किसानों का वेतन आयोग कब आयेगा —- देवेन्द्र शर्मा

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यह खुल्लमखुल्ला पक्षपात है। सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट ( जिसके अनुसार केन्द्रीय कर्मचारियों का वेतन औसतन 23.55 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है) को स्वीकार करते हुए वित्त मंत्री ‘अरुण जेटली’ ने कहा कि इससे राज्य खर्च पर ‘मामूली’ भार पड़ेगा। वेतन की इस भारी बढ़ोत्तरी से उम्मीद है कि आटोमोबाइल, रियल इस्टेट और उपभोक्ता सामानों की मांग बढ़ेगी। दूसरे शब्दों में कहे तो मांग बढ़ने की संभावना से उद्योग ज्यादा उत्साहित है और इसलिए वित्त मंत्री भी उत्साहित हैं कि इससे जीडीपी संख्या भी बढ़ने की उम्मीद है।
कल्पना कीजिए कि 60 करोड़ किसान (इसका मतलब है कि करीब 10 करोड़ किसान परिवार) की खेती से होने वाली आय में भी 23.55 प्रतिशत का इजाफा हो जाय तो मांग अप्रत्याशित तरीके से बढ़ेगी और पूरी अर्थव्यवस्था ऐसी सरपट गति से आगे बढ़ेगी कि हम महज उसकी कल्पना ही कर सकते हैं। फिर ऐसा क्यो है कि सभी सरकारें सिर्फ उन्हीं की जेबें भरती है जिनकी जेब में पहले से ही काफी कुछ है और व्यापक जनता को नजरअंदाज करती हैं। यह एक ऐसा सवाल है जिसे कोई भी अर्थशास्त्री या नीति निर्धारक संबोधित नहीं करना चाहता।
अभी पिछले माह ही सुप्रीम कोर्ट में एक एफीडेविट फाइल करते हुए अतिरिक्त सालीसीटर जनरल ‘मनिन्दर सिंह’ ने कहा कि किसानों को उनकी उत्पादन लागत पर 50 प्रतिशत मुनाफा उपलब्ध कराने में सरकार असमर्थ है (लागत पर 50 प्रतिशत मुनाफे की सिफारिश ‘स्वामीनाथन कमेटी’ ने की थी।) उन्होने आगे कहा कि ‘‘लागत पर 50 प्रतिशत मुनाफा देने से बाजार पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) और उत्पादन लागत के बीच यान्त्रिक जुड़ाव कुछ मामलों में प्रतिकूल प्रभाव वाला हो सकता है।’’
सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार ने धान और गेहूं के समर्थन मूल्य में महज प्रति कुन्तल 50 रुपये की बढ़ोत्तरी की थी जो महज 3.6 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी है जो उस समय के मुद्रास्फीति के अतिरिक्त बोझ को हटाने के मामले में नाकाफी था। इस साल 2015-16 में गेंहू की कीमत 75 रुपयें प्रति कुन्तल बढ़ायी गयी है।
उम्मीद है कि सातवें वेतन आयोग से 47 लाख केन्द्रीय कर्मचारी और 52 लाख पेन्शन भोगी लोगों को फायदा होगा। हांलाकि इस बढ़ोत्तरी से 1.02 लाख करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा, लेकिन यथार्थ में यह कई गुना ज्यादा होगा। एक संकीर्ण अनुमान के अनुसार 3 लाख करोड़ से कम नहीं। क्योकि इसी तरह की वेतन बढ़ोत्तरी राज्य सरकार के कर्मचारियों, स्वायत्त संस्थाओं, विश्वविद्यालयों और पब्लिक सेक्टर के कर्मचारियों को भी दिया जाने वाला है।
आय में यह असमानता बहुत भयानक है। अब सरकारी कर्मचारी के लिए न्यूनतम वेतन बढ़कर 18000 रुपये हो गया वहीं एक किसान परिवार की औसत मासिक आय (एनएसएसओ 2014 की रिपोर्ट के अनुसार) महज 6000 रुपये है। इसमें से 3078 रुपये खेती से आते है। लगभग 58 प्रतिशत किसान अपनी मासिक आय के पूरक के तौर पर मनरेगा जैसी गैर कृषि गतिविधियों पर निर्भर रहते हैं। खेती से होने वाली आय बहुत कम है क्योकि सभी सरकारोें ने जानबूझकर खेती को संसाधनों से वंचित रखा है और किसानों को उचित दाम देने से इंकार करती रही हैं।
