अब्बू की नज़र में जेल- अंतिम भाग

एक दिन सुबह-सुबह गिनती के बाद अब्बू ने अचानक बिना किसी सन्दर्भ के मुझसे पूछा-‘मौसा, अगर तुम्हारे पास अपनी जेल होती तो क्या तुम मौसी को कभी जेल में डालते।’ मैंने बेहद आश्चर्य से उससे पूछा कि ये क्या पूछ रहा है तू। उसने मेरे आश्चर्य वाले भाव पर बिना ध्यान दिये आगे जोड़ा-‘मतलब कि मौसी तुमसे भी तो झगड़ा करती है, तो उस समय यदि तुम्हारे पास जेल होती तो क्या तुम मौसी को जेल में बन्द कर देते।’ अब्बू बिना रूके उसी रौ में आगे बोलता रहा-‘लेकिन जब तुमने सरकार से झगड़ा किया तो सरकार ने तुम्हें जेल में क्योँ डाला।’ उसकी इस बात ने मुझे और ज्यादा आश्चर्य में डाल दिया। मैं समझ नहीं पाया कि क्या बोलूं। इस बात को समझने में तो बड़े-बड़े समाज वैज्ञानिकों को भी दिक्कत होती है। मैं अब्बू को कैसे समझाऊँ। मैंने तो अब्बू को टाल दिया कि ठीक है अब्बू, दलिया पीने के बाद बताउंगा। लेकिन मेरा दिमाग चलने लगा। जनता और सरकार के बीच का रिश्ता, या और सटीक रूप से कहें तो जनता और राज्य के बीच का रिश्ता क्या है। हमारी पारिवारिक पितृसत्तात्मक संरचना और जनता पर दमन के लिए इस संरचना का इस्तेमाल या इस दमन के प्रतिरोध में यह संरचना कितना अवरोध पैदा करती है। यदि हम सबके घरों में एक छोटी जेल है तो हम इस बड़ी जेल का कितना विरोध कर पायेंगे। या इस बड़ी जेल का विरोध, उन छोटी-छोटी जेलों को तोड़ने में कितना कारगर होगा या इस छोटी जेल का उस बड़ी जेल से आखिर सम्बन्ध क्या है। खैर दलिया पीने के बाद अब्बू ‘बोरा जी’ के साथ चेस खेलने लगा और अपना सवाल भूल गया।
चेस खेलते अब्बू को मैंने ध्यान से देखा और अचानक मेरे दिमाग में आया कि अब इस बच्चे को और जेल में रखना सही नही हैं। अभी पिछली ही बार जब मैं महिला मुलाकात में अमिता से मिला तो अमिता ने बताया कि उसकी बैरक में जो लोग ‘अब्बू की नज़र में जेल’ पढ़ते हैं, उसमें से कई लोग अब यह कहने लगे हैं कि अब्बू को जेल में नहीं देखा जाता, उसे रिहा कर दो। मेरी बैरक में भी जो लोग ‘अब्बू की नज़र मे जेल’ पढ़ते हैं उनमें से भी कुछ लोग यह कह चुके हैं कि इतने छोटे बच्चे को जेल में नहीं देखा जाता। भले ही वह कल्पना में ही क्यो ना हो। उनके इस अनुरोध को मैं अपनी कामयाबी समझता कि मेरीे लेखनी असर कर रही है। लेकिन आज मुझे लग रहा है कि क्या मैं महज अपने स्वार्थ में अब्बू को अपने साथ जेल में रखे हुए हूं। ताकी कहानी में मासूमियत ला सकूं। और सहानुभूति बटोर सकूं। मेरे इस दावे में भी कितना दम है कि मैंने अब्बू को इसलिए अपनी कहानी में शामिल किया कि एक बार अब्बू की निर्दोष नज़र से दुनिया को देख संकू। आखिर अब्बू के मुंह से मैं ही तो बोल रहा हूं। इसी उधेड़बुन में मुझे गोर्की की कहानी ‘पाठक’ की याद हो आयी। और अन्ततः मैंने अब्बू को रिहा करने का फैसला कर लिया। हालांकि यह ख्याल आते ही मेरा दिल बैठने लगा। बिना अब्बू के मैं कैसे रहूंगा। बिना अब्बू के मैं कैसे लिखूंगा। बिना झूठ के सच कैसे लिख पाउंगा। ‘पाब्लो पिकासो’ तो कहते थे कि कला वह झूठ है जो आपको सच तक पहुचाता है। फिर मैं बिना अब्बू के सच तक कैसे पहुंचूगा। क्या कोई दूसरा झूठ गढ़ना पड़ेगा। क्या कला में हर सच का अपना एक झूठ भी होता है। और हर सच को