so long as we regard them through brothel spectacles’.[13]

Once Engels had incorporated Morgan’s findings into the socialist canon, however, no one could write neutrally on such topics any more. Morgan’s Ancient Society, as the American ethnographer Robert Lowie was later to comment,

‘attracted the notice of Marx and Engels, who accepted and popularised its evolutionary doctrines as being in harmony with their own philosophy. As a result it was promptly translated into various European tongues, and German workingmen would sometimes reveal an uncanny familiarity with the Hawaiian and Iroquois mode of designating kin, matters not obviously connected with a proletarian revolution’.[14]

Once Engels had endorsed it, Morgan’s theory was destined to become a casualty of the central conflict of the age. Social anthropologists may like to imagine that their discipline became shaped in its modern form quite independently of Marxism. It would be more accurate to describe it as moulded specifically in reaction against the ideas of Engels and Marx. ‘With Morgan’s scheme incorporated into Communist doctrine’, observes Marvin Harris, ‘the struggling science of anthropology crossed the threshold of the twentieth century with a clear mandate for its own survival and well-being: expose Morgan’s scheme and destroy the method on which it was based’.[15]

A widespread consensus developed on both sides of the Atlantic that regardless of the intellectual merit of Morgan’s ideas, ‘group motherhood’ was in any event too dangerous a concept to be allowed. A radio broadcast by Malinowski revealed his state of mind:

‘A whole school of anthropologists, from Bachofen on, have maintained that the maternal clan was the primitive domestic institution…. In my opinion, as you know, this is entirely incorrect. But an idea like that, once it is taken seriously and applied to modern conditions, becomes positively dangerous. I believe that the most disruptive element in the modern revolutionary tendencies is the idea that parenthood can be made collective. If once we came to the point of doing away with the individual family as the pivotal element of our society, we should be faced with a social catastrophe compared with which the political upheaval of the French revolution and the economic changes of Bolshevism are insignificant. The question, therefore, as to whether group motherhood is an institution which ever existed, whether it is an arrangement which is compatible with human nature and social order, is of considerable practical interest’.[16]

While denouncing ‘ideology’, Malinowski nonetheless saw it as his scholarly duty to ‘prove to the best of my ability that marriage and the family have been, are, and will remain the foundations of human society’.[17] He insisted that ‘marriage in single pairs – monogamy in the sense in which Westermarck and I are using it – is primeval’.[18] It’s worth remembering here that the Finnish historian of marriage attributed ‘marriage in single pairs’ equally to chimpanzees and gorillas, believing human marriage to have been inherited from a primate precursor.

Malinowski’s assertion that ‘monogamy’ must be ‘primeval’ fits uneasily with declarations such as the following: ‘I would rather discountenance any speculation about the ‘origins’ of marriage or anything else than contribute to them even indirectly….’[19] Notable here is Malinowski’s tactic of dissociating himself from evolutionary research while specifying his opinion as to the ‘initial situation’ for human kinship. Throughout much of the twentieth century, as Adam Kuper records, the strategy of smuggling in assumptions about ‘origins’ and ‘initial situations’ without having to justify them proved popular among anthropologists of virtually every school.[20]

THE KWAKIUTL INDIANS
In the United States, Franz Boas initially accepted the Bachofen-Morgan scheme according to which descent systems invariably underwent historical change from matriliny to patriliny and not the reverse. In support of this was a ‘complete lack of historically attested, or even inferentially probable, cases of a direct transition from patrilineal to matrilineal descent’.[21] Boas later came to believe, however, that he might discredit Morgan if he could find a single exception.

On Vancouver Island, the Kwakiutl Indians were organised in groups known as numaym, which Boas translated initially as ‘clan’ or ‘gens’. He explained that there was no consistent rule of descent: ‘The child does not belong by birth to the gens of his father or mother, but may be made a member of any gens to which his father, mother, grandparents, or great-grandparents belonged’.[22] Six years later, however, Boas changed his mind, attributing to the numaym now ‘a purely female law of descent’, albeit one secured ‘only through the medium of the husband’.[23] However, anything short of a purely patrilineal system switching to a purely matrilineal one might still have allowed Morgan’s evolutionist scheme to survive. Boas duly supplied the requisite categorical formulations. Although the Kwakiutl had today ‘a purely female law of descent’, he now proclaimed, the ‘organization must have been at one time a purely paternal one’.[24] For the very first time, a unilineal descent system had been found changing in the reverse direction from that stipulated by Morgan.

