Survivors Guide To Prison


अमरीका में जब ‘डोनाल्ड ट्रम्प’ की राष्ट्रपति पद पर जीत हुई तो दो कम्पनियों के शेयरों में 100 प्रतिशत का उछाल आ गया। ये कम्पनियां है- ‘कोर सिविक’ और ‘जीओ ग्रुप’। ये कम्पनियां अमरीका में निजी जेलों का संचालन करती हैं। जिन्हें प्रति कैदी अमरीकी सरकार से पैसे मिलते हैं। यानी जितने ज्यादा कैदी होगे, उतने ही इन्हें पैसे मिलेंगे। इसके अलावा वहां निजी कम्पनियां ठेके पर इन कैदियों से काम भी कराती है, जहां उन्हें न्यूनतम वेतन से काफी कम मजदूरी दी जाती है। डोनाल्ड ट्रम्प का अप्रवासियों, कालों और मुस्लिमों के प्रति जो रुख था, उससे इन कम्पनियों ने अनुमान लगा लिया था कि ट्रम्प के आने के बाद जेलों में कैदियों की संख्या बढ़ेगी। इसलिए इन कम्पनियों ने चुनाव कैम्पेन में ट्रम्प के समर्थन में काफी पैसा बहाया।
आपको यह जानकर शायद आश्चर्य हो कि पूरी दुनिया में जितनी महिलाएं जेलों में है, उसका एक तिहाई अकेले अमरीका में हैं। पूरी दुनिया में जितने कैदी हैं, उसका 22 प्रतिशत अकेले अमरीका में हैं। जबकि अमरीकी आबादी दुनिया की आबादी का महज 5 प्रतिशत है। वहां की जेलों में काले और अप्रवासी लैटिन अमरीकियों की संख्या आबादी में उनके अनुपात से कहीं ज्यादा है।

इसी साल मई में अमरीकी जेलों की स्थितियों पर एक बेहद संवेदनशील फिल्म ‘Survivors Guide To Prison’ आयी है, जिसकी प्रगतिशील खेमे में काफी चर्चा है। एक गोरे और एक काले व्यक्ति, जिन्होंने निर्दोष होने के बावजूद सालों-साल जेल की काल-कोठरी में गुजार दी, के साक्षात्कार के माध्यम से यह फिल्म ना सिर्फ जेल की अमानवीय स्थितियांे, पुलिस की निरंकुशता और कोर्ट की संवेदनहीनता और गरीबों-कालों-अप्रवासियों के प्रति उसके पक्षपात को बेहद असरदार तरीके से सामने लाती है, वरन मानवाधिकार के क्षेत्र में काम कर रहे विभिन्न बुद्धिजीवियों के साक्षात्कारों के माध्यम से जेल-स्वतंत्रता व मानव अधिकारों के बारे में बेहद बुनियादी सवाल उठाती है। फिल्म के निर्देशक ‘मैथ्यू कूक’ और ‘सूसान सरन्डन’ ने बेहद असरदार तरीके से नैरेशन की भूमिका अदा की है। और बीच बीच में इस फिल्म को एक परिप्रेक्ष्य देने की कोशिश की है।
फिल्म में बताये गये इस तथ्य को जानकर बेहद आश्चर्य होता है कि अमेरिका में 95 प्रतिशत मामले ‘Plea bargain’ से हल किये जाते हैं। मतलब कि आरोपी से कहा जाता है कि वह अपना अपराध कबूल कर ले, तो उसे कम दण्ड दिया जायेगा। अन्यथा उसे मंहगे ट्रायल का सामना करना पड़ेगा और उसके बाद अगर वह दोषी पाया गया तो उसे कड़ी सजा दी जायेगी। इसी दबाव में मंहगे ट्रायल का खर्च ना उठा पाने वाले अधिकांश गरीब-काले व अप्रवासी वे जुर्म भी कबूल कर लेते हैं जो उन्होंने कभी किया ही नहीं होता। इसलिए अमरीकी जेलों में निर्दोष कैदियों की भरमार है। और यही कारण है कि पुलिस वहां किसी को भी गिरफ्तार करके जेल भेज देती है और उसे सजा हो जाती हैै। अमरीकी जेलों में कैदियों की बहुतायत का यह एक बड़ा कारण है। मानवाधिकार कार्यकर्ता और लेखिका Alexander Michelle ने फिल्म में अपने साक्षात्कार के दौरान इसे उचित ही एक नये तरह के ‘जिम क्रो’ (1965 के पहले अमरीका के दक्षिणी राज्यों में काले व गोरों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में अलग अलग नियम होते थे। जो उनके बीच नस्लभेद को कायम रखते थे। इसकी तुलना हम भारत के गांवों में लागू होने वाली अलग अलग मनु-संहिताओं से कर सकते हैं।) की संज्ञा दी है। उन्होंने इस पर एक बेहद महत्वपूर्ण किताब भी लिखी है-Alexander, Michelle-The new Jim Crow _ mass incarceration in the age of colorblindness

ब्लैक एक्टिविस्ट और बहुचर्चित किताब ‘Are Prisons Obsolete?’ की लेखिका ‘एंजिला डेविस’ का इस फिल्म का हिस्सा ना होना थोड़ा अखरता है। यदि एंजिला डेविस से इस फिल्म में साक्षात्कार लिया जाता तो वे जेलों के अस्तित्व पर ही सवाल उठाती। जिस सवाल को यह फिल्म जाने अनजाने छोड़ देती है। हालांकि फिल्म के नैरेशन की तार्किक परिणति इसी सवाल पर होती है। इस सवाल पर चर्चा होनी ही चाहिए कि जेल अपराध-सुधार के लिए है या वर्ग शासन को बनाये रखने का एक हथियार है।
डाकूमेन्टरी फिल्म होने के बावजूद यह कृत्रिम और ‘हार्श लाइट’ का अत्यधिक प्रयोग करती है जो दर्शक को कभी कभी डिस-ओरियन्ट कर देता है। इसके अलावा Extreme Close Up का अत्यधिक प्रयोग भी फिल्म की अब्जेक्टिविटी को प्रभावित करता है। और कहीं कहीं यह किसी डरावनी फिल्म का संकेत देता हैं।
इसके बरक्स ‘जान पिल्जर‘ की 1974 में आयी फिल्म ‘Guilty Until Proven Innocent’ की याद आती है जो बेहद सामान्य तरीके से नेचुरल लाइट में शूट की गयी है और ज्यादा आब्जेक्टिव और प्रभावोत्पादक है।
भारत में इस विषय पर फिल्में काफी कम हैं। कुछ समय पहले ‘के पी ससी’ की फिल्म ‘FABRICATED‘, ‘शुब्रदीप चक्रवर्ती’ की 2013 में आयी फिल्म ‘After the Storm‘ और 1978 में आयी ‘आनन्द पटवर्धन’ की ‘Prisoners of Conscience‘ महत्वपूर्ण फिल्में है। हालांकि ये सीधे सीधे जेलों पर नहीं है। पहली और दूसरी फिल्म फर्जी तरीके से गिरफ्तार किये गये, विशेषकर मुस्लिमों के बारे में है तो तीसरी फिल्म राजनीतिक कैदियों के बारे में है।
‘Survivors Guide To Prison’ भारत के सन्दर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योकि यहां भी जेलों की स्थिति अमरीका जैसी ही है। यहां भी मुस्लिम, ईसाई, सिख दलित और आदिवासी जनसंख्या में अपने अनुपात से कहीं ज्यादा हैं। 2012 में 22.22 प्रतिशत दलित और 13.47 प्रतिशत आदिवासी तथा 20.02 प्रतिशत मुस्लिम जेलों में थे, जबकि उसी वक्त जनसंख्या में उनका अनुपात क्रमशः 16.63 प्रतिशत, 8.63 प्रतिशत और 14.23 प्रतिशत था। छत्तीसगढ़ व झारखण्ड में हजारों आदिवासी बेल बान्ड ना भर पाने की वजह से जेलों में बने हुए हैं। इसके अलावा जेलों की अमानवीय स्थितियां और गिरफ्तारी के वक्त टार्चर दिया जाना अब सामान्य बात बन चुकी है।
किसी ने बिल्कुल सही कहा है कि किसी भी समाज में जनतंत्र कितना है, इसका पता वहां कि जेलों की स्थितियों से लगाया जा सकता है। और इस मापदण्ड पर दुनिया के सबसे ‘पुराने’ और सबसे ‘बड़े’ लोकतंत्र के ढकोसले की धज्जियां उड़ जाती हैं।
कुल मिलाकर यह अनिवार्य रुप से देखी जानी वाली फिल्म है।

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“Young Karl Marx”: A Must-See Film by Frieda Afary

