अब्बू की नज़र में जेल-12

यह मध्य जनवरी की ठंडी सुबह थी। सभी लोग ‘खुली गिनती’ के बाद तुरन्त अपने अपने बैरक में लौटने की जल्दी में थे। हम अहाते के बीच पहुंचे ही थे कि अब्बू ने मेरा हाथ झटकते हुए सामने की ओर इशारा किया। मैंने देखा कि वहां एक सामान्य कद काठी का लड़का जेल वाला काला झबरीला कंबल लपेट कर खड़ा है और 5-7 लोग उसे घेर कर खड़े हैं। मैं नजदीक पहुंचा तो देखा कि वह नंगे पांव था और शरीर पर महज एक झीनी सी शर्ट थी जो कंबल के नीचे से झांक रही थी। उसकी आंखों के किनारो से आंसू बह रहे थे और वह ठंड से कांप रहा था। मेरे वहां पहुचते ही घेरे में खड़े हुए लोगों ने मुझे रास्ता दे दिया मानो अब वह मेरी जिम्मेदारी हो। मैंने उससे पूछा-कब आये हो? उसने कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन उसे घेर कर खड़े एक कैदी ने कहा कि इसका नाम ‘मकबूल’ है। इसे कल रात लाया गया है। यह मेरे ही बैरक में है। लेकिन इसे हिन्दी नहीं आती। बस थोड़ा बहुत समझ लेता है। इसके पास कुछ भी नहीं है। ये बता रहा है कि इसका स्वेटर भी पुलिस स्टेशन में रखवा लिया गया। मेरे बगल में खड़े अब्बू ने आश्चर्य से दोहराया-‘स्वेटर पुलिस स्टेशन में रखवा लिया गया ?’ मैंने उससे पूछा- ‘कहां के रहने वाले हो?’ उसने कांपते हुए जवाब दिया-‘आसाम’। उसके बाद उसने कुछ बोला लेकिन हममे से कोई नहीं समझ पाया। मैंने तुरन्त अब्बू से कहा-‘अब्बू दौड़ के जा और खोखन को बुला कर ला।’ अब्बू दौड़ कर गया और खोखन को बुला लाया। खोखन बांग्लादेश के रहने वाले हैं और भारत में उनकी रिश्तेदारी है। यहां एक रिश्तेदार से मिलने आये और पर्याप्त डाकूमेन्ट ना होने की वजह से उन्हें जेल में डाल दिया। उन्हें बांग्ला और असमिया दोनो भाषाएं आती हैं। खोखन और असम के उस व्यक्ति मकबूल के बीच लगभग 15 मिनट बात हुई। जब खोखन बोलते तो अब्बू खोखन का मुंह देखता और जब मकबूल बोलता तो अब्बू उसका मुंह देखता। इस संक्षिप्त बातचीत के बाद खोखन हम सबसे मुखातिब हुए और कहने लगे कि यह कुछ ही दिन पहले आसाम से लखनऊ आया था। यहां इसके गांव का एक व्यक्ति कबाड़ का काम करता है। उसी ने इसे बुलाया था। मकबूल भी यहां आकर कबाड़ के काम में शामिल हो गया था। कल दोपहर में ‘परिवर्तन चौक’ के पास इसकी ठेला गाड़ी को कुछ पुलिस वालों ने रोका, इसका आधार कार्ड चेक किया, दिन भर थाने में बैठाये रखा इसका स्वेटर उतरवाया और शाम को जेल भेज दिया। मैंने खोखन के माध्यम से उससे पूछा कि उसे मारा पीटा भी गया है क्या, तो उसने कहा-नहीं। उसे अभी तक नहीं पता कि उसे किस अपराध में जेल में डाला गया है। यह सुनकर मैं परेशान हो गया। मैं कुछ सोचने लगा। तभी सामने से जेल का चीफ सिपाही जाता हुआ दिखा। मैंने तुरन्त उसे आवाज लगायी-‘चीफ साब, ये किस केस में अन्दर आया है?’ उसने एक नज़र मकबूल पर डाली और बेरूखी से यह कहते हुए आगे बढ़ गया कि ‘अरे, यह दंगाई वाले केस में आया है।’ मैं समझ गया। सीएए के खिलाफ प्रदर्शन का यह पहला कैदी हमारे अहाते में आया था। मैं यह बात नही पचा पा रहा था कि पुलिस ने इतनी ठंड में जब रात में पारा जीरो डिग्री के पास चला जा रहा है, इसका स्वेटर क्यो उतार लिया। यह गरीब से नफरत के कारण है या मुसलमान से या दोनो से। जब मैं इन राजनीतिक-नैतिक सवालों में उलझा था तभी मैंने देखा कि अब्बू और खोखन दोनो सामने से हाथ में कुछ कपड़े लिये चले आ रहे हैं। अब्बू और खोखन कब यहां से खिसक लिये थे, मुझे पता ही नही चला। 40 साल के खोखन के साथ अब्बू की भी दोस्ती हो गयी थी। जब वह मेरे साथ नहीं होता तो खोखन के पास उसके पाये जाने की संभावना ज्यादा होती। दोनो जाकर कुछ लोगो से मकबूल के लिये कपड़े वगैरह जुटा लाये थे। मैं थोड़ा शर्मिन्दा हुआ कि जब मैं सैद्धान्तिक सवालों में उलझा था उस समय खोखन तात्कालिक व्यवहारिक समस्या का समाधान करने में जुटे हुए थे। बहरहाल जल्दी ही मकबूल के पास सभी जरूरी चीजें हो गयी। अचानक मैंने देखा कि अब्बू अपना छोटा मग लेकर भागा आ रहा है। आते ही उसने अपना मग झिझकते हुए मकबूल की ओर बढ़ा दिया। मकबूल मेरी तरफ देखने लगा। मैंने कहा, ले लो। हमारे पास एक और है। इसमें सुबह सुबह दलिया ले सकते हो। मकबूल के मग पकड़ते ही अब्बू के चेहरे पर खुशी देखने लायक थी। जेल की तुलना अक्सर नरक से की जाती है। लेकिन जहां आम गरीब लोगों का जमावड़ा हो, वहां जीवन बहता है और जहां जीवन बहता है वह जगह नरक कैसे हो सकती है?
बाद में मैं जब भी मकबूल से बात करता तो खोखन भाई अनुवादक की भूमिका निभाते। अब्बू भी अक्सर हमारी बातचीत ध्यान से सुनता। एक दिन उसने मुझसे पूछा-‘मौसा, अलग अलग तरह की भाषा क्यो होती है। एक ही भाषा क्यो नहीं होती।’ मैंने कुछ देर सोचा। फिर मैंने अब्बू को एक पुरानी कहानी सुनाई-‘अब्बू पहले सबकी भाषा एक ही थी। तब इंसान ने एक बार भगवान से मिलने की सोची। और सबने एक दूसरे के कंधे पर चढ़कर आसमान तक एक सीढ़ी बनाने लगे। यह देखकर भगवान घबरा गया और उसने सबकी अलग अलग भाषा बना दी ताकि कोई एक दूसरे की बात न समझ पाये और भगवान तक सीढ़ी न बना पाये।’ अब्बू का अगला सवाल था-‘लेकिन भगवान ये क्यो चाहता है कि कोई सीढ़ी ना बना पाये और उससे ना मिल पाये?’ मैं सोच में पड़ गया। मुझे चुप देख अब्बू ने ही संशय और प्रश्नवाचक मुद्रा के साथ कहा-‘ताकि कोई भगवान की पोल पट्टी ना जान ले।’ मैं आश्चर्य में पड़ गया। अब्बू का आशय क्या था, मुझे पता नही। लेकिन मेरे लिए इसके आशय गहरे थे।
