‘John Abraham’, ‘Amma Ariyan’ and ‘Odessa Collective’

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आज ही के दिन (31 मई) 1987 को केरल के समानान्तर सिनेमा के मशहूर फिल्मकार ‘जान अब्राहम’ का निधन हुआ था। यह अजीब संयोग है कि जन फिल्मकार के रुप में मशहूर जान अब्राहम की मृत्यु भी आम आदमी की तरह ही हुई। 30 मई को वे छत से गिर गये थे। दोस्तो ने उन्हे अस्पताल पहुंचाया। वहां कोई भी उन्हे पहचान नहीं पाया और एक आम आदमी की तरह ही उनकी उपेक्षा की गयी और अगले दिन उनकी मृत्यु हो गयी। बाद में करीब 26 साल बाद उस समय वहां तैनात एक सर्जन ने अपनी फेसबुक पर स्वीकार किया कि यदि उन्हे समय रहते पहचान लिया जाता तो उन्हे आसानी से बचाया जा सकता था। यानी जान अब्राहम की मृत्यु भी एक ‘फिल्म’ बन गयी जिसने एक चुभता यथार्थ हमारे सामने खोल दिया। जिस समय उनकी मृत्यु हुई वे महज 49 साल के थे।
जान अब्राहम ‘एफटीआईआई’ में ‘ऋत्विक घटक’ के शिष्य थे और उनसे खासे प्रभावित भी थे। ऋत्विक घटक ने समानान्तर सिनेमा की पूरी एक पीढ़ी को एफटीआईआई के अपने कार्यकाल में प्रशिक्षित किया है। लेकिन उनमें शायद सबसे योग्य उत्तराधिकारी जान अब्राहम ही थे।
जान अब्राहम ने अपने कैरियर की शुरुआत ऋत्विक घटक के ही दूसरे शिष्य ‘मणि कौल’ के असिस्टेन्ट डायरेक्टर (फिल्म -‘उसकी रोटी’) के रुप में की। जान अब्राहम ने अपने जीवन काल में महज 4 फिल्में बनायी। इन चार में से उनकी दो फिल्में भारतीय ही नहीं बल्कि विश्व सिनेमा में भी अपना विशेष स्थान रखती हैं। 1977 में उन्होनें ‘Agraharathil Kazhuthai’ नामक फिल्म तमिल में बनायी। जिसका शाब्दिक अनुवाद होगा- ‘एक गधा ब्राहमणों के गांव में’। गधे को केन्द्र में रखकर इसमें ब्राहमणों के पाखण्ड पर जबर्दस्त चोट की गयी है। उस वक़्त तमिल ब्राहमणों के जबर्दस्त विरोध के कारण दूरदर्शन पर इसका प्रसारण रोक दिया गया था। यह फिल्म फ्रेन्च ‘न्यू वेव सिनेमा’ की एक महत्वपूर्ण फिल्म ‘Au Hasard Balthazar’ से प्रेरित है। लेकिन इसे बहुत मौलिक तरीके से भारतीय परिवेश मेें ढाला गया है।
लेकिन उनकी सबसे महत्वपूर्ण फिल्म उनकी मृत्यु से ठीक एक साल पहले 1986 में आयी। यह फिल्म थी- Amma Ariyan यह फिल्म अब तक की मेरी देखी सबसे चुनौतीपूर्ण फिल्म है। दरअसल इस फिल्म पर ब्रेख्त के alienation effect का जबर्दस्त असर है। जान अब्राहम खुद भी ब्रेख्त के बड़े प्रशंसक रहे हैं। यह फिल्म दर्शकों को engage करती है और कई सवाल अनुत्तरित छोडती चलती है जो दर्शकों को किसी भी मोड़ पर ‘पैसिव’ नही रहने देता। इसी के अनुरुप फिल्म की टेक्निक और कला भी अपनायी गयी है। ‘फिक्शन फार्म’ और ‘डाकूमेन्ट्री फार्म’ आपस में गुथे हुए है। फिल्मकार सायास फिक्शन से डाकूमेन्ट्री और डाकूमेन्ट्री से फिक्शन में विचरण करता है।
फिल्म का मुख्य पात्र ‘पुरुशान’ जब घर से दिल्ली के लिए निकलता है तो उसकी मां उसे पत्र लिखते रहने की हिदायत देती है। रास्ते में उसे एक लाश दिखती है जो पुलिस के कब्जे में है और पुलिस के अनुसार उसने आत्महत्या की है। पुलिस उसकी शिनाख्त के लिए लोगो से पुछती है लेकिन कोई भी उसे नही पहचानता। पुरुशान उसे पहचानता तो है लेकिन ठीक से याद नही कर पाता कि वह कौन है और उसे कहां देखा है। वह दिल्ली जाने का अपना इरादा बदल देता है और उसकी पहचान