Matir Moina [The Clay Bird]

‘मातिर मोयना’ [The Clay Bird] कुछ उन फिल्मों में से है जिनकी सबसे बड़ी खूबी उनका ‘सरल नरेशन’ होता है।
मदरसे में पढ़ने वाले एक बच्चें अनु के माध्यम से 1960 के दशक के पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के राजनीतिक-सांस्कृतिक-सामाजिक और धार्मिक बदलावों की कहानी कहती यह फिल्म एक साथ ही बहुत मुखर भी है और बहुत शान्त भी, एकदम वहां की नदियों की तरह।
मशहूर डायरेक्टर तारिक मसूद की यह फिल्म 2002 में आयी थी, लेकिन बांग्लादेश में तुरन्त ही इसे बैन कर दिया गया। हालांकि 2002 में ही ‘कान्स फिल्म फेस्टिवल’ में इसे काफी सराहा गया। इस फिल्म का एक और सशक्त पहलू इसका संगीत है, जिसे बांग्ला की मशहूर गायिका मौसिमी भौमिक ने दिया है। ऊपर प्रस्तुत खूबसूरत सूफी गीत इसी फिल्म में से है।
और जैसा कि अक्सर ऐसी फिल्मों के साथ होता है, इसके सभी कलाकार ‘गैर पेशेवर’ है। जो इसकी सरलता और प्रवाह को और भी निखार देते हैं।
डायरेक्टर तारिक मसूद कुछ लोग उचित ही बांग्लादेश का ‘जफर पनाही’ भी कहते हैं।
आप यह खूबसूरत और अर्थपूर्ण फिल्म यहां देख सकते हैं।

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मुझे कदम-कदम पर

आज मुक्तिबोध का जन्मदिन है…..एक प्रिय कविता………

गजानन माधव मुक्तिबोध »

मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बांहें फैलाए!
एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं,
मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ,
बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तजुर्बे और अपने सपने….
सब सच्चे लगते हैं,
अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,
मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,
जाने क्या मिल जाए!

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में
चमकता हीरा है,
हर एक छाती में आत्मा अधीरा है
प्रत्येक सस्मित में विमल सदानीरा है,
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में
महाकाव्य पीडा है,
पलभर में मैं सबमें से गुजरना चाहता हूँ,
इस तरह खुद को ही दिए-दिए फिरता हूँ,
अजीब है जिंदगी!
बेवकूफ बनने की खातिर ही
सब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ,
और यह देख-देख बडा मजा आता है
कि मैं ठगा जाता हूँ…
हृदय में मेरे ही,
प्रसन्नचित्त एक मूर्ख बैठा है
हंस-हंसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है,
कि जगत…. स्वायत्त हुआ जाता है।
कहानियां लेकर और
मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते
जहां जरा खडे होकर
बातें कुछ करता हूँ
…. उपन्यास मिल जाते ।

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‘मिनिस्ट्री आॅफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ : आज के दौर का एक राजनीतिक दस्तावेज

बाल्ज़ाक ने कहा था ‘फिक्शन वस्तुतः देशों का गुप्त इतिहास होता है।’ लेकिन अरुन्धती राॅय का उपन्यास ‘मिनिस्ट्री आॅफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ भारत देश के वर्तमान दौर का एक ‘ओपन सीक्रेट’ है। यह एक ऐसा सीक्रेट है जिसे हम जितना ही गुप्त रखने का प्रयास करते हैं वह उतना ही खुलता जाता है।

‘एक बिखरी हुयी दास्तान कैसे कही जाए?
धीरे-धीरे हर किसी में तब्दील होकर
नहीं
धीरे-धीरे हर चीज़ में तब्दील होकर……….’

’अरुन्धती राॅय की नयी किताब ( ’गाॅड आॅफ स्माल थिंग्स’ के 20 साल बाद आया उपन्यास) ‘मिनिस्ट्री आॅफ+ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ इन्हीं बिखरी हुयी दास्तानों को समेटने का काम करता है। ज़ाहिर है इन बिखरी हुयी दास्तानों को पढ़ते हुए पाठक ‘हरेक’ में तब्दील हो जाता है। हर व्यक्ति में, हर चीज+ में………। (अगर वह दास्तानों को इन अर्थों में लेने की आदी है तो)। कोई आश्चर्य नहीं अरुन्धती ने पिछले दस सालों (जबसे उन्होंने इस पर काम करना शुरू किया) में हर मसले को, हर सबब को, हर चरित्र को अपने ऊपर झेला होगा। उनका सहानुभूति से तदनुभूति में बदल जाना ही इस किताब की सार्थकता है। अरुन्धती के शब्दों में उन्होंने वही चित्रित किया है जो वह सांस ले रही हैं। भारत की फिज़ाओं में जो ज़हर घुल गया है उसमें हम सभी सांस लेने को मजबूर हैं। वे भी जो फ़िज़ाओं में ज़हर घोल रहे हैं।पर उम्मीद बिल्कुल खत्म नहीं हुयी है। अभी भी दिल्ली के जन्तर मन्तर पर तमाम प्रतिबन्धों के बावजूद इस देश के हर तबके के प्रतिनिधि प्रतिरोध करने के लिए डटे हैं। इन्हीं प्रतिरोधों की पृष्ठभूमि में मिलती है एक नन्हीं सी बच्ची जिसकी कोई जाति नहीं, कोई धर्म नहीं, कोई मां-बाप नहीं। वह उस आन्दोलन की बेटी है जो अपने जल-जंगल-जमीन की लड़ाई लड़ रहा है। वह भविष्य की उम्मीद की एक उम्मीदवार है। जिसे खुशियों की एक ऐसी जगह पनाह मिलती है जो एक कब्रिस्तान में आबाद हुयी है। कब्रिस्तान में बना ‘जन्नत गेस्ट हाउस’। यहां समाज के ढेरों हाशियाकृत लोग और पशु पक्षी, पेड़-पौधे बारी-बारी से रहने आ जाते हैं। यह अनन्यतम खुशियों का मन्त्रालय है! इसे आबाद करने में सबसे बड़ी भूमिका है अंजुम की।
अंजुम जो पैदा हुयी तो उसे उसके मां बाप ने नाम दिया आफ़ताब। तीन बेटियों के बाद चैथा बेटा। लेकिन बेटा कभी आफ़ताब नहीं बन सका। वह वो नहीं था जिसकी उसके मां-बाप ने तमन्ना की थी, तीन बेटियों के बाद चैथा बेटा। वह एक अनिच्छित बेटी भी नहीं थी, जो भारतीय परिवारों में अक्सर बिना स्वागत के पैदा हो जाती हैं। वह एक उभयलिंगी बच्चा था। जिसकी प्रत्येक कोशिका में मादा हारमोन ज़्यादा तैर रहे थे। बरसों की उलझन, अपमान और अपने आप से संघर्ष करते हुए आफ़ताब शामिल हो जाता है ‘ख़्वाबगाह’ में जहां हिजड़ों की एक दूसरी दुनिया आबाद है जिससे ‘इस दुनिया’ का कुछ लेना देना नहीं है। जिसे ख़्वाबगाह के लोग ‘दुनिया’ कहते हैं वह तो उन्हें इंसान ही नहीं समझते, उनके प्रति प्रायः उदासीन रहते हैं। इस ख़्वाबगाह में आफ़ताब अंजुम हो जाती है। यहां ज़्यादा कम्फर्टेबल और महफ़ूज़ है वह। उस दुनिया में जहां उसकी मां उसे उतना ही प्यार करती है जितना अपने अन्य बच्चों को। लेकिन वह उसे दुनिया की नृशंस और क्रूर सोच से नहीं बचा पाती। अपने ख़्वाबगाह में पर्याप्त समय बिताने के बाद, वहां के तौर तरीके अपना लेने के बाद अंजुम एक बू्ढ़े व्यक्ति ज़ाकिर मिंया के साथ अजमेर शरीफ़ जाती है और वहीं से प्रसिद्ध कवि वली दकनी की मज़ार को एक बार देखने की हसरत लिए अहमदाबाद जाती है। यह वक्त वही है जब 2002 में गुजरात में मुस्लिमों के साथ वली दकनी की मज़ार का भी कत्लेआम हो रहा था। ज़ईफ़ ज़ाकिर मियां को हिन्दुओं ने मार दिया जबकि अंजुम बच गयी शायद इसलिए कि वह एक हिजड़ा थी। क्योंकि हिजड़े की हत्या करना हिन्दुओं के लिए एक अपशकुन होता है। (शायद उसी के आशीर्वाद से हिन्दुत्व की बेल आज फल फूल रही है) किस्मत ने पहली दफ़ा उसका साथ दिया। अहमदाबाद से वापस लौटने के बाद अंजुम वही नहीं रह जाती जो वह यहां से जाने के पहले थी। अन्त में एक झगड़े के बाद वह ‘ख़्वाबगाह’ छोड़ देती है और एक क़ब्रिस्तान में अपनी दुनिया बसाती है।
फिर तो किताब में बहुत कुछ है। जन्तर मन्तर है, जहां हर रंग हर शेड के आन्दोलनकारी हैं, कम्युनिस्ट हैं, भोपाल त्रासदी के आन्दोलनकारी हैं, कश्मीर के ग़ायब कर दिये गए बच्चों की मांएं है और अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी उपवास है। और इन सबमें अकेली छूट गयी नन्हीं सी बच्ची है जो अंजुम की नयी उम्मीद है। माब लिंचिंग है, ऊना है जहां दलित मरे हुए जानवर डीएम के कार्यालय के सामने फेंक कर प्रतिरोध जता रहे हैं और अपने आपको असर्ट कर रहे हैं। मनमोहन सिंह हैं, गुजरात के लल्ला हैं जिनकी 56 इंच छाती है, माथे पर तिलक है, जिनकी भावनाशून्य ठंडी आंखें हैं, जो भारत को ’हिन्दू पाकिस्तान’ बनाना चाहता है।
और हां उपन्यास में तिलोत्तमा है। तिलो जो ‘इस दुनिया’ से ‘उस दुनिया’ के बीच का पुल है। जो हममें आपमें से कोई भी हो सकता है बशर्ते हम वैसी नज+र रखें।
उपन्यास के एक बड़े हिस्से में कश्मीर है। ‘कश्मीर की सरज़मीन में प्यार करने से ज़्यादा आर्तनाद करना होता है’ (इसी किताब से)। इस ज़मीन पर आर्तनाद का सुर इतना प्रमुख है, जो हमारे ज़हनों में हर वक्त गूंजता रहता है। निश्चित रूप से प्यार के प्रतीक खूबसूरत बच्चे अभी भी पैदा हो रहे हैं इस ज़मीन पर। पर कुछ तो है जिसकी वजह से 10-11-12 साल के लड़के और अब लडकियों की भी मुट्ठियों में पत्थर आ जाते हैं। वे पत्थर उछाल रहे हैं माइटी भारतीय सेना पर जिनके लिए सेना प्रमुख बयान देते हैं कि काश उनके हाथों में हथियार होते तो दुनिया के ‘विशालतम लोकतन्त्र’ की पेशेवर सेना उनको युद्ध में अपने नवीनतम साॅफ़िस्टिकेटेड हथियार से परास्त कर देती। यानी उन्होंने स्वीकार कर लिया कि वे पत्थरों से हार रहे हैं। दरअसल ये पत्थर नहीं वह जज़्बा है जिससे वे हार रहे हैं। तभी तो मूसा (कश्मीरी क्रान्तिकारी) अपने एक समय के दोस्त आईबी (जिसका हृदय परिवर्तन हो चुका है?) अफसर से कहता है ‘भले हम गलत साबित हो जाएं, हम लड़ाई जीत चुके हैं।’………..‘तुम हम सभी को अपनी पैलेट गन से भले ही अन्धा कर दो, लेकिन यह देखने के लिए तुम्हारी आंखें खुली रहेंगी कि तुमने हमारे साथ क्या किया है। तुम हमें नहीं मार रहे तुम हमें रच रहे हो…….’(इसी किताब से)
उपन्यास का बड़ा हिस्सा कश्मीर की सरज़मीं है, जिसमें खूबसूरत वादियां नहीं, झेलम का शफ़्फ़ाक पानी नहीं….श्वेत धवल बर्फ के चित्र नहीं बल्कि बर्फ और झेलम के पानी में घुलता रक्त है जहां मानवाधिकार कार्यकर्ता वकील जालिब कादरी का शव बोरे में भर कर फेंक दिया जाता है। जहां भारतीय सेना का प्रतीक अमरीक सिंह है जो यातना देने के सारे गुर जानता है जो एक पेशेवर सेना के अधिकारी को आने चाहिए। अन्ततः वह कनाडा में शरण लेने को बाध्य होता है। डर वहां भी उसका पीछा नहीं छोड़ता और वह अपने परिवार को गोली मार कर खुदकुशी कर लेता है। मूसा कहता है ‘एक दिन कश्मीर इसी तरह भारत को आत्मघाती बनने को बाध्य कर देगा।’
इस तरह अरुन्धती ने उस कश्मीर पर लेखनी चलाने का साहस किया है जिस पर बोलने से भारत का बुद्धिजीवी वर्ग बचता रहा है। साम्प्रदायिकता और दलितों पर बोलने का साहस तो अब बहुत से लोग करने लगे हैं लेकिन कश्मीर अभी भी भारतीय बुद्धिजीवियों का खासतौर से हिन्दी भाषा में लेखन करने वाले बुद्धिजीवियों का टैबू बना हुआ है।
यह समूचा उपन्यास एक जटिल उपन्यास है। यह ऐसा उपन्यास कतई नहीं है जहां एक कहानी शुरू होकर अपने अन्त तक जाती है। विभिन्न चमत्कारिक शीर्षकों में बंटे इस उपन्यास के हर अध्याय में एक अलग कहानी है। जिसको पढ़ते वक्त कई बार दिमाग में गिरहें पड़ने लगती हैं। दिमाग तनावग्रस्त हो जाता है…….सम्भवतः हमें समझ नहीं आ रहा…….जो कुछ लिखा है वह कठिन है। और अगर अंग्रेज़ी अच्छी न आती हो तो दुरूहता और भी बढ़ जाती है। लेकिन अन्त तक आते-आते उपन्यास उन गिरहों को खोलने लगता है और सारी बात समझ में आने लगती है। लगता है मानो गणित के किसी कठिन सवाल को हल करते समय शुरुआती मुश्किलों के बाद सूत्र खुलने लगते हैं और सवाल हल हो जाता है। दिमाग वैसे ही हल्का और उपलब्धता बोध से भर जाता है। हां, उपन्यास का नाम ‘मिनिस्ट्री आॅफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ से पाठक एकदम से कनेक्ट नहीं होता।
पुनः भाषा और शिल्प की दृष्टि से यह उपन्यास काफी जटिल और कठिन है। इसका एक कारण यह है कि यह उपन्यास कहने की आम विधा को तोड़ता है. लेकिन सभी बड़ी रचनायें न केवल अपनी विषयवस्तु में बल्कि अपने शिल्प में भी परम्परा को तोड़ती ही हैं. यह उपन्यास भी कहानी कहने की परम्परागत विधि को तोड़ता है. लेकिन विषयवस्तु के सन्दर्भ में अरुन्धती की राजनीति बिल्कुल साफ है। शुरुआत से अन्त तक उनकी पक्षधरता बिल्कुल तय है । वे अन्याय के खिलाफ़ शोषित-वंचितों के पक्ष में खड़ी नज़र आती हैं। और यही इस उपन्यास की ताकत भी है। आज के दौर में ऐसी ही साफ-शफ़्फ़ाक पक्षधरता की ज़रूरत है।
कुल मिलाकर यह उपन्यास आज के दौर का ज्वलन्त राजनीतिक दस्तावेज है।

