Kya Dilli Kya Lahore

मई 2014 में आयी फिल्म ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ दर्शकों का ध्यान नहीं खींच पाई। आज के इस दौर में जब ‘मनोरंजन’ ने ‘यथार्थ’ पर पूरी तरह विजय पा ली है तो ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ जैसी यथार्थ परक फिल्मों का ‘मनोरंजन उद्योग’ द्वारा निरंतन गला घोटा जाना ऐसा तथ्य बन गया है, जिसे प्रायः लोग नोटिस भी नहीं लेते। खैर अब कुछ बातें फिल्म पर।
भारत-पाकिस्तान विभाजन इतिहास का ऐसा अध्याय है जिसने हमारे जीवन के कमोवेश प्रत्येक पहलू को आज तक प्रभावित कर रखा है। ये एक ऐसा जख्म है जो समय के साथ भरने की बजाय और हरा होता जा रहा है। लेकिन इस पर फिल्में ना के बराबर है। शायद उंगलियों पर गिनने लायक।
‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ महज चार पात्रों (ज्यादातर समय तो सिर्फ दो ही पात्र) के माध्यम से कही गयी उन करोड़ों लोगो की कहानी है जो किसी ना किसी तरह इस दर्द से बावस्ता हैं।
कहानी 1948 की यानी भारत-पाक विभाजन के तुरन्त बाद की है। विभाजन के बाद दिल्ली के चांदनी चौक में पले बढ़े ‘रहमत अली’ (विजय राज) को पाकिस्तान आना पड़ता है और पाक सेना ज्वाइन करनी पड़ती है। उधर लाहौर के निवासी ‘समरथ प्रताप’ (मनु रिषी) को भारत आना पड़ता है और उसकी नौकरी भारतीय सेना में खानसामे के रुप में लग जाती है। फिल्म की शुरुआत में ही घटना इस तरह से घटित होती है कि भारत-पाक बार्डर पर एक चौकी पर इन दोनो सैनिकों का आमना सामना हो जाता है। अपनी आत्म-रक्षा में दोनों एक दूसरे से छिपते भी हैं और मौका लगने पर एक दूसरे पर फायर भी करते हैं। लेकिन इस लुका-छिपी के युद्ध में उनका एक दूसरे से संवाद शुरु हो जाता है। और यह संवाद ही फिल्म की जान है। मजे की बात है कि संवाद मनु रिषी ने ही लिखे है। इन संवादों में भारत पाक विभाजन की जटिलता, उसकी यान्त्रिकता, उसकी विभीषिका और उसकी विफलता और इसके विविध प्रभाव बहुत असरकारक तरीके से संप्रेषित होते हैं। संवाद में व्यंग और हास्य का इस्तेमाल दर्शको को भावना में बहने से रोकता है और तर्क की ओर ले जाता है।
एक दूसरे से बात करते हुए दोनो ही अपने मूल शहर ‘दिल्ली’ और ‘लाहौर’ को शिद्दत से याद करते हैं। और फिर विभाजन की विभीषिका का जिक्र करते हुए बताते हैं कि कैसे विभाजन ने उनकी जिन्दगियों को नर्क बना दिया है। और मन ही मन एक दूसरे के करीब आने लगते हैं। दोनों को ही आश्चर्य होता है कि उनका जीवन कितना समान है। वहीं अगले ही पल विभाजन की राजनीति के वशीभूत होकर वे पुनः एक दूसरे को गालियां देना शुरु कर देते हैं और एक दूसरे पर गोली चलाने लगते हैं। मूल मानवीय भावना और ओढ़ी हुई साम्प्रदायिक भावना का यह क्लासिक टकराव बेहद दिलचस्प है, जिसे विजय राज और मनु रिषी ने अपने जीवन्त अभिनय से अविस्मरणीय बना दिया है। यहां आपको निश्चय ही ‘असगर वजाहत’ का ‘जिन लाहौर नही देख्या वो जन्म्या ही नही’ नाटक के वे डायलाग याद आयेंगे जो हवेली की मालकिन हिन्दू बूढ़ी औरत और उस हवेली में रहने भारत से आये एक मुस्लिम परिवार के बीच होता है।
फिल्म का दूसरा महत्वपूर्ण और दिलचस्प मोड़ तब आता है, जब इन दोनों ही सैनिकों के ऑफिसर इन्हे गद्दार बोलते है क्योकि दोनो ही क्रमशः भारत और पाकिस्तान से आये रिफ्यूजी है। यानी दोनो का ही अब कोई देश नहीं रहा। अपना देश वे छोड़ चुके हैं और इस नये देश में उन्हे गद्दार समझा जा रहा है। यहां ‘मंटो’ की कहानी ‘टोबाटेक सिंह’ की याद आये बिना नही रह सकता। इसके बाद कहानी में जल्दी जल्दी कुछ मोड़ आते हैं और अन्त में पाकिस्तानी सैनिक जब यह देखता है कि उसका पाक आफिसर, भारतीय सैनिक (जिसे वह ‘भाईजान’ कहता है) की जान लेने पर तुला है तो वह अपने ही आफिसर को गोली मार देता है। भारतीय सैनिक उसे आश्चर्य से देखता है और तभी दूर कही से आयी एक गोली इस पाक सैनिक को भी लगती है और वह भारतीय सैनिक की गोद में गिर जाता है। सैनिक तो मर जाता है, लेकिन मानवता जीत जाती है।
बहुत से फिल्म समीक्षको ने इस फिल्म की तुलना आस्कर विजेता ‘नो मेन्स लैण्ड’ से की है। लेकिन जैसा कि फिल्म समीक्षक ‘शुभ्रा गुप्ता’ कहती हैं कि यह फिल्म ‘नो मेन्स लैण्ड’ से बड़ी फिल्म है क्योकि यह हमारी फिल्म है।
यह फिल्म देखते हुए दूसरी जो फिल्म जेहन में आती है, वह है ‘पीटर वाटकिन’ की ‘डायरी ऑफ एन अननोन सोल्जर’
इस फिल्म से ‘गुलजार’ का नाम भी जुड़ा है। इसके गीत गुलजार ने लिखे हैं और नरेशन भी उन्ही का है। विभाजन पर गुलजार के महत्वपूर्ण काम से हम सभी परिचित हैं। लेकिन उनकी खास स्टाइल कभी कभी किसी विषय को डायलूट कर देती है। उनके नरेशन में यह बखूबी दिखता है।
‘‘लकीरे हैं तो रहने दो
किसी ने रुठ कर गुस्से में शायद खींच दी थी।
…………………….’’ -गुलजार