स्थापित करने के काम में लग जाता है। इस दौरान वह कई लोगों से मिलता है और उसकी पहचान स्थापित हो जाती है कि वह ‘हरी’ है। तबला वादक हरी। अब पुरुशान और उसके दोस्त यह निर्णय लेते हैं कि हरी की मां को हरी की मृत्यु की सूचना देनी है जो कोचीन में रहती है। कोचीन जाने के क्रम में रास्ते में जो भी हरी के परिचित होते है, उन सबको हरी की मृत्यु की सूचना दी जाती है। और वे सब हरी की मां को सूचना देने वाले कारवां में शामिल हो जाते हैं और कारवां बढ़ता जाता है। इसी प्रक्रिया में हरी की पहचान भी उजागर होती हैै। लेकिन यह पहचान सबके लिए अलग अलग है। किसी के लिए वह अन्तर्मुखी ‘ड्रग एडिक्ट’ है तो किसी के लिए ‘क्रान्तिकारी नक्सली’। लेकिन फिल्मकार अंत तक उसकी सही पहचान को उजागर नही करता। यह एक तरह से ’empirical reality’ का एक उदाहरण है। ज्यादातर ‘न्यू वेव सिनेमा’ या ‘समानान्तर सिनेमा’ के फिल्मकार यथार्थ के साथ इसी रिश्ते में बंधे रहते है। और यही उनकी सीमा भी बनती है। इस फिल्म में भी इसे महसूस किया जा सकता है।

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बहरहाल हरी की मां को सूचना देने की यात्रा में 70 के दशक के केरल के आन्दोलनकारी माहौल से दर्शक रूबरू होता है। मेडिकल छात्रों का निजीकरण के खिलाफ आन्दोलन, जमाखोरो के खिलाफ जनता की कार्यवाही और जनता द्वारा उनके गोदामों पर कब्जा, खनन कर्मियों का आन्दोलन व मालिकों व पुलिस के अत्याचार , पुलिस द्वारा उस समय के नक्सलियों का टार्चर, महिला आन्दोलनकारियों की पुलिस से भिड़न्त जैसे अनेको दृश्यों से केरल के उस समय के राजनीतिक इतिहास से हमारी एक मुठभेड़ होती है। इसके अलावा ‘रियल क्लिपिंग’ के माध्यम से उस समय के दुनिया के हालात भी दर्शकों के सामने आते हैं- वियतनाम, कम्बोडिया, अफ्रीका, लैटिन अमरीका में भूख, दमन और प्रतिरोध। यानी विश्व का ‘राजनीतिक लैण्डस्केप’।
खैर अन्ततः पूरा कारवां हरी की मां तक पहुचने में कामयाब हो जाता है और जब उसे यह सूचना दे रहा होता है तो उसी समय वहां पुलिस भी ठीक यही सूचना लेकर आती है। कारवां का मिशन समाप्त। लेकिन इस मिशन की समाप्ति पर कारवां के कुछ लोग उस समय के राजनीतिक हालात पर चर्चा करते हैं। फिल्म का अन्तिम दृश्य काफी प्रतीकात्मक है। फिल्म के अंत में दिखता है कि पुरुशान की मां अपने गांव में गांव वालों के साथ प्रोजेक्टर पर यही फिल्म देख रही है और फिल्म में हरी की मां अपने आंसू पोछ रही है। वास्तव में पूरी फिल्म एक नरेशन के रुप में है। पुरुशान रास्ते में लाश देखने से लेकर आगे का पूरा घटनाक्रम पत्र के माध्यम से अपनी मां को बयां करता है। दरअसल पूरी फिल्म में मां को एक रुपक के रुप में इस्तेमाल किया गया है। जो शायद ‘नेशन’ के अर्थ में है। जो अपने बच्चों यानी ‘सिटिजन’ को लेकर चिन्तित है। हरी की मौत की सूचना देने जा रहे कारवां को भी एक रुपक की तरह इस्तेमाल किया गया है। जिसकी अनेक भिन्न भिन्न ब्याख्यायें समीक्षकों ने की हैं। और कुछ तो एकदम विरोधी है। वैसे ही जैसे फिल्म में हरी की पहचान सबके लिए अलग अलग है। और कुछ तो एकदम विरोधी है।
