अब्बू की नज़र में जेल- 8

हमारे घर से हमें सीधे ‘हाक’ (एण्टी नक्सल फोर्स) हेडक्वार्टर लाया गया। काले बूट और गहरे हरे रंग की वर्दी में नौजवान लड़के अत्याधुनिक हथियारों से लैस किसी रोबोट की भांति इधर से उधर आ जा रहे थे। हमारे आने पर उन्होंने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई। कुर्सियां लगी एक छोटे कमरे में हमें बैठाया गया। हमारे बैठते ही उन लोगों के बीच कुछ काना फूसी हुई और फिर अमिता को इसी से सटे दूसरे कमरे में शिफ्ट कर दिया गया। अब्बू को मैंने शतरंज दे दिया और उसे कोने में लगी एक कुर्सी पर बिठा दिया। लेकिन अब्बू कुर्सी पर बैठते ही सरक कर उतर गया और बोला-‘मौसा मैं एक चक्कर लगा कर आता हूं।’ इसके बाद वह कैम्पस का चक्कर लगाता और बीच बीच में आकर मुझे नई-नई जानकारी देता। जैसे, वो लंबा वाला सिपाही वीडियो काल में अपने बच्चे से बात कर रहा है। मैंने चुपके से सुन लिया, आज उसके बच्चे का जन्मदिन है और वो अपने पापा को बुला रहा है।
इधर मुझसे पूछताछ की शुरूआत हो गयी। 7-8 लोगों ने भयभीत करने के अंदाज में मेरे एकदम नजदीक आकर घेरे में कुर्सियों पर बैठ गये। पहले औपचारिक पूछताछ हुई। नाम, पता आदि। मुझे मशहूर लैटिन अमरीकी फिल्म ‘दी आवर आफ फरनेस’[The Hour of the Furnaces] का शुरूआती दृश्य याद आ गया। तेज ड्रम संगीत के बीच स्क्रीन पर कैप्शन उभरता है। नाम- विक्टिम [victim], सरनेम- आरगैनाइजेशन [organization], पेशा- रिवोल्यूशन [Revolution]। सच में मेरा भी यही परिचय था। इस औपचारिक पूछताछ के बाद असली पूछताछ शुरू हुई। मेरे नजदीक बैठे एक शख्स ने अपना मोबाइल निकाला और एक एक करके मुझे तमाम लोगों के फोटो दिखाने लगा। फोटो देखते हुए मैं नर्वस होने लगा और मेरे पसीने छूटने लगे। लेकिन जल्दी ही मैंने अपने पर नियंत्रण पा लिया और बाथरूम जाने का इशारा किया। इसी ‘ब्रेक’ में मैंने अपने आपको नार्मल किया। ‘ब्रेक’ के बाद वह हर फोटो का परिचय खुद ही देने लगा और उनसे मेरा सम्बन्ध जोड़ने लगा। अब तक मैं इस शुरूआती शाक से उबर चुका था। मैंने कहा-‘जब आपको इतनी डिटेल जानकारी है तो मुझसे क्यों पूछ रहे हैं।’ उसने तुरन्त कहा -‘लेकिन हमें यह नही पता कि संगठन में इनका पद और जिम्मेदारी क्या है। यह जानकारी आप हमें देंगे।’ फिर व्यंग्य से बोला-‘देंगे ना।’ अब तक मेरा अपने आप पर पूरा नियंत्रण हो चुका था। मैंने दृढ़ता से कहा- इनमें से कुछ जनसंगठन के सदस्य हैं और कुछ मेरे व्यक्तिगत दोस्त हैं, बाकी को मैं नहीं पहचानता । कुछ फोटो पर वह जोर देने लगा कि बताइये यह कौन है। मैंने साफ इंकार कर दिया कि मैं नहीं जानता। तभी उनमें से एक ने मेरे पेट पर हाथ रखते हुए हल्का सा मरोड़ दिया और बोला कि बताना पड़ेगा। मुझेे लगा कि अब टार्चर शुरू होने वाला है। तभी एक हट्टा कट्टा लंबा सांवले रंग का सिपाही जो इस पूछताछ में चुपचाप बैठा था, अचानक बोल उठा-‘इनका पेट ठीक नहीं है, टच मत करिये।’ बाद में मैंने ध्यान दिया, यह वही व्यक्ति था जिसके बेटे का आज जन्म दिन था और जिसकी बात अब्बू ने सुन ली थी। उसकी बात का असर हुआ। और फिर किसी ने मुझे टच नहीं किया। मुझे अभी भी समझ नहीं आ रहा कि उसने मुझे ‘डिफेन्ड’ क्यो किया।