It is not easy to make a movie about a multidimensional and historical figure like Marx without privileging one aspect of that figure’s life over another.  Raoul Peck’s Young Karl Marx however, has succeeded in presenting a holistic view of the young Marx and his time that also speaks movingly to the problems of our time.
That success seems to be rooted in two elements:
First,  In addition to being very knowledgeable about Marx’s work and time period,  Raoul Peck and Pascal Bonitzer,  the screenplay writers have largely drawn on the  correspondence of  the main characters, Marx, Friedrich Engels, his closest colleague and collaborator, and Jenny von Westphalen, his comrade/wife.  In doing so, they have allowed us to hear these characters think.
Secondly, Peck’s own life-experience has made him a creative intellectual/filmmaker/political activist, sensitive to the issue of human suffering and emancipation.    Born in Haiti, under Duvalier’s dictatorship, he went to the Congo with his family in 1961 where the first democratically elected government of Prime Minister Patrice Lumumba had just been overthrown by U.S.-backed forces loyal to the dictator Mobuto Sese Seko.   After living under the dictatorship of Mobutu for many years, he continued his education in France and Germany where he received degrees in industrial engineering, economics, and film.  He has had jobs as varied as being a taxi driver in New York, a journalist and later, Haiti’s minister of culture in 1996-1997.   During the past 36 years, Peck has made 21 films,   most notably,  Lumumba, about the Congolese revolutionary and independence leader,  and I Am Not Your Negro about the African American writer, James Baldwin.  It is this knowledge and life experience that has been brought to bear on his presentation of the young Marx.
The film thus starts with a chilling scene in which poor peasants– women, men and children –collecting deadwood in Prussia’s Mosel forest in the Rhineland, are assaulted, beaten and killed by agents of landowners who arrive on horsebacks.  In the background, we hear excerpts from one of  Marx’s 1842 essays on the Prussian law on the theft of wood, which he wrote for the newspaper Rheinische Zeitung, where he challenged the very hypocrisy and  inhumanity of this law and its use to kill peasants.   Film viewers are then taken to the office of the Rheinische Zeitung where the 24-year old editor, Marx (not yet a communist) is challenging his colleagues to be more radical, even as the Prussian police is banging on the door with an order to shut down the newspaper and arrest them.
Peck then,  introduces us to Friedrich Engels,  the son/employee of a German textile factory owner in Manchester and a socialist intellectual seeking  the collaboration of workers to help him write a book about the condition of the working class in England.  Marx and Engels meet for the second time at the office of the German philosopher and political writer, Arnold Ruge.  They discuss their respective works, ideals and goals,  and the rest is history.
Since it is not possible to  discuss all the dimensions of Peck’s film, in this short review,  I would like to limit myself to  three aspects which stand out as unique:   I. Marx’s concept of organization;   II. Marx’s challenge to the French Anarchist thinker, Pierre Proudhon;   III.  The role of women.
I. Marx’s Concept of Organization
While a two-hour film cannot possibly allow any writer/director to do justice to the philosophical, economic, political and social issues that Marx was writing about,  or Engels and Marx were jointly writing about,   what comes through in Peck’s film is the following:   Marx saw himself as a philosopher,  the originator  of a unique critique of political economy and  a totally new concept of human liberation.  He was not simply exposing income inequality but challenging alienated labor and the alienation of humanity.   He was a profound philosopher and economist but also not an ivory-tower intellectual.  Thus,  he and Engels actively reached out to workers, men and women,  to poor people,  to other revolutionary intellectuals,  and helped transform the League of the Just from an organization that limited itself to “the brotherhood of men”  to one whose manifesto became the Communist Manifesto,  written and published on the eve of the 1848 Revolutions that shook up Europe.
The fact that Marx’s concept of human emancipation and his views on organization were completely distorted and turned into totalitarian state capitalist societies, as seen in the USSR and Maoist China,   does not permit the abandonment of that concept and its relevance for today.
II. Marx’s Challenge to Proudhon
Peck emphasizes how much the development of Marx’s ideas was a response to what he and Engels thought were the inadequacies of Pierre Proudhon’s views.   At the same time, we see that  Marx and Engels made an effort to reach out to Proudhon in their organizational work, because they respected him as a worker-intellectual and a working-class leader.
The gist of Marx’s critique of Proudhon is expressed in a few scenes in which Marx challenges Proudhon’s view of “property as theft” for being inadequate in its understanding of capitalism and capitalist relations of production, namely alienated mechanical labor and its consequences.   Peck also depicts how Marx took it upon himself to do a serious study of  Proudhon’s  Philosophy of Poverty (1846),  and was compelled to write  Poverty of Philosophy(1847), as a response.
In his Philosophy of Poverty,   Proudhon had argued that if money were abolished and if workers were paid vouchers based on their labor time,  the vouchers would allow autonomous cooperatives and communities to have transparent exchange and social relations without the need for a central plan.
Marx, in his Poverty of Philosophy, and later in the Grundrisse,  critiqued Proudhon’s thesis and argued that under capitalism too,  workers’ wages are based on their labor time.  However, the labor time used as the measure of remuneration under capitalism is not the worker’s actual labor time but the minimum labor time for the production of an exchange value.  Later in Capital he called this measure, an average or  “socially necessary labor time.”  He thought that any conception that fell short of comprehending the capitalist mode of production and its fragmentation of the human being, would not be able to offer an alternative that could truly transcend capitalism.
While the detailed content of these books could not be discussed in The Young Marx, the film does show that  Poverty of Philosophy was meant as a book  for workers as much as for intellectuals.   In one scene, Mary Burns, a worker, is shown holding it up at a labor meeting and calling on the participants to read Marx’s response to Proudhon.
III. The Role of Women
Peck makes a special effort to highlight the role and characters of Marx’s wife,  Jenny von Westphalen and Engels’s companion,  Mary Burns.   Jenny von Westphalen was the daughter of an aristocratic family in Trier and had been Marx’s friend from a young age.   She was not simply Marx’s wife.  As a highly educated woman who had also become a revolutionary,  she was a thinker and a comrade who could carry on debates with Marx and assisted him in the development of his ideas.   She was independent-minded and articulate.   She endured poverty and endless hardships because of having married a revolutionary who kept getting expelled from one country after another for his ideas and activities.   However,  she did not  return to Prussia to live with her aristocratic family,  because she truly believed in the cause for which she and Marx were both fighting.    All of these dimensions of Jenny Marx come through in the film and make viewers truly admire her.
Mary Burns was also not simply Engels’s companion.   She was a militant and vocal Irish worker who challenged the horrible conditions of factory labor and helped introduce Engels to the League of the Just, an organization of revolutionary artisans and workers led by German emigrant artisans, Karl Schapper and Wilhelm Weitling.   She was also very interested in the ideas that Marx and Engels were developing,  and participated in activities with them to introduce these ideas to other workers.
The last scene in the film in which Marx, Engels, Jenny von Westphalen and Mary Burns are sitting around a table and editing the handwritten copy of the Communist Manifesto,  is truly memorable.
IV. Marx’s Relevance for Today
It is the Communist Manifesto,  the culmination of the film,  that Peck argues,  speaks volumes to today’s crisis-ridden capitalism.  In an interview about the film,  he states:   “Both projects [I Am Not Your Negro and The Young Karl Marx] were a sort of response to the world I see around me, and not only here in this country [U.S.] but in Europe and in the Third World.  It’s what I call the rise of ignorance, of confusion . . . I just wanted to give a response and come back to what I call the fundamentals.”  (https://www.npr.org/2018/02/25/588673944/the-young-karl-marx-looks-inside-the-mind-of-a-revolutionary) In another interview, he states:  “Marx was not dogmatic.  Marx always said you need to reanalyze your current situation and your historic situation.” (http://www.newsweek.com/young-karl-marx-movie-raoul-peck-director-review-communist-manifesto-communism-818987)
It is not only Marx’s critique of capitalism but also his ability to comprehend reality in a holistic way, to analyze, to be a critical and independent thinker,  that Peck thinks we can learn from in order to  challenge the growing  populism,  dogmatism and authoritarianism that is engulfing the world.   Peck wants a new generation to know that they can change the world for the better and revolutionize it, provided they begin with the thinkers who give us the foundation to do so.
Hopefully,  Peck will go on to make parts II and III of this film to cover the other periods of Marx’s life.
Frieda Afary
March 23, 2018
Cast: August Diehl as Karl Marx, Stefan Konarske as Friedrich Engels, Vicky Krieps as Jenny von Westphalen,  Hannah Steele as Mary Burns, Olivier Gourmet as Pierre Proudhon, Rolf Kanies as Moses Hess, Niels-Bruno Schmidt as Karl Grun, Alexander Scheer as Wilhelm Weitling.
Director: Raoul Peck
Writers: Pascal Bonitzer and Raoul Peck
Cinematographer: Kolja Brandt
Editor:  Frederique Broos
Composer:  Alexei Aigui
Languages:  German, French, English with English subtitles
Length:  118 minutes

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‘Mephisto’: एक कलाकार जिसने अपनी आत्मा फासीवादियों को बेच दी….

जर्मन फासीवाद पर वैसे तो कई बेहतरीन फिल्में हैं, लेकिन 1981 में आयी यह फिल्म एकदम अलग तरह की है।
‘हेन्डरिक’ एक स्टेज कलाकार है। वह आम तौर से वाम की ओर झुका हुआ हैै। और उसी तरह के नाटक करता है। उसके ग्रुप में ज्यादातर कलाकार वाम की ओर झुके हुए हैं। यह वह समय है जब जर्मनी में नाजीवाद तेजी से अपने पैर पसार रहा है। फिर एक दिन अचानक से खबर आती है कि हिटलर ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है।
परिस्थिति पूरी तरह बदल जाती है। हेन्डरिक के बहुत से दोस्त ‘प्रतिरोध दस्तों’ में शामिल हो जाते है और बहुत से देश छोड़ के चले जाते हैं। हेन्डरिक की पत्नी भी देश छोड़ कर फ्रान्स चली जाती है। जाने से पहले वह हेन्डरिक को भी देश छोड़ने के लिए मनाती है। लेकिन वह नहीं मानता और तर्क देता है कि ये नाजी लोकतान्त्रिक तरीके से ही तो सत्ता में आये है,ं और मेरा काम थियेटर करना है और मुझे कुछ नहीं पता। जब उसके दोस्त उसे प्रतिरोध दस्ते में शामिल होने के लिए कहते हैं तो वह कहता है कि मुझे रिजर्व में रख लो। अभी तत्काल मैं शामिल नहीं हो सकता। यहीं से उसका व्यक्तित्व बदलने लगता है। और वह अपने आपको नयी परिस्थिति में ढालने में लग जाता है और उसके अनुसार ही तर्क भी गढ़ने लगता है।
आगे बढ़ने से पहले यह जान लेते हैं कि फिल्म का नाम ‘मेफिस्टो’ का मतलब क्या है। जर्मन लोक कथा में ‘फास्ट’ और ‘मेफिस्टो’ को लेकर अनेक कहानियां हैं। फास्ट एक कलाकार-बुद्धिजीवी है। मेफिस्टों एक दानव है। मेफिस्टों हमेशा लोगो की आत्मा का सौदा करने के लिए घूमता रहता है। जो उसे अपनी आत्मा बेच देता है उसे वह खूब सारा धन व शोहरत देता है। एक दिन फास्ट भी मेफिस्टो को अपनी आत्मा बेच देता है और इस ऐवज में उसे बहुत सा धन व शोहरत मिलती है।
इसी दौरान एक बार स्टेज पर ‘मेफिस्टो’ का रोल करते हुए वीआइपी दर्शक दीर्घा में बैठा हुआ नाजी जनरल हेन्डरिक के अभिनय से प्रभावित हो जाता है और उसे अपने पास बुलाता है। दोनो के मिलन को दर्शक सांस बांधे देख रहे हैं। यह पूरी फिल्म का बहुत ही पावरफुल दृश्य है और बेहद प्रतीकात्मक है। मानो यहीं पर फास्ट यानी हेन्डरिक अपनी आत्मा का सौदा मेफिस्टो यानी नाजी जनरल के साथ करता है। और उसके बाद शुरु होती है आत्मा विहीन खोखले हेन्डरिक की शोहरत की यात्रा और जल्द ही उसे संस्कृति का पूरा जिम्मा दे दिया जाता है।
इसी समय संास्कृतिक मंत्रालय की तरफ से उसे फ्रांस जाना होता है वहां वह अपनी पूर्व पत्नी से मिलता है। वह आश्चर्य करती है कि वह ऐसे माहौल में बर्लिन में कैसे रह पा रहा है। वह कहता है कि मैं थियेटर में रहता हूं। तो उसकी पूर्व पत्नी बोलती है कि आखिर थियेटर बर्लिन में ही तो है। यह बहस इस सर्वकालिक बहस की ओर संकेत करती है कि कला निरपेक्ष होती है या समाज सापेक्ष। इससे पहले भी जब उसकी पत्नी उससे स्टैण्ड लेने को कहती है तो वह बोलता है कि मेरा स्टैण्ड शेक्सपियर है (उस समय वह शेक्सपियर का नाटक ‘हैमलेट’ करने जाने वाला था)। उसकी पत्नी गुस्से से बोलती है कि तुम शेक्सपियर के पीछे छिप नहीं सकते। नाजी लोग अपनी गन्दगी पर पर्दा डालने के लिए शेक्सपियर जैसा क्लासिक नाटक करते हैं। तुम्हे इसे समझना चाहिए। आज भारत की परिस्थिति में भी हम इसे देख सकते हैं। जब नाटककार या कलाकार आज के तीखे सवालों से आंख चुराते हुए अपनी कायरता पर पर्दा डालने के लिए पुराने ‘क्लासिक’ नाटक के पीछे अपने को छुपा लेते हैं।
फ्रांस में जब हेन्डरिक की अपनी पूर्व पत्नी से बहस हो रही होती है तो वही पास में बैठा उसका एक पुराना दोस्त इसे सुन रहा होता है। कुछ समय बाद वह आता है और हेन्डरिक को एक थप्पड़ जड़ देता है। यह दृश्य बहुत ही पावरफुल है। हेन्डरिक इस थप्पड़ का जरा भी विरोध नहीं करता। ‘क्लोज अप’ में चेहरे का भाव यह बताता है कि उसे पता है कि वह इसी लायक है।