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अगर शार्क आदमी होते — बर्तोल्त ब्रेख्त

मकान मालकीन की छोटी लड़की ने क महाशय से पुछा– “अगर शार्क आदमी होते तो क्या छोटी मछलियों के साथ उनका व्यवहार सभ्य-शालीन होता?” उन्होंने कहा- “निश्चय ही, अगर शार्क आदमी होते तो वे छोटी मछलियों के लिए समुद्र में विशाल बक्से बनवाते, जिसके भीतर हर तरह के भोजन होते, तरकारी और मांस दोनों ही। वे इस बात का ध्यान रखते कि बक्सों में साफ पानी रहे और आम तौर पर वे हर तरह की स्वच्छता का इंतजाम करते। उदाहरण के लिए अगर किसी छोटी मछली का पंख चोटिल हो जाता तो तुरन्त उसकी पट्टी की जाती, ताकि वह मर न जाये और समय से पहले वह शार्क के लिए गायब न हो जाये। छोटी मछलियाँ उदास न हों इसलिए समय-समय पर विराट जल महोत्सव होता, क्योंकि प्रसन्नचित्त मछलियाँ उदास मछलियों से ज्यादा स्वादिष्ट होती हैं। निश्चय ही, बड़े बक्सों में स्कूल भी होते। उन स्कूलों में छोटी मछलियाँ यह सिखतीं कि शार्क के जबड़ों में कैसे तैरा जाता है। भूगोल जानना भी जरूरी होता, ताकि उदहारण के लिए, वे उन बड़े शार्कों को खोज सकें जो किसी जगह सुस्त पड़े हों। छोटी मछलियों के लिए प्रमुख विषय निश्चय ही नैतिक शिक्षा होता। उनको सिखाया जाता की दुनिया में यह सबसे अच्छी और बेहद सुन्दर बात होगी अगर कोई छोटी मछली ख़ुशी-ख़ुशी अपने को कुर्बान करे और यह कि उन सबको शार्कों पर भरोसा रखना होगा, खासकर तब जब वे कहें कि वे उनके लिए सुन्दर भविष्य मुहैया कर रहे हैं। छोटी मछलियों को पढ़ाया जाता कि यह भविष्य तभी सुनिश्चित होगा जब वे आज्ञाकारी बनना सीख जायें। छोटी मछलियों को सभी घटिया, भौतिकवादी, स्वार्थपरक और मार्क्सवादी रुझानों सावधान रहना होता और अगर उनमें से कोई दगाबाजी करके इन बातों में दिलचस्पी लेती तो तुरन्त इसकी सूचना शार्कों को देनी होती। अगर शार्क आदमी होते तो निश्चय ही वे एक दूसरे के खिलाफ युद्ध छेड़ते, ताकि दूसरे मछली बक्सों और दूसरी छोटी मछलियों को जीत सकें। युद्ध उनकी अपनी छोटी मछलियों द्वारा लड़ा जाता। वे अपनी छोटी मछलियों को सिखाते कि उनमें और दूसरे शार्कों की छोटी मछलियों के बीच भरी अन्तर है। वे घोषणा करते कि छोटी मछली चुप रहने के लिए सुविख्यात हैं, लेकिन वे बिलकुल अलग भाषाओं में चुप हैं और इसलिए एक दूसरे को समझ पाना उनके लिए असंभव होता है। हर छोटी मछली जो युद्ध में एक जोड़ी छोटी मछली, यानी अपने दुश्मन की हत्या करती उसे समुद्री शैवाल टाँका हुआ तमगा मिलता और उसको नायक की उपाधि से विभूषित किया जाता। अगर शार्क आदमी होते तो निश्चय ही कला भी होती। सुन्दर-सुन्दर तस्वीरें होतीं जिनमें शार्क की दाँतों को शानदार रंगों में चित्रित किया गया होता और उनके जबड़ों को निर्मल विहार उपवन के रूप में दर्शाया जाता जिसमें कोई भी शान से विचरण कर पाता। समुद्र की तलहटी में थियेटर यह दिखाता कि कैसे बहादुर छोटी मछलियाँ उत्साहपूर्वक शार्क के जबड़े में तैर रही हैं और संगीत इतना सुन्दर होता कि वह उनके सुर में सुर मिलाता रहता, आर्केस्ट्रा उनको प्रोत्साहित करता और अत्यंत मनोहर विचारों से श्लथ, छोटी मछलियाँ स्वप्निल बहाव के साथ शार्क के जबड़े में समातीं। एक धर्म भी होता अगर शार्क आदमी होते। वह उपदेश देता कि छोटी मछली वास्तव में केवल शार्कों के उदर में ही समुचित रूप से जीना शुरू करती हैं। इसके आलावा, अगर शार्क आदमी होते तो सभी छोटी मछलियों की बराबरी का दर्जा ख़त्म हो जाता, जैसा कि आजकल है। कुछ को महत्वपूर्ण पद दिये जाते और उनको बाकी सब से ऊँचा स्थान दिया जाता। जो थोड़ी बड़ी होतीं उन्हें अपने से छोटी मछलियों को खाने की भी इजाजत होती। शार्कों की इस बात पर पूरी सहमति होती क्योंकि उनको भी तो समय-समय पर थोडा बड़ा निवाला खाने को मिलता। और हाँ, जो छोटी मछलियाँ थोड़े बड़े आकर की होतीं वे अपने पदों पर काबिज होकर बाकी छोटी मछलियों के बीच व्यवस्था कायम करतीं। वे शिक्षक, अफसर, बक्सा निर्माण इंजीनियर इत्यादि हो जातीं। थोड़े शब्दों में, अगर शार्क आदमी होते तो पहली बार वे समुद्र के भीतर संस्कृति ले आते।

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कृषि संकट : आर्थिक कुप्रबंधन की देन है – देविंदर शर्मा

देविंदर शर्मा

देश में खेती की निर्भरता का सच क्या है? जीडीपी में योगदान का वास्तविक आंकड़ा कितना है?

सच ये है कि हर प्रधानमंत्री देश को कृषि प्रधान बताता है। मगर बजट पेश करने वाला हर वित्त मंत्री बजट में एग्रीकल्चर बाटम पर व उद्योग टाप पर रखता है। लोगों को विश्वास दिलाने को कहता है कि देश कृषि प्रधान है। हम खेती को ऐसा मंच नहीं बना पाये कि खेती देश के लिये लाभकारी साबित हो सके। वास्तव में कुल 52 फीसदी लोग कृषि पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर निर्भर हैं। यानी कुल 60 करोड़ लोग खेती पर निर्भर हैं। पिछली जनगणना में यह तथ्य सामने आया कि खेती पर निर्भर जनसंख्या कम होती जा रही है। अब  भूमिहीन काश्तकार का आंकड़ा बड़ा है। हम मानकर चलें कि करीब 35 करोड़ किसान भूमिहीन हैं और करीब कुल 25 करोड़ किसान खेत वाले हैं।
सकल घरेलू उत्पाद में खेती का योगदान लगातार घटा है?
जहां तक जीडीपी का सवाल है तो यह कुल योगदान का 14 प्रतिशत है। यह धारणा फैलायी जा रही है कि खेती का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान कम हो रहा है। जब हम किसानों को दाम का हक नही देंगे तो स्वाभाविक रूप खेती का जीडीपी में शेयर कम होगा। सीधी सी बात है कि यदि इनकम कम होगी तो उसकी हिस्सेदारी भी कम होगी। ये इरादतन कम किया गया है।

आरोप लगते रहे हैं कि सरकार कॉरपोरेट को श्रमिक उपलब्ध कराने के लिये किसानों को खेती से बेदखल कर रही है?

