‘गदर पार्टी’ का जन्म शताब्दी वर्ष

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2013 ‘गदर पार्टी’ का जन्म शताब्दी वर्ष है। अप्रैल 1913 में अमरीका में गदर पार्टी की नींव रखी गयी थी।
1857 के बाद संगठित व सशस्त्र तरीके से अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेकने का यह पहला प्रयास था। आगे आने वाली भगत सिंह की क्रान्तिकारी धारा पर गदर पार्टी और इसके शहीद नेताओ का काफी असर था। मुख्य धारा के इतिहास लेखन में इसे पर्याप्त जगह नही दी गयी है। फलतः बहुत से इतिहास के छात्र भी इतिहास में गदर पार्टी के योगदान से परिचित नहीं है। आज आम नौजवानों को ‘गदर’ से शायद ‘गदरः एक प्रेम कथा’ ही ध्यान आयेगी। लेकिन यह थोड़ा आश्चर्य की बात है कि पंजाब में एक दो जगहो को छोड़कर कही भी इस पर कोई छोटी गोष्ठी भी नही हुई। खैर
20वी शताब्दी की शुरुआत में सस्ते श्रम के लालच में खुद अंग्रेजों ने मुख्यतः पंजाब से मजदूरों को अपने दूसरे डोमिनियन राज्य कनाडा में आमंत्रित किया। कुछ सालों बाद वहां के लोकल मजदूरो को भारत से गये मजदूरों विशेषकर पंजाबियों से खतरा पैदा होने लगा क्योकि इनके सस्ते श्रम के कारण वहां मजदूरी गिरने लगी। फलतः भारतीय मूल के लोगो पर वहां नस्लीय हमले होने लगे। इसी बीच 1909 में एक कानून बनाकर भी भारत से आप्रवास पर कई तरीके के प्रतिबंध लगा दिये गये। इस कारण से नौकरी की तलाश में भारतीय अमरीका का रुख करने लगे। अमरीका में उस समय पूंजीवादी विकास तेज गति से आगे बढ़ रहा था और सस्ते श्रम की बहुत मांग थी।
अमरीका में भी श्रम की स्थितिया काफी खराब थी और भारतीयों को कठिन मेहनत वाले काम ही दिये जाते थे। इसके अलावा उनसे नस्लीय भेदभाव भी बड़े पैमाने पर किया जाता था। वहां उन्होने अहसास किया कि एक स्वतंत्र देश के नागरिक और गुलाम देश के नागरिकों में क्या फर्क होता है। स्वतंत्र देशो की सरकारे अमरीका में अपने नागरिको के पक्ष में हस्तक्षेप करती थी। लेकिन भारतीयों की कठिनाइयों से ब्रिटिश सरकार का कोइ वास्ता नही था।
अमरीकी विश्वविद्यालयो में भी बड़ी मात्रा में भारत से गये छात्र पढ़ाई कर रहे थे। जहां एक ओर वे अपनी कक्षाओं में स्वतंत्रता व समानता के दार्शनिक विचारो से परिचित हो रहे थे तो वही वे विश्वविद्यालयो के बाहर के समाज में फैली असमानता और नस्लीय भेदभाव को भी तीखे तरीके से महसूस कर रहे थे।
इसी पृष्ठभूमि में कुछ भारतीयो ने अपने देश भारत को आजाद कराने के बारे में सोचना शुरु किया। फलतः अमरीका कनाडा सहित इंग्लैण्ड, जर्मनी तथा अन्य देशो में पढ़ने वाले छात्रों तथा अन्य भारतीयो ने अपने अपने तरीके से भारत की आजादी का प्रचार शुरु कर दिया। इसी कड़ी में तारकदास नामक एक छात्र ने अमरीका के सियटेल से 1907 में ‘आजाद हिन्दोस्तान’ नामक मैगजीन निकालनी शुरु की। इसी के आसपास एक और महत्वपूर्ण मैगजीन ‘स्वदेश सेवक’ पंजाबी में शुरु हुई।
इसी बीच लाला हरदयाल लंदन से अमरीका आये। उन्होने वहा के लोगो विशेषकर अमरीकी विश्वविद्यालयो मे पढ़ने वाले लोगो में भारत की आजादी के समर्थन में खूब प्रचार किया। और एक ग्रुप बनाने का प्रयास किया। मशहूर क्रान्तिकारी करतार सिंह सराभा इसी ग्रुप के सदस्य थे। लाला हरदयाल, करतार सिंह सराभा व अन्य देशभक्तों के प्रयासों से अमरीका के ओरेगान नामक जगह में 23 अप्रैल 1913 को एक सभा बुलाई गयी। इसमें हिन्दोस्तान से अंग्रेजो को सशस्त्र तरीके से उखाड़ फेकने का आहवान किया गया। इसी सभा में ‘हिन्दोस्तान असोसियेशन आफ दि पैसिफिक कोस्ट’ का गठन किया गया। इसका लक्ष्य रखा गया कि हमें भारत से अंग्रेजो को सशस्त्र तरीके से उसी तरह उखाड़ फेकना है जैसे 1776 में अमरीकी लोगो ने अपने यहां से अंग्रेजो को उखाड़ फेका था। लाला हरदयाल को इस संगठन का महासचिव चुना गया। इसी संगठन की तरफ से ‘गदर’ नामक पत्रिका शुरु की गयी। जिसके