जब उसकी दूसरी नीग्रो पार्टनर (जिसके साथ वह कभी पब्लिक में नहीं होता क्योकि उस दौरान जर्मनी में प्रचलित नस्लीय शुद्धता के सिद्वान्त से यह मेल नहीं खाता, इसलिए वह अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके अपनी ‘नीग्रो’ पार्टनर को देश से निकल जाने के लिए बाध्य करता है और उस पर यह अहसान भी जताता है कि उसने उसे सम्भावित नाजी हमले से बचा लिया) अकेले में उसे उसके समझौते या कहे कि उसकी मक्कारी के लिए धिक्कारती है तो वह कोई प्रतिरोध नहीं करता बल्कि तुरन्त आइने में देखता है कि क्या वह सचमुच कमीना है।
नाजी जनरल की चापलूसी करते हुए वह यहां तक चला जाता है कि एक प्रोग्राम में वह कहता है-‘‘बिना संरक्षण के कला टूटे पंखों वाली चिड़िया की तरह होती है।’’
दरअसल जब जब कैमरा हेन्डरिक का क्लोज अप लेता है तो उसके व्यक्तित्व का खोखलापन बहुत पावरफुल तरीके से सामने आ जाता है। और यही लगता है कि जब वो आरम्भ में वाम की ओर झुका था तब भी उसे वाम से कुछ लेना देना नहीं था बस उस समय वाम ही उसके आगे बढ़ने के लिए एक सीढ़ी की तरह था जैसे इस समय नाजी हंै।
फिल्म में एक और दृश्य बहुत ही प्रतीकात्मक और शक्तिशाली है। एक बार जब वह अपने आफिस आता है तो देखता है कि किसी ने आफिस के अन्दर नाजी-विरोधी पर्चे फेंके हुए है। वह जल्दी से जल्दी दूसरे लोगों के आने से पहले सभी पर्चे इकट्ठा करता है, बाथरुम में जाकर उन्हें जलाता है और फिर करीने से राख को इकट्ठा करके उसे अपनी जेब में रख लेता है। दरअसल ऐसे कलाकारो का यही मुख्य काम होता है- प्रतिरोध की आंच से व्यवस्था को बचाना। भारत में भी ऐसे कितने कलाकार हैं जो इस काम में जी जान से लगे हुए हैं।
फिल्म का अन्त बहुत शक्तिशाली है। नाजी जनरल हेन्डरिक को विशाल नवनिर्मित नाटक हाल में ले जाता है और कहता है कि यहां तुम्हारे प्रदर्शन पर तुम्हें बहुत शोहरत मिलेगी। उसे जबर्दस्ती हाल के बीच में जाने को कहा जाता है और उस पर चारों तरफ से लाइट डाली जाती है। इस तेज लाइट से बचने के लिए वह अपना चेहरा छुपाने का असफल प्रयास करता है और अपने से कहता है कि ये लोग मुझसे चाहते क्या हैं, आखिर मैं एक कलाकार ही तो हूं। यहीं पर ‘फ्रीज फ्रेम’ के साथ फिल्म समाप्त हो जाती है।
इस पूरी फिल्म को यदि हम आज के अपने देश के हालात में और उसमें कलाकारों की भूमिका के सन्दर्भ में अनुदित करें तो हमें गजब का साम्य नजर आयेगा। आपको भारत के फास्ट (हेन्डरिक जैसे कलाकार) और मेफिस्टो (फासीवादी यानी सरकारी तंत्र) के बीच की जुगलबन्दी को पहचानने में ज्यादा वर्जिश नहीं करनी पड़ेगी। लेकिन यह काम मैं आप पर ही छोड़ती हूं।

वे नहीं कहेंगे कि वह समय अंधकार का था
वे पूछेंगे कि
उस समय के कवि
चुप क्यो थे?
-ब्रेख्त

[इस फिल्म को 1981 में विदेशी भाषा की कैटेगरी में बेस्ट फिल्म का आस्कर अवार्ड भी मिला। इस फिल्म को हंगरी के डायरेक्टर ‘Istvan Szabo’ ने निर्देशित किया।]

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Stephen Hawking and ‘Crisis In Physics’


14 मार्च को मशहूर वैज्ञानिक व गणितज्ञ ‘स्टीफन हाकिन्स’ की मृत्यु के बाद उन पर काफी कुछ लिखा जा चुका है। निस्सन्देह उन्हेांने विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में बड़ा योगदान किया है। उनके राजनीतिक विचार भी आमतौर से प्रगतिशील थे। ईश्वर के अस्तित्व के बारे में भी उन्होंने खुलकर अपने विचार रखे और साफ कहा कि वे नास्तिक हैं।
लेकिन जिस भौतिक विज्ञान का स्टीफन हाकिन्स प्रतिनिधित्व करते थे, वहां एक बड़ा संकट मौजूद है, जिसे ‘क्रिस्टोफर काडवेल’ ‘Crisis in Physics’ कहते थे और इसी नाम से अपनी मशहूर किताब भी लिखी थी। स्टीफन हाकिन्स तक आते आते यह संकट और गहरा गया है। विशेषकर आइन्स्टाइन के बाद ही भौतिक विज्ञान का (विशेषकर अन्तरिक्ष विज्ञान,Cosmology का) प्रयोगों और परीक्षण से रिश्ता बहुत कम हो गया और एक तरह से पूरा भौतिक विज्ञान विशेषकर अन्तरिक्ष विज्ञान गणित-आधारित हो गया, या यो कहे कि ‘गणित का कैदी’ हो गया। और इसी रास्ते से भौतिक विज्ञान में अध्यात्मवाद ने प्रवेश किया। स्टीफन हाकिन्स की पूरी थ्योरी (‘ब्लैक होल’ और ‘बिग बैंग’ से सम्बन्धित) गणित आधारित है, जिसका प्रयोगों-परीक्षणों से कोई रिश्ता नहीं रहा है।
कुछ समय पहले इसी ब्लाग में इस संकट पर एक विस्तृत लेख लिखा गया था। स्टीफन हाकिन्स ने इस संकट को और बढ़ाया ही है।
आइये इस मौके पर एक नज़र डालते है उस लेख पर-

