कृषि संकट : आर्थिक कुप्रबंधन की देन है – देविंदर शर्मा

देविंदर शर्मा

देश में खेती की निर्भरता का सच क्या है? जीडीपी में योगदान का वास्तविक आंकड़ा कितना है?

सच ये है कि हर प्रधानमंत्री देश को कृषि प्रधान बताता है। मगर बजट पेश करने वाला हर वित्त मंत्री बजट में एग्रीकल्चर बाटम पर व उद्योग टाप पर रखता है। लोगों को विश्वास दिलाने को कहता है कि देश कृषि प्रधान है। हम खेती को ऐसा मंच नहीं बना पाये कि खेती देश के लिये लाभकारी साबित हो सके। वास्तव में कुल 52 फीसदी लोग कृषि पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर निर्भर हैं। यानी कुल 60 करोड़ लोग खेती पर निर्भर हैं। पिछली जनगणना में यह तथ्य सामने आया कि खेती पर निर्भर जनसंख्या कम होती जा रही है। अब  भूमिहीन काश्तकार का आंकड़ा बड़ा है। हम मानकर चलें कि करीब 35 करोड़ किसान भूमिहीन हैं और करीब कुल 25 करोड़ किसान खेत वाले हैं।
सकल घरेलू उत्पाद में खेती का योगदान लगातार घटा है?
जहां तक जीडीपी का सवाल है तो यह कुल योगदान का 14 प्रतिशत है। यह धारणा फैलायी जा रही है कि खेती का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान कम हो रहा है। जब हम किसानों को दाम का हक नही देंगे तो स्वाभाविक रूप खेती का जीडीपी में शेयर कम होगा। सीधी सी बात है कि यदि इनकम कम होगी तो उसकी हिस्सेदारी भी कम होगी। ये इरादतन कम किया गया है।

आरोप लगते रहे हैं कि सरकार कॉरपोरेट को श्रमिक उपलब्ध कराने के लिये किसानों को खेती से बेदखल कर रही है?

पहले सरकार की नीतियों को समझना जरूरी है। वास्तव में ये नीतियां क्या हैं। वर्ष 1996 में मुझे एमएस स्वामीनाथन फाउंडेशन के चेन्नई सम्मेलन में भाग लेने का मौका मिला। वहां विश्व बैंक के एक वाइस प्रेजीडेंट ने एक आंकड़ा प्रस्तुत किया। विश्व बैंक के अधिकारी ने कहा था कि 2015 तक भारत में गांव से शहर जाने वाले किसानों की संख्या इंग्ालैड, फ्रांस व जर्मनी की जनसंख्या से दोगुनी होगी। उस समय तीनों देशों की जनसंख्या बीस करोड़ थी यानी कि 40 करोड़ शिफ्ट होंगे। तब मैंने सोचा कि विश्व बैंक हमें सचेत कर रहा है। मगर जब मैंने 2008 में विश्व बैंक की रिपोर्ट देखी तो उसने सरकार को उलाहना दिया कि अब तक ये किसान कृषि से निकाले क्यों नहीं जा सके। डेवलेपमेंट रिपोर्ट में कहा गया कि जमीन अयोग्य लोगों के हाथों में है, जमीनों का अधिग्रहण तेज किया जाये। जो लोग खेती के अलावा कुछ नहीं जानते, उन्हें कृषि से हटाया जाये। जो युवा लोग खेती से जुड़े हैं, उन्हें ट्रेंिनग इंस्टीट्यूटों में, उद्योगों में काम करने का प्रशिक्षण दिलाया जाये। इसके ठीक एक साल बाद मैंने पाया कि 2009 में तत्कालीन वित्तमंत्री पी. चिंदबरम ने तत्काल 1000 आईटीआई खोलने की मंजूरी दे दी। यह सब सोची-समझी रणनीति के तरह लोगों को खेती से हटाने का उपक्रम है। ऐसे तौर-तरीकों से विकास नहीं होता। हम ये बात अब भी नहीं समझते कि यूरोप व अमेरिका में हुए बदलावों और भारत की स्थितियों में फर्क है। इससे आने वाले वर्षों में सोशो-इकोनॉमी चुनौती से देश में भयावह परिदृश्य उत्पन्न होगा।

क्या असली मुद्दा किसान की लागत न निकल पाना है?