जिस ‘लकीर’ के कारण करोड़ों लोग उजड़ गये हों, 10 लाख के करीब लोग मारे गये हो और लाखों महिलाओं का हिंसक बलात्कार हुआ हो उसके लिए यह लिखना कि ‘किसी ने रुठ कर गुस्से में शायद खींच दी थी’, मेरी समझ में या तो नादानी है या मासूमियत की आड़ में विभाजन के लिए जिम्मेदार ताकतों को माफी देना है। शायद गुलजार के प्रभाव में ही इस फिल्म के निर्देशक ‘विजय राज’ भी इस फिल्म को एक ‘मासूम कहानी’ बताते हैं। जबकि इस ‘मासूम कहानी’ के लिए जिम्मेदार लोग कतई मासूम नहीं थे। साम्राज्यवादी ताकतों और देशी सामंती-पूंजीपतियों ने विभाजन का यह ‘खेल’ बहुत बारीकी से बुना और उसे अंजाम दिया था।
इस फिल्म की सिनेमैटोग्राफी ‘राज चक्रवर्ती’ की है जिनका काम ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ में काफी सराहा गया है। कहानी की जरुरत के हिसाब से ही कैमरा लगातार इन दो पात्रों को ही ट्रैक करता है और आस-पास के लैण्डस्केप से हमें सायास दूर रखता है। जिससे विषय की सघनता टूटती नहीं।
और अन्त में – आज के परिदृश्य में यह फिल्म हम सबके लिए एक जरुरी फिल्म है।
इस फिल्म को आप यहां देख सकते हैं।

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