मशहूर मार्क्सवादी विचारक ‘क्रिस्टोफर काडवेल’ ने 1939 में एक महत्वपूर्ण किताब लिखी थी- ‘दी क्राइसिस इन फिजिक्स’। इस किताब में काडवेल ने इस संकट को इस रुप में रखा था- ‘‘भौतिकी का यह संकट जो कुछ वक्त पहले तक महज भौतिकविदों तक सीमित था, अब जनता के बीच भी आ चुका है। आम आदमी भी अब यह जानता है कि भौतिक विज्ञान में सब कुछ ठीक नही चल रहा है। इसकी संरचना में जो तेजी से दरार पैदा हो रही है, उसे ऐसे रहस्यमयी विचारों से पाटा जा रहा है, जो विज्ञान के लिए नये हैं। ख्यातलब्ध भौतिकविद यह ऐलान कर रहे हैं कि ‘निश्चयता’ (determinism) और ‘कार्यकारण संबंध’ (causality) भौतिक विज्ञान से खारिज हो चुके हैं। और यह ब्रह्ंमाण्ड गणितज्ञों की रचना है, और इसकी असल प्रकृति अज्ञात है। इस तरह के विचारों के मूल प्रवक्ता हैं- Jeans, Schrodinger, Heisenberg, Dirac और Eddington. ये सभी मशहूर भौतिकविज्ञानी हैं। मैक्स प्लांक और अलबर्ट आइन्सटाइन इनके प्रबल विरोधी थे, जिनकी प्रतिष्ठा ही इनके परंपरागत विचारों की रक्षा का प्रमुख हथियार था। लेकिन ‘दुश्मन’ के ठिकानों पर प्रति आक्रमण करने में ये सक्षम नहीं थे। प्लांक के अनुसार कार्य-कारण संबध (causality) का औचित्य यह था कि यह वैज्ञानिकों का विश्वास, भरोसा व न सिद्ध किया जा सकने वाला विज्ञान का मूल गुण है। आइन्सटाइन की कार्यनीति कही अधिक सरल थी – ‘‘युवा लोग क्या कह रहे हैं यह उन्हें ‘समझ नही आता’।’’ (‘The Crisis In Physics’ page-1)
किताब के आखिरी चैप्टर में काडवेल ने इस संकट का सार बताते हुए लिखा-‘‘ भौतिकी में इस संकट की जड़े काफी गहरी हैं और यह सामान्य व अंतिम संकट का एक हिस्सा हैै।’’ (पेज-161)
पूरी किताब में भौतिकी के इस संकट को समझाते हुए काडवेल ने इसे उचित ही ‘बुर्जुआ संकट’ से जोड़ा है।
तब से लेकर आज तक न सिर्फ यह संकट बढ़ा है, वरन इस संकट की पहचान भी काफी धुंधली पड़ गयी है। ‘बिग बैंग’ से लेकर ‘गाड पार्टिकल’ थ्योरी के माध्यम से अवैज्ञानिक और प्रतिक्रियावादी दर्शन ने जिस तरह से आज विज्ञान विशेषकर भौतिक विज्ञान को एक कुंहासे से ढक रखा है वह अभूतपूर्व है। यह कोई आश्चर्य की बात नही कि बिग बैंग थ्योरी को आज पोप के साथ साथ साम्राज्यवादी शासन व्यवस्था का वरद हस्त प्राप्त है। जबकि इसके बरक्स दूसरी अनेक वैज्ञानिक स्थापनाएं हैं जिन्हे सुनियोजित तरीके से दरकिनार कर दिया जाता है।
‘सिंगुलैरिटी’, ‘ब्लैकहोल'(हालांकि ‘हाकिन्स’ अब इसके अस्तित्व से इंकार कर चुके हैं।), ‘डार्क एनर्जी’, ‘डार्क मैटर’, 4th, 5th, 6th.. डाइमेन्सन, ‘बिग क्रन्च’, ‘बिग बैंग’ ब्रह्माण्ड की ‘हीट डेथ’ आदि के माध्यम से जो परोसा जा रहा है, वह विज्ञान से दूर विज्ञान फंतासी के ज्यादा निकट लगता है। एंगेल्स (Dialectics of nature और Anti Duhring), लेनिन (Materialism and Empirio Criticism) और एक हद तक काडवेल ने अपने अपने समयों पर द्वन्दात्मक भौतिकवाद [Dialectical materialism] की जमीन पर खड़े होकर उस समय के कुंहासे को काफी हद तक साफ किया था।
काडवेल के बाद भले ही यह संघर्ष कमजोर पड़ा हो, लेकिन यह रुका कभी नहीं। David bohm, Shoichi Sakata जैसे अनेक वैज्ञानिकों ने अपने अपने समय के अधिभूतवाद (Metaphysics) से टक्कर ली और भौतिकवादी परम्परा को धूमिल नही होने दिया।
इसी परम्परा में 2007 में एक किताब आयी थी- ‘The New Scientific Worldview’ इसके लेखक हैं- ‘Glenn Borchardt’ जो स्वयं एक वैज्ञानिक है और इनके अब तक 300 से ज्यादा पेपर प्रकाशित हो चुके हैं।
हांलांकि यह किताब मुकम्मल रुप से द्वन्दात्मक भौतिकवाद की जमीन पर खड़ी नही है और समाज विज्ञान के विश्लेषण में तो काफी कमजोर है। लेकिन इसके बावजूद यह आज के भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में छाये कुंहासे को काफी हद तक दूर करने में मददगार है।
किसी भी क्षेत्र में बुनियादी अवधारणायें (Assumptions) ही वह प्रस्थान बिन्दू होती हैं जो हमारे चिन्तन व प्रयोगों की दिशा निर्धारित करती है। भौतिकी के क्षेत्र में आज जो संकट व्याप्त है उसका कारण वे बुनियादी गलत अवधारणायें हैं जिन पर पूरा मुख्य धारा का भौतिक विज्ञान खड़ा है। इसलिए लेखक उन बुनियादी अवधारणाओं पर चोट करते हुए विज्ञान की 10 बुनियादी अलग अवधारणायें पेश करते हुए ब्रह्मांड का एक वैकल्पिक माडल पेश करता है। ये अवधारणायें हैं-
1. Materialism- The external world exists after the observer does not.
2. Causality- All effects have an infinit number of material causes.
3. Uncertainty- It is impossible to know everything about anything, but it is possible to know more about anything.
4. Inseparability- Just as there is no motion without matter, so there is no matter without motion.
5. Conservation- Matter and the motion of matter neither can be created nor destroyed.
6. Complementarity- All things are subject to divergence and convergence from other things.
7. Irreversibility- All processes are irreversible.
8. Infinity- The universe is infinite, both in the microcosmic and macrocosmic directions.
9. Relativism- All things have characteristics that make them similar to all other things, as well as characteristics that make them dissimilar to all other things.
10. Interconnection- All things are interconnected, that is, between any two objects exist other objects that transmit matter and motion.
लेखक ने इन अवधारणाओं के आधार पर यह साफ किया है कि इस ब्रह्माण्ड कि कोई शुरुवात या अंत नहीं है. यह माइक्रो [micro] और मैक्रो [macro] दोनों तरफ अनंत है।
लेखक ने इन अवधारणाओं पर आइन्स्टाइन को भी कसा है और उन्हे भी एक हद तक इस संकट का जिम्मेदार माना है। आइन्स्टाइन पर इससे पहले भी ये आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने भौतिक विज्ञान को प्रयोगों से हटाकर गणित का कैदी बना दिया। आइन्स्टाइन की सबसे बड़ी दार्शनिक चूक ‘समय’ को ‘मैटर’ के रुप में देखने की है। जबकि समय किसी मैटर का ‘मोशन’ है। ‘time dilation’ के उनके सिद्धांत ने समय में आगे-पीछे जाने जैसी कल्पनाओं के साथ साथ अन्य फंतासियों को भी जन्म दिया। स्पेस को भी आइन्स्टाइन ’empty space’ के रुप में देखते थे। लेखक कहता है कि पूरे ब्रह्मांड में न ही ’empty space’ है और न ही ‘solid matter’ है। सभी मैटर इन्ही दोनों अवस्थाओं के बीच होते हैं। यही कारण है कि अभी तक कहीं भी 0 डिग्री k नही पाया गया है। जो ’empty space’ के लिए जरुरी है।
आइन्स्टाइन का ‘curved space’ का विचार इसी गलत अवधारणा से पैदा हुआ। जबकि स्पेस (और समय भी) मैटर का ‘mode of existence’ भर है।
किताब की दूसरी महत्वपूर्ण स्थापना ईथर की स्वीकार्यता है। 1887 में ‘Michelson–Morley’ प्रयोग के बाद कई ऐसे प्रयोग हुए जो ईथर के अस्तित्व को साबित करते हैं। 2002 में उक्रेन के दो वैज्ञानिकों ने सफलतापूर्वक ‘aether drift’ को सिद्ध किया। लेकिन इनके पेपर व प्रयोगों को सचेत तरीके से मुख्य धारा के भौतिक विज्ञानियों व संस्थाओं ने नजरअंदाज किया। दरअसल आइन्सटाइन का पूरा माडल ईथर की अस्वीकार्यता पर निर्भर है। ईथर को स्वीकारते ही आइन्स्टाइन का पूरा माडल और उनकी प्रतिष्ठा दांव पर लग जायेगी।
लेखक ने ईथर को स्वीकारने के साथ ही प्रकाश की पुरानी अवधारण को फिर से स्थापित किया है। लेखक के अनुसार प्रकाश कण नही तरंग है जो ईथर माध्यम में विचरण करती है और इसलिए प्रकाश की गति भी कास्टैन्ट नही हैं। ‘फोटान’ ईथर माध्यम का कण हैं प्रकाश का नहीं।
दूसरी महत्वपूर्ण स्थापना ‘गुरुत्वाकर्षण’ को लेकर है। दरअसल विज्ञान में कार्य-कारण संबंध मानने वाले भौतिकवादी वैज्ञानिकों के लिए भी गुरुत्वाकर्षण एक गुत्थी है। यहां तक कि काडवेल ने भी गुरुत्वाकर्षण को सिर्फ ‘प्रभाव’(effect) माना जिसका कोई कारण नही है। न्यूटन की खोज इस ‘प्रभाव’ के बारे में है। इसके कारण का पता वे भी नही लगा सके। हालांकि न्यूटन ने इस पर एक जगह अपना संदेह भी जाहिर किया है कि कैसे दो सूदूर की वस्तुएं बिना किसी भौतिक बन्धन के एक दूसरे को आकर्षित करती हैं। यानी कि यदि कार्य-कारण संबंध का कोई अपवाद नही है तो गुरुत्वाकर्षण का भी कोई कारण अवश्य होना चाहिए और वह कारण भौतिक होना चाहिए आध्यात्मिक नहीं। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव का कारण भगवान पर छोड़ दिया। आइन्स्टाइन ‘curved space’ की शरण में चले गये। लेकिन लेखक का कहना है कि पूरे ब्रह्मांण में जो ईथर है उसके ‘फ्री कण’ का ‘काम्प्लेक्स कण’ पर जो ‘push’ बल लगता है उसके कारण गुरुत्वाकर्षण बल पैदा होता है। (इस प्रक्रिया में ‘vortex’ की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है।) इस रुप में गुरुत्वाकर्षण ‘pull’ नहीं बल्कि ‘push’ बल है। और इसका प्रभाव स्थानीय है, हालांकि इसकी व्यापकता पूरे ब्रह्माण्ड में है। किताब का यह चैप्टर थोड़ा कठिन है। लेकिन इतना तो समझ में आ जाता है कि न्यूटन की ‘आकर्षण’ व आइन्स्टाइन की ‘curved space’ वाली गुरुत्वाकर्षण की व्याख्या काफी अपूर्ण है और विज्ञान की दो बुनियादी अवधारणाओं ‘matter-motion’ व ‘causality’ पर खरी नही उतरती।
पुस्तक में लेखक ने ‘उर्जा’ के मिथक को भी साफ किया है। विज्ञान और दर्शन में उर्जा को लेकर अनेक भ्रमात्मक अवधारणायें हैं। आइन्स्टाइन के प्रसिद्ध सूत्र “E=MC2” ने भी इसमें अपना योगदान दिया है। इस सूत्र से ऐसा लगता है कि ‘मैटर’ और ‘उर्जा'[energy] अलग अलग चीज है जिसे एक दूसरे में बदला जा सकता है। इसी गलत अवधारणा से यह कल्पना की जाती है कि बिग बैंग से पहले ब्रह्मांड में ‘शुद्ध उर्जा’ थी और इसी से ‘मैटर’ का जन्म हुआ।
दरअसल इस पूरे ब्रह्मांड में दो ही मूल चीजे हैं- ‘मैटर’ और ‘मोशन’। बिना ‘मैटर’ के ‘मोशन’ नही हो सकता और बिना ‘मोशन’ के ‘मैटर’ नही हो सकता।
लेखक के अनुसार उर्जा ‘matter in motion’ के लिए एक अमूर्त टर्म है। उर्जा का विशिष्ट रुप कोई भी हो वह ‘motion of matter’ ही होगा। जैसे उर्जा का एक रुप प्रकाश है। यह ‘मोशन’ है जो ईथर नामक ‘मैटर’ के कारण संपन्न होता है। दूसरा उदाहरण ‘दौड़ना’ है जो ‘पैर’ नामक मैटर के कारण संभव होता है। क्या हम ‘दौड़ने’ (motion) को ‘पैर’ (matter) से अलग कर सकते हैं। इसी तरह ‘शुद्ध उर्जा’ जैसी कोई चीज नही होती।
“E=MC2” सूत्र एक प्रकार के ‘matter in motion’ का दूसरे प्रकार के ‘motion of matter’ में रुपान्तरण है, न कि ‘matter’ का ‘motion’ में रुपान्तरण।
यह स्थापना बेहद महत्वपूर्ण है कि क्योकि काडवेल भी इसे ठीक से नही समझ पाये थे और उन्होने भी प्रकाश को ‘motion of motion system’ जैसा अजीब नामकरण दिया था। दूसरी जगह इसकी व्याख्या करते हुए वे लिखते हैं – ‘‘ प्रकाश जब परमाणु में जाकर अदृश्य हो जाता है तो मैटर बन जाता है और जब इलेक्ट्रान के रुप में प्रकट होता है तो प्रकाश बन जाता है।(पेज-126)
इस किताब से इस बात का भी तीखा अहसास होता है कि समाज विज्ञान की तरह प्राकृतिक विज्ञान विशेषकर भौतिक विज्ञान भी तीखे विचारधारात्मक दार्शनिक संघर्ष का क्षेत्र होता है क्योकि जैसा कि काडवेल ने बहुत सटीक तरीके से समझाया है कि एक वैज्ञानिक, वैज्ञानिक होने से पहले एक इंसान होता है और इंसान के रुप में उसकी इस वर्ग समाज में एक जगह होती है और उसके अनुरुप उसकी अपनी एक विचारधारा होती है।
शासन व्यवस्था इसमें अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। और अपने तात्कालिक व दूरगामी हितों के हिसाब से कुछ वैज्ञानिकों व अवधारणाओं को गोद लेती है तो कुछ का दमन करती है या उन्हे दरकिनार करती है। ब्रूनों को जलाने से लेकर किसी पेपर को मुख्य धारा की साइन्स मैगजीन में ना छपने देना तक यह कुछ भी हो सकता है।
आज व्यवस्था की मदद से जिस तरह से ‘बिग बैंग’, ‘गाड पार्टिकल’, ‘शुद्ध उर्जा’ (स्पिरिट?) जैसी चीजों को धर्म के स्तर तक उठा कर ‘कामन सेन्स’ बनाया जा रहा है, उससे टकराने के लिए हमें भी अपनी ‘scientific worldview’ की धार को तेज करना चाहिए और द्वन्दात्मक भौतिकवाद [Dialectical materialism] की अपनी जड़ो की ओर लौटना चाहिए। यह याद रखना चाहिए कि ‘शुद्ध उर्जा’ की तरह ‘शुद्ध विज्ञान’ जैसी कोई चीज नही होती।

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‘ख़बर इतिहास का पहला कच्‍चा ड्राफ्ट होती है’: ‘द पोस्‍ट’