The loyalty of Robert Lowie to his great friend and teacher, Franz Boas, could hardly be in doubt. In 1914, however, even this ardent disciple admitted that the Vancouver Island data had been stretched to fit the case. Although ‘the Kwakiutl facts are very interesting’, as he put it, ‘it is highly doubtful whether they have the theoretical significance ascribed to them’.[25] Most awkward was the fact that the Kwakiutl numaym groupings central to Boas’ entire argument were not unilineal descent groups at all. Neither ‘matriliny’ nor ‘patriliny’ were applicable concepts. ‘For these reasons,’ as Lowie put it, ‘the Kwakiutl conditions do not seem to furnish a favorable test case.’ However, such scholarly reservations did nothing to stop Boas or his students from continuing to disseminate the myth. The ‘extreme interest in Boas’ handling of the numaym’, as the historian Marvin Harris comments in his analysis of the whole shameful episode,

‘stems from the fashion in which he and his students seized upon this case to destroy the supposed universal tendency for patrilineality to follow matrilineality and at the same time to discredit the entire historical determinist position. On the basis of this one drastically deficient case, there gradually diffused out of Schermerhorn Hall at Columbia, through lecture, word of mouth, article and text, the unquestioned dogma that Boas had proved that it was just as likely that patrilineality succeeded matrilineality as the reverse’.[26]

‘THE MOTHER’S BROTHER’
Meanwhile across the Atlantic, A. R. Radcliffe-Brown intervened with his celebrated article entitled ‘The mother’s brother in South Africa’.[27] It was this intervention which by general consent – at least among British structural-functionalist anthropologists – buried once and for all the evolutionist theory that the mother’s brother relationship in patrilineal societies was a survival left over from an earlier matrilineal stage. Radcliffe-Brown’s specific target was a comprehensive monograph on the Thonga of Mozambique.[28] The following features seemed to require explanation:

• Although inheriting clan membership from their father, Thonga children on being weaned went to live in their mother’s brother’s village.
• A man without patrilineal heirs could require a sister to remain in his settlement, her male offspring continuing his lineage.
• Even when a man did have patrilineal heirs, his sisters’ sons could claim items from his own estate.
• The maternal uncle had a share in the bride price received for a sister’s daughter.
• The maternal uncle and not the father officiated at the sacrifices in a young man’s life-crisis ceremonies.

Henri Junod himself had interpreted these features as clear evidence that the Thonga were not straightforwardly patrilineal but were embroiled in a difficult and sometimes contradictory process of transition from matrilineal to patrilineal descent. For Radcliffe-Brown, it was axiomatic that any such ‘pseudo-history’ had to be repudiated. The various components of a social system should instead be explained in structural-functionalist terms – that is, by invoking fixed laws on the model of physics and chemistry.

He now proposed his celebrated structural functionalist explanation. The involvement of the mother’s brother in the upbringing of a Thonga (or Tsonga) boy has nothing whatsoever to do with past or present matrilineal descent. It’s just an expression of a fixed and invariant sociological principle – the principle of ‘the equivalence of siblings’. Since a woman and her brother are equivalents, any human child’s feelings toward its mother will naturally tend to include to her brother as well. Radcliffe-Brown termed this universal psychic mechanism ‘the extension of sentiments’, concluding after a few further observations that everything was now satisfactorily explained.

With the benefit of hindsight, what are we to make of this short essay? Let me begin by recalling some fundamentals of matrilineal versus patrilineal descent. Underlying everything is the fact that the alternatives, for any woman, involve a choice. To put her brother first in her children’s lives is to put her husband second; conversely, if she puts her husband first, her brother must come second. It really is as simple as that: you can either have brother-sister unity as the fundamental principle or else you can have husband-wife unity, but you cannot have both at the same time.

From this it follows that brother-sister unity cannot possibly be ‘a universal sociological principle’. Matriliny presupposes brother-sister unity; patriliny entails just the opposite. In its pure form, it requires men to let go of their sisters, instead monitoring the fidelity of their wives. Where the husband’s rights prevail, the wife to that extent yields control over her fertility to him and his kin, weakening her bond with her brother, enhancing paternity certainty and thereby favouring patrilineal descent.

