‘लातीन अमरीका के रिसते जख्म’: एक चीखती किताब

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एदुवार्दो गालिआनो की किताब ’ओपेन वेन्स ऑफ़ लैटिन अमेरिका’ [OPEN VEINS OF LATIN AMERICA] लम्बे समय से पढ़ने की फेहरिस्त में थी। गार्गी प्रकाशन ने हाल ही में इसका हिन्दी अनुवाद ’लातिन अमेरिका के रिसते जख्म’ के नाम से प्रकाशित किया है। इत्तेफाक से हिन्दी अनुवाद हाथ में आया और पढ़ना शुरू किया। पन्ने दर पन्ने इस किताब को पढ़ते हुए अजीब-अजीब से मनोभावों से गुजरना हुआ। अन्याय शोषण का ऐसा नंगा नाच जितना लैटिन अमरीकी देशों में हुआ, शायद ही कहीं हुआ हो। दमन और प्रतिरोध का बेमिसाल उदाहरण है समूचा दक्षिण अमरीकी महाद्वीप। इस किताब को पढ़ते हुए कभी ग़म की शिकार हुयी तो कभी गु़स्से की। पढ़ते हुए कभी पेट की अंतड़ियां तक ऐंठने लगती हैं, कभी यह चेतना को इतना झकझोरती है कि आप उठ कर चक्कर लगाने लगते हैं। इससे पहले इतनी चीखती हुयी किताब मैंने पहले कभी नहीं पढ़ी थी। इसको पढ़ने के बाद आप इतिहास के रोज़ाना के चक्र में अपने कदमों के निशान को तलाशने लगते हैं। प्रश्न करते हैं कि अन्याय की यह रवायत आखिर कब तक?? इससे पहले हावर्ड जिन की असाधारण किताब ’पीपुल्स हिस्ट्री आफ अमेरिका’ पढ़ी थी। इन दोनो किताबों ने मिल कर समूचे अमरीकी महाद्वीपों का असली इतिहास सामने रख दिया। उत्तरी अमेरिका ने न केवल दक्षिणी अमरीकी जनता के श्रम को लूटा था बल्कि बहुत संस्थागत तरीके से उत्तरी अमरीकी मूलनिवासियों का कत्लेआम किया और बचे हुए लोगों को संग्रहालय की वस्तु बना कर रख दिया।
1971 में प्रकाशित एदुवार्दो गालिआनो की इस किताब ने समूचे लैटिन अमेरिका में तहलका मचा दिया था। उरुग्वे के नागरिक एदुआर्दो गालियानो एक पत्रकार थे। वह लैटिन अमेरिका की धरती और लोगों में रचे बसे थे। वह अपने बेमिसाल साहित्य और जनता के प्रति अपने सरोकारयुक्त लेखन के लिए जाने जाते हैं। 1971 में जब यह किताब आयी तो लैटिन अमेरिका एक उथलपुथल से गुजर रहा था। दुनिया की राजनीति में शीत युद्ध का दौर था। उत्तरी अमेरिका के नेतृत्व में इस महाद्वीप के सैनिक शासकों को शह थी। ऐसे माहौल में जब यह किताब आयी तो अर्जेन्टीना, चिली, ब्राजील और उनके अपने देश उरुग्वे में इस किताब को प्रतिबन्धित कर दिया गया। कई वर्षों तक एदुवार्दो को निर्वासन में जीवन जीना पड़ा। सन 2009 में जब वेनेजुएला के राष्ट्रपति शावेज ने 5वे अमरीकी समिट में यह किताब राष्ट्रपति ओबामा को भेंट की तो ओबामा अचकचा गया। क्योंकि ओबामा इस लूट की निरन्तरता का वाहक रहा है। लेकिन इस किताब की सेल एकाएक बहुत ज़्यादा बढ़ गयी। इसलिए नहीं कि शावेज इसके प्रचारक बने बल्कि इसलिए कि वाकई यह किताब चीखते हुए खुद को पढ़ने के लिए आमन्त्रित करती है।
लैटिन अमरीकी महाद्वीप 20 से अधिक छोटे बड़े देशों का एक समूह है। यहां की रत्नगर्भा धरती वस्तुतः यहां के इतिहास के लिए एक अभिशाप बन गयी। इतिहास गवाह है कि दुनिया में जहां-जहां भी धरती के नीचे सम्पदा है उसके ऊपर रहने वाले वहां के मूल निवासी इतिहास के सबसे अधिक शोषित लोगों में से एक हैं। हालांकि वे सदियों से इसकी रक्षा करते आए हैं और आज भी जहां-जहां वे संघर्ष करते हुए लड़ रहे हैं, वहां की सम्पदा बची हुयी है। स्वयं भारत इसका एक ज्वलन्त उदाहरण है। आज भारत में भी आदिवासी लोग अपने जल, जंगल व ज़मीन की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं। नियमगिरी के आदिवासियों ने प्रतिरोध की मिसाल कायम करते हुए अपने समूचे पहाड़ को वेदान्ता के पंजे में जाने से रोक लिया। आज भी उनका संघर्ष जारी है।