‘ख़बर इतिहास का पहला कच्‍चा ड्राफ्ट होती है’ और ‘प्रेस को शासकों की नहीं शासितों की सेवा करनी चाहिए’ पत्रकारिता के इन दोनो उसूलों का पालन करते हुए ‘द पोस्‍ट फ़िल्म की प्रोटेगेनिस्‍ट कैथरिन ग्राहम ने अपने अंतरद्वंद को हल किया. बहुुचर्चित फ़िल्म ‘द पोस्‍ट’ देख कर उठी तो देर तक ये दोनो पंक्तियां कानों में गूंजती रही. एक निर्वाक् कर देने वाली फ़िल्म. खैर अब हालीवुड की फ़िल्मों यहां तक कि बालीवुड की फ़िल्मों के लिए भी यह टिप्‍पणी करना कि वे तकनीकी रूप से बेहद उन्‍नत हैं या कि उनकी एडिटिंग बेहद कसी हुयी है, एक सामान्‍य कमेंट है. फिल्‍ममेकिंग आमतौर पर जिस उंचाई पर पहुंच गयी है वहां तकनीक की सराहना करना दरअसल उस उंचाई को नहीं छू पाता. लेकिन किसी फिल्‍म के प्रस्‍तुतिकरण में स्क्रिप्‍ट और निर्देशन और अभिनय उस फिल्‍म को अन्‍य फ़िल्मों से अलग करते है. इस मायने में फ़िल्म ‘द पोस्‍ट’ बेजोड़ है.
‘द पोस्‍ट’ दरअसल फिल्‍म है इसकी सशक्‍त अभिनेत्री मेरिल स्‍ट्रीप की. उनका बेजोड़ अभिनय इस फिल्‍म को बेहद असरदार बना देता हैं. मेरिल स्‍ट्रीप ने इस पिक्‍चर में कैथरीन ग्राहम की भूमिका निभाई है. कैथरीन यानी के ग्राहम, अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार द वाशिंगटन पोस्‍ट की प्रकाशक मालकिन है. जो अपने पति की मौत के बाद अखबार का कामकाज देखती है. लाज़मी है कि उस वक्‍त उसे पितृसत्‍तात्‍मक सोच से भी निपटना पड़ता है.
ये कहानी बुनी गयी है (दरअसल यह एक सच्‍ची कहानी है और इन कागज़ात के चोरी होने का साहस करने वाले लोगों पर अमेरिका में पहले ही एक डाक्‍यूमेंट्री फिल्‍म ‘1971’ के नाम से बन चुकी है. जिसमें दिखाया गया है कि पेंटागन से इन सीक्रेट दस्‍तावेजों को चुराने वाले कुछ लोगों को सालों छिप कर जीवन जीना पड़ा था.) 1971 के अमेरिका की पृष्‍ठभूमि में. जब अमेरिका वियतनाम युद्ध में बुरी तरह से फंसा हुआ था. विगत तीस सालों से यह युद्ध लड़ा जा रहा था जहां हज़ारों अमरीकी सैनिकों ने अपनी जान गंवा दी थी. अमरीकी जनता इसका पुरज़ोर विरोध कर रही थी. समूचे अमेरिका में युद्ध विरोधी प्रदर्शन चल रहे थे. इसी माहौल में कुछ साहसी लोग अमेरिका के रक्षा आॅफिस पेंटागन से कुछ सीक्रेट कागज़ात चोरी करके उसे मीडिया में लीक कर देते हैं. अमेरिका के एक अन्‍य बड़े अखबार ‘द न्‍यूयार्क टाइम्‍स’ में पहली बार खबर छपती है. सुरक्षा का हवाला देकर अमरीकी सरकार उस पर वैधानिक कार्यवाई करती है. इसी समय वाशिंगटन पोस्‍ट को भी उससे सम्‍बन्धित दस्‍तावेज हासिल हो जाते हैं. अब सम्‍पादक बेन ब्रैडली ( अभिनेता टॉम हैन्‍क) और उसके सहयोगियों में मतभेद हो जाता है. एक पक्ष इन रिपोर्टों को छापने के पक्ष में है और दूसरा उसके विरोध में. अन्तिम फैसला के ग्राहम को करना है. जो इसका अर्थ अच्‍छी तरह जानती है कि रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद हो सकता है कि उसे जेल जाना पड़ता या अखबार को बन्‍द करना पड़ता. उसके कई पुरुष सलाहकार उसे ऐसा न करने की सलाह देते हैं, बल्कि उसे एक तरह से धमकाते भी हैं. ढेर सारे अन्‍तरद्वन्‍दों के बाद अन्‍तत: के ग्राहम अपने सम्‍पादक के साथ खड़ी होती है. और एक स्‍वतन्‍त्र प्रेस की भावना जीत जाती है.
समूची कहानी ऐसी सधी हुयी है कि दर्शक को एक थ्रिलर का मज़ा आता है. स्‍पीलबर्ग का निर्देशन निर्विवाद रूप से अद्भुत है. फिल्‍म के अन्‍त में मीडिया को व्‍हाइट हाउस में न घुसने देने का राष्‍ट्रपति के आदेश को तथ्‍यात्‍मक रूप देने के लिए स्‍पीलबर्ग निक्‍सन की वास्‍तविक आवाज़ को सुनाते हैं. वाह।
अमेरिका का मौजूदा निजाम यानी ट्रम्‍प भी मीडिया से कुछ वैसा ही भड़कता है. लेकिन उतने प्रतिगामी माहौल में भी वहां का मीडिया इतना रीढ़विहीन नज़र नहीं आता जितना कि आज के प्रतिगामी माहौल में भारतीय मीडिया लिजलिजा है. सम्‍भवत: ऐसा वहां के विगत के जनवादी आन्‍दोलनों का यह असर है। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए वहां का मीडिया भी कारपोरेट साम्राज्‍यवाद की ही सेवा करता है. लेकिन इतने विचलन मे भी वहां के समाज में ऐसे पत्रकार, अखबार और फिल्‍ममेकर हैं जो सच्‍चाई को सामने लाने का साहस करते हैं और वहां की जनता उन्‍हें हाथोंहाथ लेती है.
यह फिल्‍म इसलिए और अधिक कन्‍ट्रास्‍ट पैदा करती है कि आज भारत में मीडिया के तमाम माध्‍यमों में जिस तरह के हालात हैं उससे लगभग घिन आती है. अगर सोशल मीडिया पर भी कोई खुलकर अपने विचार व्‍यक्‍त करता है तो उसे पकड़कर जेल में डाल दिया जाता है. अभिव्‍यक्ति के तमाम रास्‍तों को रोक कर लुच्‍चे लफ्ंगे खड़े हैं. जिन्‍होंने अपने सारे जीवन में एक भी इतिहास की किताब नहीं पढ़ी होगी वह इतिहास के नाम पर तलवार भांज रहे हैं. फिल्‍मकार सती जैसे कर्मकाण्‍ड को महिमामण्डित कर रहे हैं. तमाम सारे टीवी चैनल लगातार नफरत की भाषा बोल रहे हैं. वे सरकार की चाटुकारिता की सारी हदें पार कर चुके हैं.
ऐसे में ‘द पोस्‍ट’ मूवी एक आइना है जिसे भारतीय मीडिया संस्‍थानों के कोर्स में कम्‍पल्‍सरी कर देना चाहिए. आज जब सरकार राफेल सौदे को ‘सुरक्षा’ का हवाला देते हुए उस पर हुए खर्च का ब्‍यौरा देने को तैयार नहीं, ऐसे में भारत में ‘द पोस्‍ट’ जैसी फिल्‍में बनने में न जाने कितना वक्‍त लगेगा. जबकि साहसी पत्रकारिता का दम भरने वाले अखबार द इंडियन एक्‍सप्रेस ने कुलभूषण जाधव का सच सामने लाने वाले पत्रकार प्रवीण स्‍वामी को नौकरी से निकाल दिया है……………
‘द पोस्‍ट’ के साथ ही एक और शानदार फिल्‍म ‘डार्केस्‍ट आवर’ आयी है. इन दोनो का केन्‍द्रीय विषय एक ऐसा अन्‍तर्द्वन्‍द है जहां उनके प्रोटेगेनिस्‍ट को अहम फैसला करना है और दोनो ही फिल्‍में आस्‍कर के लिए नामांकित हैं…..

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‘भीमा कोरेगांव’ के 200 साल के बहाने कुछ बातें