पहले सरकार की नीतियों को समझना जरूरी है। वास्तव में ये नीतियां क्या हैं। वर्ष 1996 में मुझे एमएस स्वामीनाथन फाउंडेशन के चेन्नई सम्मेलन में भाग लेने का मौका मिला। वहां विश्व बैंक के एक वाइस प्रेजीडेंट ने एक आंकड़ा प्रस्तुत किया। विश्व बैंक के अधिकारी ने कहा था कि 2015 तक भारत में गांव से शहर जाने वाले किसानों की संख्या इंग्ालैड, फ्रांस व जर्मनी की जनसंख्या से दोगुनी होगी। उस समय तीनों देशों की जनसंख्या बीस करोड़ थी यानी कि 40 करोड़ शिफ्ट होंगे। तब मैंने सोचा कि विश्व बैंक हमें सचेत कर रहा है। मगर जब मैंने 2008 में विश्व बैंक की रिपोर्ट देखी तो उसने सरकार को उलाहना दिया कि अब तक ये किसान कृषि से निकाले क्यों नहीं जा सके। डेवलेपमेंट रिपोर्ट में कहा गया कि जमीन अयोग्य लोगों के हाथों में है, जमीनों का अधिग्रहण तेज किया जाये। जो लोग खेती के अलावा कुछ नहीं जानते, उन्हें कृषि से हटाया जाये। जो युवा लोग खेती से जुड़े हैं, उन्हें ट्रेंिनग इंस्टीट्यूटों में, उद्योगों में काम करने का प्रशिक्षण दिलाया जाये। इसके ठीक एक साल बाद मैंने पाया कि 2009 में तत्कालीन वित्तमंत्री पी. चिंदबरम ने तत्काल 1000 आईटीआई खोलने की मंजूरी दे दी। यह सब सोची-समझी रणनीति के तरह लोगों को खेती से हटाने का उपक्रम है। ऐसे तौर-तरीकों से विकास नहीं होता। हम ये बात अब भी नहीं समझते कि यूरोप व अमेरिका में हुए बदलावों और भारत की स्थितियों में फर्क है। इससे आने वाले वर्षों में सोशो-इकोनॉमी चुनौती से देश में भयावह परिदृश्य उत्पन्न होगा।

क्या असली मुद्दा किसान की लागत न निकल पाना है?

दरअसल, किसान की लागत और मुनाफे की तो बात ही नहीं होती। जब हमारी व्यवस्था का मकसद ही खेतिहर लोगों को खदेड़ना है तो फिर क्या कहा जाये। दरअसल, हमने आधा अधूरा अमेरिकी माडल अपनाया है। पब्लिक सेक्टर में निवेश किया ही नहीं। कोशिश की कृषि उत्पादों की कीमत कम रखिये, जिससे मजबूर होकर किसान खेती छोड़कर मजदूर बन जाये। सही मायनो में हमने वाजिब दाम दिये ही नहीं। हमने कभी किसान की लागत को वर्क आउट किया ही नहीं। आंकड़ों पर नजर डालें तो जो गेहूं 1970 में 76 रुपये कंुतल था वह 2015 में 1450 रुपये कुंतल था यानी 45 साल में उसमें सिर्फ 19 गुना ही वृद्धि हुई। इस अवधि में यदि हम सरकारी कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि देखें तो बेसिक पे व डीए में करीब 120 से 150 गुना, कालेज टीचर के वेतन में 120 से 150 गुना और प्राइमरी टीचर के वेतन में 280 से 300 गुना तक वृद्धि हुई है। कर्मचारियों के कुल 108 तरह के भत्ते शामिल हैं, जबकि किसान को एक भी भत्ता नहीं मिलता। यानी किसान के खिलाफ मैच फिक्स है। वह खाद्यान्न की नहीं बल्कि दुखों की खेती करता है।

क्या किसान आंदोलन नोटबंदी के परिणामों और विपक्ष की राजनीतिक हताशा की शह से उपजा है?

मैं आंदोलन को इस तरह से नहीं देखता। किसानों के दिल में भयंकर गुब्बार है। ये गुस्सा  तो फूटना ही था। मौजूदा आंदोलन का अभी जो आप समापन देख रहे हैं, उसे किसी तरह हैंडल कर लिया गया। यदि हालात इसी तरह चलते रहे तो यह गुस्सा भयंकर ढंग से फूटेगा। खेती की अनदेखी की जा रही है, जानबूझकर किसान को खेती से बेदखल किया जा रहा है। ये तो अभी ट्रेलर है, असली फिल्म अभी बाकी है।

किसानों की समस्या की असली जड़ कहा है?

मूलत: कृषि समस्या आर्थिक कुप्रबंधन की समस्या है। इसके मूल में आर्थिक असुरक्षा है। साल-दर-साल किसान पिस रहा है। सरकार की कोशिश होती है कि किसी तरह से मुद्रास्फीति को नियंत्रण में किया जाये। ठीक है लोगों को सस्ता अनाज मिल रहा है, मध्य वर्ग खुश हो जाता है। मगर सवाल यह है कि जो अन्नदाता उपज पैदा कर रहे हैं, उसे आप क्या दे रहे हैं? उसे खेती से बेदखल किया जा रहा है। उससे हम पैसा ले तो रहे हैं मगर दे नहीं रहे हैं।

ऐसा क्यों है कि किसान की आत्महत्या की खबरें संपन्न इलाकों पंजाब, महाराष्ट्र आदि से आ रही हैं?

ऐसा नहीं है। इस समस्या के दो पहलू हैं। एक तो जो आत्महत्याएं हो रही हैं, उसकी सही तस्वीर सामने नहीं आ रही है। महत्वपूर्ण कारण यह है कि जहां किसान का फसल के साथ रिस्क जुड़ा है, वहां से आ रही हैं। जहां कैश क्रॉप के रूप में अंगूर, कपास आदि हैं, वहां से ज्यादा आत्महत्या की खबरें हैं। कुल 70 प्रतिशत कपास का क्षेत्र संवदेनशील है। दूसरे आत्महत्या के आंकड़ों की हकीकत सामने नहीं आ रही है। विदर्भ के इलाके में स्वयंसेवी संस्था से जुड़े किशोर तिवारी ने आत्महत्या का डाटा एकत्र कर देना शुरू किया। जब यह आंकड़ा निकलकर एनजीओ व मीडिया के पास आया तो देश को विदर्भ की हकीकत का पता चला। यदि ये सारे देश में होता तो वास्तविकता उभरकर सामने  आती। बुंदेलखंड से  भी आत्महत्याओं की खबरें आ रही हैं। अब लोग जागरूक हो रहे हैं। मैं चार साल पहले दिल्ली से चंडीगढ़ आया। प्रिंट मीडिया से मिली आत्महत्या की जानकारी को मैंने हर रोज ट्वीट करना शुरू किया। पंजाब हॉटस्पाट के बारे में लोगों को पता चला। दरअसल, सूचना बंटेगी तो पता चलेगा। उड़ीसा में भयंकर सुसाइड के मामले सामने  आ रहे हैं। देश में क्रेश क्रॉप की इनपुट कास्ट बढ़ी है।

आने वाले वक्त में खाद्य जरूरतें कितनी बड़ी चुनौती है?

ये बात कोई समझने की कोशिश नहीं कर रहा है। वर्ष 1965 में पहली बार खाद्यान्न का आयात किया गया। वर्ष 1967 में सबसे ज्यादा 11 मिलियन टन अनाज आयात किया गया। तब इसे हम शिप टू माउथ कहते थे। यानी जहाजों से उतरा  और सीधे खाद्यान्न के रूप में इस्तेमाल हुआ। देश में हरित क्रांति आई, इम्पोर्ट बंद हुआ। मगर आज हम उन्हीं नीतियों पर जा रहे हैं। इतने बड़े देश को फीड करना आसान नहीं होगा। जब भारत मार्केट में उतरता है तो कीमतें बढ़ती हैं। वहीं जब हम बेचने जाते हैं तो कीमतें गिर जाती हैं। भारत विश्व बाजार में बड़ा देश है तो उथलपुथल होगी। इतने बड़े देश को आयात करके खिलाना संभव नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी नेशनल सिक्योरिटी खाद्य सिक्योरिटी से जुड़ी है। हम जय जवान, मर किसान का नारा नहीं लगा सकते। वर्ष 2007-08 में जब खाद्यान्न संकट हुआ तो 37 देशों में खाद्यान्न को लेकर दंगे हुए। मगर भारत की स्वतंत्र व्यवस्था के चलते हम इससे प्रभावित नहीं हुए। भारत में खाना न हो तो क्या हो।

क्या परंपरागत फसलों की पैदावार खत्म होने व पानी वाली फसलों के प्रचलन से समस्या बढ़ी है?

असली समस्या तो लागत की है। हरेक चीज रिलेटिव है। हरित क्रांति से पहले भारतीय परंपरागत फसलों के हालात एेसे नहीं थे कि हम पूरे देश का पेट भर सकें। हरित क्रांति के बाद दो महत्वपूर्ण कदम उठाये गये। एक तो फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण, जिससे किसानों का व्यवस्था पर भरोसा बढ़ा। दूसरा एफसीआई का गठन । इतने बड़े देश में खाद्यान्न को हेंडल करना व डिस्िट्रब्यूट करना आसान नहीं था। माना कि भ्रष्टाचार बड़ी समस्या है मगर इसे डिस्मेंटल करना आत्मघाती कदम होगा। हम फिर शिप टू माउथ की स्थिति में पहंुच जायेंगे। हमें कास्ट आफ प्राडक्शन भी देखनी है। किसान को न्यायसंगत दाम तो मिलें। यदि किसान को मुद्रास्फीति के हिसाब से मौजूदा दर पर अनाज की कीमत मिले तो शहर गये लोग गांव आना शुरू कर देंगे। अनाज का बाजार मूल्य दें और बाकी लागत उसके जन धन खाते में स्थानांतरित कर दें।

देश में अथाह गरीबी है। कीमतें बढ़ाने से बढ़ी महंगाई से सामाजिक असमानता नहीं बढ़ेगी?

