आठ मार्च: औरतों के अस्तित्व के संघर्ष को सलाम!!

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आज, 8 मार्च 2015 अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस को ‘त्रिशूर’ केरल स्थित रिटेल शोरूम ‘कल्याण सारीज़’ की महिला कर्मचारियों की हड़ताल अपने 64 वें दिन प्रवेश कर रही है। कल्याण सिल्क के फेसबुक पेज पर 8 मार्च के दिन महिलाओं का अभिवादन किया गया है। निश्चित रूप से इस ब्रैण्ड की साड़ी पहन कर कुछ महिलाओं का व्यक्तित्व ‘जगमगा’ उठेगा। वहीं दूसरी ओर इस जगमगाते शोरूम में काम करने वाली महिला कर्मचारियों (सेल्सगर्ल्स) को बैठने की भी अनुमति नहीं है। वे 10 से 12 घण्टे और त्योहारों के अवसरों पर तो 14-14 घण्टे खड़े होकर काम करने को बाध्य हैं। प्रबन्धन कहता है कि अगर इन महिलाओं को बैठना है तो वे स्थायी रूप से अपने घर पर जाकर बैठें।
याद करिये, 19वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध जब अमेरिका और यूरोप की कपड़ा फैक्ट्रियों की महिला मज़दूर अपने कम वेतन, काम के अन्तहीन घण्टों, खराब कार्यदशा और कार्यस्थल की दुर्दशा के खिलाफ़ आन्दोलनरत थीं। इसकी परिणति हुई थी 8 मार्च 1908 को जब अमेरिका के रटगर्स स्क्वेयर पर लगभग 30000 औरतें इकट्ठी हुयीं थीं। काम के घण्टे कम करने, वेतन में बढ़ोत्तरी और मतदान का अधिकार उनकी प्रमुख मांगें थीं। इसी दिन को याद करते हुए 1910 में जर्मनी के कोपेनहेगन शहर में आयोजित समाजवादी महिला सम्मेलन में जर्मनी की नेत्री क्लारा जेटकिन ने 8 मार्च को महिला दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव रखा। इसे स्वीकार कर लिया गया। आगे चलकर 1975 में यूएन में इस दिन को महिला दिवस के रूप में मनाने की मंजूरी मिली। तब से बाज़ार ने इस दिन को अपने पक्ष में हाईजैक कर लिया और औरतों के बहादुराना संघर्ष की इस विरासत को भुलाने का नाकाम प्रयास किया जा रहा है।
आज भी भारत में असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लाखों-लाख औरतें ( और पुरुष भी) बहुत कम वेतन पर अमानवीय कार्यदशा में काम करने को बाध्य हैं। ज़ाहिर है 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध का अमेरिका आज भारत की ज़मीन पर जगह-जगह मौजूद है। पश्चिम बंगाल के चाय बागानों के मजदूर लम्बे समय से संघर्षरत हैं। हाल ही में वे 2 दिनों के लिए भूख हड़ताल पर थे। इन संघर्षरत मजदूरों में ज़्यादातर महिला मजदूर हैं। इन सभी संघर्षों का मूल मुद्दा यूनियन बनाने के अधिकार का है। यह हक़ीक़त आज 21वीं सदी के भारत की है। इस तथाकथित आज़ादी के 6 दशक बाद भी मजदूरों को संगठित होने का अधिकार भी नहीं प्राप्त है। जो लड़ाई यूरोप और अमेरिका में आज से 200 साल पहले शुरु हुई थी, भारत में आज भी जारी है। मारुति उद्योग में मजदूरों का पूरा संघर्ष इसी मांग पर हुआ था। पिछले दो साल से मारुति उद्योग के 147 मजदूर जेल में हैं। उनके घरों की औरतें और बच्चे अपनी तरह से इस संघर्ष में हिस्सेदार हैं। ग़ौरतलब है कि आज के कारपोरेट मीडिया को ‘आप’ के अन्तरकलह को दिखाने से फु़र्सत ही नहीं है। वह इन मुद्दों पर नज़र डालना भी ज़रूरी नहीं समझता। मजदूरों किसानों के चेहरे और उनके मुद्दे मीडिया से पूरी तरह गायब हो चुके हैं।