बहरहाल तभी अहाते में कुछ हलचल होने लगी। अब्बू तेजी से बाहर भागा। पीछे पीछे मैं भी चल दिया। आज 20-25 लोगों की ‘नई आमद’ आयी थी। नये कैदी को यहां जेल की भाषा में ‘आमद’ यानी ‘आमदनी’ कहां जाता है। सच में वो आमदनी होते हैं क्योकि उनसे जेल प्रशासन कई तरह से अवैध उगाही करता है। अब्बू ने कहा-‘इतने सारे लोग।’ आमतौर पर रोज हमारे अहाते में 5 से 7 नये कैदी आते है। इसलिए सभी को आश्चर्य हो रहा था कि इतने सारे लोग कैसे। हमारे अहाते का राइटर जहां बैठता है, मैं वहीं खड़ा था। तभी सर्किल चीफ आया और धीरे से राइटर से बोला-‘ये सब दंगाई हैं इन्हें अलग अलग बैरकों में रखना। और हर बैरक में कहलवा देना कि इनसे कोई बात ना करे।’ अपनी बात में वजन लाने के लिए उसने आगे जोड़ा कि यह डिप्टी साहब का आदेश है। यह कहकर जैसे ही चीफ मुड़ा, अब्बू ने मुझसे सवाल किया-‘मौसा दंगाई क्या होते हैं।’ मैं इस मासूम बच्चे को क्या बताता कि दंगाई क्या होते हैं। मुझे पता था कि ये सब सीएए के खिलाफ प्रदर्शनकारी है और कुछ मकबूल जैसे लोग हैं जो महज अपनी मुस्लिम पहचान के कारण जेल पहुच गये हैं। मैंने कुछ सोचकर अब्बू से कहा-‘अब्बू रात में जब अपना बैरक बन्द हो जायेगा तो इनमें जो भी अपनी बैरक में आयेगा, उसी से पूछ लेंगे कि दंगाई क्या होते हैं।’ अब्बू ने भी खुशी से कहा, हां यही ठीक रहेगा।
बैरक बन्द होने के बाद जब गिनती पूरी हो गयी तो जाते हुए सिपाही ने सबको सचेत करते हुए कहा-‘इस बैरक में जो दंगाई आये हैं उनसे कोई बात न करे।’ मुझे आश्चर्य हुआ कि कुछ देर पहले जो बात सर्किल चीफ दबी जुबान में कह रहा था वह अब ऐलान बन गयी। यह आत्मविश्वास उन्हें कहा से आया?
बैरक का गेट बन्द होते ही सभी लोगों की निगाह उस ‘दंगाई’ पर टिक गयी। मैं अभी सोच ही रहा था कि उसके पास जाउं और बाते शुरू करूं, तभी तीन चार मुस्लिम कैदी अपने फट्टे से उठे और उस नये कैदी के पास पहुंच गये। कुछ देर बाद मैं भी उनके बीच जाकर बैठ गया। अब्बू अभी बैरक में लगी टीवी देख रहा था और मुड़ मुड़ कर मेरी तरफ देख लेता था। जैसे ही उसने देखा कि मैं उस नये कैदी के पास जा रहा हूं, वह भी उठा और भागता हुआ मेरे पास आ गया। बातचीत पहले ही शुरू हो चुकी थी। उसका नाम अब्दुल था। उसकी इलेक्ट्रिक की दुकान थी। उस दिन घर से उसके भाई का फोन आया कि शहर में कुछ बवाल हो गया है, आप दुकान बन्द करके घर आ जाइये। अब्दुल ने तुरन्त दुकान बन्द किया और घर की ओर चल दिया। रास्ते में ही पुलिस की एक जीप ने उसे रोका, उसका नाम पूछा और उसे जीप में बिठा लिया। कुछ देर थाने में बिठाये रखा और फिर जेल भेज दिया। मैंने पूछा, मारा पीटा तो नही। उसने कहा, ना तो मारा पीटा और ना ही कुछ पूछा ही। बगल में बैठे एक मुस्लिम कैदी, जो मोबाइल चोरी के जुर्म में पिछले 8 माह से जेल काट रहा था, ने धीमे से कहा- हमारा नाम ही काफी है। उसके बाद क्या पूछताछ करना। मैं