Survivors Guide To Prison


अमरीका में जब ‘डोनाल्ड ट्रम्प’ की राष्ट्रपति पद पर जीत हुई तो दो कम्पनियों के शेयरों में 100 प्रतिशत का उछाल आ गया। ये कम्पनियां है- ‘कोर सिविक’ और ‘जीओ ग्रुप’। ये कम्पनियां अमरीका में निजी जेलों का संचालन करती हैं। जिन्हें प्रति कैदी अमरीकी सरकार से पैसे मिलते हैं। यानी जितने ज्यादा कैदी होगे, उतने ही इन्हें पैसे मिलेंगे। इसके अलावा वहां निजी कम्पनियां ठेके पर इन कैदियों से काम भी कराती है, जहां उन्हें न्यूनतम वेतन से काफी कम मजदूरी दी जाती है। डोनाल्ड ट्रम्प का अप्रवासियों, कालों और मुस्लिमों के प्रति जो रुख था, उससे इन कम्पनियों ने अनुमान लगा लिया था कि ट्रम्प के आने के बाद जेलों में कैदियों की संख्या बढ़ेगी। इसलिए इन कम्पनियों ने चुनाव कैम्पेन में ट्रम्प के समर्थन में काफी पैसा बहाया।
आपको यह जानकर शायद आश्चर्य हो कि पूरी दुनिया में जितनी महिलाएं जेलों में है, उसका एक तिहाई अकेले अमरीका में हैं। पूरी दुनिया में जितने कैदी हैं, उसका 22 प्रतिशत अकेले अमरीका में हैं। जबकि अमरीकी आबादी दुनिया की आबादी का महज 5 प्रतिशत है। वहां की जेलों में काले और अप्रवासी लैटिन अमरीकियों की संख्या आबादी में उनके अनुपात से कहीं ज्यादा है।

इसी साल मई में अमरीकी जेलों की स्थितियों पर एक बेहद संवेदनशील फिल्म ‘Survivors Guide To Prison’ आयी है, जिसकी प्रगतिशील खेमे में काफी चर्चा है। एक गोरे और एक काले व्यक्ति, जिन्होंने निर्दोष होने के बावजूद सालों-साल जेल की काल-कोठरी में गुजार दी, के साक्षात्कार के माध्यम से यह फिल्म ना सिर्फ जेल की अमानवीय स्थितियांे, पुलिस की निरंकुशता और कोर्ट की संवेदनहीनता और गरीबों-कालों-अप्रवासियों के प्रति उसके पक्षपात को बेहद असरदार तरीके से सामने लाती है, वरन मानवाधिकार के क्षेत्र में काम कर रहे विभिन्न बुद्धिजीवियों के साक्षात्कारों के माध्यम से जेल-स्वतंत्रता व मानव अधिकारों के बारे में बेहद बुनियादी सवाल उठाती है। फिल्म के निर्देशक ‘मैथ्यू कूक’ और ‘सूसान सरन्डन’ ने बेहद असरदार तरीके से नैरेशन की भूमिका अदा की है। और बीच बीच में इस फिल्म को एक परिप्रेक्ष्य देने की कोशिश की है।
फिल्म में बताये गये इस तथ्य को जानकर बेहद आश्चर्य होता है कि अमेरिका में 95 प्रतिशत मामले ‘Plea bargain’ से हल किये जाते हैं। मतलब कि आरोपी से कहा जाता है कि वह अपना अपराध कबूल कर ले, तो उसे कम दण्ड दिया जायेगा। अन्यथा उसे मंहगे ट्रायल का सामना करना पड़ेगा और उसके बाद अगर वह दोषी पाया गया तो उसे कड़ी सजा दी जायेगी। इसी दबाव में मंहगे ट्रायल का खर्च ना उठा पाने वाले अधिकांश गरीब-काले व अप्रवासी वे जुर्म भी कबूल कर लेते हैं जो उन्होंने कभी किया ही नहीं होता। इसलिए अमरीकी जेलों में निर्दोष कैदियों की भरमार है। और यही कारण है कि पुलिस वहां किसी को भी गिरफ्तार करके जेल भेज देती है और उसे सजा हो जाती हैै। अमरीकी जेलों में कैदियों की बहुतायत का यह एक बड़ा कारण है। मानवाधिकार कार्यकर्ता और लेखिका Alexander Michelle ने फिल्म में अपने साक्षात्कार के दौरान इसे उचित ही एक नये तरह के ‘जिम क्रो’ (1965 के पहले अमरीका के दक्षिणी राज्यों में काले व गोरों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में अलग अलग नियम होते थे। जो उनके बीच नस्लभेद को कायम रखते थे। इसकी तुलना हम भारत के गांवों में लागू होने वाली अलग अलग मनु-संहिताओं से कर सकते हैं।) की संज्ञा दी है। उन्होंने इस पर एक बेहद महत्वपूर्ण किताब भी लिखी है-Alexander, Michelle-The new Jim Crow _ mass incarceration in the age of colorblindness