ग्वाटेमाला के क्रान्तिकारी कवि ‘आटो रीन कैस्तिलों’ की मशहूर कविता Apolitical Intellectuals का इसमें बेहतरीन इस्तेमाल हुआ है। शायद यह गैर राजनीतिक उस कारवां पर एक कमेन्ट है जो कभी भी इस सवाल से अपना वास्ता नही दिखाता कि हरी की मौत किस वजह से हुई, कि उसने आत्महत्या क्यो की या की यह आत्महत्या है या हत्या। उसका काम महज तकनीकी है। हरी की मां को हरी की मौत की सूचना देना।
फिल्म में ‘उमबई’ [Umbai] द्वारा गाई हिन्दी गजल ‘किस शान से वो आज बेइन्तहा चले’ का बहुत ही खूबसूरत इस्तेमाल किया गया है।
अब कुछ बातें ‘ओदेसा कलेक्टिव’ पर। जान अब्राहम और उनके साथियों ने 1984 में यह ओदेसा कलेक्टिव आंदोलन शुरु किया था। सिनेमा या कहे कि संस्कृति के क्षेत्र में यह एक तरह का जन-आन्दोलन था। ओदेसा-कलेक्टिव की टीम अपनी सिनेमा, नाटक मंडली के साथ गांव गांव जाती थी और अपने कार्यक्रमों के जरिये जनता से फंड इकट्ठा करती थी और फिर उसी पैसे से फिल्म बनाती थी। ओदेसा फंड से बनी पहली फिल्म यही फिल्म यानी Amma Ariyan थी।
ओदेसा कलेक्टिव ने पहली बार सिनेमा को बाजार के चंगुल से सफलतापूर्वक छुड़ा लिया था। Amma Ariyan का न सिर्फ निर्माण जनता के पैसे से हुआ बल्कि इसका प्रदर्शन और वितरण भी जनता के ही नेटवर्क से हुआ। प्रोजेक्टर के माध्यम से इसे केरल के गांव गांव में दिखाया गया। ओदेसा कलेक्टिव के कारण ही केरल की व्यापक जनता ने ‘चार्ली चैपलिन’ समेत अनेक मशहूर जन फिल्मकारों की फिल्में देखी और जनता के सक्रिय सहयोग से केरल में अनेक महत्वपूर्ण जन-फिल्में बनी जो अन्यथा असंभव होती। जान अब्राहम के एक महत्वपूर्ण सहयोगी और मशहूर डाकुमेन्ट्री फिल्म मेकर ‘सत्यान’ ने इस आन्दोलन को आगे बढ़ाया और फलतः उनका नाम ही ‘सत्यान ओदेसा’ पड़ गया। पिछले साल अगस्त में ही उनकी मृत्यु हुई। 70 के दशक के मशहूर नक्सली आन्दोलनकारी ‘वर्गीज’ के फर्जी मुठभेड़ पर उनकी बहुचर्चित डाकूमेन्ट्री इसी तरह बनायी गयी थी। केरल के आम लोगों के लिए जान अब्राहम अपनी फिल्मों से ज्यादा अपने ओदेसा कलेक्टिव के कारण मशहूर हैं।
सच तो यह है कि भारत का समानान्तर सिनेमा अनिवार्य रुप से विभिन्न तरह की फिल्म सोसाइटी का हिस्सा रहा है। ‘सत्यजीत रे’, ‘ऋत्विक घटक’ फिल्म निर्माण के साथ साथ फिल्म सोसाइटी का भी हिस्सा रहे हैं। बाद में ‘गिरीश कासारवली’, ‘जानू बरुआ’, ‘अदूर गोपालकृष्णन’ जैसे फिल्मकार अपनी अपनी फिल्म सोसाइटी को लेकर काफी गंभीर रहे हैं। लेकिन जान अब्राहम द्वारा शुरु किया गया ओदेसा कलेक्टिव इसे एक नई ऊंचाई तक ले गया।
यह सुखद संयोग हैं कि आज फिर से इस तरह की पहलकदमी शुरु हो गयी है। और बाजार की निर्मम ताकतों को नजरअंदाज करते हुए फिल्में विशेषकर डाकूमेन्टरी फिल्मे बनने लगी हैं। जगह जगह फिल्म सोसायटी भी बनने लगी हैं। जिसके माध्यम से सार्थक फिल्में जनता तक भी पहुचने लगी हैं। ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ उनमें से एक है। लेकिन अभी भी इनकी पहुंच बहुत सीमित है। ग्रामीण आबादी तो इससे अभी भी दूर है। आज जरुरत है इन छोटे छोटे प्रयासों को ओदेसा कलेक्टिव के स्तर तक उठाने की। तभी सही माने में जन सिनेमा का विचार चरितार्थ हो सकेगा, जिसका सपना जान अब्राहम जैसे बहुत से लोगों ने देखा था। बिना इसके सिनेमा तो क्या कोई भी कला अपूर्ण है। कला की सार्थकता इसी में है कि वह जहां से आयी है वहां दुबारा लौटे यानी जन मानस के पास – ‘अपनी पूरी जीवन्तता और कलात्मकता के साथ’।

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