दरअसल, किसान की लागत और मुनाफे की तो बात ही नहीं होती। जब हमारी व्यवस्था का मकसद ही खेतिहर लोगों को खदेड़ना है तो फिर क्या कहा जाये। दरअसल, हमने आधा अधूरा अमेरिकी माडल अपनाया है। पब्लिक सेक्टर में निवेश किया ही नहीं। कोशिश की कृषि उत्पादों की कीमत कम रखिये, जिससे मजबूर होकर किसान खेती छोड़कर मजदूर बन जाये। सही मायनो में हमने वाजिब दाम दिये ही नहीं। हमने कभी किसान की लागत को वर्क आउट किया ही नहीं। आंकड़ों पर नजर डालें तो जो गेहूं 1970 में 76 रुपये कंुतल था वह 2015 में 1450 रुपये कुंतल था यानी 45 साल में उसमें सिर्फ 19 गुना ही वृद्धि हुई। इस अवधि में यदि हम सरकारी कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि देखें तो बेसिक पे व डीए में करीब 120 से 150 गुना, कालेज टीचर के वेतन में 120 से 150 गुना और प्राइमरी टीचर के वेतन में 280 से 300 गुना तक वृद्धि हुई है। कर्मचारियों के कुल 108 तरह के भत्ते शामिल हैं, जबकि किसान को एक भी भत्ता नहीं मिलता। यानी किसान के खिलाफ मैच फिक्स है। वह खाद्यान्न की नहीं बल्कि दुखों की खेती करता है।

क्या किसान आंदोलन नोटबंदी के परिणामों और विपक्ष की राजनीतिक हताशा की शह से उपजा है?

मैं आंदोलन को इस तरह से नहीं देखता। किसानों के दिल में भयंकर गुब्बार है। ये गुस्सा  तो फूटना ही था। मौजूदा आंदोलन का अभी जो आप समापन देख रहे हैं, उसे किसी तरह हैंडल कर लिया गया। यदि हालात इसी तरह चलते रहे तो यह गुस्सा भयंकर ढंग से फूटेगा। खेती की अनदेखी की जा रही है, जानबूझकर किसान को खेती से बेदखल किया जा रहा है। ये तो अभी ट्रेलर है, असली फिल्म अभी बाकी है।

किसानों की समस्या की असली जड़ कहा है?

मूलत: कृषि समस्या आर्थिक कुप्रबंधन की समस्या है। इसके मूल में आर्थिक असुरक्षा है। साल-दर-साल किसान पिस रहा है। सरकार की कोशिश होती है कि किसी तरह से मुद्रास्फीति को नियंत्रण में किया जाये। ठीक है लोगों को सस्ता अनाज मिल रहा है, मध्य वर्ग खुश हो जाता है। मगर सवाल यह है कि जो अन्नदाता उपज पैदा कर रहे हैं, उसे आप क्या दे रहे हैं? उसे खेती से बेदखल किया जा रहा है। उससे हम पैसा ले तो रहे हैं मगर दे नहीं रहे हैं।

ऐसा क्यों है कि किसान की आत्महत्या की खबरें संपन्न इलाकों पंजाब, महाराष्ट्र आदि से आ रही हैं?

ऐसा नहीं है। इस समस्या के दो पहलू हैं। एक तो जो आत्महत्याएं हो रही हैं, उसकी सही तस्वीर सामने नहीं आ रही है। महत्वपूर्ण कारण यह है कि जहां किसान का फसल के साथ रिस्क जुड़ा है, वहां से आ रही हैं। जहां कैश क्रॉप के रूप में अंगूर, कपास आदि हैं, वहां से ज्यादा आत्महत्या की खबरें हैं। कुल 70 प्रतिशत कपास का क्षेत्र संवदेनशील है। दूसरे आत्महत्या के आंकड़ों की हकीकत सामने नहीं आ रही है। विदर्भ के इलाके में स्वयंसेवी संस्था से जुड़े किशोर तिवारी ने आत्महत्या का डाटा एकत्र कर देना शुरू किया। जब यह आंकड़ा निकलकर एनजीओ व मीडिया के पास आया तो देश को विदर्भ की हकीकत का पता चला। यदि ये सारे देश में होता तो वास्तविकता उभरकर सामने  आती। बुंदेलखंड से  भी आत्महत्याओं की खबरें आ रही हैं। अब लोग जागरूक हो रहे हैं। मैं चार साल पहले दिल्ली से चंडीगढ़ आया। प्रिंट मीडिया से मिली आत्महत्या की जानकारी को मैंने हर रोज ट्वीट करना शुरू किया। पंजाब हॉटस्पाट के बारे में लोगों को पता चला। दरअसल, सूचना बंटेगी तो पता चलेगा। उड़ीसा में भयंकर सुसाइड के मामले सामने  आ रहे हैं। देश में क्रेश क्रॉप की इनपुट कास्ट बढ़ी है।

आने वाले वक्त में खाद्य जरूरतें कितनी बड़ी चुनौती है?

