अब्बू की नज़र में जेल-9

कोर्ट से जब हम वापस हाक हेडक्वार्टर पहुंचे तो मैं काफी हल्का और आत्म विश्वास से भरा महसूस कर रहा था। निश्चय ही यह ‘इंकलाब जिंदाबाद’ नारे का प्रभाव था। अमिता थोड़ा पहले पहुंच चुकी थी। जब मैं और अब्बू वहां पहुंचे तो वहां एक महिला कांस्टेबिल के चिल्लाने और रोने की आवाज आ रही थी। जब मैं पूछताछ वाले कमरे में पहुंचा तो बगल के कमरे से अमिता की भी तेज तेज आवाज सुनाई दे रही थी। तभी मेरे कमरे में अमिता को साथ ले जाने वाली महिला कांस्टेबिल रोते हुए गुस्से से पैर पटकते प्रवेश की। उसके पीछे एटीएस का एक अधिकारी भी आया। महिला के कुर्सी पर धंसते ही उस अधिकारी ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला-‘चलो छोड़ो, ये साले खुद ही अपनी मौत मरेंगे।’ मैंने तेज आवाज में कहा-‘गाली किसे दे रहे हैं।’ उसने मुझे नज़रअंदाज कर दिया और फिर उस महिला कांस्टेबिल से ही मुखातिब होते हुए कहा-‘साले ऐसे ही होते हैं।’ इस बार मैं गुस्से में बोला-‘आपको गाली देने का अधिकार नहीं है।’ यह सुनकर वह महिला कांस्टेबिल चिल्ला पड़ी-‘आप लोगों को गाली देने का अधिकार है?’ मैं आवाक रह़ गया। लेकिन बेहद शान्त होकर पूछा-‘किसने गाली दी, आखिर हुआ क्या है?’ महिला ने तेज और उंची आवाज में कहा-‘आपकी पत्नी ने मुझे गाली दी है।’ मैंने आश्चर्य से कहा-‘क्या कहा उसने?’ ‘हरामी कहा उसने मुझे’-महिला कांस्टेबिल चीख कर बोली। मैंने तुरन्त मामला शान्त करने के उद्देश्य से कहा-‘चलिए उसकी तरफ से मैं माफी मांगता हूं। लेकिन हुआ क्या?’ वह महिला कांस्टेबिल गुस्से में उठी और पैर पटकते हुए बाहर चल दी। इस पूरे माहौल से अब्बू थोड़ा सकते में आ गया था और मुझसे सट कर बैठा रहा। उसके जाने के बाद अब्बू ने मुझसे कान में कहा-‘मौसा मुझे पता है क्या हुआ था।’ अब्बू ने फिर धीमें धीमें बताना शुरू किया-‘मौसा, वो पुलिस लड़की न, मौसी का बायां हाथ खींच कर कैमरा वाले से दूर ले जा रही थी। मौसी को बांए हाथ में दर्द है ना, तो मौसी ने उसे कसकर डांट दिया।’ फिर थोड़ा रूक कर बोला-‘अच्छा किया डांटा।’
खैर उसके बाद एटीएस के ही एक बन्दे ने मुझे बताया कि वह महिला डिप्रेशन में है। ऐसे ही कुछ कुछ समय पर भड़क उठती है। मैंने पूछा, पहले से है या नौकरी में आने के बाद हुआ। उसने कहा, नौकरी में आने के बाद डेवलप हुआ है। शायद नौकरी के प्रेशर का असर हो। मैं उससे बात कर ही रहा था कि पुनः वह महिला तेजी से कमरे में दाखिल हुई और उसी तरह चिल्लाकर बोली-‘दूसरो की पत्नियों को गले लगाने का रिवाज आपके यहां होगा, हमारे यहां नहीं।’ यह कहकर वह उल्टे पाव वापस चल दी। मैं आवाक रह गया कि यह क्या बात हुई। किस सन्दर्भ में उसने यह बात की। दिमाग पर बहुत जोर डालने पर मुझे बात समझ आयी। दरअसल कोर्ट में अब्बू की मां जब रो रही थी तो मैंने उसे सांत्वना देते हुए हल्के से गले लगा लिया था और उसके सर पर अपना हाथ रख दिया था। मुझे याद आया, उस समय यही महिला कांस्टेबिल बड़े ध्यान से मेरी तरफ देख रही थी। मुझे पूरा मामला समझ आ गया। लेकिन मुझे उस महिला कांस्टेबिल पर जरा भी गुस्सा नहीं आया। बल्कि तरस आया। दरअसल असल कैद में तो वो थी-‘अपने पिछड़े मूल्यों की कैद में।’