इस साल जब लोग नये साल का जश्न आदतन मना रहे होंगे तो समाज का एक हिस्सा 1 जनवरी को एक ऐसी घटना की 200वीं बरसी मना रहा होगा जिसने दलितों के आत्मसम्मान की लड़ाई को एक नयी दिशा दी। 1 जनवरी 1818 को महाराष्ट्र में पूना के नजदीक ‘भीमा कोरेगांव’ में अंग्रेजों की फौज के साथ मिलकर लड़ते हुए महारों की 500 की सेना ने मराठा पेशवाओं की 20000 से भी ज्यादा की फौज को शिकस्त देते हुए उन्हें भागने पर मजबूर कर दिया था। बाद में 1851 में इस युद्ध में मारे गये सैनिकों की याद में अंग्रेजों ने यहां एक ‘स्तम्भ’ का निर्माण करवाया जिसके ऊपर ज्यादातर महार सैनिकों के ही नाम खुदे हैं। ‘मुख्यधारा’ का इतिहास आज भी इस महत्वपूर्ण घटना की ओर आंखे मूंदे हुए है।
1 जनवरी 1927 को डाॅ अम्बेडकर ने यहां अपने साथियों के साथ आकर उन महार सैनिकों को याद किया जिन्होंने भयंकर जातिवादी और प्रतिक्रियावादी पेशवाओं की सेना को शिकस्त देते हुए कई सारे जातिगत मिथकों को तोड़ डाला था और दलितों के आत्म सम्मान को ऊंचा उठाया था। (शायद यहीं से प्रेरणा लेते हुए डाॅ अम्बेडकर ने 1926 में ‘समता सैनिक दल’ की स्थापना की थी) तब से हर साल यहां लाखों की भीड़ उमड़ती है और दलित आन्दोलन व जनवाद की लड़ाई से जुड़े लोग यहां आकर अनेकों कार्यक्रम पेश करते हैं और जाति व्यवस्था के खात्मे की शपथ लेते हैं।
महारों की सेना द्वारा पेशवाओं की सेना पर इस विजय के महत्व को हम तभी अच्छी तरह समझ सकते है जब हम पेशवाओं के राज्य में महारों की क्या स्थिति थी यह जाने। पेशवाओं के राज्य में महारों को सार्वजनिक स्थलों पर निकलने से पहले अनिवार्य रुप से अपने गले में घड़ा और कमर में पीछे झाड़ू बांधनी पड़ती थी। जिससे उनके पैरों के निशान खुद ब खुद मिटते रहें और उनकी थूक सार्वजनिक स्थलों पर ना गिरे ताकि सार्वजनिक स्थल ‘अपवित्र’ ना हो। अपनी इसी स्थिति के कारण महारों के दिलो-दिमाग में ब्राहमणों और तथाकथित ऊची जातियों के प्रति सदियों से जो नफरत बैठी होगी, उसी नफरत ने उन्हें वह ताकत दी जिससे वे अपने से संख्या में कहीं ज्यादा पेशवाओं की सेना को वापस भागने पर मजबूर कर दिया। इस युद्ध ने वर्णव्यवस्था के उस मिथक को भी चूर चूर कर दिया कि एक ही जाति में लड़ने की काबिलियत है।
सवर्ण मानसिकता से ग्रस्त ‘इतिहासकारों’ ने इस घटना को नजरअंदाज किया, यह बात तो समझ आती है, लेकिन ‘मार्क्सवादी’ कहे जाने वाले इतिहासकारों ने भी इसे क्यो नजरअंदाज किया,इसे समझने की जरुरत है।
‘मुख्यधारा’ के इतिहासकारों के अनुसार महारों ने भीमा कोरेगांव की यह लड़ाई अग्रेजों के नेतृत्व में अंग्रेजों के साथ मिलकर लड़ी थी तो इतिहास में इसे प्रगतिशील कदम कैसे कहा जा सकता है। अपने इसी रुख के कारण आजादी के आन्दोलन के दौरान डाॅ अम्बेडकर की भूमिका पर भी उन्होंने (विशेषकर ‘मार्क्सवादी’ इतिहासकारों ने) प्रश्न चिन्ह खड़े किये। मुख्य धारा के वाम में अन्दरुनी हलकों में तो उन्हें अंग्रेजों का दलाल तक माना जाता रहा है।
इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर लौटने से पहले चलिए विश्व इतिहास की कुछ अन्य इससे मिलती जुलती घटना पर एक नज़र डाल लेते हैं।
भीमा कोरेगांव की घटना के ठीक 42 साल पहले 4 जुलाई 1776 को अमेरिका, इंग्लैंड के खिलाफ लड़कर स्वतंत्र हुआ। ‘जार्ज वाशिंगटन’ और ‘जेफरसन’ के नेतृत्व में लड़े गये इस ‘अमरीकी स्वतंत्रता संग्राम’ में वहां के काले गुलाम अफ्रीकी लोग और वहां के मूल निवासी किसके पक्ष में लड़े थे? आपको शायद आश्चर्य हो लेकिन यह सच है कि इनका अधिकांश हिस्सा इंग्लैंड के पक्ष में जार्ज वाशिंगटन की सेना के खिलाफ लड़ रहा था। 4 जुलाई 1776 के बाद का इतिहास यह दिखाता है कि उनका निर्णय सही था। क्योकि इसी दिन घोषित तौर पर दुनिया का पहला नस्ल-भेदी देश अस्तित्व में आया, जहां स्वतंत्रता सिर्फ गोरे लोगेां के लिए थी और काले लोगो के लिए गुलामी करना नियम था। (‘स्टेच्यू आॅफ लिबर्टी’ काले लोगों की गुलामी से जगमगा रही थी।) स्वयं जार्ज वाशिंगटन और जेफरसन के पास सैकड़ों की संख्या में काले गुलाम उनकी निजी सम्पत्ति के रुप में मौजूद थे। 2014 में अमरीका के मशहूर इतिहासकार ‘गेराल्ड होने’ (Gerald Horne) ने इसी विषय पर एक विचारोत्तेजक किताब लिखी- The Counter-Revolution of 1776। इसमें उन्होंने विस्तार से अमरीकी स्वतंत्रता सग्राम के दौरान वहां के काले गुलामों और गोरे अमरीकियों के बीच के ‘शत्रुतापूर्ण अन्तरविरोधों’ की चर्चा की, जिससे वहां के मुख्यधारा के गोरे इतिहासकार नज़र चुराते रहे हैं।
इसे एक रुपक मानकर यदि हम इसे तत्कालीन भारत पर लागू करे तो कुछ आश्चर्यजनक समानताएं दिखती हैं। यहां के दलितों (विशेषकर ‘अछूतों’) का ‘शत्रुतापूर्ण अन्तरविरोध’ यहां के ब्राहमणवादी उच्च वर्ण के साथ होगा या बाहर से आये उन अंग्रेजों के प्रति होगा जो कम से कम छूआछूत का प्रयोग तो नहीं ही करते थे, और जिन्होेंने शिवाजी के बाद पहली बार महारों को अपनी सेना में प्रवेश दिया। इतिहास कुछ सेट फार्मूलों से नहीं बल्कि अपने वस्तुगत अन्तरविरोधों से आगे बढ़ता है। ‘देशी’ पेशवाआंे और ‘बाहरी’ अंग्रेजों के बीच लड़ाई में वे किस तर्क से पेशवाओं का साथ देते?
इसे और बेहतर तरीके से समझने के लिए इतिहास की एक अन्य महत्वपूर्ण घटना को ले लेते हैं। 410 ईसवी में जब जर्मन कबीलों ने रोम पर भयानक हमला बोला तो रोम के गुलामों ने क्या अपने दास स्वामियों का साथ दिया। नहीं! उन्होंने जर्मन कबीलों के साथ मिलकर रोम की नींव हिला दी। क्या यह रोम के साथ गुलामों की गद्दारी थी? इसे आप खुद ही तय कर लीजिए। इस वक्त गुलामों की क्या स्थिति थी, इसे जानने के लिए हावर्ड फास्ट की मशहूर कृति ‘स्पार्टकस’ पढ़ा जा सकता है।
1688 की ‘गौरवपूर्ण क्रान्ति’ ने गुलामों के व्यापार को अंग्रेज व्यापारियों के लिए मुक्त कर दिया। इसके पहले गुलाम व्यापार पर सिर्फ राजा का अधिकार होता था और यह सीमित था। इसके फलस्वरुप अफ्रीका से गुलामों का व्यापार सैकड़ों गुना बढ़ गया और उन्हें जहाजों में ठूस ठूस कर अटलान्टिक सागर के दोनों ओर गुलामी के लिए भेजा जाने लगा। उन गुलामों की नज़र से देखिये तो उनके लिए इस ‘गौरवपूर्ण क्रान्ति’ में गौरवपूर्ण क्या था?
पुनः भारत पर लौटते हैं। यहां जाति व्यवस्था हिन्दू धर्म का अनिवार्य हिस्सा है। दरअसल उस अर्थ में हिन्दू धर्म, धर्म भी नहीं है जिस अर्थ में ईसाई या मुस्लिम धर्म हैं। इसमें ना कोई एक ईश्वर है ना बाइबिल या कुरान की तरह कोई एक किताब है। और जैसा कि अम्बेडकर इसे सटीक तरीके से बताते है कि हिन्दू धर्म में एक ही चीज ऐसी है जो सभी हिन्दुओं को आपस में बांधती है, और वह है उसकी जाति व्यवस्था। जिसे सभी हिन्दू अनिवार्य रुप से मानते हैं। इस जाति व्यवस्था में सबसे निचली पायदान पर हैं ‘अछूत’, शेष जातियां जिनकी छाया से भी बचती हैं। वर्ण व्यवस्था से भी ये बाहर हैं। हिन्दू मन्दिरों और हिन्दू अनुष्ठानों में इनका प्रवेश वर्जित है। इस रुप में यह दुनिया का पहला और निश्चित रुप से आखरी धर्म है जो अपने ही एक समुदाय की ईश्वर तक पहुंच को सचेत तरीके से रोक देता है। ज्योति बा फुले की शिष्या ‘मुक्ता साल्वे’ ने 1855 में लिखे अपने एक लेख में इस तर्क को बहुत असरदार तरीके से रखा है-‘यदि वेद पर सिर्फ ब्राहमणों का अधिकार है, तब यह साफ है कि वेद हमारी किताब नहीं है। हमारी कोई किताब नहीं है-हमारा कोई धर्म नहीं है। यदि वेद सिर्फ ब्राहमणों के लिए है तो हम कतई बाध्य नहीं हैं कि हम वेदों के हिसाब से चले। यदि वेदों की तरफ महज देखने भर से हमें भयानक पाप लगता है (जैसा कि ब्राहमण कहते हैं) तब क्या इसका अनुसरण करना हद दर्जे की मूर्खता नहीं है? मुसलमान कुरान के हिसाब से अपना जीवन जीते हैं, अंग्रेज बाइबिल का अनुसरण करते हैं और ब्राहमणों के पास उनके वेद हैं। चूंकि उनके पास अपना अच्छा या बुरा धर्म है, इसलिए वे लोग हमारी तुलना में कुछ हद तक खुश हैं। हमारे पास तो अपना धर्म ही नहीं है।’ हे भगवान! कृपया हमें बताइये कि हमारा धर्म क्या है?’
इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए डाॅ अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म को अमानवीय धर्म कहा है।
यदि हम इसकी तुलना ईसाई धर्म या मुस्लिम धर्म से करते है तो पाते हैं कि वे जहां भी जाते थे, वहां के निवासियों को अपने धर्म से जोड़ने का प्रयास करते थे। अपने सभी धार्मिक अनुष्ठानों, अपने पूजा स्थलों में उन्हें शामिल करते थे और अपने ईश्वर के साथ उनका नाता जोड़ते थे। हालांकि यह कहने की जरुरत नहीं है कि इसमें उनके अपने राजनीतिक व आर्थिक हित जुड़े होते थे (इस प्रक्रिया को क्यूबा में 1975 में बनी मशहूर फिल्म ‘दि लास्ट सपर’ में बहुत शानदार तरीके से दिखाया गया है)। लेकिन इसके बावजूद हिन्दू धर्म से उनका रणनीतिक अन्तर बहुत साफ है।
यदि हम ‘अछूतों’ की आर्थिक हैसियत की बात करें तो यह बात साफ है कि उनके पास अपनी व्यक्तिगत चीजों के अलावा कोई सम्पत्ति नहीं होती थी। वास्तव में ‘अछूतों’ के लिए सम्पत्ति रखना धार्मिक तौर पर मना था।
यानी हिन्दू धर्म में ही ऐसा सम्भव है जहां समाज के एक समुदाय ‘अछूत’ को ना सिर्फ आर्थिक तौर पर गरीब रखा जाता है वरन् धर्म व ईश्वर से वंचित रखकर उसकी ‘आध्यात्मिक सम्पत्ति’ भी छीन ली जाती है।
धर्म पर इतनी बात इसलिए जरुरी है क्योकि हम समाज में मौजूद वर्गीय अन्तरविरोधों को तो पकड़ लेते हैं, लेकिन धर्म के अन्दर या धर्म के आवरण में मौजूद अन्तरविरोधों को नहीं देख पाते या उसे नजरअंदाज कर देते है। जाति उन्मूलन पर लिखे अपने क्रान्तिकारी दस्तावेज ‘जातिभेद का उच्छेद’ में अम्बेडकर हिन्दू धर्म की तमाम कुटिलताओं-शब्दाडम्बरों को भेदकर उसके भीतर या उसके आवरण में मौजूद उस शत्रुतापूर्ण अन्तरविरोध को सामने लाते है जिस पर अब तक पर्दा पड़ा हुआ था। इस अति महत्वपूर्ण किताब के माध्यम से अम्बेडकर ने समूचे दलित समुदाय को हिन्दू धर्म से बाहर खींचकर उन्हें मानसिक गुलामी से आजाद कर दिया और उन्हें स्वतंत्र वैचारिक जमीन मुहैया करायी, जिस पर भावी दलित आन्दोलन की नींव रखी जानी थी। इसी किताब में निष्कर्ष के रुप में अम्बेडकर ने यह साफ कर दिया कि इस शत्रुतापूर्ण अन्तरविरोध (अम्बेडकर ने ‘शत्रुतापूर्ण अन्तरविरोध’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है, लेकिन उनका मतलब यही है।) को बनाये रखते हुए समाज का जनवादीकरण करना या/और राष्ट्र निमार्ण करना असम्भव है। डाॅ अम्बेडकर के शब्दो में-‘जातिप्रथा की नींव पर किसी भी प्रकार का निर्माण संभव नही है।’ इसीलिए काग्रेस द्वारा चलाये जा रहे ‘आजादी’ के आन्दोलन को वे उचित ही शक की निगाह से देख रहे थे। उन्होंने साफ साफ कहा-‘प्रत्येक कांग्रेसी को जो बराबरी का यह सिद्धान्त बार बार दुहराता है कि एक देश को दूसरे देश पर राज करने का अधिकार नहीं है, उन्हें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि एक वर्ग दूसरे वर्ग पर राज करने के योग्य नहीं है।’ कांग्रेस और गांधी को राष्ट्रीय आन्दोलन का पर्याय बताने वाले इतिहासकार यह बताना भूल जाते हैं कि गांधी आजीवन वर्णव्यवस्था और प्रकारान्तर से जाति व्यवस्था के समर्थक बने रहे। यही कारण है कि गांधी ने खुलेआम ऐलान किया कि अम्बेडकर हिन्दुत्व के लिए चुनौती हैं। दरअसल कांग्रेस में तिलक के आने के बाद से ही कांग्रेसी नेतृत्व निरन्तर रुढि़वादी और साम्प्रदायिक होता गया है। ‘पंडित’नेहरु इसके अपवाद नहीं वरन इस पर पड़ा वह झीना पर्दा था जो अक्सर ही फट जाया करता था और कांग्रेस का असली चेहरा सामने आ जाया करता था। इस बात पर भी चर्चा होनी चाहिए कि आज हम जिस फासीवाद को अपने नंगे रुप में देख रहे हैं, उसका कितना सम्बन्ध आजादी के आन्दोलन के दौरान और उसके बाद के कांग्रेस और उसके नेतृत्व से रहा है। खैर इस पर चर्चा फिर कभी। अन्त में-देखिये, नामदेव धसाल की एक शानदार कविता-