Let us suppose, however, that after marriage, a woman chooses to remain with her brother. This can only be at the expense of her bond with her husband – reducing paternity certainty and hence favouring matrilineal descent. To sum up: the very factor invoked by Radcliffe-Brown as an alternative to the matrilineal complex – namely, brother-sister solidarity – turns out to be a covariant feature of that complex itself. To invoke ‘brother-sister unity’ as an explanation for the mother’s brother relationship is no more than to invoke an aspect of the matrilineal complex while concealing it under another name.

The renowned comparative anthropologist G. P. Murdock long ago poured scorn on Radcliffe-Brown’s whole approach:

‘In the first place, the alleged principles are mere verbalizations reified into causal forces. In the second, such concepts as ‘equivalence of brothers’ and ‘necessity for social integration’ contain no statements of the relationships between phenomena under varying conditions, and thus lie at the opposite extreme from genuine scientific laws.’[29]

Exactly so.

Ironically, Murdock’s subsequent historical research on the Thonga confirmed that they were indeed in the throes of transition from matriliny to patriliny just as Junod had originally claimed.[30] In conformity with Morgan’s scheme, the rise of alienable property – typically cattle – is the crucial factor cementing marital bonds at the expense of brother-sister solidarity throughout much of sub-Saharan Africa. As everyone now agrees, ‘the cow is the enemy of matriliny’.[31] Following Murdock’s cross-cultural comparative work, a recent phylogenetically controlled analysis has confirmed a negative correlation between African matriliny and cattle-owning.[32] In their most recent analysis of matriliny as daughter-biased investment, the researchers comment: ‘the two factors Morgan identified, heritable wealth and paternity uncertainty, remain central to our understanding of variation in matriliny and patriliny in human social organisation’.[33] I should emphasise that this isn’t controversial. Among anthropologists who specialise in such topics, it’s the consensual position.

HUMAN ORIGINS

Despite this, when scholars turn to ultimate origins, thy tend to return to the old stereotypes. Most continue to invoke paternity certainty as key to the process leading from Plio-Pleistocene hominin to modern Homo sapiens.

In typical versions of the story, paternal investment is linked directly to the sexual division of labour, food sharing, lengthy juvenile dependency, ovulation concealment and continuous female sexual receptivity. The idea is that since the human female produces such unusually helpless and dependent offspring, she needs a man to provide long-term pair-bonding commitment and support. The catch is that no man should enter such a contract unless confident that his partner will be faithful to him in return. ‘In evolutionary terms’, as Terrence Deacon puts it, ‘a male who tends to invest significant time and energy in caring for and providing food for an infant must have a high probability of being its father; otherwise his expenditure of time and energy will benefit the genes of another male’.[34]

Dating from the 1960s and 1970s, this scenario has become in effect the Standard Model of Human Evolution. Textbooks on human evolution go so far as to impute monogamy to Homo erectus:

‘Females may have had difficulty providing food for themselves and their dependent young. If [i]H. erectus hunted regularly, males might have been able to provide high-quality food for their mates and offspring. Monogamy would have increased the males’ confidence of paternity and favored paternal investment.’[35][/i]

Evolutionary psychologist Steven Pinker uses the same idea to explain why the sexual double standard is natural and inevitable:

‘Sexual jealousy is found in all cultures…. In most societies, some women readily share a husband, but in no society do men readily share a wife. A woman having sex with another man is always a threat to the man’s genetic interests, because it might fool him into working for a competitor’s genes’.[36]

In response to such dogmatic statements, Stephen Beckerman and Paul Valentine have assembled counter-evidence from a substantial number of lowland South American societies. In their book, Cultures of Multiple Fathers, they demonstrate how – in direct refutation of Pinker – the paternity of a woman’s baby becomes partitioned among multiple males. They quote this passage from a classical account of the Xocleng (previously Kaingang):

‘Klendó’s daughter, Pathó, is my child’, said Vomblé. ‘How do you know,’ said I, ‘since Klendó also lay with her mother?’ ‘Well, when two men lie with a woman they just call her child their child.’ But not only do men feel that their mistress’s children are their children, but people whose mothers have had intercourse with the same man, whether as lover or husband, regard one another as siblings’. [37]

If such ‘partible paternity’ (as the authors term it) were found in only a tribe or two, it could perhaps be dismissed as an aberration. However, the institution is widely distributed across Lowland South America and found among peoples whose traditions diverged millennia ago – as evidenced by the fact that they live thousands of kilometres apart, speak unrelated languages, and show no indication of having been in contact for centuries. The authors continue:

‘It is difficult to come to any conclusion except that partible paternity is an ancient folk belief capable of supporting effective families, families that provide satisfactory paternal care of children and manage the successful rearing of children to adulthood. The distributional evidence argues that it is possible to build a biologically and socially competent society – a society whose members do a perfectly adequate job of reproducing themselves and their social relations – with a culture that incorporates a belief in partible paternity.’[38]

Not only is the belief compatible with successful reproduction. It may even help babies to survive. Among the hunting and gathering Aché, children with one extra father are significantly more likely to reach maturity,[39] a correlation confirmed by a longitudinal statistical study among the Barí.[40]

Can a woman really help her baby by taking extra lovers during pregnancy? The answer seems to be yes. The explanation is probably that additional fathers contribute additional provisions and more protection against infanticide. It is not in a woman’s interests to encourage the men in her life to engage in contests over biological paternity. From a woman’s standpoint, the truth is that her current husband may become injured, die or abandon her. In any event, she may have good reason to switch to a new man. If her new mate suspects that he is not this or that child’s father, her existing offspring might suffer infanticide or abuse. Loss of a wanted child is enormously costly to any human mother, making it best not to divulge but precisely to confuse accurate paternity information, taking extra lovers to distribute illusions among multiple males.

Whether these males contest or collude depends on the balance of costs and benefits involved. Where males strive to contest paternity, females may have an interest in driving up the costs. Beckerman and Valentine view the range of variation as reflecting ‘a competition between men and women over whose reproductive strategies will dominate social life’. In small-scale egalitarian societies, they continue,

‘women’s reproductive interests are best served if mate choice is a non-binding, female decision; if there is a network of multiple females to aid or substitute for a woman in mothering responsibilities; if male support for a woman and her children comes from multiple men; and if a woman is shielded from the effects of male sexual jealousy. Male reproductive interests, contrariwise, are best served by male control over female sexual behavior, promoting paternity certainty and elevated reproductive success for the more powerful males. This profile implies that men choose their own or their sons’ wives, and their daughters’ husbands; that marriage is a lifetime commitment and extra-marital affairs by women are severely sanctioned; and that this state of affairs is maintained by disallowing women reliable female support networks, or male support other than that of the husband and his primary male consanguines.’[41]

In humans as in other sexually reproducing species, neither sex is likely to succeed in imposing its strategies to the exclusion of those of the opposite sex.[42] Yet there are situations that may give the edge to one side or the other. In the human case, when male strategies dominate, patrilineal descent and patrilocal residence are the order of the day, with female autonomy correspondingly curtailed. However, as Beckerman and Valentine explain, the reverse outcome must be recognized if we are to grasp the parameters:

‘Where women clearly have the upper hand, uxorilocal [matrilocal] residence predominates; women’s husbands are often chosen for them by their mothers, or they choose their own husbands; when a woman’s husband dies, his children tend to be brought up by their mother, her brothers, and her new husband; women have broad sexual freedom both before and after marriage; the idea of partible paternity is prominent, with women having wide latitude in choosing the secondary fathers of their children; women usually make no secret of the identity of these secondary fathers; and the ideology of partible paternity defuses to some extent potential conflicts between male rivals – antagonisms that are seldom helpful to a woman’s reproductive interests in the long run’.[43]

ENGELS RE-VISITED?

Beckerman and Valentine are Darwinian anthropologists who can hardly be accused of having Marxist sympathies. But I cannot help thinking that if Engels were alive, he might have been encouraged by their results. Here, for the record, is Engels on the subject of male sexual jealousy in evolutionary perspective:

‘….animal societies have, to be sure, a certain value in drawing conclusions regarding human societies – but only in a negative sense. As far as we have ascertained, the higher vertebrates know only two forms of the family: polygamy or the single pair. In both cases only one adult male, only one husband is permissible. The jealousy of the male, representing both tie and limits of the family, brings the animal family into conflict with the horde. The horde, the higher social form, is rendered impossible here, loosened there, or dissolved altogether during the mating season; at best, its continued development is hindered by the jealousy of the male. This alone suffices to prove that the animal family and primitive human society are incompatible things; that primitive man, working his way up out of the animal stage, either knew no family whatsoever, or at the most knew a family that is nonexistent among animals’.[44]