बिल्कुल नहीं। दुनिया में असमानता हर देश में है। कुल टॉप एक प्रतिशत लोगों को मोटा पैसा मिलता है। मिडिल क्लास को छोड़ दें तो देश में 60 करोड़ लोग खेती से जुड़े हैं। देश के आधे यानी 17 प्रदेशों में किसान की मासिक आय 1700 रुपये से कम प्रतिमाह है। इतने में तो हम गाय नहीं पाल सकते। आज जब मिनिमम लिविंग वेज की बात होती है तो किसान को भी तो यह मिलना चाहिए। हमारे देश में किसान उत्पाद भी है और उपभोक्ता भी है। यदि हम किसान को खर्च के बराबर पैसा देते हैं तो हमारी सात-आठ फीसदी के आसपास रहने वाली जीडीपी 15 तक पहुंच सकती है। तभी तो सबका साथ, सबका विकास होगा।

न्यू्नतम समर्थन मूल्य किसान के हित में कितना कारगर है?

मैं सीआईआई व फिक्की की बैठक में शामिल था तो खाद्य मंत्री ने पूछा कि एमएसपी के दायरे में कितने किसान हैं? अंदाजे से मैंने तीस फीसदी बताया। अधिकारी जबाव न दे पाये। एफसीआई को पता नहीं था, अगली मीटिंग में खुलासा हुआ कि छह प्रतिशत। यानी कुल 94 फीसदी किसान को कोई सुरक्षा कवच नहीं । ऐसे में किसान आत्महत्या नहीं करेगा तो क्या करेगा? कैसे जीयेगा किसान?
[https://devinder-sharma.blogspot.in/ से साभार]

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An Interview With Anand Patwardhan


For over 40 years Anand Patwardhan’s documentary films have stood for freedom of expression. He faced censorship on numerous occasions, took the government to court, and won each time. Anand is not just a filmmaker but an activist in the cause of Indian democracy, clearly under threat today. In this candid conversation with Vidya Bhushan Rawat, Anand discusses his views on the challenges before us, and most importantly, how he perceives both Gandhi and Ambedkar as liberation theologists whose ideas are in danger of being revised by their enemies.

VB: As a freedom lover secularist what is the difference between today’s media and that which existed during the official Emergency in 1975.

AP: The Emergency of 1975 was visible to all. The world condemned it and in India some brave newspapers protested with blank editorials. Within a fairly short time a strong resistance movement grew. Today’s Emergency is largely invisible to the masses because Indian media houses have been corporatized and these corporates, both Indian and foreign, are direct beneficiaries of an economic system that has been surreptitiously imposed on the country not just by the present regime but by forces that were already moving in the same direction but at a slower pace. We have sold our sovereignty to USA and the global corporates and people have been told that this is for our own good. The invisible Emergency of today depends on what Chomsky called “manufactured consent”.

VB: Today we face the biggest challenge to Indian democracy since independence when our civil liberties are under the attack, when freedom of expression is under threat and when media is constructing the ‘news’. Is ‘free media’ now the biggest threat to democracy?

AP: The media is free in the sense that it now has the freedom to tell lies about both, the domestic economy and about national security – lies that parrot an American-Israeli-Saudi axis which created, nurtured and unleashed Al Qaeda and ISIS on the one hand and pretended to “fight terror” on the other.

VB: You have documented major events not only of communal violence but also of violence against Dalits in Maharashtra. After the death of Rohit Vemula, in HCU, JNU and other campuses, students of all ideological frames – from the Left, to Ambedkarites and other Bahujan groups, joined in a common struggle against the ABVP and its attempt to vitiate the climate in the universities. Today that unity appears to be crumbling and we are again at the cross roads. Why ?

AP: The fault lies as much with the Left (of all shades) which is still unclear about how to destroy the caste system within, as with Dalit groups that fall prey to red-baiting and exclusivist identity politics. On one side are traditional Marxists who were brought up to think that caste is part of a superstructure that will automatically wither away when the economic base becomes socialist. On the other side are those who think that the caste of your birth alone forever determines how you think and how you act. Not only is such thinking contrary to the teachings of Dr. Ambedkar, it mirrors the mindset of the worst Manuvadis who believe that caste determines everything.

Luckily reality is proving both positions wrong. I believe that the Left and Dalits are natural allies so it is a matter of time before a genuine, long-lasting unity is forged. People like Govind Pansare, Kanhaiya Kumar and Jignesh Mevani have shown us that this unity is possible. Into this mix I would add progressive Gandhians – people like Narendra Dabholkar and Medha Patkar. Together these forces represent the politics of Reason that this country so desperately needs.

VB: Your film Jai Bhim Comrade was an extraordinary work which brought us back the memories of the struggle for justice of the people of Ramabai Nagar in Mumbai. You screened the film in various places. What were the reactions?

AP: The film as you know took 14 years to make. In the winter of 2011 we screened it in the open air in Dalit bastis across urban Maharashtra. We bought a powerful video projector, made a huge foldable cloth screen, and in each basti erected bamboo scaffolding to mount it on. As the screen was being erected, we played progressive film songs and Dalit movement songs to alert and attract the audience. Often the crowd would swell to well over a 1000 people. As we could not afford so many chairs, people sat on the ground or stood at the back and on the sides for the three hour duration of the film. At the end of the screening we tried to organize a discussion but often instead of a back and forth question and answer session, people just grabbed the mike and poured their hearts out about what the film had meant to them. It was an overwhelming experience for me. Later I began to understand the reasons for this amazing response. Although in the bastis, little of the hardship shown in the film was unknown to people, the fact that the film presented its protagonists not as victims but as resisters, was a morale booster. The genre of music heard in the film was in danger of either dying out or getting commercialized, so the film, so full of these songs captured over decades, served as a valuable archive. Lastly the politics of the film was appreciated, as it did not pull punches. It called to task not only sections of the Left for not recognizing the primacy of caste, but also Dalit leaders who were being lured by Manuvadi Hindutva to betray the legacy of Dr. Ambedkar.

Much later I began to show the film in colleges and schools and other middle class and elite circles. Here the response was enthusiastic but very different from that in the bastis. Even though people generally appreciated the film, almost invariably someone would ask about the evils of “reservations”. It was as if the audience had been blind and deaf to what they had just seen. After 3000 years where manual scavenging has been reserved for one caste alone and education has been forbidden, was it not time to reserve education seats for the dispossessed? In the end after long discussions, we agreed that reservations could be done away with only when the children of the rich and the children of the poor start going to the same schools – from the primary to the college level. Such prolonged inter-caste, inter-class contact could also open the door for inter-caste marriages. Many generations of such mixed marriages could finally end the caste system. This sounds idealistic but in my view this is the only way to finally end caste – when bloodlines become so mixed that no one can clearly say what caste they come from.

VB: Do you think that as secular activists we have not been able to communicate to common people in the language they understand or have failed to use the great secular legacy of India which was radical and rational as well?

AP: In general this is true but in particular some people are genuinely trying to address this. Of course the task is huge and we are up against a fascist force in the Brahminist RSS that has created a hydra-headed, cadre based organization that indoctrinates people in the name of cultural and religious pride, as well as today, of fake nationalism. In the early days they attracted mainly Brahmins. Today they are drawing in all castes and tribes that can be mobilized against their stated three enemies – Muslims, Christians and Communists. Religious culture and right wing politics is a potent combination and we rationalists have so far failed to match the organizational genius that runs this fascist machine.

VB: This government has been in hyper-active mode to keep people busy but if we analyse their actions we find clear attempts to divide people and polarize the debate. It started with their favorite topics like ‘Gaay’, Ganga, Rastrawaad, beef, Jana Gana Mana and then to Kashmir. Things went horribly wrong in Kashmir and the last part was a surgical strike but that too was questioned. Then came demonetization which hurt the poorest of the poor but was dressed up to look like an attack on “black money” and the rich. Each act is commonly linked, in my opinion, to privatizing our national resources and creating business for crony capital.

AP: Yes there is a clear strategy. Nothing in the Hindutva Parivar happens ad hoc or without central planning. At the same time perhaps Modi and Amit Shah have surprised even their own cadre by their willingness to be brutal and dishonest. Demonetization is an example. Even the direct beneficiaries, like the crony capitalists who emptied the banks and refused to pay back their loans must have been surprised at how the poor were squeezed to fill the bank coffers up again and then sold the idea that this was a strike on the unscrupulous rich. Even when all the “black money” came back into the banks and became white money, no question was raised while thousands of jobs were lost across the nation. It may be the undoing of Modi in the long run but in the short term he is still fooling most of the people most of the time.

VB: Communalism or I would call it Brahminism has joined hands with capitalism here but the resistance too is stronger. Unfortunately, political parties are unable to join hands with their egos and brinkmanship for votes. Will people’s pressure bring them together?

AP: At the moment there is no visible peoples’ pressure. There is visible suffering but the anger is not yet visible. Let us see if it manifests later.

VB: Do you feel that the Indian way of secularism i.e. equal respect to all religions, or what we call Sarva Dharma Samabhava is damaging the cause of social change as it allows religious dogmatics to hijack the leadership of different communities? There is a virtual competition between the religious right taking place in the polity thereby denying common persons of all communities the means to counter them. How do we respond to it?

AP: All over the world rationalists have found that religion that has existed for centuries is hard to stamp out and some form of co-existence is the norm in most secular countries. After the Soviet Revolution, St. Petersburgh became Leningrad but in 1991 it became St. Petersburgh again.

In India, both Gandhi and Ambedkar recognized that this country was so steeped in the idiom of religion that atheism or pure rationality would not be easily accepted by the masses. I consider Gandhi and Ambedkar, each in their own right, to be liberation theologists. Of course, Gandhi unlike Ambedkar, did not choose his own religion, he inherited it. But to whatever he inherited, he applied post-Enlightenment ethical values that were essentially modern. When he began to do manual scavenging and began to advocate this (even force it) on to his followers, he actually destroyed the very basis of the Pollution/Purity dichotomy that is at the heart of the caste system. Theoretically he for a long time infamously clung to the concept of Varnashram Dharma, but in actual deed he destroyed it the day he took up manual scavenging, a job that had been hitherto reserved for the so-called ‘untouchables’. As time went on Gandhi became ever more radical. He clearly learned from Dr. Ambedkar as well as from his own intuitive understanding of the world he was witnessing. For instance, towards the latter stages of his life, Gandhi refused to attend any marriage that was not an inter-caste marriage. By the end of his life he had fashioned out of his inherited Hinduism, something entirely new. Only the idiom remained, and not the original hierarchical Sanatan dharma. Whether his reluctance to discard the idiom was a practical decision that stemmed from a desire to remain in touch with the vast Indian masses in a language they could easily follow, or from his own inner belief system, is something that can be debated, but is of no great interest to me. What is unmistakable is that Gandhi’s ethical code bears little resemblance to the hierarchical and vengeful structure of traditional Hinduism.

Dr. Ambedkar in some ways was more fortunate than Gandhi in that he clearly saw how oppressive the religion of his birth was, being as he was, a direct victim of it. So he discarded it and searched for the best alternative to it. After examining many religions he finally chose the religion that was closest to Reason. Buddhism is the one world religion that does not posit an external, all-knowing God. However it has a very strong ethical core that Dr. Ambedkar highlighted. At the same time he discarded irrational and unproveable Buddhist tenets like Reincarnation that many traditional Buddhists ardently follow. This is why I see both Ambedkar and Gandhi as liberation theologists. In the same way that Left wing priests like Ernesto Cardinale in Latin America, a minister in Nicaragua’s revolutionary Sandinista government, re-interpreted Jesus Christ as a revolutionary who fought and died for justice to the poor and powerless, Gandhi and Ambedkar gave new ethical meaning to the religions they adopted and adapted.

