‘मसान’ के बहाने…………….

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जब हम ऐसी फिल्मों से घिरे हुए होते है जिनमें ‘24 झूठ प्रति सेकेण्ड’ दिखाया जाता है तो ‘मसान’ जैसी फिल्में हमें वैसा ही सकून देती है जैसे उमस के मौसम में बारिश की फुहार। ऐसी फिल्में कला व यथार्थ के फर्क को काफी हद तक पाट देती है। लगता है कि आम जीवन, उनके संघर्ष व उनकी चिन्ताएं भी फिल्म के केन्द्र में हो सकती हैं। हालांकि भारत में ऐसी फिल्मों की एक समृद्ध परंपरा रही है। लेकिन पिछले करीब दो दशकों से यह परंपरा काफी कमजोर हुई है। क्षेत्रीय भाषाओं में तो फिर भी यह परंपरा किसी ना किसी रुप में कमोवेश जारी रही है, लेकिन हिन्दी में तो स्थिति काफी बुरी रही है।
बहरहाल ‘मसान’ का प्लाट काफी जटिल है। इसमें जाति का सवाल है। महिला के अपने निर्णय व अधिकार का सवाल है। निम्न वर्गीय व मध्यवर्गीय पीढ़ी के एक हिस्से और प्रभावी सामाजिक संरचना के बीच अन्तरविरोध का सवाल है। पुलिस की अमानवीय कार्यप्रणाली एवं उसके निर्मम भ्रष्टाचार का सवाल है। हां इसमें एक पात्र बनारस भी है। लेकिन अब तक फिल्मों में जिस बनारस को हम देखते आये हैं वह यहां नही है। यहां बनारस अपने मिथकीय रुप में नही बल्कि उसके ‘एण्टी थीसिस’ के रुप में है और उसका प्रमुख हिस्सा वहां का ‘श्मसान घाट’ है। जहां जलती लाशों की आग में मानों उसके सभी मिथकीय रुप नष्ट हो गये हों। ‘रिचा चड्ढा’ और ‘संजय मिश्रा’ के अलावा सभी पात्र लगभग नये है। जिससे कहानी में एक अलग ताजगी का अहसास होता है। स्क्रिप्ट काफी चुस्त है और आपको पहले ही दृश्य से अपने साथ बांध लेती है।
फिल्म की शुरुआत से ही जैसे जैसे इसके मुख्य चरित्रों का विकास होता है सामाजिक यथार्थ के साथ इनका तनाव भी बढ़ता जाता है। इस तनाव में दर्शक भी हिस्सेदार होता है और उसकी जिज्ञासा बढ़ती जाती है कि ये चरित्र यथार्थ के चौखटे को कैसे तोड़ते हैं। सिनेमा की भाषा में कहें तो निर्देशक का यथार्थ के साथ ‘इनगेजमेन्ट’ किस तरह का होता है। लेकिन अफसोस कि फिल्म यहीं जाकर औंधे मुंह गिर जाती है। ‘डोम’ जाति के लड़के और ‘गुप्ता’ जाति की लड़की के बीच का प्रेम सामाजिक तानेबाने से टकराने से पहले ही खत्म हो जाता है क्योकि केदारनाथ जाते हुए बस खाई में गिर जाती है और लड़की की मौत हो जाती है।
आपने ऐसी कहानियां जरुर सुनी होंगी जहां पात्र अपने लेखक से विद्रोह कर बैठते है और लेखक की योजना के खिलाफ अपना मार्ग खुद तय करते है। मुझे लगता है इस फिल्म में भी शालू पात्र को अपने लेखक और निर्देशक के खिलाफ विद्रोह करना चाहिए था। और अपने प्रेम को अंजाम तक पहुंचाना चाहिए था। अंजाम अच्छा हो या बुरा, यह महत्वपूर्ण नही है। महत्वपूर्ण है यथार्थ के साथ कलाकार की मुठभेड़। इस मुठभेड़ से बचने के लिए ही शालू को मारा गया है।