चलिये वापस लौटते हैं त्रिशूर की कल्याण सारीज़ की संघर्षरत दास्तान पर। कल्याण सिल्क केरल में टेक्सटाइल रीटेल क्षेत्र का एक विशाल क्षेत्र है। कल्याण सारीज़ में महिला मज़दूरों का संघर्ष तब शुरू हुआ जब प्रबंधन ने 6 महिला मज़दूरों को बिना नोटिस दिये सुदूर क्षेत्रों में स्थानान्तरित कर दिया। जब उन्होंने इसका विरोध किया तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। उनका दोष महज़ इतना था कि वे केरल के एक मजूदर संगठन ‘असंगठित मेघला थोजीलाली यूनियन (एएमटीयू)’ की सदस्य बन गयीं थीं। उल्लेखनीय है कि संगठित होना बाज़ार की दृष्टि में एक ‘अपराध’ है। इसके विरोध में उनकी यह हड़ताल 4 जनवरी 2015 को शुरू हुयी थी।
1990 के बाद से केरल के टेक्सटाइल रीटेल क्षेत्र में प्रमुख रूप से औरतों ने पुरुषों की जगह ले ली। क्योंकि इन जगहों पर बेहद कम वेतन पर औरतों से काम करवाना आसान था। फि़र ‘मुश्किल’ समय में उनसे निपटना भी आसान होता। वे बेवजह छुट्टी भी नहीं मांगती। कल्याण सारीज़ में तब से ही ये औरतें बेहद अमानवीय दशा में काम कर रही हैं। आज उन्हें 4000-7000 रु का मामूली वेतन मिलता है। उन्हें सुबह 9.30 से रात में 8 -9 बजे तक लगातार खड़े रह कर काम करना पड़ता है। उन्हें लगातार निगरानी में रखा जाता है। अगर गल्ती से कोई बैठ गयी तो फ्लोर मैनेजर या मालिक उन्हें गालियां देने लगते हैं। उनके आसपास बैठने के लिए स्टूल भी नहीं दिया जाता। अगर कोई कर्मचारी मालिकों की निगाहों से बच गयी तो सीसीटीवी कैमरे उनका काम कर देते हैं। उसकी फुटेज का आकलन किया जाता है। कोई कर्मचारी अगर 5 मिनट देरी से भी आती है तो उनका आधे दिन का वेतन कट जाता है। अगर कोई कर्मचारी पेशाब जाने की छुट्टी मांगती है तो उन्हें अभद्र टिप्पणियां सुनने को मिलती हैं। जैसे ‘अपनी साड़ी में होज़पाइप लगवा लो’ आदि। ये कर्मचारी डर के मारे सारे दिन पानी नहीं पीतीं या बहुत कम पानी पीती हैं। इन सबका उनके स्वास्थ्य पर बहुत प्रतिकूल असर पड़ता है। ऐसे में इन महिला मजदूरों का पहला मुद्दा तो इन्हें मानवीय दर्जा देने का है। वेतन वृद्धि और काम के घण्टे कम करने की मांग तो बहुत दूर की बात है। 8 मार्च 2014 को कल्याण सारीज़ की इन्हीं मजदूरों ने अपने बैठने के अधिकार की मांग को लेकर हड़ताल की थी। यह है विश्व शक्ति बनने का ख्वाब देखने वाले भारत की असल दस्तान।
4 जनवरी 2015 को शुरू हुई ये हड़ताल सदियों से मजदूरों के अनवरत जारी संघर्ष का एक हिस्सा है। कश्मीर में कुछ महिला संगठन 23 फ़रवरी को महिला दिवस मनाते हैं। इसी दिन 1991 में कश्मीर के ‘कुनान पोशपारा’ गांव की 50 से ज्यादा महिलाओं के साथ भारतीय सेना की एक टुकड़ी ने कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार किया था। तबसे ये महिलायें न्याय के लिये लगातार संघर्षरत हैं। मणिपुर में मनोरमा की माओं और शर्मिला के संघर्ष को भला कौन भूल सकता है?
बेशक आज भारत में 19वीं शताब्दी का मजदूर आन्दोलन जैसी स्थितियां दिखायी दे रही है पर आज भी अमेरिका की मेहनतकश औरतें तमाम अमानवीयताओं के खिलाफ संघर्षरत हैं। इस साल यह कार्यक्रम ‘संघर्षरत औरतें’ (women in the struggle) विषय पर केन्द्रित है। इसका मुख्य फोकस हैं 67 वर्षीय फि़लीस्तीनी अमरीकी नेत्री ‘रेस्मिया ओदेह’ पर। 1969 में इज़राइल में इन पर अमानवीय अत्याचार किया गया था। अमेरिका में भी यह अत्याचार जारी है। उन्हें अमेरिका में अवैध इमीग्रेशन का आरोप लगा कर 10 साल जेल की सज़ा सुनायी गयी है।
कुल मिला कर 8 मार्च नाम है औरतों के लिए अपने अस्तित्व के संघर्ष का। हमें इस संघर्ष को सलाम करते हुए ही इसे मनाना चाहिए।

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