समूचे लैटिन अमेरिका में धरती के नीचे सोना, चांदी, टिन, पेट्रोलियम के अकूत भण्डार पर आक्रान्ताओं की गिद्ध नजर रही तो धरती के ऊपर कोको, काफ़ी, केला, रबर व चीनी की पैदावार लूट का सबब बनी। यूरोप के बाज़ार ने एशिया की समृद्धि की कहानी सुनी थी। कोलम्बस इसी भ्रम में अमरीकी महाद्वीप पहुंच गया। इसके साथ ही शुरू हुयी यहां बाज़ार की निर्मम लूट और नरसंहार। लैटिन अमरीका की प्राकृतिक समृद्धि यूरोप और बाद में चलकर उत्तरी अमेरिका की समृद्धि का सबब बनी। यहां की अकूत ग़रीबी वहां की अमीरी का आधार बनी। शुरू हुआ हत्याओं और नरसंहारों का ऐसा अन्तहीन चक्र जिसके निशान आज भी लैटिन अमरीका की धरती पर यहां वहां बिखरे नज़र आ जाएंगे। उन्होंने वहां के निवासियों के श्रम का जबरन इस्तेमाल कर वहां की धरती खोद डाली। धरती की नसों में प्रवाहित होता सोना, चांदी और टिन खुरच-खुरच कर निकाल लिया। अपने घोड़ों की नाल में चांदी ठुकवा कर हाथों में हथियार लहराते लाखों लोगों का कत्लेआम किया। पूंजीवाद कितना निर्मम हो सकता है, इसका गवाह है लैटिन अमेरिका के 500 सालों की लूट का यह इतिहास। मार्क्स की यह पंक्ति कि ‘पूंजी सिर से पांव तक खून व कीचड़ में लथपथ है’ का अर्थ इस किताब को पढ़ने पर पूरी तरह से खुल जाता है।
लैटिन अमरीकी शासक वर्ग ने लगातार दलाल की भूमिका अदा की। पहले उसने यूरोपीय आक्रान्ताओं के समक्ष समर्पण किया फ़िर उत्तरी अमरीकी बहुराष्ट्रीय निगमों को अपने देश की अकूत सम्पदा बेच दी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमरीका दुनिया का ठेकेदार बना और उसकी दो प्रमुख आर्थिक संस्थाएं आईएमएफ़ व विश्वबैंक ने कर्ज़ की राजनीति शुरू की और प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से लैटिन अमरीकी जनता के खुले जख्मों को चूस लिया। वही कहानी दोहराई गयी। जनता लगातार ग़रीब बनी रही और मुट्ठी भर लोग उनकी अंतड़ियों को चांदी की प्लेट में परोस कर मौज करते रहे। एदुआर्दो गालियानो की यह किताब 500 साल की इसी भयानक लूट का राजनीतिक अर्थशास्त्र का इतिहास बताती है। पंक्ति दर पंक्ति यह किताब अपनी विशिष्ट किस्सागोई की शैली में इस भीषण लूट की दास्तान बताती है।
पुस्तक की 1997 संस्करण की प्रस्तावना लिखी है ईसाबेल अलेन्दे ने। ईसाबेल चिली के लोकप्रिय शासक सल्वाडोर अलेन्दे की जीवनसाथी हैं। 11 सितम्बर 1973 अमेरिका ने अलेन्दे का तख्तापलट करवा दिया था। घर से भागते समय ईसाबेल के सामानों में चिली की मिट्टी के अलावा ’ओपेन वेन्स ऑफ लैटिन अमेरिका’ व पाब्लो नेरुदा की किताब ‘ओड्स’ थी। ईसाबेल लातीन अमेरिका में उत्तरी अमरीकी ताण्डव की प्रत्यक्ष गवाह थीं। इस किताब की भूमिका इस किताब का एक बेहतरीन हिस्सा है। अनुवाद की दृष्टि से भी यह सबसे बेहतरीन हिस्सा है।
अब थोड़ी बात अनुवाद पर। इस बेहद महत्वपूर्ण किताब को हिन्दी के पाठको के लिए लाने का श्रमसाध्य काम करने के लिए अनुवादक दिनेश पोसवाल को बधाई! निश्चित रूप से यह एक जरूरी किताब है जिसे हिन्दी में आना ही चाहिए था। प्रकाशक गार्गी प्रकाशन को भी शुक्रिया! अनुवाद के लिए निश्चित रूप से यह एक कठिन किताब है। मूल स्पेनी से अंग्रेजी फिर अंग्रेजी से हिन्दी। मूल भाव बचा पाना एक कठिन काम है। सम्भवतः इस कारण से अनुवादक किताब में प्रवाह को पूरी तरह से बचा नहीं पाए हैं। हिन्दी में अंग्रेजी के तरह का वाक्य विन्यास किताब को और दुरूह बनाता है। अनुवादक को इससे बचना चाहिए। इसके अलावा व्यक्तिगत रूप से लैटिन अमेरिका के इतिहास की कम जानकारी, सन्दर्भों से अपरिचय एवं कठिन व लम्बे लातीन अमरीकी नाम भी प्रवाह में बाधक बने। अन्त में इसी किताब से एक उद्धरण –
जब तक
हिरन अपना इतिहास
खुद नहीं लिखेंगे
शिकारियों की
शौर्यगाथाएं
लिखी जाती रहेंगी
-चिनुआ अचीबी

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