खैर, कोर्ट से एटीएस को हमारा ‘ट्रांजिट रिमांड’ मिल चुका था और अब हमें भोपाल से लखनऊ आना था। गाड़ियों में जल्दी जल्दी सामान पैक किया जा रहा था। जरूरी औपचारिकताएं निभाई जा रही थी। पहली बार हम इतनी लंबी यात्रा बिना कोई सामान लिए करने जा रहे थे-खाली हाथ। कार से इतने ‘लांग ड्राइव’ पर जाने का हल्का सुख भी महसूस हो रहा था और आगे होने वाली पूछताछ की चिंता भी सता रही थी। खैर 8 बजे रात हम लोग निकल पड़े। अब्बू उत्साहित था कि हम लखनऊ जा रहे है-यानी मौसा के गांव। भोपाल से अपने राजनीतिक काम पर निकलते हुए मैं अब्बू से यही कहता था कि मैं लखनऊ जा रहा हूं, अपने गांव।
रास्ते में ढाबे पर हमने खाना खाया। और फिर आगे निकल पड़े। इस दौरान कोई किसी से नही बोल रहा था। तभी आगे बैठे एटीएस अधिकारी ने बोला-‘रात में हम झांसी में अपने कार्यालय पर रूकेंगे और फिर सुबह लखनऊ के लिए निकलेंगे।’ मैं कुछ नहीं बोला। मेरे पास विकल्प ही क्या था। खाना खाने के बाद अब सबको नींद आ रही थी। अब्बू तो मेरी गोद में ही सो गया था। अचानक आगे की सीट पर ड्राइवर के साथ बैठे अधिकारी ने आदेशात्मक स्वर में बोला-‘किसी को सोना नहीं है। वरना ड्राइवर को भी नींद आयेंगी।’ थोड़ा देर रूक कर फिर बोला-‘ चलिए मनीष जी अपने बारे में कुछ बताइये। अपने बचपन से शुरू कीजिए।’ मैं कुछ बोलता, इससे पहले ही उसने सवाल दागना शुरू कर दिया। मसलन, जन्म कहां हुआ, पढ़ाई कहां से की आदि। मुझे समझ नही आया कि वह सचमुच मुझमें रूचि ले रहा है या पूछताछ की अपनी ड्यूटी निभा रहा है। बहरहाल मुझे मजा आ रहा था। बहुत बहुत दिनों बाद कोई मेरे बचपन के बारे में पूछ रहा था। मेरे अगल बगल बैठे दो सिपाही और मेरी सीट के पीछे बैठे दो सिपाहियों की प्रतिक्रिया मैं रात के अंधेरे में नहीं देख पा रहा था। अचानक मेरे बगल में बैठे एटीएस के सिपाही ने मुझसे पूछा-‘आपके कमरे में जो ‘शहतूत’ वाली कविता लगी थी वो आपने लिखी है?’ मैंने हंसते हुए कहा-‘अरे नहीं, वह तो ईरान के मजदूर कवि ‘साबिर हका’ की कविता है।’ एटीएस का यह व्यक्ति वही था जो मेरे कमरे की तलाशी के दौरान तलाशी लेने की बजाय दिवारों पर लगी कविताएं पढ़ रहा था। अचानक उसने सामने की सीट पर बैठे अपने सीनियर से कहा-‘सर चलिए, कुछ कविताएं सुनते हैं मनीष जी से।’ उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। हां हां कुछ कविताएं, शेरो शायरी हो जाये। पीछे बैठे सिपाहियों ने एक साथ कहा। तब मुझे अहसास हुआ कि इन लोगों को मेरी कहानी में कोई रूचि नहीं थी। गाड़ी 80-90 की रफ्तार से दौड़ रही थी। मैंने कहा-‘पहले आप लोग कुछ सुनाइये।’ बगल वाले व्यक्ति ने एक अच्छा शेर सुनाया, जिसका भाव यह था कि अगर आप बिखरे हुए कांच के टुकड़ों को उठाने का प्रयास करेंगे तो उंगलियां तो लहूलूहान होगी ही। अब मेरी बारी थी। मैंने लगातार कई शेर सुनाएं। सभी मंत्रमुग्ध सुन रहे थे और दाद दे रहे थे। सामने की सीट पर बैठा अधिकारी कुछ नहीं बोल रहा था। शायद उसे यह ‘मुक्त माहौल’ पसन्द नहीं आ रहा था। आखिर मैं कैदी जो था। लेकिन वह बोला कुछ नहीं। अंत में मैंने दो कविताओं के माध्यम से उनके सामने एक सवाल रख दिया। गोरख पाण्डेय की कविता-‘चिड़िया जाल में क्यो फंसी, क्योकि वह भूखी थी।’ और कंवल भारती की कविता-‘चिड़िया जाल में क्यो फंसी, क्योकि वह चिड़िया थी।’ गाड़ी में बैठे सभी लोगों में दो फाड़ हो गया। सभी के अपने अपने तर्क थे। तभी मैंने देखा कि अब्बू उठकर बैठ चुका था और खिड़की से बाहर का मजा ले रहा था। हमारी बातें भी उसके कान में पड़ रही थी। अचानक वह मुड़ा और मेरा गला अपनी ओर खींचते हुए मेरे कान में बोला-‘मौसा, चिड़िया को कोई बहेलिया जाल बिछाकर पकड़ेगा, तभी तो चिड़िया जाल में फंसेगी। बहेलिया चिड़िया को नही पकड़ेगा तो चिड़िया मजे में उड़ती रहेगी, चाहे वो भूखी हो या ना हो।’ बहस में अब्बू का यह निर्णायक हस्तक्षेप था। मैंने आश्चर्य से उसे देखा और उसका माथा चूम लिया। इस खूबसूरत हस्तक्षेप के बाद वह कुछ समय बाहर का नजारा लेकर पुनः मेरी गोद में सो गया। तभी सामने की सीट पर बैठा अधिकारी जो अब तक चुप था और ऐसा लग रहा था कि उसे यह ‘कवि गोष्ठी’ पसन्द नहीं आ रही थी, अचानक बोल उठा-‘एक नक्सली जाल में क्यो फंसा, क्योकि वह सुरक्षा के प्रति लापरवाह था।’ और ‘एक नक्सली जाल में क्यो फंसा, क्योकि वह नक्सली था।’
इस खेल में अधिकारी के कूदते ही सब खुश हो गये। खैर, इस पर भी सब दो भागों में बंट गये और मुझे थोड़ा अन्दाजा लगाने में आसानी हुई कि ये मुझ तक कैसे पहुंचे। तभी पीछे बैठे एक सिपाही ने मुझसे पूछा कि आखिर आप लोग चाहते क्या हैं। अब तक मैं बोल बोल के थक चुका था, लिहाजा मैंने फैज का एक मशहूर शेर पढ़ दिया-‘सूतूनेदार पे रखते चलो सरो के चिराग, जहां तलक सितम की सियह रात चले।’ शेर का अर्थ शायद उसकी समझ में नहीं आया, लेकिन उसने दूसरा प्रश्न दाग दिया-‘चलिए, मान लिया कि आपको आपका मकसद मिल जाये तो उसके बाद आप क्या करेंगे।’ मैंने उसी रौ में एक और शेर पढ़ दिया-‘जिंदगी एक मुसलसल सफर है, जो मंजिल पे पहुंचा तो मंजिल बढ़ा ली।’
शेरो शायरी के बीच हमारी मंजिल यानी झांसी आ गया। इसी बीच सामने बैठे अधिकारी के पास किसी का फोन आया। वह ‘जी सर, जी सर’ कहता रहा। फिर पीछे मुड़ कर बोला-‘मनीष जी सारी, आज रात आपको 2-4 घण्टे थाने के लाक अप में गुजारने होंगे।’ उनकी आपस की बातचीत से मैंने अंदाजा लगाया कि ऊपर से आदेश था कि मुझे लाकअप में ही रखा जाय। जिंदगी में पहली बार मैं लाकअप में था। छोटा अंधेरा कमरा, पेशाब की बदबू से भरा। लाकअप के कोने में पेशाब घर, पेशाब से लबालब। नरक की कल्पना करने वाला जरूर इस लाकअप में रहा होगा। खैर अब्बू अभी भी नींद में मेरी गोद में ही था। मुझे लगा कि कही अब्बू जाग ना जाय और इस नरक से उसका साबका ना पड़ जाय। खैर वह सोया रहा और मुझे भी नींद आ गयी। सुबह सुबह अचानक मेरी नींद खुली। मेरे कानों में लगातार आवाज आ रही थी-‘अरे बाप रे, अरे माई रे।’ थानेदार अपनी बेल्ट से 16-17 साल के तीन बच्चों को बेरहमी से पीट रहा था। सामने दिवाल घड़ी 5 बजा रही थी। पिटते तीनों बच्चों के उपर गांधी, अंबेडकर की फोटो लगी थी। सामने की दिवार पर बड़ा बड़ा ‘सत्यमेव जयते’ खुदा हुआ था। यह दृश्य देख मुझे महेन्द्र मिन्हवी का एक शेर याद आ गया-
सत्यमेव जयते का नारा खुदा हुआ यो थाने में, जैसे कोई इत्र की शीशी रखी हुई पैखाने में।
इसी शोरगुल में अब्बू की नींद भी खुल गयी। उसने आश्चर्य से चारो तरफ देखा और मुझसे लिपट गया। मेरे कान में धीमें से बोला-‘हम कहां हैं।’ मैंने कहा-‘ड्राइवर थक गया था, इसलिए हम यहां आराम कर रहे हैं। तब तक पेशाब की बदबू अब्बू की नाक में जा चुकी थी। अब्बू मुंह बनाके बोला-‘कितनी बुरी जगह है ये। यहां कौन रहता है।’ मैंने बेहद धीमे से यूहीं कह दिया-‘चोर रहते हैं।’ उसने फौरन सवाल किया-‘लेकिन, लेकिन हम तो चोर नहीं हैं।’ मैंने कहा, हां हम तो सिर्फ रूकने के लिए आये हैं। फिर अब्बू ने सहमी सी नज़र लाकअप में बैठे 3 अन्य लड़कों पर डाली जिन्हें रात में ही यहां लाया गया था। अब्बू ने बेहद धीमें से मेरे कान में कहा-‘क्या ये चोर हैं।’ उनमें से एक लड़के ने अब्बू की बात सुन ली और प्यार से कहा-‘हम चोर नहीं है।’ फिर उसने गुस्से में आगे जोड़ा-‘चोर तो पुलिस है। उसने हमारे पैसे मोबाइल सब चुरा लिये।’ फिर मेरी तरफ दुःख से देखते हुए बोला-‘हमें तो घर से पकड़ कर लायी है। देखते हैं क्या केस डालती है। अभी तक तो कुछ बताया नही।’ फिर उन्होंने अब्बू को खाने के लिए बिस्किट दिये, जो अब्बू ने थोड़ा झिझकते हुए ले लिया। बिस्किट खाते हुए अब्बू ने मेरे कान में धीमें से कहा-‘मौसा ये चोर नहीं हैं।’ मैंने भी खेल खेलने के अंदाज में उसके कान में कहा-‘तुझे कैसे मालूम।’ अब्बू ने भी तुरन्त शरारती अंदाज में कहा-‘मुझे मालूम है, क्योकि बच्चे हमेशा सच बोलते हैं।’ यह सुनकर मैं मुस्कुरा दिया।
इसके बाद हमें लाकअप से निकाला गया। हम नित्यकर्म से निवृत्त होकर पुनः लाकअप में आ गये। तभी एटीएस की हमारी टीम भी नहा धोकर, नये कपड़े पहनकर और इत्र लगाकर हमें लेने वापस आ गयी। आते ही एटीएस अधिकारी ने मुझसे पूछा-‘रात कैसी कटी।’ मैं समझ नहीं पाया कि यह सामान्य सवाल था या व्यंग्य था। मैंने कोई जवाब नहीं दिया। उसने आगे कहा-‘मच्छरो ने जरूर परेशान किया होगा।’ रात की शेरो-शायरी का हैंग ओवर अभी मेरे ऊपर था। लिहाजा एक शेर में ही मैंने उसे जवाब दिया-‘धूप की शिद्दत कभी महसूस ना करता, ये कौन मगर पेड़ के साये में खड़ा है।’ उस अधिकारी समेत पूरी टीम मुस्कुरा दी और हम अगली यात्रा पर निकल पड़े।

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