लत बगावत की……

[आज आठ मार्च है, अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस! मुक्ति के लिए महिला संघर्षों का एक प्रतीक दिवस! लेकिन आज इसकी सबकी अपनी व्याख्या है। सबकी अपनी समझ है। हमारे लिए अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस प्रतीक है उन संघर्षों का ही जिनकी वजह से हमें वह ज़मीन मिली है जिसपर आज हम खड़े हैं…………पेश है एक कविता……उन संघर्षों को समर्पित…]

कुछ ख़ाब सुनहरे
हरेक ख़ाब पे पाबन्दी
पाबन्दियों को खुरचा
तो त्वचा छिल गयी.
छिलते-छिलते
फौलादी बन गए हम
अब सवाल है ये
हमारा ये लोहा
लेगा क्या आकार
यातनाओं की भट्टी में पिघल कर
खुद ही ख़ाक हो जाएगा
या फिर……….
बन कर एक छोटी सी कील
ठुक जाएगा तुम्हारे पथरीले कलेजे में
अगर कहीं होगा तुम्हारी शिराओं में लहू
तो वो जमेगा अवश्य एक रोज
देख कर हमारे हौसलों को.
पस्त नहीं हम
तुम्हारे लाख प्रयास के बावजूद.
हमारे ख़ाब फीनिक्स की तरह
ज़िन्दा हो जाते हैं हर बार
आखिर तुम्हारी भी तो कोई हद है
यह हम जानते हैं बेशक.
इसीलिए तो तुम करते हो रश्क
हमारी उड़ान से
इसीलिए तो तुम
हमसे बदला लेने की फ़िराक़
में बावरे फिरते रहते हो हर वक्त
खड़ा किया है तुमने
दुनिया के समूचे बाज़ार को हमारे ख़िलाफ़
तुम चाहते हो कि दुनिया की सारी तोपों का रुख़
हमारी ओर कर दिया जाए
जिसमें नेस्तनाबूद हो जाएं
हमारे सारे ख़ाब सुनहरे
पर यहीं चूक गए तुम
खाबों को तुम्हारे हथियारों से नहीं मारा जा सकता.
हमारे ख़ाब तो हमारे दिमाग में है
हमारे दिल में है
जिस पर सदियों की तानाशाही के बावजूद, हार रहे हो तुम.
याद रखना
तानाशाहों की हवेलियों पर,
उनकी दरो-दीवारों पर
आज ‘उग रहा है सब्ज़ा’
तुम्हारी सल्तनत के दिन अब लद गए
क्योंकि अब हमारे सुनहरे ख़ाबों को
लत लग गयी है बग़ावत की…………

कृति

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1 Response to लत बगावत की……

  1. tinnu says:

    bahut hee shandaar kavita hai.. likhate rahiye.. haalaaki sirf antim line aajkal ek baaliwood ke gaane se match karane ke chalate kavita ka flow kuch todata saa lagata hai (lagata hai gaana mere dimag per jyada hee haawi hai !!).

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