Make no mistake that I am equating the two. Their differences are obvious. One came from a privileged caste, the other from the most oppressed. One was educated in a limited sense and steeped in traditional religion in his formative years while the other came from a caste denied the right to education and rose to become the best-read and easily the greatest intellectual of modern India.
I am not at all blind to the things about Gandhi that are paradoxical and irrational like his life-long demonization of sexuality. Gandhi’s insistence on chastity puts him in the same irrational, patriarchal boat as the priests and monks and nuns of many world religions. To examine this aspect in depth would take a whole chapter. And yet this same sex-denying man, by introducing the Charkha as a weapon of non-violent resistance, brought thousands of women into the mainstream of the Indian freedom movement.

I realize that I have let my stream of consciousness diverge from your original question. To get back to the issue about whether Sarva Dharma Samabhava can take the place of constitutionally guaranteed secular democratic rights, I think it cannot. We need Dr. Ambedkar’s Constitution much more than we need holy books. And yet as many in our country are still hooked to holy books and unholy pretenders, we need liberation theologists who can help people to culturally discard the worst features of their inherited religious culture and replace these with ethical, just and non-exclusivist interpretations.

Waiting for everyone to become atheist or rationalist may take centuries. Ethics is the answer. Small wonder that Ambedkar and Gandhi, each in their own way, arrived at individual definitions of Ahimsa.

VB: In post-Mandal India communities are seeking their space in the polity. In the earlier phase of secularism the Indian elite always kept the marginalised communities like Dalits, OBCs, Muslims outside the gates of their decision making bodies and public platforms but things are changing now. Very unfortunately more than the seculars it is the communalists who are jumping into identity politics and social engineering. Meanwhile communist parties still retain their upper caste leadership. Will we be able to face the challenge in such a way?

AP: Actually identity politics is a double-edged weapon. As long as oppression of identifiable groups exists, it is perfectly legitimate for oppressed groups to unite according to their identity. “Black is beautiful’ was a necessary movement for Afro-Americans in the USA, just as pride in Dalit or Buddhist identity is necessary in India. The trouble begins when this turns into an exclusivist or separatist movement. Malcolm X went through a Black Muslim phase when he described all white people as “devils”. But in the latter stages of his life he completely rejected this theory for a much more inclusive critique of injustice and inequality. That is when the American deep State killed him. Similarly while a broad section of Dalits are inclusive and fully understand the distinction Dr. Ambedkar made between the ideology of Brahminism and individuals who happen to be born into one or the other “upper” castes, there is a tiny section of separatist Dalits today who see birth as the sole determining factor. The fact that Western post-modern academia encourages such identity politics in preference to class analysis has given this form of separatist politics international acceptance. Meanwhile in India Manuvadi forces feel obvious glee when Dalits attack the Left or Gandhi, as both have long been the enemies of Hindutva.

VB: Hindutva people are expert in appropriating icons who are secular. They used Ambedkar, Bhagat Singh, Vivekananda, Subhash Chandra Bose, Sri Narayan Guru etc for their purposes. Is this because an overdose of Gandhi and Nehru’s role in our freedom struggle minimized all other icons that a kind of resentment began against Nehru and Gandhi?

AP: Frankly I am not a fan of Subhash Chandra Bose. I cannot swallow his alliance with Hitler and Hirohito. Freedom could not be wrested at such a cost. Vivekanand is also very troubling because he advocated a kind of machismo that I think is deeply problematic. Also what is little known about him is that he was deeply casteist. In fact he seems perfectly suited as a BJP icon. The resentment against Gandhi lies at the heart of the project of Hindutva which is why they killed him first and then attempted to appropriate his glasses and broomstick later. Nehru is hated because his development paradigm goes against the grain of privatization. Ambedkar they do not dare criticize openly these days so the only option is to use his image, minus any content.

VB: Your uncle Achyut Patwardhan was an icon of the socialist movement in India. We heard a lot about his relationship with Dr Baba Saheb Ambedkar. Was there any influence of him on your socio-political thoughts?

AP: Achyutkaka and Aruna Asaf Ali, according to British records, were amongst the most wanted underground leaders of 1942. He ran the underground radio and was a master of disguise amongst other things but in later years he ensured that history erased him. You hardly hear or read about him anywhere because soon after Independence he became disillusioned with mainstream politics. He did educational and social work but he would never discuss the past, even with me. He felt it had all been mostly an illusion. His elder brother, Purshottam (Raokaka to me) was also a freedom fighter and spent over 10 years in British jails. In the 1930’s while he was making an anti-communal speech, Madanlal Pahwa tried to assassinate him but was caught. Raokaka who was a Gandhian socialist, refused to file charges and Pahwa was let off. Later this same Pahwa threw a bomb at Gandhi and was part of the conspiracy that finally killed him.

To answer your next question, it is true that in the decade of the 1930’s Dr. Ambedkar spent several months living, writing and studying at our family farm home in Ahmednagar, but this again is a chapter of history that has been irretrievably lost. Raokaka like Achyut left active politics after Independence and both, by their own choice, were written out of history. I have heard that Dr. Ambedkar and Achyutkaka were friends and met when Achyutkaka was underground, but I have no documents about this. What I do know is that my family opposed the caste system and many married outside their own caste, including my parents.

VB: You have always tried to bring together not only left and Ambedkarites but also what you call ‘Progressive Gandhians’. Why are you using this term ? You have been critical of people who as you say ‘blow out of proportion’ the differences between Gandhi and Ambedkar. Many of the Ambedkarites feel it quite disturbing?

AP: I must speak the truth as I see it. I have always felt that the affinities between Gandhi and Ambedkar are greater than their differences. They were both egalitarian humanists at heart. It may not win me any popularity contest today but I think those who are ready to set prejudice aside and undertake a proper historical study will come around to this point of view. Take the act of “Satyagraha”, a term coined by Gandhi. Ambedkar used this very term and form of struggle to launch his Mahad Satyagraha to claim drinking water rights. There are many other examples of common ideas and action. I was pleasantly shocked to read what Dr. Ambedkar had to say in 1932 immediately after concluding the now infamous Poona Pact (where the idea of separate electorates for Dalits was abandoned in favour of reserved seats for Dalits). Popular theory is that Ambedkar was blackmailed by Gandhi’s fast-unto-death into accepting a bitter compromise. But Ambedkar’s statement in 1932 after signing the pact was totally different in tone. He had high praise for Gandhi and stated that the “Mahatma” (yes, contrary to popular belief, Ambedkar referred to Gandhi as “Mahatma” at this point in time) offered a much better deal for Dalits in terms of reserved seats than Ambedkar himself had asked or hoped for. There is no denying however that Ambedkar did get disgusted with the Congress in later years. How much of the blame for the failures of Congress are attributable to Gandhi is a matter of discussion and debate. We know that Gandhi’s writ did not work in preventing Partition or the bloodshed that preceded and followed it and that Gandhi did not attend the Independence Day flag hoisting at the Red Fort in Delhi. He was busy fighting the communal inferno in the countryside.

Gandhi had a lot of obscurantist ideas to start with but as time went on he was honest enough to keep evolving. In the end I see him as a great humanist who died for his belief in non-violence and religious universality. He was also an inventive anti-Imperialist (though in his earlier days he had supported the British Empire) and an organic naturalist that today’s madly consumerist, globally warmed world desperately needs. Are most of today’s Gandhians like that? Of course not. That is why I used the term ‘progressive Gandhians’. It describes dedicated non-violent fighters like Medha Patkar, Narendra Dabholkar, the whole Baba Amte family, Sandeep Pande, S.P Udaykumar, Teesta Setalvad, Aruna Roy, Admiral Ramdas, and so many others. It certainly does not include government-fed Gandhians and those Gandhians who jump onto the Hindutva bandwagon as soon as it gathers steam.

Today I believe that all humanists, rationalists and fighters for social and economic justice must unite to fight the usurpers of our democracy and our history.

Vidya Bhushan Rawat is a social and human rights activist. He blogs at www.manukhsi.blogspot.com twitter @freetohumanity Email: vbrawat@gmail.com
[http://www.countercurrents.org से साभार]

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शाबास स्वरा भास्कर

हम प्रायः अपनी धारणाओं के बन्दी होते हैं। यही हुआ मेरे साथ फिल्म अनारकली आफ आरा के सम्बन्ध में। फिल्म के प्रोमोज और कास्ट्यूम वगैरह देखकर लगा कि एक और लटके-झटके वाली फिल्म। जिसमें द्विअर्थी गाने होंगे और उसके माध्यम से औरत के माध्यम से चीप मनोरंजन का एक और प्रयास। फिल्म रिलीज हो गयी। उत्सुकता के बावजूद फिल्म देखने का कोई प्रोग्राम नहीं बनाया। आदतन रिव्यू पढ़ते हुए धारणाएं बदलने लगी और जब फिल्म देखी तो मुंह से अनायास निकला ‘शाबास स्वरा भास्कर’ं। पत्रकार अविनाश दास की पहली फिल्म है ये। स्वरा भास्कर के अलावा पंकज त्रिपाठी और संजय मिश्रा ने इसमें बेहतरीन अभिनय किया है।
लेकिन यह फिल्म स्वरा की फिल्म है। उसने अपने चरित्र को पूरी तरह से जिया है। बेहतरीन अभिनय। फिल्म में चीप गानों के बावजूद फिल्म कहीं से अश्लील नहीं लगी। सामन्ती समाज में अपने घर की औरत को घूंघट में रख कर दूसरी औरतों से छेड़खानी और अश्लीलता आम थी/है। शादियों में नाचने वालियों को बुलाने का प्रचलन हाल-हाल तक था। रूप बदल कर यह अभी भी जारी है। देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाली नुमाइशों, मेलों, महोत्सवों, अमीरों की शादियों में नाच गाने का कार्यक्रम अभी भी आम है। कुछ दिनों पहले एक शादी में एक डांसर की एक मनचले की गोली से मौत हो गयी थी।
फिल्म की कहानी इसी तर्ज पर शुरू होती है। बन्दूक की नली में पैसा अटका कर नृत्यांगना को मुंह से पकड़ने को कहा जाता है। वह लम्पट गोली चला देता है। बच्ची अनारकली की आंखों के सामने उसकी मां की मौत हो जाती है। कुछ सेकेण्डों तक स्क्रीन पर अंधेरा छा जाता है। यही अंधेरा तारी हो जाता है अनारकली के पूरे जीवन में। बड़ी होकर अनारकली (स्वरा भास्कर) एक म्यूजिक कम्पनी में नाचने गाने को अभिशप्त है। उसका गाना बहुत ही साधारण है लेकिन दर्शकों को मज़ा देते हैं। ऐसे गाने बन्द हो गए हैं ऐसा नहीं। आप भोजपुरी इलाकों के छोटे कस्बों के टेम्पो में बैठिए तेज वाल्यूम में बजते ऐसे गाने आपके कान और ज़हन झनझना देंगे। लेकिन इस फिल्म के गाने बहुत सतही और ‘मजा देने वाले’ गाने अश्लील नहीं लगते। जैसे-जैसे दृश्य आगे बढ़ता है, ये गाने पृष्ठभूमि में चले जाते हैं और स्वरा भास्कर का किरदार उभरने लगता है।
फिल्म की कहानी कोई नयी नहीं है। पुरानी बात है। फिल्म एक नाचने गाने वाली की सामन्ती नज़र से लड़ाई है। ये कहानी हज़ारों बार कही जा चुकी है तरह-तरह की चाशनी में लपेट कर। फर्क केवल कहानी के प्रति फिल्मकार के ट्रीटमेंट का है। एक बेहतरीन स्क्रिप्ट कहानी की जान है। हरेक संवाद का अपना अलग महत्व है। सीन दर सीन स्वरा अपने अभिनय से इस स्क्रिप्ट को अपने सशक्त अभिनय से अर्थ प्रदान करती चलती हैं। ताकतवर लोगों से लड़ते हुए अन्तिम सीन में अनारकली का भाव अपनी जीत के प्रति भी आश्वस्त करता है। सरे रात, सरे राह एक औरत के चेहरे पर भय नहीं विजय का भाव और फिर घाघरा झटक कर चल देना। मानो लड़ाई का यह रास्ता बहुत लम्बा है। इस रास्ते में तुम्हारी जैसी न जाने कितनी हैं जिनके जीवन में आज़ादी की एक गली भी नहीं खुलती।
यह फिल्म प्रतीकों की फिल्म है। जिसकी व्याख्या आप अपने मन से कर सकते हैं। पुलिस तो हमेशा से ही शैतानियत और सामन्ती सोच का प्रतीक रही है। लेकिन एक वीसी को लम्पटई का प्रतीक बना देना अनायास नहीं है। मुझे नहीं पता कि अविनाश के मन में यह चरित्र कहां से आया। आमतौर पर यह चरित्र किसी जमींदार या नेता के रूप में ही दिखाया जाता है। लेकिन देश के बदलते राजनीतिक परिदृश्य में वीसी की लम्पटई बहुत कुछ कहती है जहां वीसी की भूमिका बौद्धिक हस्तक्षेप से कहीं ज़्यादा हो गयी है। आज तमाम शिक्षा के कैम्पस में वीसी दरोगा की भूमिका के लिए कुख्यात हो रहे हैं। अनारकली का आरा से भाग कर दिल्ली आना और हीरामन के माध्यम से ‘विकास’ की नई व्याख्या करना बहुत कुछ कह जाती है। हीरामन के चरित्र को फिर से एक नया आयाम देना भी इस फिल्म का एक नया प्रतीक है। स्वयं अनारकली प्रतीक है एक मजबूत होती औरत की। तमाम जुल्मोसितम अभी भी हैं लेकिन वह अपनी मर्जी के खिलाफ अपने ऊपर हाथ भी नहीं रखने देती। उसकी अपनी यौनिकता है और उसका असर्शन भी। उसके खिलाफ संघर्ष भी उसका अपना है। यहीं यह फिल्म ‘पिंक’ के कहीं आगे चली जाती है। अनारकली को अपनी लड़ाई लड़ने के लिए किसी अमिताभ बच्चन की जरूरत नहीं। वह खुद लड़ती है और जीतती है। काश ये जीत हर औरत की जीत में तब्दील हो जाती!

