‘Land and Freedom’


पिछले ब्लाक में मैने ‘केन लोच’ की फिल्म ‘Land and Freedom’ पर टिप्पणी की थी। इस बार इसी पर कुछ बातें। फिल्म पर आने से पहले कुछ बातें उस दौर के बारे में, जिस पर फिल्म आधारित है।
1936 से पहले स्पेन में प्रतिक्रियावादी सेना का शासन था। 1936 में हुए चुनाव में एक लोकतांत्रिक सरकार अस्तित्व में आई। इस सरकार में बहुसंख्या उदारवादियों की थी। कम्युनिस्ट या समाजवादी अल्पसंख्या में थे। अराजकतावादियों का भी अच्छा असर था। इस सरकार ने जब लोकतांत्रिक सुधार करने शुरु किये तो तो पुराने आर्मी अफसरों के नेतृत्व में सारे प्रतिक्रियावादी इन सुधारों के खिलाफ एकजुट होने लगे। फासीवादी शासकों जैसे हिटलर और मुसोलिनी का तो उन्हे समर्थन था ही, इसके अलावा अपने आप को जनवादी कहलाने वाले पश्चिमी देशों का भी उन्हे अन्दरुनी समर्थन मिल रहा था। यह बात तब खुलकर सामने आ गयी जब स्पेन में जनवाद को बचाने के लिए दुनिया भर के प्रगतिशील नौैजवान स्पेन की ओर कूच करने लगे तो ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देशों ने स्पेन जाने पर ही पाबंदी लगा दी।
अन्ततः फ्रैन्को के नेतृत्व में सारे प्रतिक्रियावादियों ने स्पेन की लोकप्रिय सरकार के खिलाफ भीषण युद्ध शुरु कर दिया।
यहां पर यह बात याद रखनी होगी कि थर्ड इंटरनेशनल के नेतृत्व में जार्ज दिमित्रोव ने सभी फासीवादी-विरोधी शक्तियों के संयुक्त मोर्चे के गठन का प्रस्ताव रखा था। और इसे व्यापक मान्यता मिल चुकी थी।
पूरी दुनिया का वर्ग शक्ति संतुलन इस प्रकार था– फ्रैन्को के नेतृत्व में प्रतिक्रियावादियों के युद्ध की मदद सक्रिय तौर पर मुसोलिनी और हिटलर कर रहे थे। तथाकथित जनवादी देश अमेरिका और ब्रिटेन अपनी ‘अहस्तक्षेप की नीति’ द्वारा फ्रैन्को और फ्रैन्को के बहाने हिटलर और मुसोलिनी को अप्रत्यक्ष रूप से मदद पहुंचा रहे थे। स्टालिन के नेतृत्व में सोवियत रूस का प्रयास यह था कि किसी भी कीमत पर स्पेन की जनवादी और प्रगतिशील सरकार को गिरने नहीं देना है। स्पेन की लोकप्रिय सरकार की मदद वह हथियार भेज कर भी कर रहा था। यह अलग बात है कि सोवियत रूस द्वारा भेजे हथियारों की कई खेप फ्रान्स और ब्रिटेन द्वारा रोक ली गयी।
जब फ्रैन्को ने स्पेन की लोकप्रिय जनवादी सरकार पर हमला किया तो स्पेन की जनवादी सरकार के पास कोई सेना नहीं थी। क्योंकि पुरानी सेना फ्रैन्को की तरफ चली गयी थी। इसलिए फ्रैन्को से लड़ने के लिए एक मजबूत और अनुशासित सेना की जरूरत थी। सोवियत रूस इस पर बराबर जोर दे रहा था। लेकिन सरकार मंे शामिल और सरकार के बाहर त्रात्सकीपन्थियों और अराजकतावादियों ने स्तालिन-विरोध के नाम पर नियमित सेना के गठन का ही विरोध करना शुरु कर दिया। यही नहीं वे तीसरे इन्टरनेशनल में पेश किये गए दिमित्रोव की संयुक्त मोर्चे की थीसिस के खिलाफ जाकर जमीन के सामूहिकीकरण का नारा देने लगे। जिससे फासीवाद विरोधी मोर्चे के कमजोर होने का खतरा पैदा हो गया। उस समय स्पेन में जमीन के सामूहिकीकरण का टास्क नहीं बल्कि सभी फासीवाद विरोधी ताकतों को एकत्रित करके फ्रैन्को को हराने का टास्क था। बाकी टास्क फ्रैन्को की हार के बाद ही लागू हो सकते थे। फिल्म के एक दृश्य में एक गांव का दृश्य है जहां क्रान्तिकारी जमीन के सामूहिकीकरण करने ना करने के सवाल पर बहस कर रहे है। और जाहिर सी बात है कि इसमें सामूहिकीकरण के पक्ष वाले लोगों को बहस में जीतते दिखाया गया है। केन लोच ने अपनी फिल्म में जमीन के सामूहिकीकरण पर हुयी डिबेट को इस तरह दिखाया है जैसे कि फ्रैन्को को हराने के लिए जमीन के सामूहिकीकरण की ही जरूरत है। मजेदार बात यह है कि केन लोच ने भी इसी दृश्य को अपनी फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण दृश्य माना है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि फ्रैन्को का हमला मैड्रिड की तरफ से था। यानि लड़ाई का मुख्य मोर्चा मैड्रिड था न कि बर्सिलोना, जैसा कि केन लोच ने दिखाया है।
केन लोच ने अपनी पूरी फिल्म इस मुख्य मोर्चों से कहीं दूर दक्षिण में ‘ओरेगान’ में केन्द्रित की है जो फ्रैन्को के हमले का मुख्य केन्द्र नही था। यानि इस गांव में आप मजे से जमीन के सामूहिकीकरण पर बहस करते रह सकते हैं।
स्पेनी गृहयुद्ध के मुख्य मोर्चे मैड्रिट के नजदीक एक गांव गुर्निका को फ्रैन्को ने पूरी तरह तबाह कर दिया था। पिकासो ने जब इसी तबाही को दर्शाते हुए अपनी मशहूर पेंटिग ‘गुर्निका’ बनाई तो ‘गुर्निका’ गांव पूरी दुनिया में मशहूर हो गया। और यह पेंटिग तबाही और बर्बरता का प्रतीक बन गयी।
फिल्म में इस प्रसंग का ना होना आश्चर्य पैदा करता है।
कुल मिलाकर यदि आपको इस दौर का इतिहास ठीक से पता है तो आप इस फिल्म से कुछ चीजें सकारात्मक निकाल सकते है। वर्ना आप भी ‘केन लोच’ की गलत इतिहास दृष्टि का शिकार हो जायेंगे।
इतिहास की इस विषयवस्तु के प्रति केन लोच यहां पर पूर्वाग्रह से ग्रसित नज+र आते हैं। उनकी इसी नज+र का कमाल है कि फिल्म में बेवजह सोवियत यूनियन और स्तालिन को गालियां दिलवाई गयी हैंंं। जबकि यह इतिहाससिद्ध बात है कि स्पेन के गृहयुद्ध में स्पेन की जनवादी- लोकतान्त्रिक सरकार की सबसे अधिक मदद सोवियत यूनियन और स्तालिन ने ही की थी।

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