Engels accepts that a male gorilla might strive to hold on to any females it has succeeded in acquiring. But applied to the human case, mothers would then be denied access to any but the most isolated and intolerant males. The point stressed by Engels is that only a decisive social breakthrough could have solved this problem:

‘For evolution out of the animal stage, for the accomplishment of the greatest advance known to nature, an additional element was needed: the replacement of the individual’s inadequate power of defence by the united strength and joint effort of the horde.… Mutual toleration among the adult males, freedom from jealousy, was…. the first condition for the building of those large and enduring groups in the midst of which alone the transition from animal to man could be achieved. And indeed, what do we find as the oldest, most primitive form of the family, of which undeniable evidence can be found in history, and which even today can be studied here and there? Group marriage, the form in which whole groups of men and whole groups of women belong to one another, and which leaves but little scope for jealousy’.

As I have argued elsewhere[45][46][47], not all of Engels’ revolutionary speculations look out of place today.

ENGELS WAS RIGHT

Embarrassingly for proponents of the patrilocal band model, genetic data on sub-Saharan African hunter-gatherers indicates a long-term historical preference for matrilocal residence. Studies of mitochondrial versus Y-chromosomal dispersal patterns show that over thousands of years, hunter-gatherer women across this vast region have tended to reside close to their mothers following marriage, migration rates for women being lower than those for men.[47]

A census among the Hadza – bow-and-arrow hunters of Tanzania – showed 68 per cent of married women whose mothers were alive residing with them in the same camp.[48] ‘Across all societies’, concludes the major specialist on this topic, ‘the greater the dependence on gathering, hunting, and fishing, the less likely that residence is virilocal [patrilocal]’.[49] Hunting has the strongest effect and, contrary to proponents of the standard model, results in less patrilocality, not more.[50]

A study conducted in 2004 reviewed the evidence behind the standard doctrine that patrilocality is the hunter-gatherer norm. Most of the widely used classifications turn out to have been based on totally inadequate data and ignore insightful discussions that took place in early anthropology. The few ethnographies in which camp data are available show that individuals use a variety of kin and other links to decide where to live, the only discernible statistical bias being in favour of mother-daughter interdependence and proximity.[51]

An important finding is that choices vary at different stages of life. A husband who has already helped provision a child might then be trusted sufficiently for his wife to agree to move with him to his natal camp. But this shouldn’t obscure the fact that residence among hunter-gatherers is matrilocal at first. Whether in Australia, Africa or the Americas, a young hunter-gatherer bridegroom is obliged to visit his bride while she remains in her own camp, working strenuously for her as he surrenders to her kinsfolk whatever game he catches. This, after all, is the essence of ‘bride-service’ – the fundamental economic institution in any hunter-gatherer society.

To maximise incoming provisions, the young hunter’s in-laws will strive to keep him under close supervision and control. It therefore comes as little surprise to find that cross culturally, males contribute less when they can take their bride back to their own camp, more when they are obliged to visit their bride who remains living among her own kin.[52] Females, then, obtain the best deal when they remain following marriage with close kin.

On what grounds can it be claimed that this residence pattern characterized early human kinship? According to the ‘grandmother’ hypothesis,[53][54][55] the selective advantage of distinctively human postmenopausal lifespans is that it enabled older women to assist their adult children in caring for and provisioning grandchildren. In genetic terms, a woman can never be as certain of her son’s offspring as she can of her daughter’s. For grandmothers to invest preferentially in their descendants through sons, therefore, would not be an evolutionarily stable strategy. It comes as little surprise, therefore, that a recent analysis of 213 Hadza camp compositions found that a woman over 45 with grown children is more likely to be in camp with her daughter than with her son, more likely to be with her daughter if that daughter has children under age 7 years and more likely to be with her daughter if that daughter is suckling a baby.[56]
Of course, advocates of the patrilocal band model might counter that grandmothers could somehow find ways to encourage or enforce fidelity in their sons’ wives. But unless they can explain how certainty of paternity could have equalled or exceeded certainty of maternity during the evolution of postmenopausal lifespans, we must conclude that the grandmothering hypothesis tips the scales decisively in favour of matrilocal residence and matrilineal descent.[57]

