Look Who’s Back : हिटलर ज़‍िन्‍दा है


हिटलर ज़‍िन्‍दा है, कभी वह अख़लाक के फ्रीज़र के गोश्‍त में घुस जाता है, कभी वह जुनैद की टोपी के धागों में उलझ जाता है, कभ्‍ाी वह पहलू ख़ान और रकबर ख़ान के मवेशियों के झुण्‍ड में घुस जाता है, तो कभी वह किसी मुसलमान युवक बुज़ुर्ग को पीट-पीट के मारने वाले लम्‍पटों में शामिल हो जाता है तो कभी एक आठ साल के बच्‍चे को पीट के मारने वालों में शामिल हो जाता है. हिटलर ज़‍िन्‍दा है, वह शामिल है, पुलिस वालों की साम्‍प्रदायिक सोच और कार्यवाइयों में, न्‍यायपालिका के फैसलों में, प्रधानमंत्री के भाषणों में. वह शामिल है कहानियों में, कविताओं में, फिल्‍मों में. महिलाओं के प्रति छेड़छाड़ में, हिंसा में, वह ज़‍िन्‍दा है ब्राम्‍हणवादियों के शुद्ध रक्‍त में.
दरअसल हिटलर कभ्‍ाी मरा ही नहीं. बीच-बीच में वह सिर उठाता ही रहता है कभी हमारे ही भीतर तो कभी छुपे रूप में. लेकिन यह भी सच है कि हिटलर के सिर उठाने के खिलाफ़ व्‍यापक प्रतिरोध भी है. प्रतिरोध है टी एम कृष्‍णा के सुरीले सुरों में, औरतों के साहसी प्रतिरोधों में और चारो ओर चल रहे जनता के प्रतिरोधों में.
लेकिन क्‍या हो अगर हिटलर आज पुन: अपनी क़ब्र से सशरीर ज़‍िन्‍दा हो जाये तो. जी हां, यह सच है, यह सच हुआ 2012 में लिखा गया तिमूर वर्मीज के बेस्‍टसेलर उपन्‍यास ‘लुक हू इज़ बैक’ में. देखते ही देखते इसकी लाखों प्रतियां बिक गयीं. 2015 में इसी उपन्‍यास पर आधारित करके डेविड वानेन्‍ड्त ने एक फिल्‍म बनायी – ‘लुक हू इज़ बैक’.
तंज़‍िया शैली में बनी इस फि़ल्‍म में हिटलर आज 21वीं सदी में वास्‍तव में उस पार्क से उठ बैठता है जिसमें कभी उसका बंकर हुआ करता है. हिटलर को 1945 के बाद की कोई याददाश्‍त नहीं है. वह मौजूदा जर्मनी में घूमता है और धीरे-धीरे उसका रुतबा काबिज़ होता जाता है. अन्‍त में एक बूढ़ी नानी उसे पहचान कर नफ़रत से भर उठती है और उसे अपने घर से बाहर निकाल देती है. हिटलर के माध्‍यम से टीआपी बटोरने वाला एक टेलीविजन चैनल एक प्रोग्राम के माध्‍यम से लोगों के सामने हिटलर को पेश करते हैं (याद करें आज भारत के टीवी चैनल किस तरह फासीवादी कार्यक्रमों के ज़रिये टीआरपी बटोर रहे हैं) अन्‍त में हिटलर को मारने की कोशिश नाकाम हो जाती है और वह एक विजयी की तरह खुली गाड़ी में बैठ कर जर्मनी की सड़कों पर निकलता है. इसी समय शुरू हो जाता है हिटलर के खिलाफ़ जनता का प्रतिरोध. और यहीं यह फि़ल्‍म खत्‍म हो जाती है.
एक अविश्‍वसनीय सी स्क्रिप्‍ट के साथ बनी यह फि़ल्‍म बहुत आसान फि़ल्‍म नहीं है. इसमें सिलसिलेवार तरीके से कहानी नहीं चलती. बल्कि तंज की शक्‍ल में यह फि़ल्‍म हमें बार-बार अहसास दिलाती है कि हिटलर कैसे हमारी ज़‍िन्‍दगी में सायास घुस गया है. हिटलर के माध्‍यम से यह एक ऐसा तंज है कि जब किसी दृश्‍य में हम हंसते हैं तो अगले ही पल हमारा गला रुंधने लगता है. कि हमने ही तो इस फासिस्‍ट को पनाह दी है. हमने ही वोट देकर ‘लोकतान्त्रिक’ माध्‍यम से सारी दुनिया में हिटलरों को चुना है. ये हिटलर जनता से अपनी वैधता हासिल कर जनता पर दमन करते हैं.
समूची दुनिया में चल रहे दक्षिणपंथी आंधी के रूप में हिटलर की वापसी और शरणार्थी संकट पर यह फिल्‍म ज़बरदस्‍त तंज़ करती है.
नहीं, हिटलर कोई मज़ाक नहीं है. हिटलर एक यथार्थ है जो आज हमारे ख़यालों में घुस गया है. ज़रूरत है हमारे ज़हन से हिटलर के रूप में मौजूद फासीवाद के ज़हर को खुरच-खुरच के मिटा देने की. आज हर तरफ़ सिर उठा रहे हिटलरों में को कुचल देने की. देखो हिटलर जि़न्‍दा है की कहानी कहती यह फिल्‍म एक आज के दौर की एक ज़रूरी फि़ल्‍म है.

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