माध्यम से संगठन के उद्देश्यों का प्रचार किया जाना था। यह पत्रिका उर्दू , हिन्दी और पंजाबी में निकलती थी। इसका पहला अंक 1 नवम्बर 1913 को निकला. जल्दी ही ‘गदर’ पत्रिका हिन्दुस्तान के क्रान्तिकारियों और क्रान्तिकारी समूहो तक भी पहुचने लगी। जाहिर है अंग्रेज सरकार ने इसे बैन कर दिया। लेकिन हिन्दुस्तान में इसकी एक भी प्रति पहुंचने से तुरन्त ही इसका हजारों में रीप्रिन्ट निकाल लिया जाता था। इस प्रक्रिया में ‘गदर’ पत्रिका इतनी लोकप्रिय हो गयी कि ‘हिन्दोस्तान असोसियेशन आफ दि पैसिफिक कोस्ट’ को ‘गदर पार्टी’ के नाम से जाना जाने लगा।
इसी बीच ब्रिटिश सरकार के दबाव की वजह से लाला हरदयाल को अमरीका में गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन जल्दी ही जमानत मिल गयी। तत्पश्चात मार्च 1914 में वे जर्मनी पहुंच गये। इसी बीच प्रथम विश्व युद्ध शुरु हो गया। जर्मनी अपने स्वार्थ की वजह से ‘गदर पार्टी’ से सहानुभूति रखने लगी थी। जर्मनी ने उन्हे मदद देने का भी प्रस्ताव रखा। फलतः लाला हरदयाल व अन्य साथियों ने मिलकर जर्मनी में ‘बर्लिन इण्डियन कमेटी’ की स्थापना की। इस कमेटी का उद्देश्य था कि जर्मन सरकार से आर्थिक व हथियारों की मदद लेकर हिन्दोस्तान में अंग्रेजो के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष छेड़ना और अंग्रेज सरकार को उखाड़ फेकना। उस वक्त साम्राज्यवाद के बारे में समझ साफ ना होने के कारण लाला हरदयाल व उनके साथी यह नही समझ पाये कि ‘राष्ट्रीय मुक्ति युद्ध’ की लड़ाई किसी एक या दूसरे साम्राज्यवादी देश की मदद के भरोसे नही लड़ी जा सकती। इसे सिर्फ और सिर्फ जनता की ताकत के दम पर ही लड़ा जाता है। बाद में यही गलती सुभाषचंद्र बोस ने भी दोहराई।
युद्ध शुरु होने पर ‘गदर पार्टी’ ने अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन, बर्मा, सिंगापुर, तुर्की आदि देशों से अपने लोगो को हिन्दोस्तान भेजना शुरु किया ताकि आजादी की लड़ाई तेज की जा सके। इन्होने भारतीय सेना में भी प्रचार करना शुरु किया कि वे अंग्रेजों की तरफ से ना लड़े और आजादी की लड़ाई में शामिल हो जाये। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का यह अजब विरोधाभाष है कि इसी समय गांधी और उनकी ‘नेशनल काग्रेस’ मजबूती के साथ अंग्रेज सरकार के साथ खड़ी थी और गांधी देशभर में घूमघूम कर अग्रेजी सेना में भर्ती का आहवान कर रहे थे।
इसी दौरान गदर पार्टी और जर्मनी ने मिलकर एक योजना बनायी। इसी योजना के तहत एक जहाज भारी मात्रा में हथियार-गोलाबारुद सहित करीब 5000 गदर पार्टी के स्वयंसेवको को लेकर हिन्दोस्तान की ओर रवाना हुआ। लेकिन यह योजना किसी तरह लीक हो गयी और जहाज को हिन्दोस्तान पहुंचने से पहले ही जब्त कर लिया गया। और स्वयंसेवको को गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि कुछ लोग इस गिरफ्तारी से बच गये और वापस हिन्दोस्तान पहुंच कर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गये। लेकिन यहां भी लगभग सभी लोगो को अंग्रेजी सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। बाद में इनमें से कुछ लोगो को मौत की सजा भी दी गयी।
इस तरह विश्व युद्ध खतम होते होते गदर पार्टी का भौतिक अस्तित्व तो खत्म हो गया, लेकिन इसका राजनीतिक अस्तित्व लंबे समय तक बना रहा। [ हालाँकि औपचारिक तौर पर ग़दर पार्टी 1948 में भंग हुई] दरअसल ‘गदर पार्टी’ ने देश के अंदर की राजनीतिक परिस्थिति को समझने में भी भूल की। उसे लगा कि देश के अन्दर सभी लोग आजादी की लड़ाई के लिए तैयार बैठे है।
लेकिन अपनी तात्कालिक असफलता के बावजूद गदर पार्टी का आने वाले क्रान्तिकारी आन्दोलनों पर गहरा असर था। यह कहना ज्यादा सही होगा कि 1857 के बाद इसने पहली बार हिन्दुस्तान में संगठित तौर पर आजादी के बीज बोये।

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