शंबूक का कटा सिर — ओमप्रकाश वाल्मीकि

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अभी अभी यह दुखद खबर मिली कि प्रख्यात दलित साहित्यकार ‘ओमप्रकाश वाल्मीकि’ का देहरादून में निधन हो गया। ओमप्रकाश वाल्मीकी न सिर्फ अच्छे कहानीकार व उपन्यासकार थे बल्कि अच्छे कवि भी थे। कम ही लोगों को पता होगा कि उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत कविता से की थी। उनका पहला कविता संग्रह ‘सदियों का संताप’ नाम से 1989 में ही आ गया था। हालांकि वह ‘जूठन’ नामक महत्वपूर्ण कृति से पूरे देश में पहचाने गये। ‘कांचा इलैया’ ने ‘जूठन’ का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया।
उन्हें याद करते हुए प्रस्तुत है उनकी एक महत्वपूर्ण कविता-

जब भी मैंने
किसी घने वृक्ष की छाँव में बैठकर
घड़ी भर सुस्ता लेना चाहा
मेरे कानों में
भयानक चीत्काेरें गूँजने लगी
जैसे हर एक टहनी पर
लटकी हो लाखों लाशें
ज़मीन पर पड़ा हो शंबूक का कटा सिर ।

मैं उठकर भागना चाहता हूँ
शंबूक का सिर मेरा रास्ताा रोक लेता है
चीख़-चीख़कर कहता है–
युगों-युगों से पेड़ पर लटका हूँ
बार-बार राम ने मेरी हत्या की है ।

मेरे शब्दस पंख कटे पक्षी की तरह
तड़प उठते हैं–
तुम अकेले नहीं मारे गए तपस्वीष
यहाँ तो हर रोज़ मारे जाते हैं असंख्यव लोग;
जिनकी सिसकियाँ घुटकर रह जाती है
अँधेरे की काली पर्तों में

यहाँ गली-गली में
राम है
शंबूक है
द्रोण है
एकलव्यह है
फिर भी सब ख़ामोश हैं
कहीं कुछ है
जो बंद कमरों से उठते क्रंदन को
बाहर नहीं आने देता
कर देता है
रक्ते से सनी उँगलियों को महिमा-मंडित ।

शंबूक ! तुम्हायरा रक्तम ज़मीन के अंदर
समा गया है जो किसी भी दिन
फूटकर बाहर आएगा
ज्वारलामुखी बनकर !
[‘सदियों का संताप’से ]

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