सूरज की ओर पीठ किये, वे शताब्दियों तक यात्रा करते रहे,
अब-अब, अंधियारे की ओर यह यात्रा हमें बन्द करनी चाहिए,
और यह कि इस अंधेरे को ढोते ढोते हमारे पिता अब झुक गये हैं,
अब-अब, हमें उस बोझ को उनकी पीठ से हटाना होगा,
इस वैभवशाली शहर को बनाने में हमारा खून बहा है,
इसके बदले में हमें केवल पत्थर खाने को मिले हैं,
अब-अब, इस गगनचुम्बी इमारत को हमें उड़ाना होगा,
हजारों सालों के बाद हमें एक सूरजमुखी फूल देने वाला फकीर मिला है,
अब-अब, सूरजमुखी के फूल की तरह हमें अपना चेहरा,
सूरज की ओर कर लेना चाहिए।

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Matir Moina [The Clay Bird]

‘मातिर मोयना’ [The Clay Bird] कुछ उन फिल्मों में से है जिनकी सबसे बड़ी खूबी उनका ‘सरल नरेशन’ होता है।
मदरसे में पढ़ने वाले एक बच्चें अनु के माध्यम से 1960 के दशक के पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के राजनीतिक-सांस्कृतिक-सामाजिक और धार्मिक बदलावों की कहानी कहती यह फिल्म एक साथ ही बहुत मुखर भी है और बहुत शान्त भी, एकदम वहां की नदियों की तरह।
मशहूर डायरेक्टर तारिक मसूद की यह फिल्म 2002 में आयी थी, लेकिन बांग्लादेश में तुरन्त ही इसे बैन कर दिया गया। हालांकि 2002 में ही ‘कान्स फिल्म फेस्टिवल’ में इसे काफी सराहा गया। इस फिल्म का एक और सशक्त पहलू इसका संगीत है, जिसे बांग्ला की मशहूर गायिका मौसिमी भौमिक ने दिया है। ऊपर प्रस्तुत खूबसूरत सूफी गीत इसी फिल्म में से है।
और जैसा कि अक्सर ऐसी फिल्मों के साथ होता है, इसके सभी कलाकार ‘गैर पेशेवर’ है। जो इसकी सरलता और प्रवाह को और भी निखार देते हैं।
डायरेक्टर तारिक मसूद कुछ लोग उचित ही बांग्लादेश का ‘जफर पनाही’ भी कहते हैं।
आप यह खूबसूरत और अर्थपूर्ण फिल्म यहां देख सकते हैं।

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मुझे कदम-कदम पर

आज मुक्तिबोध का जन्मदिन है…..एक प्रिय कविता………

गजानन माधव मुक्तिबोध »

मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बांहें फैलाए!
एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं,
मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ,
बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तजुर्बे और अपने सपने….
सब सच्चे लगते हैं,
अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,
मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,
जाने क्या मिल जाए!

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में
चमकता हीरा है,
हर एक छाती में आत्मा अधीरा है
प्रत्येक सस्मित में विमल सदानीरा है,
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में
महाकाव्य पीडा है,
पलभर में मैं सबमें से गुजरना चाहता हूँ,
इस तरह खुद को ही दिए-दिए फिरता हूँ,
अजीब है जिंदगी!
बेवकूफ बनने की खातिर ही
सब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ,
और यह देख-देख बडा मजा आता है
कि मैं ठगा जाता हूँ…
हृदय में मेरे ही,
प्रसन्नचित्त एक मूर्ख बैठा है
हंस-हंसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है,
कि जगत…. स्वायत्त हुआ जाता है।
कहानियां लेकर और
मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते
जहां जरा खडे होकर
बातें कुछ करता हूँ
…. उपन्यास मिल जाते ।

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‘मिनिस्ट्री आॅफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ : आज के दौर का एक राजनीतिक दस्तावेज

बाल्ज़ाक ने कहा था ‘फिक्शन वस्तुतः देशों का गुप्त इतिहास होता है।’ लेकिन अरुन्धती राॅय का उपन्यास ‘मिनिस्ट्री आॅफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ भारत देश के वर्तमान दौर का एक ‘ओपन सीक्रेट’ है। यह एक ऐसा सीक्रेट है जिसे हम जितना ही गुप्त रखने का प्रयास करते हैं वह उतना ही खुलता जाता है।

‘एक बिखरी हुयी दास्तान कैसे कही जाए?
धीरे-धीरे हर किसी में तब्दील होकर
नहीं
धीरे-धीरे हर चीज़ में तब्दील होकर……….’

’अरुन्धती राॅय की नयी किताब ( ’गाॅड आॅफ स्माल थिंग्स’ के 20 साल बाद आया उपन्यास) ‘मिनिस्ट्री आॅफ+ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ इन्हीं बिखरी हुयी दास्तानों को समेटने का काम करता है। ज़ाहिर है इन बिखरी हुयी दास्तानों को पढ़ते हुए पाठक ‘हरेक’ में तब्दील हो जाता है। हर व्यक्ति में, हर चीज+ में………। (अगर वह दास्तानों को इन अर्थों में लेने की आदी है तो)। कोई आश्चर्य नहीं अरुन्धती ने पिछले दस सालों (जबसे उन्होंने इस पर काम करना शुरू किया) में हर मसले को, हर सबब को, हर चरित्र को अपने ऊपर झेला होगा। उनका सहानुभूति से तदनुभूति में बदल जाना ही इस किताब की सार्थकता है। अरुन्धती के शब्दों में उन्होंने वही चित्रित किया है जो वह सांस ले रही हैं। भारत की फिज़ाओं में जो ज़हर घुल गया है उसमें हम सभी सांस लेने को मजबूर हैं। वे भी जो फ़िज़ाओं में ज़हर घोल रहे हैं।पर उम्मीद बिल्कुल खत्म नहीं हुयी है। अभी भी दिल्ली के जन्तर मन्तर पर तमाम प्रतिबन्धों के बावजूद इस देश के हर तबके के प्रतिनिधि प्रतिरोध करने के लिए डटे हैं। इन्हीं प्रतिरोधों की पृष्ठभूमि में मिलती है एक नन्हीं सी बच्ची जिसकी कोई जाति नहीं, कोई धर्म नहीं, कोई मां-बाप नहीं। वह उस आन्दोलन की बेटी है जो अपने जल-जंगल-जमीन की लड़ाई लड़ रहा है। वह भविष्य की उम्मीद की एक उम्मीदवार है। जिसे खुशियों की एक ऐसी जगह पनाह मिलती है जो एक कब्रिस्तान में आबाद हुयी है। कब्रिस्तान में बना ‘जन्नत गेस्ट हाउस’। यहां समाज के ढेरों हाशियाकृत लोग और पशु पक्षी, पेड़-पौधे बारी-बारी से रहने आ जाते हैं। यह अनन्यतम खुशियों का मन्त्रालय है! इसे आबाद करने में सबसे बड़ी भूमिका है अंजुम की।
अंजुम जो पैदा हुयी तो उसे उसके मां बाप ने नाम दिया आफ़ताब। तीन बेटियों के बाद चैथा बेटा। लेकिन बेटा कभी आफ़ताब नहीं बन सका। वह वो नहीं था जिसकी उसके मां-बाप ने तमन्ना की थी, तीन बेटियों के बाद चैथा बेटा। वह एक अनिच्छित बेटी भी नहीं थी, जो भारतीय परिवारों में अक्सर बिना स्वागत के पैदा हो जाती हैं। वह एक उभयलिंगी बच्चा था। जिसकी प्रत्येक कोशिका में मादा हारमोन ज़्यादा तैर रहे थे। बरसों की उलझन, अपमान और अपने आप से संघर्ष करते हुए आफ़ताब शामिल हो जाता है ‘ख़्वाबगाह’ में जहां हिजड़ों की एक दूसरी दुनिया आबाद है जिससे ‘इस दुनिया’ का कुछ लेना देना नहीं है। जिसे ख़्वाबगाह के लोग ‘दुनिया’ कहते हैं वह तो उन्हें इंसान ही नहीं समझते, उनके प्रति प्रायः उदासीन रहते हैं। इस ख़्वाबगाह में आफ़ताब अंजुम हो जाती है। यहां ज़्यादा कम्फर्टेबल और महफ़ूज़ है वह। उस दुनिया में जहां उसकी मां उसे उतना ही प्यार करती है जितना अपने अन्य बच्चों को। लेकिन वह उसे दुनिया की नृशंस और क्रूर सोच से नहीं बचा पाती। अपने ख़्वाबगाह में पर्याप्त समय बिताने के बाद, वहां के तौर तरीके अपना लेने के बाद अंजुम एक बू्ढ़े व्यक्ति ज़ाकिर मिंया के साथ अजमेर शरीफ़ जाती है और वहीं से प्रसिद्ध कवि वली दकनी की मज़ार को एक बार देखने की हसरत लिए अहमदाबाद जाती है। यह वक्त वही है जब 2002 में गुजरात में मुस्लिमों के साथ वली दकनी की मज़ार का भी कत्लेआम हो रहा था। ज़ईफ़ ज़ाकिर मियां को हिन्दुओं ने मार दिया जबकि अंजुम बच गयी शायद इसलिए कि वह एक हिजड़ा थी। क्योंकि हिजड़े की हत्या करना हिन्दुओं के लिए एक अपशकुन होता है। (शायद उसी के आशीर्वाद से हिन्दुत्व की बेल आज फल फूल रही है) किस्मत ने पहली दफ़ा उसका साथ दिया। अहमदाबाद से वापस लौटने के बाद अंजुम वही नहीं रह जाती जो वह यहां से जाने के पहले थी। अन्त में एक झगड़े के बाद वह ‘ख़्वाबगाह’ छोड़ देती है और एक क़ब्रिस्तान में अपनी दुनिया बसाती है।
फिर तो किताब में बहुत कुछ है। जन्तर मन्तर है, जहां हर रंग हर शेड के आन्दोलनकारी हैं, कम्युनिस्ट हैं, भोपाल त्रासदी के आन्दोलनकारी हैं, कश्मीर के ग़ायब कर दिये गए बच्चों की मांएं है और अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी उपवास है। और इन सबमें अकेली छूट गयी नन्हीं सी बच्ची है जो अंजुम की नयी उम्मीद है। माब लिंचिंग है, ऊना है जहां दलित मरे हुए जानवर डीएम के कार्यालय के सामने फेंक कर प्रतिरोध जता रहे हैं और अपने आपको असर्ट कर रहे हैं। मनमोहन सिंह हैं, गुजरात के लल्ला हैं जिनकी 56 इंच छाती है, माथे पर तिलक है, जिनकी भावनाशून्य ठंडी आंखें हैं, जो भारत को ’हिन्दू पाकिस्तान’ बनाना चाहता है।
और हां उपन्यास में तिलोत्तमा है। तिलो जो ‘इस दुनिया’ से ‘उस दुनिया’ के बीच का पुल है। जो हममें आपमें से कोई भी हो सकता है बशर्ते हम वैसी नज+र रखें।
उपन्यास के एक बड़े हिस्से में कश्मीर है। ‘कश्मीर की सरज़मीन में प्यार करने से ज़्यादा आर्तनाद करना होता है’ (इसी किताब से)। इस ज़मीन पर आर्तनाद का सुर इतना प्रमुख है, जो हमारे ज़हनों में हर वक्त गूंजता रहता है। निश्चित रूप से प्यार के प्रतीक खूबसूरत बच्चे अभी भी पैदा हो रहे हैं इस ज़मीन पर। पर कुछ तो है जिसकी वजह से 10-11-12 साल के लड़के और अब लडकियों की भी मुट्ठियों में पत्थर आ जाते हैं। वे पत्थर उछाल रहे हैं माइटी भारतीय सेना पर जिनके लिए सेना प्रमुख बयान देते हैं कि काश उनके हाथों में हथियार होते तो दुनिया के ‘विशालतम लोकतन्त्र’ की पेशेवर सेना उनको युद्ध में अपने नवीनतम साॅफ़िस्टिकेटेड हथियार से परास्त कर देती। यानी उन्होंने स्वीकार कर लिया कि वे पत्थरों से हार रहे हैं। दरअसल ये पत्थर नहीं वह जज़्बा है जिससे वे हार रहे हैं। तभी तो मूसा (कश्मीरी क्रान्तिकारी) अपने एक समय के दोस्त आईबी (जिसका हृदय परिवर्तन हो चुका है?) अफसर से कहता है ‘भले हम गलत साबित हो जाएं, हम लड़ाई जीत चुके हैं।’………..‘तुम हम सभी को अपनी पैलेट गन से भले ही अन्धा कर दो, लेकिन यह देखने के लिए तुम्हारी आंखें खुली रहेंगी कि तुमने हमारे साथ क्या किया है। तुम हमें नहीं मार रहे तुम हमें रच रहे हो…….’(इसी किताब से)
उपन्यास का बड़ा हिस्सा कश्मीर की सरज़मीं है, जिसमें खूबसूरत वादियां नहीं, झेलम का शफ़्फ़ाक पानी नहीं….श्वेत धवल बर्फ के चित्र नहीं बल्कि बर्फ और झेलम के पानी में घुलता रक्त है जहां मानवाधिकार कार्यकर्ता वकील जालिब कादरी का शव बोरे में भर कर फेंक दिया जाता है। जहां भारतीय सेना का प्रतीक अमरीक सिंह है जो यातना देने के सारे गुर जानता है जो एक पेशेवर सेना के अधिकारी को आने चाहिए। अन्ततः वह कनाडा में शरण लेने को बाध्य होता है। डर वहां भी उसका पीछा नहीं छोड़ता और वह अपने परिवार को गोली मार कर खुदकुशी कर लेता है। मूसा कहता है ‘एक दिन कश्मीर इसी तरह भारत को आत्मघाती बनने को बाध्य कर देगा।’
इस तरह अरुन्धती ने उस कश्मीर पर लेखनी चलाने का साहस किया है जिस पर बोलने से भारत का बुद्धिजीवी वर्ग बचता रहा है। साम्प्रदायिकता और दलितों पर बोलने का साहस तो अब बहुत से लोग करने लगे हैं लेकिन कश्मीर अभी भी भारतीय बुद्धिजीवियों का खासतौर से हिन्दी भाषा में लेखन करने वाले बुद्धिजीवियों का टैबू बना हुआ है।
यह समूचा उपन्यास एक जटिल उपन्यास है। यह ऐसा उपन्यास कतई नहीं है जहां एक कहानी शुरू होकर अपने अन्त तक जाती है। विभिन्न चमत्कारिक शीर्षकों में बंटे इस उपन्यास के हर अध्याय में एक अलग कहानी है। जिसको पढ़ते वक्त कई बार दिमाग में गिरहें पड़ने लगती हैं। दिमाग तनावग्रस्त हो जाता है…….सम्भवतः हमें समझ नहीं आ रहा…….जो कुछ लिखा है वह कठिन है। और अगर अंग्रेज़ी अच्छी न आती हो तो दुरूहता और भी बढ़ जाती है। लेकिन अन्त तक आते-आते उपन्यास उन गिरहों को खोलने लगता है और सारी बात समझ में आने लगती है। लगता है मानो गणित के किसी कठिन सवाल को हल करते समय शुरुआती मुश्किलों के बाद सूत्र खुलने लगते हैं और सवाल हल हो जाता है। दिमाग वैसे ही हल्का और उपलब्धता बोध से भर जाता है। हां, उपन्यास का नाम ‘मिनिस्ट्री आॅफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ से पाठक एकदम से कनेक्ट नहीं होता।
पुनः भाषा और शिल्प की दृष्टि से यह उपन्यास काफी जटिल और कठिन है। इसका एक कारण यह है कि यह उपन्यास कहने की आम विधा को तोड़ता है. लेकिन सभी बड़ी रचनायें न केवल अपनी विषयवस्तु में बल्कि अपने शिल्प में भी परम्परा को तोड़ती ही हैं. यह उपन्यास भी कहानी कहने की परम्परागत विधि को तोड़ता है. लेकिन विषयवस्तु के सन्दर्भ में अरुन्धती की राजनीति बिल्कुल साफ है। शुरुआत से अन्त तक उनकी पक्षधरता बिल्कुल तय है । वे अन्याय के खिलाफ़ शोषित-वंचितों के पक्ष में खड़ी नज़र आती हैं। और यही इस उपन्यास की ताकत भी है। आज के दौर में ऐसी ही साफ-शफ़्फ़ाक पक्षधरता की ज़रूरत है।
कुल मिलाकर यह उपन्यास आज के दौर का ज्वलन्त राजनीतिक दस्तावेज है।