कमोवेश देवी के चरित्र के साथ भी ऐसा ही होता है। वह ‘छोटे शहर के लोगों की छोटी सोच’ से बाहर निकल जाना चाहती है। वह अपने पुरुष मित्र के साथ एक होटल में जिज्ञासा वश सेक्स सम्बन्ध बनाती है और उसे इसका कोई अफसोस नही है। वह मजबूत व स्वाभिमानी लड़की है। लेकिन उसके सामने ही पुलिस का आदमी हर महीने उसके पिता से 1लाख रुपये इस लिए ले जाता है कि उसके पास उसी होटल का देवी का एक वीडियो है, जिसे वह यूट्यूब पर डालने की धमकी देता है। पता नही लेखक और निर्देशक इस चीज को कैसे देखते हैं। इसके प्रति देवी की चुप्पी परेशान करती है। यहां तक कि वह नौकरी करके घूस की इस रकम का जुगाड़ करने में अपने पिता की मदद भी करती है। वह तमाम चीजों पर अपने पिता से जिरह करती है। उन पर यह आरोप भी लगाती है कि उनकी मां के प्रति उदासीनता के कारण ही उसकी मां की मृत्यु हुई। लेकिन पुलिस के इस शोषण पर कुछ नही बोलती। फिल्म के अन्त में देवी का पिता पुलिस को तय हुई रकम यानी 3 लाख की अन्तिम किस्त चुकाता है और उधर देवी बनारस छोड़कर इलाहाबाद सेटल होने के लिए आ जाती है। यहीं पर एक दृश्य बहुत महत्वपूर्ण है और उसे बहुत ही कौशल के साथ फिल्माया गया है। दरअसल उसके पुरुष मित्र (जिसने उसी समय होटल में पुलिस की रेड के समय बदनामी के डर से आत्महत्या कर ली थी) का घर इलाहाबाद में ही है। देवी एक बार वहां जाकर उसके मां बाप से मिलना चाहती है। कैमरा एक जगह घर के सामने थोड़ी दूरी पर स्थिर है। देवी अन्दर जाती है, अन्दर से एक आदमी (जाहिर है लड़के का पिता) के जोर जोर से चिल्लाने की आवाज आती है और देवी घर से रोते हुए लगभग भागते हुए बाहर आती है। यहां भी कोई ‘क्लोजअप’ नही है। और यह बेहद कठिन दृश्य आसानी से संम्प्रेषित हो जाता है।
इसी मनःस्थिति में वह इलाहाबाद के संगम घाट पहुचती है और उसकी मुलाकात विवेक (जो शालू की मौत के बाद फिर से अपने को संभालता है और इलाहाबाद आकर रेलवे की नौकरी ज्वाइन करता है और दोबारा अपनी जिन्दगी शुरु करता है।) से होती है। और यहीं पर एक प्रतीकात्मक डायलाग के साथ फिल्म समाप्त हो जाती है।
कई संभावनाएं परिपक्व होने से पहले ही मुरझा जाती हैं। मशहूर फिल्म समीक्षक ‘Jay Weissberg’ ने सही कहा है कि इस फिल्म में काफी संभावना थी जिसे निर्देशक चरितार्थ नही कर पाया।
यह संयोग ही था कि ‘मसान’ देखने के साथ ही मैने ‘हंस’ के अगस्त अंक में एक बेहतरीन कहानी पढ़ी-‘अवधेश प्रीत’ की ‘चांद के पार एक चाभी’। इसमें भी एक मुशहर जाति के लड़के और एक ब्राहमण लड़की की अनछुई सी प्रेम कहानी है। और इस कहानी के इर्द गिर्द वो सामाजिक-राजनीतिक ताना बाना है जिससे टकराकर अब तक ना जाने कितनी ही प्रेम कहानियों ने दम तोड़ा होगा। लेकिन ‘मसान’ के विपरीत यह कथा अपने यथार्थ से टकराती है और उसकी कीमत भी चुकाती है। लेकिन इसी प्रक्रिया में वो जमीन तैयार होती है जिसके कारण आने वाले समय में प्रेम कहानियों की संख्या कम होने की बजाय और बढ़ेगी ही।