ये बात कोई समझने की कोशिश नहीं कर रहा है। वर्ष 1965 में पहली बार खाद्यान्न का आयात किया गया। वर्ष 1967 में सबसे ज्यादा 11 मिलियन टन अनाज आयात किया गया। तब इसे हम शिप टू माउथ कहते थे। यानी जहाजों से उतरा  और सीधे खाद्यान्न के रूप में इस्तेमाल हुआ। देश में हरित क्रांति आई, इम्पोर्ट बंद हुआ। मगर आज हम उन्हीं नीतियों पर जा रहे हैं। इतने बड़े देश को फीड करना आसान नहीं होगा। जब भारत मार्केट में उतरता है तो कीमतें बढ़ती हैं। वहीं जब हम बेचने जाते हैं तो कीमतें गिर जाती हैं। भारत विश्व बाजार में बड़ा देश है तो उथलपुथल होगी। इतने बड़े देश को आयात करके खिलाना संभव नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी नेशनल सिक्योरिटी खाद्य सिक्योरिटी से जुड़ी है। हम जय जवान, मर किसान का नारा नहीं लगा सकते। वर्ष 2007-08 में जब खाद्यान्न संकट हुआ तो 37 देशों में खाद्यान्न को लेकर दंगे हुए। मगर भारत की स्वतंत्र व्यवस्था के चलते हम इससे प्रभावित नहीं हुए। भारत में खाना न हो तो क्या हो।

क्या परंपरागत फसलों की पैदावार खत्म होने व पानी वाली फसलों के प्रचलन से समस्या बढ़ी है?

असली समस्या तो लागत की है। हरेक चीज रिलेटिव है। हरित क्रांति से पहले भारतीय परंपरागत फसलों के हालात एेसे नहीं थे कि हम पूरे देश का पेट भर सकें। हरित क्रांति के बाद दो महत्वपूर्ण कदम उठाये गये। एक तो फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण, जिससे किसानों का व्यवस्था पर भरोसा बढ़ा। दूसरा एफसीआई का गठन । इतने बड़े देश में खाद्यान्न को हेंडल करना व डिस्िट्रब्यूट करना आसान नहीं था। माना कि भ्रष्टाचार बड़ी समस्या है मगर इसे डिस्मेंटल करना आत्मघाती कदम होगा। हम फिर शिप टू माउथ की स्थिति में पहंुच जायेंगे। हमें कास्ट आफ प्राडक्शन भी देखनी है। किसान को न्यायसंगत दाम तो मिलें। यदि किसान को मुद्रास्फीति के हिसाब से मौजूदा दर पर अनाज की कीमत मिले तो शहर गये लोग गांव आना शुरू कर देंगे। अनाज का बाजार मूल्य दें और बाकी लागत उसके जन धन खाते में स्थानांतरित कर दें।

देश में अथाह गरीबी है। कीमतें बढ़ाने से बढ़ी महंगाई से सामाजिक असमानता नहीं बढ़ेगी?

बिल्कुल नहीं। दुनिया में असमानता हर देश में है। कुल टॉप एक प्रतिशत लोगों को मोटा पैसा मिलता है। मिडिल क्लास को छोड़ दें तो देश में 60 करोड़ लोग खेती से जुड़े हैं। देश के आधे यानी 17 प्रदेशों में किसान की मासिक आय 1700 रुपये से कम प्रतिमाह है। इतने में तो हम गाय नहीं पाल सकते। आज जब मिनिमम लिविंग वेज की बात होती है तो किसान को भी तो यह मिलना चाहिए। हमारे देश में किसान उत्पाद भी है और उपभोक्ता भी है। यदि हम किसान को खर्च के बराबर पैसा देते हैं तो हमारी सात-आठ फीसदी के आसपास रहने वाली जीडीपी 15 तक पहुंच सकती है। तभी तो सबका साथ, सबका विकास होगा।

न्यू्नतम समर्थन मूल्य किसान के हित में कितना कारगर है?

मैं सीआईआई व फिक्की की बैठक में शामिल था तो खाद्य मंत्री ने पूछा कि एमएसपी के दायरे में कितने किसान हैं? अंदाजे से मैंने तीस फीसदी बताया। अधिकारी जबाव न दे पाये। एफसीआई को पता नहीं था, अगली मीटिंग में खुलासा हुआ कि छह प्रतिशत। यानी कुल 94 फीसदी किसान को कोई सुरक्षा कवच नहीं । ऐसे में किसान आत्महत्या नहीं करेगा तो क्या करेगा? कैसे जीयेगा किसान?
[https://devinder-sharma.blogspot.in/ से साभार]

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