‘Le Capital’ – Greed is God

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2008-09 की मंदी के बाद हेज फण्ड, डेरिवेटिव, स्टाक मार्केट, सी ई ओ, रेटिंग ऐजेन्सी, टाक्सिक एसेट, अधिग्रहण, इनवेस्टमेन्ट जैसे शब्द अर्थशास्त्र न जानने वाले लोगों के शब्दकोश का भी हिस्सा बनने लगे। इन चीजों के इर्द गिर्द कई अच्छी डाक्यूमेन्टरी भी बनी। लेकिन इन चीजों के इर्द गिर्द किसी फिल्म की कल्पना करना मुश्किल था। अपनी ‘जेड’ और ‘मिसिंग’ जैसी राजनीतिक फिल्मों के लिए विख्यात डायरेक्टर ‘कोस्टा गावरास’ ने पिछले वर्ष इसी विषय पर Le Capital नाम से बहुत ही सफल फिल्म बनायी है। आश्चर्य है कि ऐसे विषय पर बनी फिल्म की गति जेम्स बान्ड सरीखी फिल्मों जितनी ही तेज है।
फिल्म की कहानी फ्रांस स्थित बैंक ‘फिनिक्स’ के सी ई ओ ‘मार्क’ के इर्द गिर्द घूमती है। मार्क बेहद महत्वाकांक्षी है। और उसका एकमात्र उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना है। अपनी पत्नी को वह ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने का तर्क देते हुए कहता है कि ज्यादा पैसा मतलब ज्यादा सम्मान। सच है पंूजीवाद में हर चीज उलट जाती है। यहां सम्मान व्यक्ति का नही पैसे का है। अपनी महत्वाकांक्षा के चलते ही वह अमरीका स्थित एक ‘हेज फण्ड’ से गुप्त सौदा करता है और बैंक को कृत्रिम मुनाफे में दिखाने और तत्पश्चात बैंक के शेयर को चढ़ाने के लिए वह बैंक से एक ही झटके में 7000 लोगों को निकाल देता है। 2007-08 की मंदी के लिए इस तरह की चीजें भी जिम्मेदार रही है।
फिल्म में एक पत्रकार मार्क को अमीरों का राबिन हुड कहती है जो गरीबों को चूसकर अमीरों यानी अपने बैंक के शेयर होल्डरों की जेब भरता है।
फिल्म इस बहाने से इस वर्ग की नैतिकता और उसके दोहरे चरित्र को भी परत दर परत उधाड़ने में कामयाब होती है। एक जगह मार्क कहता है कि बिजनेस की भी वही नैतिकता है जो युद्ध की होती है। यानी यहां तुम यदि दूसरे को धोखा नही दोगे तो दूसरा तुम्हे धोखा देने में कामयाब हो जायेगा। यदि तुम गोली नही चलाओगे तो सामने वाला तुम्हे गोली मार देगा। फिल्म के सभी पात्र एक दूसरे को धोखा देते हुए ही दिखायी देते है।
सच है पूंजीवाद के लिए लालच और मुनाफा ही उसका भगवान है। कोस्ता गावरास ने अपनी फिल्म
ला कैपिटल में इसे बहुत सधे तरीके से रखा है।

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