फिल्म में यथार्थ के साथ कैसा ‘ट्रीटमेन्ट’ होगा यह कमोवेश निर्देशक की यथार्थ के प्रति अपनी दृष्टि से तय होता है। ‘मसान’ के निर्देशक ‘नीरज घावन’ ने अपने एक साक्षात्कार में कहा कि वे व्यक्ति के नैतिक व उसके अस्तित्व के संकट को दिखाना ज्यादा पसंद करते है बनिस्पद कि उसके सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को। नीरज ने आस्ट्रेलिया के मशहूर डायरेक्टर ‘माइकल हानके’ को अपना आदर्श बताते हुए उनकी फिल्मों के भी उदाहरण दिये जो मजदूर वर्ग के नैतिक व अस्तित्ववादी संकट को सामने लाती है। माइकल हानके तो साफ साफ कहते हैं कि यथार्थ क्या है उन्हे नही पता। उनके अनुसार किसी भी फिल्म की अच्छी व बुरी सभी व्याख्याएं सही होती है। उनके अनुसार फिल्म इस तरह बनानी चाहिए कि लोग उसकी अपने अपने हिसाब से मनमानी व्याख्या कर सके।
यथार्थ के प्रति यह उत्तर-आधुनिक नजरिया ही कला की संभावना को परिपक्व होने से पहले ही मार देता है। और इसी नजरियें के कारण हम यथार्थ से मुठभेड़ नही करते बल्कि उसके कैदी हो जाते हैं। ‘एडुवार्डो गैलियानों’ के शब्दों में कहें तो यथार्थ को हम अपनी नियति बना लेते हैं। यह लिखते हुए मुझे सेनेगल के मशहूर डायरेक्टर ‘उस्मान सम्बेन’ की फिल्म मूलादि याद आ रही है। यह फिल्म भी अफ्रीका की एक सामाजिक समस्या को उठाते हुए पहले ही दृश्य से एक तनाव पैदा कर देती है। लेकिन यह तनाव ‘स्क्रिप्ट के मैनुपुलेशन’ में खत्म नही होता (जैसा कि मसान में हुआ) बल्कि यह तनाव यथार्थ के साथ मुठभेड़ का कारण बनता है। और इस मुठभेड़ से पैदा हुआ नया यथार्थ फिल्म को वो गति प्रदान करता है जिसे हम सब अपने जीवन में अनेक बार महसूस करते हैं। दरअसल यही गति जीवन की भी असली गति है यानी यथार्थ-मुठभेड़-नया यथार्थ-नयी मुठभेड़…………………..।
यहां यह जोड़ना भी जरुरी है कि हमारे ज्यादातर युवा फिल्मकार यूरोप के सिनेमा से खासे परिचित है और उससे प्रभावित भी हैं। लेकिन अफ्रीका, लैटिन अमरीका व एशिया के छोटे देशों व फिलस्तीन के सिनेमा को आमतौर पर ये युवा जाने अनजाने नजरअंदाज करते हैं। जबकि ज्यादातर असली सिनेमा यहीं घटित हो रहा है। यहां की फिल्में व्यक्ति के नैतिक व अस्तित्ववादी संकट को उसके सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक पृष्ठभूमि में रख कर देखती हैं और कमोवेश इस पृष्ठभूमि से टक्कर भी लेती है। भारत के लिए इन फिल्मों की समसामयिकता कही ज्यादा है बनिस्पद यूरोप व अमेरिका की फिल्मों के।
फिल्म की एक मजेदार विडंबना यह है कि इसकी तारीफ इस लिए भी हो रही है कि यह फिल्म ज्यादातर रियल लोकेशन पर शूट की गयी है। और जलते हुए श्मशान घाट के दृश्य की सभी लोग चर्चा कर रहे है। लेकिन यही दृश्य रीयल लोकेशन पर शूट नही हुआ है।

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