इसी दौरान अचानक मैंने देखा कि अब्बू पूछताछ करने वाले शख्स के पीछे खड़ा होकर मोबाइल की सभी तस्वीरें ध्यान से देख रहा था। उसने मेरे कान में धीमें से कहा-‘ये सब भी तेरे साथ मिलकर सरकार से लड़ते हैं।’ मैंने कहा-हां। अब्बू ने तपाक से जोड़ा-वाह। और अपने शतरंज की ओर भागा, जहां शायद उसका राजा भी दुश्मनों से घिरा हुआ था। अब्बू को उसे बचाना था।
इसी पूछताछ के बीच एक रोबीले डील डौल वाले व्यक्ति ने प्रवेश किया, जो पता नहीं क्यों किसी ढहते सामंती परिवार का बिगड़ैल बेटा नजर आ रहा था। उसने कुर्सी पर धंसते ही पूरे माओवादी आन्दोलन को गाली देना शुरू कर दिया। वही पुराना राग-‘नेता लोग कोठियों में रहते है, कैडर को मरने के लिए छोड़ देते हैं।’ मैं चुपचाप उसका ‘भाषण’ सुन रहा था। लेकिन जब उसने यह बोला कि यहां लड़कियों का शारीरिक शोषण होता है तो अचानक मुझे गुस्सा आ गया। मैंने भरसक अपने गुस्से पर नियंत्रण रखते हुए कहा कि आप मुझसे पूछताछ करने आये हैं या अपना ‘मुर्गावलोकन’ सुनाने। पता नहीं क्यो वह भड़का नहीं। गैर हिन्दी भाषी होने के कारण शायद वह मुर्गावलोकन का अर्थ नहीं समझ पाया। लेकिन उसने उसी रौ में कहा-‘तुम मानो या ना मानो यह तो कामन सेन्स की बात है।’ मैंने भी यूहीं अग्रेजी में कह दिया-‘कामन सेन्स इज नाट सो कामन’। इसके बाद उसका ब्लडप्रेशर थोड़ा नार्मल हो गया और खीझते हुए दूसरों को संबोधित करते हुए बोला-‘इनका ब्रेनवाश हो चुका है, इन्हें कुछ समझ में नहीं आयेगा। दो चार साल जेल में रहेंगे तब समझ आयेगा।’ यह कहते हुए वह पैर पटकते हुए कमरे से बाहर चला गया।
इस गरमा गरमी के कारण अब्बू का ध्यान भी भंग हो चुका था, वह दौड़ कर मेरे पास आया, बोला-‘मौसा क्या हुआ।’ मैंने कहा-‘कुछ नहीं आदिवासियों को गाली दे रहा था।’ मैंने अब्बू को आदिवासियों की जो कहानियां सुनाई थी, उससे रिलेट करके अब्बू ने कुछ समझा और तत्काल मुंह बनाकर बोला-‘गन्दा आदमी।’ मुझे हंसी आ गयी और मेरा टेंशन भी रिलीज हो गया।
इसी बीच पूछताछ करने वाले एक एक करके बाहर चले गये। सिर्फ वही बचा रहा जिसने मुझे ‘डिफेंड’ किया था। मुझे ऐसा लगा कि वह जान बूझ कर नहीं गया। जब कमरे में सिर्फ मैं और अब्बू बचे तब उसने इत्मीनान से पूछा-‘आप लोग तो भगवान में विश्वास करते नहीं तो ऐसे कठिन समय में आप किसकी तरफ देखते है।’ मैंने बिना सोचे समझे जवाब दे दिया- इतिहास की तरफ। वह संतुष्ट नहीं हुआ, लेकिन आगे कुछ नहीं पूछा और उठ कर चल दिया। अब्बू मेरी बात ध्यान से सुन रहा था। अब्बू को पता है कि मैं भगवान को नहीं मानता। कभी कभी वो मुझसे बहस भी करता है। इससे जुड़ी बड़ी मजेदार कहानियां हैं हमारे पास। लेकिन इतिहास उसके शब्दकोश के लिए नया शब्द था। उसने मुझसे पूछा-‘मौसा ये इतिहास क्या होता है?’ मैंने दिमाग पर जोर डाला और बोला, कहानी। अब्बू ने तुरन्त दूसरा सवाल दागा-‘सच्ची कहानी?’ मैंने कहा, थोड़ी सच्ची थोड़ी झूठी। अब्बू ने कहा-‘अच्छा अब पता चला कि जब मैं रोता हूं तो तुम मुझे कहानी क्यो सुनाते हो। ताकि मैं फिर से हंसने लगूं और खेलने लगूं।’ मैंने कहा- हां। मैंने इतना और जोड़ा-‘यही तो इतिहास भी करता है।’ पता नहीं अब्बू ने क्या समझा और वह फिर से कैम्पस का चक्कर लगाने भाग गया।