ब्लैक एक्टिविस्ट और बहुचर्चित किताब ‘Are Prisons Obsolete?’ की लेखिका ‘एंजिला डेविस’ का इस फिल्म का हिस्सा ना होना थोड़ा अखरता है। यदि एंजिला डेविस से इस फिल्म में साक्षात्कार लिया जाता तो वे जेलों के अस्तित्व पर ही सवाल उठाती। जिस सवाल को यह फिल्म जाने अनजाने छोड़ देती है। हालांकि फिल्म के नैरेशन की तार्किक परिणति इसी सवाल पर होती है। इस सवाल पर चर्चा होनी ही चाहिए कि जेल अपराध-सुधार के लिए है या वर्ग शासन को बनाये रखने का एक हथियार है।
डाकूमेन्टरी फिल्म होने के बावजूद यह कृत्रिम और ‘हार्श लाइट’ का अत्यधिक प्रयोग करती है जो दर्शक को कभी कभी डिस-ओरियन्ट कर देता है। इसके अलावा Extreme Close Up का अत्यधिक प्रयोग भी फिल्म की अब्जेक्टिविटी को प्रभावित करता है। और कहीं कहीं यह किसी डरावनी फिल्म का संकेत देता हैं।
इसके बरक्स ‘जान पिल्जर‘ की 1974 में आयी फिल्म ‘Guilty Until Proven Innocent’ की याद आती है जो बेहद सामान्य तरीके से नेचुरल लाइट में शूट की गयी है और ज्यादा आब्जेक्टिव और प्रभावोत्पादक है।
भारत में इस विषय पर फिल्में काफी कम हैं। कुछ समय पहले ‘के पी ससी’ की फिल्म ‘FABRICATED‘, ‘शुब्रदीप चक्रवर्ती’ की 2013 में आयी फिल्म ‘After the Storm‘ और 1978 में आयी ‘आनन्द पटवर्धन’ की ‘Prisoners of Conscience‘ महत्वपूर्ण फिल्में है। हालांकि ये सीधे सीधे जेलों पर नहीं है। पहली और दूसरी फिल्म फर्जी तरीके से गिरफ्तार किये गये, विशेषकर मुस्लिमों के बारे में है तो तीसरी फिल्म राजनीतिक कैदियों के बारे में है।
‘Survivors Guide To Prison’ भारत के सन्दर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योकि यहां भी जेलों की स्थिति अमरीका जैसी ही है। यहां भी मुस्लिम, ईसाई, सिख दलित और आदिवासी जनसंख्या में अपने अनुपात से कहीं ज्यादा हैं। 2012 में 22.22 प्रतिशत दलित और 13.47 प्रतिशत आदिवासी तथा 20.02 प्रतिशत मुस्लिम जेलों में थे, जबकि उसी वक्त जनसंख्या में उनका अनुपात क्रमशः 16.63 प्रतिशत, 8.63 प्रतिशत और 14.23 प्रतिशत था। छत्तीसगढ़ व झारखण्ड में हजारों आदिवासी बेल बान्ड ना भर पाने की वजह से जेलों में बने हुए हैं। इसके अलावा जेलों की अमानवीय स्थितियां और गिरफ्तारी के वक्त टार्चर दिया जाना अब सामान्य बात बन चुकी है।
किसी ने बिल्कुल सही कहा है कि किसी भी समाज में जनतंत्र कितना है, इसका पता वहां कि जेलों की स्थितियों से लगाया जा सकता है। और इस मापदण्ड पर दुनिया के सबसे ‘पुराने’ और सबसे ‘बड़े’ लोकतंत्र के ढकोसले की धज्जियां उड़ जाती हैं।
कुल मिलाकर यह अनिवार्य रुप से देखी जानी वाली फिल्म है।

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