सन्न रह गया। मैंने उससे आगे पूछा कि आपसे बातचीत करने के लिए जेल प्रशासन मना क्यो कर रहा हैं। इसका उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस हल्का सा मुस्कुरा दिया। रात ज्यादा होने लगी तो धीमे धीमे उसे घेरे सभी कैदी एक एक कर जाने लगे। बस मैं और अब्बू रह गये। अब्बू मेरी गोद में नींद से झूल रहा था, लेकिन फिर भी सो नहीं रहा था। मैंने उससे पूछा भी कि चल तुझे सुला दूं। लेकिन उसने इंकार कर दिया। अब अब्दुल ने मेरा परिचय पूछा। मेरा परिचय जानने के बाद उसके चेहरे पर हल्की चमक आ गयी। उसने मुझसे कहा कि कल मैं आपको और लोगों से मिलवाउंगा, जिन्हें ‘परिवर्तन चौक’ पर धरना स्थल से उठाया गया है। वो आपको और जानकारी देंगे। उन्हें थाने पर बहुत पीटा गया है। अब्दुल के चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी। मैंने उनसे कहा कि अब आप सो जाइये, कल बात करेंगे। इसके बाद जब मै और अब्बू अपने फट्टे यानी बिस्तर पर लौटे तो अब्बू ने तुरन्त पूछा-‘थाने पर किसे बहुत पीटा गया है।’ मैंने कहा कि चल सो जा। कल मैं तुझे उससे मिलवाउंगा।
दूसरे दिन अब्दुल गिनती के तुरन्त बाद मुझे सामने की बैरक में ले गया। अब्दुल ने मेरा परिचय उसे पहले ही दे दिया था। उसका नाम तैयब था। तैयब ने बिना किसी औपचारिकता के मुझे गिरफ्तारी की पूरी कहानी बयां कर दी। फिर अपना कुर्ता ऊपर करते हुए लाठियों के निशान दिखाये। निशान नीले पड़ गये थे। पूरी कहानी अब्बू दम साधे सुनता रहा था, लेकिन जब उसने पीठ पर लाठियों के निशान देखे तो मेरी उंगली पर उसकी पकड़ ना जाने क्यों मजबूत हो गयी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोलू। क्या सहानुभूति दूं। ‘मन्टो’ ने एक शरणार्थी कैम्प के जीवन के बारे में लिखते हुए कहा कि यहां सभी को सहानुभूति की जरूरत है, लेकिन दिक्कत यह है कि कौन किसको दे। यही जेल के लिए भी सच है। वापस पीठ ढकते हुए उसने कहा कि मुझे पिटाई का उतना दुःख नहीं है। मुझे इस बात का दुःख है कि पीटते हुए वे यह कह रहे थे कि अब अपने अल्लाह को बुला, देखते हैं तेरा अल्लाह तुझे कैसे बचाता है। अभी तक उसकी आंखों में आंसू नहीं आये थे, लेकिन यह बात बोलते हुए उसकी आंख भर आयी। इसी बीच एक और कैदी हमारे बीच आकर बैठ गया था। थोड़ी देर चुप रहने के बाद तैयब ने खुद पर नियंत्रण स्थापित करते हुए और उस नये कैदी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि अब इनका केस देखिए। इनको प्रदर्शन वगैरह से कोई मतलब नहीं। ये सीएए के बारे में कुछ जानते भी नही। पुलिस थाने के पास इनकी छोटी सी चाय की दुकान है। पिछले तीन साल से ये थाने में सुबह शाम चाय पिला रहे है। 21 जनवरी को थाने के ही एक परिचित सिपाही ने इसे थाने पर बुलाया। दो चार घण्टे यूं ही बैठाये रखने के बाद और बिना कुछ पूछताछ किये जेल भेज दिया। मैं उसकी तरफ मुड़ा और पूछा कि आपका नाम क्या है? उसने धीमे से झिझकते हुए जवाब दिया-‘कमालुद्दीन’।