मुझे लगा था कि आज रात नींद नहीं आयेगी। लेकिन अब्बू को और मुझे अच्छी नींद आ गयी। पूछताछ करने वाली टीम भी कई तकनीकी कामों में उलझी थी-यहां मोहर, वहां मोहर, इसकी पैंकिग, उसकी पैंकिग। शायद यही कारण था कि उन्होंने मुझे सोने का मौका दे दिया। रात में करीब दो ढाई बजे के आस पास मेरे कान में कुछ आवाज पड़ी और मेरी नींद खुल गयी। कमरे के बाहर अहाते से धीमें धीमें बातचीत की आवाज आ रही थी। एक की बात तो मैं नहीं सुन सका, लेकिन दूसरा व्यक्ति जो मेरे कमरे की तरफ ही खड़ा था, उसकी आवाज मैं सुन पा रहा था। वह कह रहा था-‘नहीं मैं यह नहीं कर सकता। इतनी बड़ी मक्खी मैं नहीं निगल सकता। आखिर कोर्ट में तो मुझे ही जवाब देना पड़ेगा।’ यह सुनकर मैं तनाव में आ गया। लेकिन फिर इसे झटक कर दुबारा सोने का प्रयास करने लगा। मैंने अपने आप से कहा-इसमें मैं क्या कर सकता हूं, जो करना है, अब इन्हें ही करना है।
अगले दिन हमें कोर्ट ले जाया गया। हमें उम्मीद नहीं थी कि वहां हमसे मिलने कोई आयेगा। लेकिन हमारे आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। वहां ना सिर्फ हमारे शुभचिंतक पहले से मौजूद थे, बल्कि उन्होंने एक अच्छा वकील भी कर दिया था। सबसे पहले अब्बू की मां हमे कोर्ट में मिली। उसकी आंखें भरी हुई थी। हमसे मिलते ही वह रोने लगी। मैंने उसे ढांढस देते हुए पूछा-‘अब्बू कैसा है।’ वह बोली कि उसे अभी बताया नहीं है, लेकिन आज सुबह पूछ रहा था कि मौसी की तबियत खराब है क्या। हम लोगो के व्यवहार से कुछ अजीब लग रहा है उसे। आज सुबह ही मौसा के यहां जाने की जिद कर रहा था। बड़ी मुश्किल से समझाया। यह सुन कर हमें भी रोना आ गया। बड़ी मुश्किल से हमने अपने आप को रोका।
खैर कोर्ट की औपचारिकता पूरी करके हम कोर्ट से बाहर निकले। मेरे दिमाग में लगातार यही चल रहा था कि अपने दोस्तों, संगठन के साथियों, और परिवार वालों को सन्देश कैसे दिया जाय कि हम ठीक हैं और अच्छी स्प्रिट में है। तभी कोर्ट की सीढ़िया उतरते हुए हमें सामने मीडिया का हुजूम दिखायी पड़ गया। बस मुझे सन्देश देने का माध्यम मिल गया। सीढ़िया उतरते हुए ही मैंने अपनी मुठ्ठी लहराई और नारा लगाया-इंकलाब जिन्दाबाद। पीछे से अमिता ने भी जोर से दोहराया-इंकलाब जिन्दाबाद। तभी मुझे अब्बू की पतली सी आवाज सुनाई दी-इंकलाब जिन्दाबाद। मैंने आश्चर्य से पीछे मुड़ कर देखा-उसके नन्हें हाथ हवा में उठे हुए थे और वो मेरी तरफ ही देख रहा था। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। दिमाग में कौंधा- भला अब इंकलाब को कौन रोक सकता है।
इंकलाब जिन्दाबाद

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