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अगर शार्क आदमी होते — बर्तोल्त ब्रेख्त

मकान मालकीन की छोटी लड़की ने क महाशय से पुछा– “अगर शार्क आदमी होते तो क्या छोटी मछलियों के साथ उनका व्यवहार सभ्य-शालीन होता?” उन्होंने कहा- “निश्चय ही, अगर शार्क आदमी होते तो वे छोटी मछलियों के लिए समुद्र में विशाल बक्से बनवाते, जिसके भीतर हर तरह के भोजन होते, तरकारी और मांस दोनों ही। वे इस बात का ध्यान रखते कि बक्सों में साफ पानी रहे और आम तौर पर वे हर तरह की स्वच्छता का इंतजाम करते। उदाहरण के लिए अगर किसी छोटी मछली का पंख चोटिल हो जाता तो तुरन्त उसकी पट्टी की जाती, ताकि वह मर न जाये और समय से पहले वह शार्क के लिए गायब न हो जाये। छोटी मछलियाँ उदास न हों इसलिए समय-समय पर विराट जल महोत्सव होता, क्योंकि प्रसन्नचित्त मछलियाँ उदास मछलियों से ज्यादा स्वादिष्ट होती हैं। निश्चय ही, बड़े बक्सों में स्कूल भी होते। उन स्कूलों में छोटी मछलियाँ यह सिखतीं कि शार्क के जबड़ों में कैसे तैरा जाता है। भूगोल जानना भी जरूरी होता, ताकि उदहारण के लिए, वे उन बड़े शार्कों को खोज सकें जो किसी जगह सुस्त पड़े हों। छोटी मछलियों के लिए प्रमुख विषय निश्चय ही नैतिक शिक्षा होता। उनको सिखाया जाता की दुनिया में यह सबसे अच्छी और बेहद सुन्दर बात होगी अगर कोई छोटी मछली ख़ुशी-ख़ुशी अपने को कुर्बान करे और यह कि उन सबको शार्कों पर भरोसा रखना होगा, खासकर तब जब वे कहें कि वे उनके लिए सुन्दर भविष्य मुहैया कर रहे हैं। छोटी मछलियों को पढ़ाया जाता कि यह भविष्य तभी सुनिश्चित होगा जब वे आज्ञाकारी बनना सीख जायें। छोटी मछलियों को सभी घटिया, भौतिकवादी, स्वार्थपरक और मार्क्सवादी रुझानों सावधान रहना होता और अगर उनमें से कोई दगाबाजी करके इन बातों में दिलचस्पी लेती तो तुरन्त इसकी सूचना शार्कों को देनी होती। अगर शार्क आदमी होते तो निश्चय ही वे एक दूसरे के खिलाफ युद्ध छेड़ते, ताकि दूसरे मछली बक्सों और दूसरी छोटी मछलियों को जीत सकें। युद्ध उनकी अपनी छोटी मछलियों द्वारा लड़ा जाता। वे अपनी छोटी मछलियों को सिखाते कि उनमें और दूसरे शार्कों की छोटी मछलियों के बीच भरी अन्तर है। वे घोषणा करते कि छोटी मछली चुप रहने के लिए सुविख्यात हैं, लेकिन वे बिलकुल अलग भाषाओं में चुप हैं और इसलिए एक दूसरे को समझ पाना उनके लिए असंभव होता है। हर छोटी मछली जो युद्ध में एक जोड़ी छोटी मछली, यानी अपने दुश्मन की हत्या करती उसे समुद्री शैवाल टाँका हुआ तमगा मिलता और उसको नायक की उपाधि से विभूषित किया जाता। अगर शार्क आदमी होते तो निश्चय ही कला भी होती। सुन्दर-सुन्दर तस्वीरें होतीं जिनमें शार्क की दाँतों को शानदार रंगों में चित्रित किया गया होता और उनके जबड़ों को निर्मल विहार उपवन के रूप में दर्शाया जाता जिसमें कोई भी शान से विचरण कर पाता। समुद्र की तलहटी में थियेटर यह दिखाता कि कैसे बहादुर छोटी मछलियाँ उत्साहपूर्वक शार्क के जबड़े में तैर रही हैं और संगीत इतना सुन्दर होता कि वह उनके सुर में सुर मिलाता रहता, आर्केस्ट्रा उनको प्रोत्साहित करता और अत्यंत मनोहर विचारों से श्लथ, छोटी मछलियाँ स्वप्निल बहाव के साथ शार्क के जबड़े में समातीं। एक धर्म भी होता अगर शार्क आदमी होते। वह उपदेश देता कि छोटी मछली वास्तव में केवल शार्कों के उदर में ही समुचित रूप से जीना शुरू करती हैं। इसके आलावा, अगर शार्क आदमी होते तो सभी छोटी मछलियों की बराबरी का दर्जा ख़त्म हो जाता, जैसा कि आजकल है। कुछ को महत्वपूर्ण पद दिये जाते और उनको बाकी सब से ऊँचा स्थान दिया जाता। जो थोड़ी बड़ी होतीं उन्हें अपने से छोटी मछलियों को खाने की भी इजाजत होती। शार्कों की इस बात पर पूरी सहमति होती क्योंकि उनको भी तो समय-समय पर थोडा बड़ा निवाला खाने को मिलता। और हाँ, जो छोटी मछलियाँ थोड़े बड़े आकर की होतीं वे अपने पदों पर काबिज होकर बाकी छोटी मछलियों के बीच व्यवस्था कायम करतीं। वे शिक्षक, अफसर, बक्सा निर्माण इंजीनियर इत्यादि हो जातीं। थोड़े शब्दों में, अगर शार्क आदमी होते तो पहली बार वे समुद्र के भीतर संस्कृति ले आते।

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