सीएए प्रदर्शनकारियों (जिन्हें जेल प्रशासन ‘दंगाई’ बुलाता था) के आने से हमारे अहाते का माहौल बदल गया। सटीक रूप में कहें तो राजनीतिक हो गया। अब मेरा ज्यादातर समय इन्हीं लोगों के साथ टहलने और बात करने में बीतने लगा। अब्बू की भी नयी दोस्ती ‘आदिल’ के साथ हो गयी। 19-20 साल का जोश से भरपूर यह नौजवान सीएए प्रदर्शन का वीडियो बना रहा था, जब पुलिस ने उसे पकड़ा। अब्बू ज्यादातर अब उसी की पीठ पर सवार रहता। खुद अन्दर से काफी परेशान होने के बावजूद वह लोगों को हमेशा अपनी हरकतों से हंसाता रहता। एक दिन अब्बू ने मुझे उसके बारे में बताया कि मौसा वो बीड़ी पीता है और जब तुम उसकी तरफ आते हो तो वह तुरन्त बीड़ी फेक देता है। एक दो बार मैंने भी गौर किया था यह बात। मैने सोचा कि 2-4 दिन की मुलाकात में वह मेरा इतना लिहाज क्यो कर रहा है। हालांकि उसके इस व्यवहार से मुझे खुशी हो रही थी।
तैयब की बहन जामिया में पढ़ती थी और वहां के प्रदर्शन और शाहीनबाग के प्रदर्शन की भागीदार थी। तैयब से मुझे आन्दोलन की जीवन्त रिपोर्ट सुनने को मिली। एक राजनीतिक कैदी के लिए इससे बड़ा सुख भला क्या हो सकता है कि उसे बाहर चल रहे आन्दोलन के एक सक्रिय भागीदार से आन्दोलन का जीवन्त विवरण सुनने को मिले। शाहीनबाग में जो नया साहित्य जन्म ले रहा था, उसकी झलक मुझे तैयब से ही मिली। उसके सुनाने का अंदाज भी निराला था। ‘आमिर अजीज’ जैसे युवा शायर की रचनाओं से तैयब ने ही मेरा परिचय कराया। तैयब ने जब यह सुनाया तो मैं एकदम रोमांचित हो गया था-‘भगतसिंह का जज़्बा हूं, आशफाक का तेवर हूं, बिस्मिल का रंग हूं। ऐ हुकूमत नज़र मिला मुझसे, मैं शाहीनबाग हूं।’
मेरी बहन ‘सीमा आजाद’ ने अपना नया कहानी संग्रह ‘सरोगेट कन्ट्री’ मुझे पढ़ने को दिया था। इन प्रदर्शनकारियों के आने से सीमा के कहानी संग्रह की मांग बढ़ गयी और कई लोग ‘वेटिंग लिस्ट’ में अपना नाम लिखाने लगे। वे पुराने कैदी जिनके साथ मैं अक्सर घूमता था, वे मुझे प्यार से चिढ़ाने लगे कि अब आप हम लोगों को भूल गये, लेकिन इतना याद रखियेगा कि ये लोग चन्द दिनों के मेहमान हैं। अन्त में आपको हमारे साथ ही रहना है। मैं मुस्कुरा देता।
इसी बीच एक दिन जब मैं अब्बू को नहला रहा था तो अब्बू अचानक बोल उठा-‘मौसा, मैं बड़ा होकर मुसलमान नहीं बनूंगा।’ अचानक मेरा हाथ रूक गया। मैंने कहा क्यो? अब्बू ने मेरे हाथ से मग खींचते हुए जवाब दिया-‘वर्ना मुझे भी पुलिस पकड़ लेगी।’ यह कह कर वह खुद ही अपने ऊपर पानी डालने लगा। और मैं उसे भौचक्का देखता रहा।

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