Turning to the emergence of modern Homo sapiens, it is now widely accepted that our species evolved recently in Africa. From about half a million years ago, brain size began increasing exponentially.[58][59] An infant with an outsized brain imposes heavy burdens on pregnant and nursing mothers.[60] If Homo sapiens mothers proved able to afford to raise such extraordinarily slow maturing, ultra-dependent offspring, this fact alone testifies to the success of their alliance-building and reproductive strategies.
The question arises: what new source of energy were they exploiting? The spare provisioning capacities of the evolving human male might in principle have been available for exploitation by females, but it is important to recognize the difficulties. It is unknown for a non-human primate male to systematically provision a pregnant or nursing female. In the case of chimpanzees, adult males are interested mainly in females who are displaying an oestrus swelling – i.e. those neither pregnant nor nursing. Where a female is nursing an infant, there is some danger that local males who feel suspicion regarding the paternity of that infant may attempt to kill and eat it.[61][62] The effects of primate male infanticide on female fitness and on population size and viability are for obvious reasons not positive.[63][64]

Where male reproductive differentials and corresponding levels of intra-male conflict are high, nursing mothers must divert scarce energy and resources away from direct offspring care into fighting off harassment and guarding against infanticide. A primate or hominin population whose females had to cope with such behaviour might head toward extinction, even as a minority of its males achieved short-term reproductive success.

But the converse equally applies. According to current models, the ancestors of extant humans comprised a small population dwelling somewhere in sub-Saharan Africa. Although disagreements abound, genetic studies indicate that their population size at one point may have resembled that of a modern endangered species, possibly no more numerous than today’s mountain gorillas. What happened next was extraordinary. The population exploded, Homo sapiens soon colonising the globe.[65]

Population expansion on such a scale is inconsistent with mothers having to put up with infanticide, harassment or the unaffordable costs of male philandering and double standards. If unusually large numbers of unusually large-brained offspring were being successfully raised to maturity, the quality of childcare must have been exceptional.

We know what the optimal solution would have been. There can be no doubt that mothers would have done best by cooperatively resisting male sexual control, relying for protection on supportive male and female kin, motivating multiple suitors to work hard for them – and taking advantage of every available childcare resource. For those conditions to be met, early human kinship needed to be matrilineal.
https://libcom.org/ से साभार

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व्यक्ति का ‘राष्ट्रद्रोह’ बनाम राष्ट्र का ‘देशद्रोह’