महाराष्ट्र के किसान नेता ‘विजय जावनधिया’ कहते हैंः ‘‘प्रत्येक दस सालों में सरकारी कर्मचारियों के न्यूनतम वेतन में करीब 30 प्रतिशत का इजाफा किया जाता है। 1986 में न्यूनतम वेतन 750 रुपये था। जनवरी 2016 में जब सातवां वेतन आयोग लागू होगा तो यह बढ़कर 18000 रुपये मासिक हो जायेगा। यदि यही पैमाना कृषि उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर लागू किया जाय तो 1985-86 में गेंहू का समर्थन मूल्य 315 रुपये था और इस हिसाब से यह बढ़कर इस समय 7505 रुपये हो जाना चाहिए था। लेकिन यथार्थ में 2015-16 के लिए गेंहू के किसानों को जिस समर्थन मूल्य का वादा किया गया है वह है महज 1525 रुपये प्रति कुन्तल।
सरकारी खरीद दाम (या बाजार दाम) ही एकमात्र वह तरीका है जिसके जरिये किसान अपनी आय प्राप्त कर सकता है। उसकी आय बाजार पर निर्भर है जहां वह अपना उत्पाद बेचता है। इसके अलावा और कोई आय का जरिया नही है। डीए (मंहगाई भत्ता) और अन्य सुविधाएं उसकी आय का हिस्सा नही हैं। इसकी तुलना सरकारी कर्मचारी से कीजिए। प्रत्येक छः माह पर उन्हे मंहगाई भत्ता मिलता है। जो बढ़कर उनके मूल वेतन में मिल जाता है। यदि सातवें वेतन आयोग की माने तो कर्मचारियों को मिलने वाले कुल 198 भत्तों में से 108 भत्तों को कायम रखा गया है और उन्हे बढ़ाया गया है। जहां मूल वेतन में 16 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की गयी है वही भत्तों में 63 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की गयी है।
सरल शब्दों में कहें तो जहां समाज के एक छोटे तबके की आर्थिक समृद्धि लगातार कई गुना बढ़ायी जा रही है वहीं व्यापक जनसमुदाय को नजरअंदाज किया जा रहा है। किसान जनसंख्या का 52 प्रतिशत है। संख्यात्मक रुप से वह 60 करोड़ से ज्यादा है। इसके बावजूद उन्हें जानबूझकर पिरामिड के पायदान पर धकेला जा रहा है। इसी कारण से नवम्बर के पहले सप्ताह में बंगलूरू में सम्पन्न किसान संगठनों के दूसरे राष्ट्रीय कन्वेन्शन ने तब तक सातवें वेतन आयोग के क्रियान्वयन पर रोक लगाने की मांग की है जब तक कर्मचारियों और किसानों की आय में समानता स्थापित नही हो जाती।
सातवें वेतन आयोग के तहत न्यूनतम वेतन की गणना के लिए जो बुनियादी मानदण्ड इस्तेमाल किये गये, वे हैं-एक मजदूर परिवार की जरुरतेंः न्यूनतम कैलोरी सुनिश्चित करने के लिए भोजन की आवश्यकता, वयस्क शरीर के लिए जरुरी प्रोटीन व फैट, औसत मजदूर परिवार के लिए प्रति वर्ष 18 यार्ड प्रति व्यक्ति कपड़े की आवश्यकता, मूल वेतन का 7.5 प्रतिशत घर के किराये के लिए, 20 प्रतिशत ईधन, लाइट व दूसरी जरुरतों के लिए। समर्थन मूल्य निर्धारित करने के लिए खेती की लागत की गणना करते समय भी इन कैटेगरियों को शामिल करना चाहिए।
खेतिहर जनसंख्या के लिए आर्थिक सुरक्षा समय की महती जरुरत है। इसलिए मेरा सुझाव है कि एक ‘नेशनल फार्मर इनकम कमीशन’ (National Farmers Income Commission) स्थापित किया जाय जिसे यह अधिकार दिया जाय कि वह कृषि सेक्टर और संगठित सेक्टर के बीच आय की समानता को सुनिश्चित करे। इसी समय यह ‘फार्मर इनकम कमीशन’ किसान परिवारों के लिए एक मासिक पैकेज की भी घोषण करे जिसे किसान परिवारों को हर माह दिया जाय। तब तक सातवे वेतन आयोग को निष्प्रभावी रखा जाना चाहिए।
अनुवादः कृति
साभार- http://devinder-sharma.blogspot.in/

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