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Kya Dilli Kya Lahore

मई 2014 में आयी फिल्म ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ दर्शकों का ध्यान नहीं खींच पाई। आज के इस दौर में जब ‘मनोरंजन’ ने ‘यथार्थ’ पर पूरी तरह विजय पा ली है तो ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ जैसी यथार्थ परक फिल्मों का ‘मनोरंजन उद्योग’ द्वारा निरंतन गला घोटा जाना ऐसा तथ्य बन गया है, जिसे प्रायः लोग नोटिस भी नहीं लेते। खैर अब कुछ बातें फिल्म पर।
भारत-पाकिस्तान विभाजन इतिहास का ऐसा अध्याय है जिसने हमारे जीवन के कमोवेश प्रत्येक पहलू को आज तक प्रभावित कर रखा है। ये एक ऐसा जख्म है जो समय के साथ भरने की बजाय और हरा होता जा रहा है। लेकिन इस पर फिल्में ना के बराबर है। शायद उंगलियों पर गिनने लायक।
‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ महज चार पात्रों (ज्यादातर समय तो सिर्फ दो ही पात्र) के माध्यम से कही गयी उन करोड़ों लोगो की कहानी है जो किसी ना किसी तरह इस दर्द से बावस्ता हैं।
कहानी 1948 की यानी भारत-पाक विभाजन के तुरन्त बाद की है। विभाजन के बाद दिल्ली के चांदनी चौक में पले बढ़े ‘रहमत अली’ (विजय राज) को पाकिस्तान आना पड़ता है और पाक सेना ज्वाइन करनी पड़ती है। उधर लाहौर के निवासी ‘समरथ प्रताप’ (मनु रिषी) को भारत आना पड़ता है और उसकी नौकरी भारतीय सेना में खानसामे के रुप में लग जाती है। फिल्म की शुरुआत में ही घटना इस तरह से घटित होती है कि भारत-पाक बार्डर पर एक चौकी पर इन दोनो सैनिकों का आमना सामना हो जाता है। अपनी आत्म-रक्षा में दोनों एक दूसरे से छिपते भी हैं और मौका लगने पर एक दूसरे पर फायर भी करते हैं। लेकिन इस लुका-छिपी के युद्ध में उनका एक दूसरे से संवाद शुरु हो जाता है। और यह संवाद ही फिल्म की जान है। मजे की बात है कि संवाद मनु रिषी ने ही लिखे है। इन संवादों में भारत पाक विभाजन की जटिलता, उसकी यान्त्रिकता, उसकी विभीषिका और उसकी विफलता और इसके विविध प्रभाव बहुत असरकारक तरीके से संप्रेषित होते हैं। संवाद में व्यंग और हास्य का इस्तेमाल दर्शको को भावना में बहने से रोकता है और तर्क की ओर ले जाता है।
एक दूसरे से बात करते हुए दोनो ही अपने मूल शहर ‘दिल्ली’ और ‘लाहौर’ को शिद्दत से याद करते हैं। और फिर विभाजन की विभीषिका का जिक्र करते हुए बताते हैं कि कैसे विभाजन ने उनकी जिन्दगियों को नर्क बना दिया है। और मन ही मन एक दूसरे के करीब आने लगते हैं। दोनों को ही आश्चर्य होता है कि उनका जीवन कितना समान है। वहीं अगले ही पल विभाजन की राजनीति के वशीभूत होकर वे पुनः एक दूसरे को गालियां देना शुरु कर देते हैं और एक दूसरे पर गोली चलाने लगते हैं। मूल मानवीय भावना और ओढ़ी हुई साम्प्रदायिक भावना का यह क्लासिक टकराव बेहद दिलचस्प है, जिसे विजय राज और मनु रिषी ने अपने जीवन्त अभिनय से अविस्मरणीय बना दिया है। यहां आपको निश्चय ही ‘असगर वजाहत’ का ‘जिन लाहौर नही देख्या वो जन्म्या ही नही’ नाटक के वे डायलाग याद आयेंगे जो हवेली की मालकिन हिन्दू बूढ़ी औरत और उस हवेली में रहने भारत से आये एक मुस्लिम परिवार के बीच होता है।
फिल्म का दूसरा महत्वपूर्ण और दिलचस्प मोड़ तब आता है, जब इन दोनों ही सैनिकों के ऑफिसर इन्हे गद्दार बोलते है क्योकि दोनो ही क्रमशः भारत और पाकिस्तान से आये रिफ्यूजी है। यानी दोनो का ही अब कोई देश नहीं रहा। अपना देश वे छोड़ चुके हैं और इस नये देश में उन्हे गद्दार समझा जा रहा है। यहां ‘मंटो’ की कहानी ‘टोबाटेक सिंह’ की याद आये बिना नही रह सकता। इसके बाद कहानी में जल्दी जल्दी कुछ मोड़ आते हैं और अन्त में पाकिस्तानी सैनिक जब यह देखता है कि उसका पाक आफिसर, भारतीय सैनिक (जिसे वह ‘भाईजान’ कहता है) की जान लेने पर तुला है तो वह अपने ही आफिसर को गोली मार देता है। भारतीय सैनिक उसे आश्चर्य से देखता है और तभी दूर कही से आयी एक गोली इस पाक सैनिक को भी लगती है और वह भारतीय सैनिक की गोद में गिर जाता है। सैनिक तो मर जाता है, लेकिन मानवता जीत जाती है।
बहुत से फिल्म समीक्षको ने इस फिल्म की तुलना आस्कर विजेता ‘नो मेन्स लैण्ड’ से की है। लेकिन जैसा कि फिल्म समीक्षक ‘शुभ्रा गुप्ता’ कहती हैं कि यह फिल्म ‘नो मेन्स लैण्ड’ से बड़ी फिल्म है क्योकि यह हमारी फिल्म है।
यह फिल्म देखते हुए दूसरी जो फिल्म जेहन में आती है, वह है ‘पीटर वाटकिन’ की ‘डायरी ऑफ एन अननोन सोल्जर’
इस फिल्म से ‘गुलजार’ का नाम भी जुड़ा है। इसके गीत गुलजार ने लिखे हैं और नरेशन भी उन्ही का है। विभाजन पर गुलजार के महत्वपूर्ण काम से हम सभी परिचित हैं। लेकिन उनकी खास स्टाइल कभी कभी किसी विषय को डायलूट कर देती है। उनके नरेशन में यह बखूबी दिखता है।
‘‘लकीरे हैं तो रहने दो
किसी ने रुठ कर गुस्से में शायद खींच दी थी।
…………………….’’ -गुलजार

जिस ‘लकीर’ के कारण करोड़ों लोग उजड़ गये हों, 10 लाख के करीब लोग मारे गये हो और लाखों महिलाओं का हिंसक बलात्कार हुआ हो उसके लिए यह लिखना कि ‘किसी ने रुठ कर गुस्से में शायद खींच दी थी’, मेरी समझ में या तो नादानी है या मासूमियत की आड़ में विभाजन के लिए जिम्मेदार ताकतों को माफी देना है। शायद गुलजार के प्रभाव में ही इस फिल्म के निर्देशक ‘विजय राज’ भी इस फिल्म को एक ‘मासूम कहानी’ बताते हैं। जबकि इस ‘मासूम कहानी’ के लिए जिम्मेदार लोग कतई मासूम नहीं थे। साम्राज्यवादी ताकतों और देशी सामंती-पूंजीपतियों ने विभाजन का यह ‘खेल’ बहुत बारीकी से बुना और उसे अंजाम दिया था।
इस फिल्म की सिनेमैटोग्राफी ‘राज चक्रवर्ती’ की है जिनका काम ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ में काफी सराहा गया है। कहानी की जरुरत के हिसाब से ही कैमरा लगातार इन दो पात्रों को ही ट्रैक करता है और आस-पास के लैण्डस्केप से हमें सायास दूर रखता है। जिससे विषय की सघनता टूटती नहीं।
और अन्त में – आज के परिदृश्य में यह फिल्म हम सबके लिए एक जरुरी फिल्म है।
इस फिल्म को आप यहां देख सकते हैं।

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I am a troll: Inside the secret world of BJP’s digital army

