‘सीआईए’ और हिन्दी साहित्य…….

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1992-93 में मैंने एक किताब पढ़ी थी। किताब का नाम था- ‘क्लासलेस कैपिटलिज्म’। यह किताब उस वक्त महज एक रुपये की थी। इसमें बताया गया था कि वर्गविहीन समाज बनाने के लिए किसी समाजवाद की जरुरत नही है। कठिन मेहनत से पूंजीवाद में ही अपना वर्ग बदला जा सकता है। इसके समर्थन में कुछ उदाहरण दिये गये थे कि कैसे अपनी कठिन मेहनत से फला फला व्यक्ति गरीब वर्ग से अमीर वर्ग में चला गया और कैसे फला फला व्यक्ति अपनी काहिली से अमीर वर्ग से गरीब वर्ग में आ गया। इसका सन्देश साफ था कि पूंजीवाद कोई रिजिड व्यवस्था नही है। यह बहुत ही लचीली व्यवस्था है, जिसमें सभी के आगे बढ़ने की पर्याप्त गुंजाइश है।
इस किताब के बारे में खोज करने पर पता चला कि यह किताब 1960 के दशक में छपी थी। और इस किताब को छापने के लिए मुख्य रुप से ‘काग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ जिम्मेदार था। ‘काग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ की स्थापना 1950 में बर्लिन में हुई थी। 1951 में इसका एक सम्मेलन मुम्बई में भी हुआ था, जिसकी अध्यक्षता ‘अज्ञेय’ ने की थी। ‘काग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ के इतिहास पर आज बहुत सी किताबें मौजूद है। और अब बकायदा दस्तावेजों से यह साबित हो चुका है कि ‘काग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ के पीछे मुख्य ताकत अमरीकी खुफिया एंजेसी ‘सीआईए’ थी। सोवियत संघ और चीन की ‘समाजवादी क्रान्ति’ तथा ‘राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलनों’ के उस दौर में अधिकांश बुद्धिजीवी ‘वाम’ की ओर झुक रहे थे। ऐसे बुद्धिजीवीयो को ‘वाम’ की तरफ जाने से रोकने के लिए सचेत तरीके से ‘काग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ का गठन किया गया था। इसे ‘फोर्ड फाउन्डेशन’ के माध्यम से पैसा दिया जाता था।
हिन्दी के लेखकों पर विशेषकर ‘परिमल’ के लेखकों पर ‘काग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ का क्या असर था, यह शोध का विषय है। लेकिन हिन्दी के कुछ लेखको पर इसका असर गहरा है। इसकी एक बानगी तब देखने को मिली जब हिन्दी के वरिष्ठ कवि ‘कमलेश’ ने ‘समास’ पत्रिका में दिये अपने साक्षात्कार में कहा कि मानवता को सीआईए का ऋणी होना चाहिए। ‘कमलेश’ का बचाव करते हुए ‘ओम थानवी’ ने इसे भी साफ कर दिया कि मानवता को सीआईए का ऋणी क्यो होना चाहिए। उनका तर्क है कि सीआईए ने बहुत सस्ते में मानवता को किताबे मुहैया करायी है। वे सस्ती किताबें कौन सी है, इसके बारे में थानवी जी मौन है। निश्चय ही वे सस्ती किताबें ‘क्लासलेस कैपिटलिज्म’ की ही तरह की है। ‘ओम थानवी’ और ‘कमलेश’ जैसे लोगो को निश्चय ही इन किताबों के लिए सीआईए का ऋणी होने का पूरा हक है। लेकिन वे अपना यह व्यक्तिगत कर्ज पूरी मानवता पर क्यो थोप रहे है। सीआईए का हाथ दुनिया के तमाम इन्साफ पसन्द लोगो के रक्त से रंगा हुआ है। आज यह एक जगजाहिर सच्चाई है। इसके लिए तमाम दस्तावेजी साक्ष्य आज मौजूद है. लेकिन यह सच्चाई उन्हे नही नजर आयेगी जो सीआईए के प्रति ऋणी है।
‘कमलेश’ का बचाव करते हुए ‘ओम थानवी’ ने यह पुराना तर्क भी दिया कि विचार के प्रतिक्रियावादी होने के बावजूद रचना उच्चकोटि की हो सकती है। इसके लिए उन्होने ‘एजरा पाउन्ड’ का उदाहरण भी दिया। दरअसल साहित्य जिनके लिए खाली समय का शगल है, वे रचना से विचार को छीलने का मजा ले सकते है। लेकिन साहित्य जिनके लिए मानवता की मुक्ति के लिए एक हथियार की तरह है, वे रचना से विचार को छीलने का मजा नही ले सकते। किसी हत्या का लाइव कवरेज देख रहा कोई व्यक्ति ‘हत्या किस कलात्मक तरीके से की गई’ इसका मजा ले सकता है, लेकिन जिस व्यक्ति की हत्या हुई है उसका दोस्त या सम्बन्धी इस ‘कला’ का आनंद चाहकर भी नही ले सकता। ‘रामायण’ का आनन्द ओम थानवी तो ले सकते है, लेकिन ‘शम्बूक’ के सगे-सम्बन्धी इसका आनन्द कैसे ले सकते है।

यह रोचक बहस फेसबुक पर अप्रैल के महीने में चली। इसका पूरा ब्योरा आप जनपक्ष पर देख सकते है।
‘सीआईए’ ने दुनिया के साहित्य को अपने हिसाब से प्रभावित करने के लिए क्या क्या किया, इस पर एक बहुत अच्छी किताब है- The cultural cold war the CIA and the world of arts and letters Frances Stonor Saunders इसे आप किताब के नाम पर क्लिक करके डाउनलोड कर सकते है।

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4 Responses to ‘सीआईए’ और हिन्दी साहित्य…….

  1. बहुत मानीखेज और ज़रूरी आलेख. इस मुहिम को आगे बढ़ाने का शुक्रिया भी.

  2. सीआईए की सस्ती किताबों पर इब्ने इंसा की टिप्पणी बेजोड़ है- अफीम सस्ता है तो क्या चाट कर पड़े रहें? जहर सस्ता है तो क्या खा कर ख़ुदकुशी कर लें?

  3. शमशाद इलाही शम्स says:

    समाज में छिपे इन नासूरो को बेनकाब करने के लिए यह जरुरी है कि इनके दाताओं के चहरे पहले दिखाए जाए. सी आई ए के मानव जाति के प्रति किये गए अपराधो से लातिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के न जाने कितने मुल्क तड़प रहे है और उसके नाम लेवा भारत में जनमनस निर्माण के धंधे में बरसों से लित्प है.

  4. chimeki says:

    Thanks for sharing such a wonderful book. Your blog is very engaging.
    regards,
    http://www.chimeki.wordpress.com

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