Guernica, 1937 by Pablo Picasso

Guernica, 1937 by Pablo Picasso

अंग्रेजों के समय में जब ‘तिलक’ को राष्ट्रद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो उन्होने कोर्ट में बयान देते हुए यह सवाल उठाया कि यदि व्यक्ति राष्ट्रद्रोह करे तो उसके लिए कानून (124 ए) है और सजा का प्रावधान है। लेकिन यदि राष्ट्र खुद अपनी जनता के खिलाफ देशद्रोह करे तो उसके लिए कौन सा कानून है और उसकी क्या सजा है।
‘जेएनयू’ के ताजा घटनाक्रम में देखे तो आज भी तिलक का यह सवाल उतना ही मौजूं है जितना कि उस समय था।
संयोग से जिस समय जेएनयू के छात्रों पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दायर किया गया है ठीक उसी समय उस महत्वपूर्ण घटना के ठीक 50 साल हो रहे है जब एक राष्ट्र ने अपनी ही जनता के साथ भयानक देशद्रोह किया था।
आज से ठीक 50 साल पहले 5 मार्च 1966 को भारतीय वायुसेना के विमानों ने आज के मिजोरम के खूबसूरत पहाड़ी शहर आइजल (Aizawl) पर बिना चेतावनी भयानक बमबारी शुरु कर दी। यह बमबारी 13 मार्च तक लगातार चलती रही जब तक कि खूबसूरत आइजल शहर पूरी तरह बर्बाद नही हो गया। इसमें कितने नागरिक मारे गये, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा आज मौजूद नही है। यह बमबारी की गयी थी ‘मिजो नेशनल फ्रन्ट’ की बगावत को कुचलने के नाम पर। लेकिन भारत सरकार ने आज तक इस बात को नहीं स्वीकार किया है कि उसने अपनी ही जनता पर बम बरसाये हैं। इंडियन एक्सप्रेस के संपादक ‘शेखर गुप्ता’ ने इस पर एक लेख भी लिखा है और बम बरसाने वाले दो पायलटों के नाम भी उजागर किया है। आपको जानकर शायद आश्चर्य हो कि ये दो नाम हैं- राजेश पायलट और सुरेश कलमाडी।
जब नार्थईस्ट के पत्रकारों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री ‘इंदिरा गांधी’ से इस सन्दर्भ में सवाल पूछे तो इंदिरा गांधी ने कहा कि विमानों से जनता को ‘फूड पैकेट्स’ गिराये गये थे। (उस समय मिजोरम में भयानक अकाल पड़ा था और ‘मिजो नेशनल फ्रन्ट’ की बगावत का तात्कालिक कारण यह अकाल ही था। क्योकि सरकार ने उनकी डेढ़ लाख की मामूली मांग को भी ठुकरा दिया था।) बाद में इंदिरा गांधी के इस बयान पर असम असेम्बली (तब मिजोरम असम का ही हिस्सा था) में एक विधायक ने व्यंग्य किया कि बम के खोखो को दिल्ली भेजा जाय और उनसे पूछा जाय कि इसे कैसे खाया जाता है।
इसके बाद जो हुआ वह और भी भयानक था। उस वक्त वहां की कुल आबादी थी- करीब 3 लाख 20 हजार। इसमें से करीब 2 लाख 36 हजार लोगो को उनके गांवों, जंगलों से जबर्दस्ती बेदखल करके सड़क किनारे कैम्पों में हांक दिया गया। और उनके पीछे उनके घरों और दूसरी चीजों को आग लगा दिया गया। आज यह घटना सरकारी आंकड़ों में इस तरह दर्ज है कि इन लोगों ने अपनी मर्जी से ‘मिजो नेशनल फ्रन्ट’ के गुरिल्लाओं से बचने के लिए अपने घरों को जला कर सरकार द्वारा बनाये कैम्पों में रहना स्वीकार किया है। मुझे याद नही आता कि आज तक के इतिहास में कभी भी कही भी जनता अपना ही घर जलाकर इस तरह कैम्पों में रहने के लिए खुशी खुशी आ जाय। 24 घण्टे सरकारी फौजों की निगरानी में रहने को मजबूर इन लोगों की जिन्दगी कैसी होगी और उनका क्या क्या शोषण होता होगा इसका अन्दाजा आज आसानी से लगाया जा सकता है क्योकि ऐसा प्रयोग कभी भी रुका नही है, देश के किसी ना किसी हिस्से में यह लगातार जारी रहा है आज भी जारी है। सरकार कोई भी क्यो ना हो। (सच तो यह है कि ऐसा प्रयोग मिजोरम से शुरु नही हुआ बल्कि इसके पहले ‘तेलंगाना’ और ‘नागालैण्ड’ में यह बड़े पैमाने पर हो चुका था।)
तब से लेकर आज तक नार्थईस्ट की जनता विशेषकर मिजोरम की जनता हर साल 5 मार्च को अपने राज्य की राजधानियों में और दिल्ली में जंतर मंतर पर इकट्ठा होती है और सरकार से सिर्फ एक ही मांग करती है कि वह यह स्वीकार कर ले कि उसने 5 मार्च 1966 को अपनी ही जनता पर बम बरसाये थे। पिछले 50 सालो से वे यही मांग कर रहे हैं।
‘नोम चोम्स्की’ ने अमरीका के बारे कहा था कि जिस आधार पर ‘न्यूरेनबर्ग’ का मुकदमा (द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ‘नाजीवादियों’ व ‘फासीवादियों’ के ऊपर चलाया गया मुकदमा) चलाया गया, अगर उसी आधार पर द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के अमरीकी राष्ट्रपतियों पर मुकदमा चलाया जाय तो प्रत्येक राष्ट्रपति को ‘मौत की सजा’ मिलेगी। क्योकि हर राष्ट्रपति के नाम कोई ना कोई जनसंहार दर्ज है। कमोवेश क्या यही स्थिति अपने देश की भी नही है। फर्क सिर्फ यह है कि अमरीका जो बाहर करता है वही काम भारत अपने देश के अन्दर करता है।
भारत में ‘गांधी’ पर जब राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया गया तो गांधी ने कहा कि राष्ट्रद्रोह उनका धर्म बन चुका है। आज के हालात को देखकर ऐसा लगता है कि भारत में भी राष्ट्रद्रोह लोगो का धर्म बनता जा रहा है।

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