उसके झूठ से और हर झूठ को उसके सच से आंकना होता है। मुझे कोई जवाब नहीं मिल रहा था, लेकिन मैंने फैसला कर लिया कि अब अब्बू को जेल से रिहा करने का समय आ गया। लेकिन उसे कैसे रिहा करूं। क्या कहानी गढ़ूं। क्या अपने पात्र से यानी अब्बू से विद्रोह करा दूं। अब्बू को रूला दूं कि अब मैं जेल में नही रह सकता। मुझे घर, मेरे ईजा बाबा के यहां पहुंचा दो। हां यही ठीक रहेगा। कितनी कहानियों में मैंने पढ़ा है कि पात्र लेखक से विद्रोह कर देते है और लेखक की कल्पना के लौह दायरे को तोड़ कर बाहर निकल जाते हैं। क्या अब्बू मेरी कल्पना के लौह दायरे को तोड़ सकता है। क्या मेरा प्यारा अब्बू ऐसा कर सकता है। ‘संजीव’ की मशहूर कहानी ‘प्रेरणास्रोत’ में भी तो यही होता है। पता नहीं कितना कहानीकार अपने पात्रों को गढ़ता है और कितना पात्र अपने कहानीकार को गढ़ते हैं। पता नहीं मैंने कितना अब्बू को गढ़ा और कितना अब्बू ने मुझे गढ़ा। बहरहाल, अब्बू को अपनी कहानी से बाहर करने का दबाव क्या सिर्फ मेरे आठ-दस पाठकों का है, या इसके पीछे मेरी अपनी निराशा भी है।
दरअसल मेरी बेल लगने के बाद ही कुछ ऐसा घटनाक्रम घटा कि मुझे अपनी बेल मुश्किल लगने लगी। तेलंगाना में किसी माओवादी ने समर्पण किया और यहां एटीएस वालों ने आदतन उसकी कहानी को बेवजह मेरे साथ जोड़ दिया। यह सुनकर मन खिन्न हो गया। और निराशा छाने लगी। लगा कि अब लम्बे समय तक बेल मुश्किल होगी। तो अब्बू को कहानी से बाहर करने का फैसला क्या निराशा में उठाया गया फैसला था? पता नहीं। ठीक-ठीक नहीं कह सकता। पहले तो मैं यही सोचता था कि मैं और अब्बू दोनो साथ ही जेल से बाहर आयेंगे। आखिर अब्बू मेरी आशा जो है। उसे तो मेरे साथ रहना ही चाहिए। ‘अनुज लगुन’ ने अपनी कविता में इस आशा को यूं बयां किया है-

यह बच्चा
जो मेरे साथ जेल की कस्टडी में है
तुम्हें नहीं लगता
जब यह बड़ा होगा तो
जेल की दीवार टूट जाएगी….?

खैर बेल पर बहस की डेट भी आ गयी। सीमा ने बताया कि अगर चमत्कार हो गया और बेल हो गयी तो मैं उसी दिन जेल में फोन करवा कर तुम्हे सूचना दे दूंगी। वर्ना समझ लेना बेल नही हुई। आज दिन भर मेरी धड़कन तेज चलती रही, लेकिन शाम तक धीरे धीरे धड़कन की रफ्तार सामान्य होने लगी। सन्देशा नहीं आया। यानी बेल नहीं हुई। एक हल्की सी आशा अभी भी बनी हुई थी कि हो सकता है वह फोन ना करवा पाई हो और कल मुलाकात के लिए आ जाय। इसी उधेड़बुन में रात भी कट गयी और दिन भर बेचैनी बनी रही। लेकिन मुलाकात नहीं आई। अब स्पष्ट हो गया कि बेल नहीं हुई। अब मैंने अपने आपको शान्त किया और उस कहानी पर विचार करने लगा जिसमें अब्बू को जेल से रिहा किया जाना था। मैंने सोचा कि दोपहर में नहाने के बाद लिखने बैठूंगा और अब्बू को रिहा करूंगा। यह सोचकर मेरा मन भारी हो रहा था कि अब मुझे लम्बे समय तक यहां अब्बू के बिना रहना पड़ेगा।