जुलाई 2015 में प्रधानमंत्री ‘मोदी’ ने अपने आधिकारिक आवास ‘रेसकोर्स रोड’ पर 150 सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले अपने समर्थकों की मीटिंग की। इस मीटिंग में सोशल मीडिया (विशेषकर ट्विटर पर) पर सक्रिय रहने वाले वे ‘ट्रोल’ (troll-जिसका हिन्दी में साधारण अनुवाद होगा ‘साइबर गुण्डा’) भी शामिल थे, जो साइबर जगत में औरतों, अल्पसंख्यकों और पत्रकारों के खिलाफ गन्दी, भड़काऊ और हिंसक भाषा का इस्तेमाल करने के लिए कुख्यात हैं। इनमें से कुछ के खिलाफ तो ‘एफआइआर’ तक दर्ज है। उस वक्त इस मीटिंग की काफी आलोचना भी हुई थी। इनमें से 22 ऐसे ट्रोल है जिसे खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ‘फालो’ करते हैं। इनमें हाल ही में अनुराग कश्यप को ट्रोल करने वाला @bhak_sala और @HDL_Global [Hindu Defence League] जैसे कुख्यात ट्रोल भी शामिल हैं।
पिछले वर्ष दिसम्बर में आयी अपने तरह की अकेली और महत्वपूर्ण किताब I am a troll: Inside the secret world of BJP’s digital army में इस किताब की लेखिका पत्रकार ‘स्वाती चतुर्वेदी’ ने अपने खोजपूर्ण अध्ययन से यह साबित किया है कि ‘आरएसएस’ की तरह ही साइबर जगत में भी बीजीपी की डिजीटल आर्मी बहुत सुनियोजित तरीके से ‘आरएसएस’ के ही एजेण्डा को आगे बढ़ा रही है। इस डिजिटल आर्मी का नाम है-‘नेशनल डिजिटल आपरेशन्स सेन्टर’ (NDOC) जिसके मुखिया बीएचयू आईआईटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई किये हुए ‘अरविन्द गुप्ता’ है, जो सीधे ‘नरेन्द्र मोदी’ और ‘अमित शाह’ से निर्देश लेते है। इस डिजिटल आर्मी का मुख्यालय दिल्ली में ‘11 अशोक रोड’ पर है, जहां करीब 200 लोग काम करते हैं। इनमें से कुछ ‘स्वयंसेवक’ हैं और कुछ ‘पेड’ है। इन्हीं में से कुछ ‘ट्रोल’ के साक्षात्कार के बहाने लेखिका इनके काम करने का तरीका और और इनकी बीमार मानसिकता का पूरा चिट्ठा सामने रखती हैं। इनमें से ज्यादातर ऊंची जाति के वे नौजवान हैं जो ‘नवउदारवादी नीतियों’ की शुरुआत और ‘बाबरी मस्जिद’ के विघ्वंस के दौरान पैदा हुए है और मूलतः मुस्लिम विरोधी-दलित विरोधी-महिला विरोधी है। इन नौजवानों का दिमाग पढ़कर आप 1991 के बाद की आर्थिक-सामाजिक-शैक्षिक नीतियों की असफलता का अन्दाजा लगा सकते हैं। ‘स्क्रीन शाट्स’ के माध्यम से बीजेपी डिजिटल आर्मी के इन ‘सैनिकों’ के जो ‘ट्विट्स’ किताब में दिये गये है वे बेहद आक्रामक और इतने अश्लील है कि उनमें से किसी को भी उद्घृत करना यहां सम्भव नहीं है। तमाम महिला पत्रकारों की तरह ही स्वाती खुद ऐसे हमलों का शिकार हुई हैं और उन्हें इसके खिलाफ ‘एफआइआर’ तक कराना पड़ा है। ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ पत्रिका के ताजा अंक में पत्रकार ‘नेहा दीक्षित’ ने भी अपने ऐसे ही अनुभवों को साझा किया है।
किताब मुख्यतः आधारित है, ‘साध्वी खोसला’ के साक्षात्कार पर। खोसला 2013 से बीजेपी की डिजीटल आर्मी का महत्वपूर्ण हिस्सा थी, लेकिन 2015 की शुरुआत में उनका मोहभंग हो गया और उन्होंने बीजेपी छोड़ दी। यह साक्षात्कार बहुत दिलचस्प है और बीजेपी की भीतरी पर्ते बखूबी खोलता है। खोसला को डिजिटल आर्मी में काम करने के लिए खुद मोदी ने आमंत्रित किया था। खोसला बताती हैं कि लगभग रोज ही चुने हुए लोगो की अरविन्द गुप्ता के साथ बैठक होती थी जहां टारगेट तय किये जाते थे कि किसकी ट्रोलिंग करनी है। यहां तक कि कभी कभी मैसेज भी पहले से तय होते थे और यह निर्देश दिये जाते थे कि इनमें ही थोड़ा हेर फेर करके इसे ही पोस्ट किया जाना है। लेखिका ने कुछ ‘स्क्रीन शाट्स’ के माध्यम से दिखाया है कि एकदम अलग अलग एकाउन्ट से पोस्ट हुए मैसेज हूबहू एक से है। यहां तक कि कामा-फुलस्टाप भी समान है। जिससे उपरोक्त बात की पुष्टि होती है। इस डिजिटल आर्मी ने सोशल मीडिया पर बहुत से फर्जी अकाउन्ट बना रखे हैं। जिसका इस्तेमाल करके मुद्दे विशेष को ‘ट्रेन्ड’ कराया जाता है और इसे अभियान की शक्ल दी जाती है। ‘आमिर खान’ के केस में इसी तरह से प्रायोजित अभियान, इस डिजिटल आर्मी ने ‘स्नैपडील’ के खिलाफ चलाया कि वो अमीर खान से अपना करार तोड़ दें। और इस अभियान का ही असर था कि स्नैपडील को बयान देना पड़ा और आमिर खान से करार तोड़ना पड़ा।
‘कैराना’ से हिन्दुओं के कथित पलायन की बात भी इसी डिजिटल अभियान का हिस्सा था।
किताब का ‘अपेन्डिक्स बी’ काफी रोचक है। इसमें डाटा एनलिस्ट ‘अंकित लाल’ के एक अध्ययन का इस्तेमाल किया गया है। अंकित लाल ने ‘डाटा एनिलिटिकल टूल’ का इस्तेमाल करते हुए जब यह देखना चाहा कि मोदी भक्त आखिर किस किस जगह से मोदी-विरोधियों को गाली दे रहे हैं तो आश्चर्यजनक रुप से उसमें ‘थाईलैण्ड’ का नाम प्रमुख रुप से उभरा। मतलब साफ है- बीजेपी की डिजीटल आर्मी अपना वास्तविक ‘आईपी एड्रेस’ छुपाने के लिए ‘वीपीएन’ (virtual private network) का इस्तेमाल कर रही है, जिसका सर्वर थाइलैण्ड में है या इसने थाइलैण्ड स्थित किसी ‘आईटी फर्म’ के साथ करार किया हुआ है जो बीजेपी के निर्देशानुसार वही से सोशल मीडिया पर बीजेपी का प्रतिनिधित्व कर रही है।
किताब में यह भी महत्वपूर्ण जानकारी दी गयी है कि जेएनयू के ‘कन्हैया’ वाले केस में जिस ‘डाक्टर्ड वीडियो’ की बात सामने आती है उसे ‘शिल्पी तिवारी’ ने तैयार किया था। यह वही शिल्पी तिवारी हैं जो स्मृति ईरानी के चुनाव अभियान की महत्वपूर्ण सदस्य थी। आपको पता ही होगा कि इस फर्जी वीडियों के कारण क्या क्या हुआ।
किताब यह बात पुरजोर तरीके से बताती है कि बीजेपी ने अन्य सभी पार्टियों से पहले सोशल मीडिया की ताकत को पहचान लिया था। और उस पर विधिवत काम भी शुरु कर दिया था। आज अनेक आईटी फर्म में आरएसएस की ‘आईटी शाखा’ भी लगना शुरु हो गयी है। इसका भी जिक्र किताब में है।
बीजेपी अपनी प्रतिक्रियावादी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए अपनी डिजीटल आर्मी का तो बखूबी प्रयोग कर रही है। लेकिन अपनी इमेज को चमकाने के लिए इसने अमरीका की शक्तिशाली पीआर फर्म ‘एपीसीओ’ (APCO) के साथ करोड़ों का समझौता किया था। इस पीआर के साथ दुनिया के कई तानाशाह भी जुड़े हुए है। ‘वाइब्रेन्ट गुजरात’ कैम्पेन का ठेका इसी ‘पीआर फर्म’ को दिया गया था। जिसका मुख्य काम था- 2002 के दंगे की कालिमा से गुजरात को बाहर निकालना।
इस पहलू को बिना छुए बीजीपी की डिजिटल आर्मी की बात पूरी नही होती। लेकिन किताब में इस बात का जिक्र तक ना होना एक अधूरेपन का अहसास कराता है। इसके अलावा पूरी किताब पड़ते समय ऐसा लगता है कि किताब बहुत जल्दबाजी में लिखी गयी है। कई महत्वपूर्ण जानकारी छूटने का यह भी एक कारण है। इसे ‘श्रिया मोहन’ ने ‘कैचन्यूज डाटकाम’ में इस पुस्तक की अपनी समीक्षा में उचित ही ‘impatient journalism’ कहा है। इस कारण से इस किताब में ‘न्यूज’ ज्यादा है जो ‘व्यूज’ पर भारी पड़ते हैं।
आज सोशल मीडिया की ‘आभासी दुनिया’ और हमारी ‘वास्तविक दुनिया’ का अन्तरसम्बन्ध बहुत गहरा है। सोशल मीडिया की हिंसा को वास्तविक दुनिया की हिंसा में बदलते आज देर नहीं लगती। इसलिए सोशल मीडिया को गम्भीरता से लेने की जरुरत है। यह किताब यह बताती है कि इस आभासी दुनिया में भी प्रतिक्रियावादी ताकतें अपने आप को संगठित करती जा रही हैं। प्रगतिशील ताकतें इसका जवाब स्वतःस्फूर्तता के साथ कितना दे पायेंगी, यह सोचने की बात है।
किताब को ‘Juggernaut’ ने छापा है और इसकी कीमत 250 रुपये है।

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जहां प्रतिरोध जीने का सलीक़ा है….