भीड़ से बचने के लिए अक्सर मैं दोपहर बाद ही नहाता था। मैं अभी अपने ऊपर पानी डालने जा ही रहा था कि अहाते में दूर से दौड़ता हुआ अब्बू आता दिखा। मैंने सोचा क्या हुआ। इतनी तेज क्यो दौड़ रहा है। मैं रूक गया। वह मेरी तरफ ही आ रहा था। वह सीधे मेरे पास आकर ही रूका। मेरे कुछ पूछने से पहले ही वह हांफते हुआ बोला-‘मौसा हमारी बेल हो गयी।’ और फिर पीछे की तरफ इशारा करता हुआ बोला कि वो नम्बरदार बताने आया है और पैसे मांग रहा है। मैं स्तब्ध था। कोई भाव नहीं आ रहा था। अब्बू को बेल के बारे में मैंने कुछ नहीं बताया था कि झूठ मूठ के वह आशा बांध लेगा। अब्बू को यहा रहते हुए बेल का मतलब अच्छी तरह पता था। मुझे इस तरह भावहीन देख उसने फिर हाफते हुए ही कहा कि मौसा मैं सच बोल रहा हूं। अब हम जेल से बाहर जायेंगे। इसी बीच वह नम्बरदार भी मुस्कुराते हुए अब्बूू के पीछे-पीछे आ गया और सबसे पहले उसने यही कहा कि 500 रूपये से कम नहीं लूंगा। पहले मैंने उससे कन्फर्म किया कि सन्देश किसका है और कैसे आया है। आश्वस्त होने के बाद मैंने उसे गले से लगाया और अब्बू को गोद में उठा लिया। अब यह तय था कि मुझे और अब्बू को साथ-साथ रिहा होना था। अब्बू का चेहरा तो खुशी से चमक रहा था। और बार-बार यही पूछ रहा था कि अब हम कितने दिन बाद बाहर निकलेंगे। तब तक अन्य परिचित कैदियों ने भी हमें घेर लिया और बधाई देने लगे। सबसे पहले कादिर ने बधाई दी। कादिर की बेल हुए 2 साल हो गये, लेकिन गरीबी के कारण कोई बेलर नहीं मिल पा रहा। महज इसलिए 2 साल से जेल में है। पहले 3-4 माह में एक बार उसकी बूढ़ी मां मिलने आ जाती थी और 100-200 रूपये दे जाती थी। लेकिन पिछले 11 महीने से वह नहीं आयी। मैंने एक बार पूछा तो हंस कर बोला- ‘क्या पता, मर मरा गयी हो।’ यह सुनकर मैं अन्दर से हिल गया। बहरहाल अब वह बैरक का झाड़ू पोछा करके अपना खर्च किसी तरह निकाल लेता है। मुझे बधाई देने वालों में कमल भी था जो एक मोबाइल चोरी में आया था और गरीबी के कारण वकील ना कर पाने से पिछले 9 माह से जेल में था। उसकी कहानी हूबहू ‘बायसिकल थीफ’ नामक फिल्म से मिलती थी। मैं उसे अक्सर मस्ती में ‘डी सिका’ (‘बायसिकल थीफ’ फिल्म का डायरेक्टर) कहकर बुलाता। वह हल्का सा मुस्कुरा देता। मुझे बधाई देने वालों में प्रमोद भी था जिसने अपने छोटे भाई का बलात्कार का केस अपने सर ले लिया था और अब पिछले तीन साल से जेल काट रहा है। जिस भाई के लिए उसने यह सब किया उसने मुड़ के देखा तक नहीं। उसकी पत्नी ईट भट्टे पर काम करती और महज इतना ही बचा पाती थी कि कोर्ट में पेशी के समय अपने दोनों छोटे बच्चों को उनके बाप की एक झलक दिखा पाती थी। मैं अक्सर उससे पूछता कि तुम्हे अफसोस नहीं होता कि जिस भाई को बचाने के लिए तुमने अपना जीवन दांव पर लगा दिया, उसने तुम्हारी मदद की कौन कहे, मुड़ के देखा तक नही कि तुम सब कैसे हो। वह हल्की सांस भरते दार्शनिक अंदाज में बोलता-‘नहीं दादा, मुझे कोई अफसोस नहीं है। मुझे जो सही लगा मैंने किया, उसे जो सही लग रहा है, वो कर रहा है।’ उसकी यह उदात्तता देख मैं हैरान रह जाता। इन सबकी बधाइयों के बीच मैं अपनी खुशी को दबाने का भरसक प्रयास कर रहा था। इनके बीच अपनी रिहाई की खुशी का प्रदर्शन मुझे अश्लील लग रहा था। मुझे बधाई देने वाले कैदियों की आंखो में मैं वो दुःख भी साफ-साफ देख पा रहा था जो मेरी रिहाई के कारण उनकी कैद को और गाढ़ा बनाने के कारण आ गया था। इसके अलावा मुझसे बिछड़ने का दुःख भी उन्हें था। मेरे लिए यह 10-15 मिनट का समय बहुत भारी गुजर रहा था- दुःखों के समन्दर में छोटी सी खुशी की नौका हिचकोले खाती हुई।

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