कई दिनो से एक किताब मेरे सिरहाने खामोश (?) पड़ी थी… पढ़े जाने का इन्तज़ार करते हुए… न जाने क्यों मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही थी उस किताब को पढ़ने की….पता नहीं क्यों मुझे लगता कि मेरे कलेजे की तरह यह किताब भी धड़क रही है….धीरे-धीरे सुलग रही है…कश्मीर की तरह…जहां आग पिछले 25 वर्षों से अधिक समय से कभी बुझी ही नहीं…………..
‘डू यू रिमेम्बर कुनान पोशपोरा?’ (क्या आपको कुनान पोशपोरा याद है?). यही किताब थी वह जो सुलग रही थी मेरे बिस्तर पर. मुझे कुनान पोशपोरा याद था. जिसका जिक्र मैंने बशारत पीर की ‘कर्फ़्यूड नाइट’ में पढ़ा था. आखिरकार मैंने एक दिन हिम्मत करके उस किताब को पढ़ना शुरू ही कर दिया. मुझमें पूर्व प्रस्तावना व प्रस्तावना पढ़ने की ताब नहीं थी. मैं सीधे किताब के पहले अध्याय पर आ गई. ‘कुनान पोशपोरा और कश्मीर की औरतें’.
कुनान और पोशपोरा कश्मीर के संवेदनशील कुपवारा ज़िले के एक दूसरे से लगे दो छोटे- छोटे गांव है. 23 फ़रवरी 1991 की सर्द रात 11 बजे 4थी राजपुताना रायफ़ल्स के ‘जवानो’ ने इन दोनो गांव में क्रैक डाउन किया. हरेक घर से पुरुषों को यातना देने के लिये बाहर निकाल दिया गया. घर की औरतों पर बारी-बारी से ‘जवानों’ ने बलात्कार किया. इनमें 11 साल से लेकर 60 साल की 31 औरतें शामिल थीं. ‘जवानों’ ने एक 8 माह की गर्भवती औरत का भी बलात्कार किया, जिसके परिणामस्वरूप पेट में ही उसके बच्चे की हड्डियां टूट गईं.
आरम्भिक यातना के बाद शुरू हुआ सेना के ‘जवानों’ के खिलाफ़ प्रतिरोध का अन्तहीन सिलसिला. 8 मार्च 1991 को त्रेहगाम पुलिस स्टेशन में पहली एफ़आईआर दर्ज़ हुई. पुलिस वालों की शर्मनाक ‘कार्यवाई’ के बाद 21 अक्टूबर 1991 को इस केस को समाप्त कर दिया गया. लेकिन मजिस्ट्रेट के समक्ष क्लोज़र रिपोर्ट नहीं दर्ज़ की गई.
इसके पूर्व बी.जी वर्गीज़ के नेतृत्व में सरकार और सेना प्रायोजित प्रेस काउंसिल आफ़ इन्डिया की टीम ने कुनान पोशपोरा की घटना को झूठ करार दिया. इसने ‘जवानों’ के मनोबल को और बढ़ा दिया. इसी को आधार बना कर कोर्ट और पुलिस ने मामले की ठीक से तफ़्तीश ही नहीं की. ज़ाहिर है सेना को राज्य का वरद हस्त मिला हुआ था.
कहते हैं कश्मीरी औरतें दुनिया में सबसे अधिक यौनिक हिंसा की शिकार औरतों में से एक हैं. सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत के बाद कश्मीर में सेना ने पहला रेप बिदाई की बस से निकाल कर एक नववधु का किया था. तबसे लेकर आज तक औरतों के साथ सेना के दुर्वयव्हार का अन्तहीन सिलसिला जारी है. 10 अक्टूबर 2010 को शोपियां में 11 साल और 60 साल की दो औरतों के साथ हुए बलात्कार ने कश्मीर कॊ जला दिया था. तब से आज तक कश्मीर की औरतें सेना की ज़्यादतियां झेल रही हैं. वे यौनिक और मानसिक दोनो तरह से यातना की शिकार हैं. इनमें वे आधी विधवाएं हैं, जिनके शौहर को सेना उठा के ले गई और आज भी वे हर दस्तक पर चौंक उठती हैं, कहीं ये वही तो नहीं. इनमें वे मांएं हैं जिनके बच्चे अपनी आज़ादी की राह पर कुर्बान हो गए, जो सेना की गोली या पैलेट गन का शिकार हो गए. इनमे अगली पीढ़ी की वे बेटियां हैं जिनके भाई-पिता सुरक्षा बलों की यातना के शिकार हुए. (इनमें इस किताब की एक लेखिका के पिता भी शामिल हैं). आज ये औरतें प्रतिरोध आन्दोलन में आगे बढ़ कर हिस्सा ले रही हैं. आज उनके हाथों में पत्थर है, तख्तियां हैं, बैनर है. आज भी कश्मीर में औरत होना और देश में और हिस्सों में औरत होना बिल्कुल भिन्न बात है. कश्मीर की औरतों का दर्द आज प्रतिरोध में अभिव्यक्त हो रहा है. कुनान पोशपोरा में घटी उस घटना के विरोध में 23 फ़रवरी को आज कश्मीर की औरतों के प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाया जाता है.
संवेदनशील लोगों के लिये अतीत की कुछ घटनाएं, परम्पराएं व इतिहास दिल में फ़ांस की तरह चुभते रहते हैं और वक्त आता है जब उन्हें इतिहास में अपनी भूमिका तय करनी ही पड़ती है. और अगर बात कश्मीर, उत्तर-पूर्व या युद्धरत क्षेत्रों की औरतों की हो तो दोहरी मानसिक यातना से गुज़रना होता है. एक, राज्य मशीनरी द्वारा औरतों के खिलाफ़ सोचे-समझे तरीके से की जाने वाली यौनिक हिंसा के आक्रमण से होने वाली यातना तो दूसरी ओर पितृसत्तात्मक सोच के कारण होने वाली यातना. ये यातना पीढ़ी दर पीढ़ी छन कर नई पीढ़ी पर तारी हो जाती है. ऐसा ही हुआ कुछ कश्मीरी युवतियों के साथ.
उन्होंने कश्मीर की घायल स्मृतियों को कुरेद कर कुनान पोशपोरा में 25 साल पहले हुई उस घटना को फ़िर से जीवित किया. अप्रैल 201३ में कश्मीर की 50 औरतों ने इस केस को फ़िर से खोलने के लिये हाईकोर्ट में पीआईएल दर्ज़ की. हालांकि कोर्ट ने इसे ‘प्री मच्योर्ड’ कह कर खारिज कर दिया. जब पीआईएल की तैयारी हो रही थी, तो रहस्यात्मक रूप से पुलिस ने मजिस्ट्रेट के समक्ष इस केस के क्लोज़र की पेशकश की. कुनान पोशपोरा के नागरिकों ने इसके खिलाफ़ प्रतिरोध जताया. कुपवारा के सेशन कोर्ट के जज ने इसके पुन: जांच के आदेश दिया.
कश्मीर की पांच युवतियों एसार बतूल, इफ़्रा बट्ट, समरीना मुश्ताक, मुनाज़ा राशिद, नताशा राथेर ने प्रकाशक ज़ुबान की श्रृंखला के लिये इस घटना को पुनर्रचित किया. ये लड़कियां कुनान पोशपोरा की घटना के वक्त या तो दो-तीन साल की थीं या पैदा ही नहीं हुईं थीं. लेकिन कश्मीर में जवान होना और एक लड़की के रूप में जवान होना बेहद जुदा अनुभव हैं. ये लेखिकाएं बहुत बाद में यह समझ पाईं कि उनकी मां और दादी उन्हें उस रास्ते से बचने की सलाह क्यों देती थीं जहां पर कोई फौजी खड़ा हो. जैसे-जैसे ये लेखिकाएं बड़ी हुईं, कुनान पोशपोरा में घटी घटनाएं उनके मन मस्तिष्क पर छाने लगीं. उन्होंने वकील और मानवाधिकार कार्य्कर्ता परवेज़ इमरोज़ के सहयोग से इस केस को पुन: सतह पर लाने का फ़ैसला किया. उन्होंने कश्मीर की औरतों से इसके खिलाफ़ एक पीआईएल पर हस्ताक्षर करने की अपील की. उनके सामने उन्होंने एक प्रश्न रखा – ‘क्या आपको कुनान पोशपोरा याद है?’ अन्त में 100 औरतें इस पर हस्ताक्षर करने को तैयार हो गईं. राज्य ने उनसे अपना पहचान पत्र जमा करने को कहा. कुछ औरतें विभिन्न कारणों से इससे पीछे हट गईं. अन्तत: कुल 50 औरतों ने पीआईएल दर्ज किया.
लेखिकाओं मे से एक इस किताब में कहती हैं -‘भारत एक आज़ाद मुल्क है. यहां सभी के लिये कुछ मौलिक अधिकारों की गारण्टी की गई है. भारतीय सुरक्षा बलों को भी कुछ आज़ादी है. हमारे हिसाब से इस आज़ादी का मतलब है- हत्या करना, विकलांग बनाना, यातना देना और बलात्कार करना….कश्मीरियों के लिये इस आज़ादी का अर्थ है – खामोश रहना, अपनी आवाज़ कभी न उठाना और भारत की अधीनता को स्वीकार करना. कश्मीर ही नहीं, उत्तर-पूर्व के अनेकों हिस्सों मे भारतीय सेना को ये ‘अधिकार’ मिले हुए हैं. अफ़्पसा के रूप में भारतीय राज्य ने उन्हें वह अमोघ अस्त्र दिया हुआ है जिसका इस्तेमाल करते हुए वे किसी को भी यातना दे सकते हैं, किसी की भी हत्या कर सकते हैं और किसी का भी बलात्कार कर सकते हैं. दुनिया की किसी भी अदालत में इस पर कोई अर्ज़ी दाखिल नहीं कर सकता. मणिपुर औरतों का प्रदर्शन हम कभी नहीं भूल सकते जिसमें उन्होंने सेना मुख्यालय के समक्ष नंगे हो कर प्रदर्शन किया था – ‘भारतीय सेना आओ हमारा बलात्कार करो’.
सम्भवत: पूरी दुनिया में शासक वर्ग की सेना को यह प्रशिक्षण दिया जाता है कि प्रतिरोध आन्दोलन को मानसिक रूप से तोड़ने के लिये उनकी औरतों का बलात्कार करो. लेकिन जहां प्रतिरोध जीने का सलीका बन जाता है वहां दमन की कोई भी इन्तेहां अन्तिम नहीं होती.
यही जज़्बा दिखाया है इस किताब की लेखिकाओं ने और कश्मीर की औरतों ने. लेखिकाओं ने न केवल कुनान पोशपोरा में घटे इस सोचे-समझे हमले से जुड़े दस्तावेजों को एकत्र किया, बल्कि इस दौरान उन्होंने उन शिकार औरतों और अन्य ग्रामीणों से तदनुभूतिक रिश्ता भी कायम किया. और बहुत ही समझदारी और संवेदनशील तरीके से इसे कलमबद्ध किया. उनके इस प्रयास से कुनान और पोशपोरा में 25 साल पहले हुई वह घटना फ़िर से सतह पर आ गई. सवाल फ़िर से उठने लगे.
कुछ वर्ष पहले दिल्ली में बलात्कार के बाद एक युवती की मौत ने सबको हिला दिया था. एक बड़ा आन्दोलन उठ खड़ा हुआ. जिसने संसद को अधिनियम बनाने पर मजबूर कर दिया. लेकिन यह किताब सवाल करती है जब कश्मीर में या उत्तरपूर्व में वर्दी में लोग बलात्कार करते हैं तो पूरे देश में कोई तूफ़ान नहीं उठ खड़ा होता. क्यों?????? 23 फ़रवरी केवल कश्मीर की औरतों का ही प्रतिरोध दिवस क्यों है, पूरे भारत की औरतों का प्रतिरोध दिवस क्यों नहीं.???

चिनार तले
आफ़रीन फ़रीदी

नंगे चिनार अपनी झाड़ियों मे सिहर उठे
चांदनी रात में अपने गांव को नींद से जागते देख
भयावह तूफ़ानी तरंग की तरह आते उस काफ़िले से दूर
चूल्हे के सामने पनाह के लिये तड़पते देख.

दर्द में भी वह चिलक उठी
जब उसके बच्चे ने हौले से कोख में उसे कोहनी मारी.
एक गरमाहट तारी हो गई
मानो कांगेर को और कस कर समेट लिया हो.
एक खिलता मौसम बेताब है, वसन्त के फूलने को……..

(इसी किताब से)

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